जबलपुर एयरपोर्ट का नाम वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम पर रखने का प्रस्ताव, मंत्री राकेश सिंह ने मुख्यमंत्री को सौंपा पत्र

भोपाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लोक निर्माण मंत्री  राकेश सिंह ने मंगलवार को मंत्रालय में सौजन्य भेंट की। इस दौरान मंत्री  सिंह ने जबलपुर एयरपोर्ट का नामकरण वीरांगना मां रानी दुर्गावती के नाम पर किए जाने का अनुरोध किया।

 सिंह ने इस संबंध में मुख्यमंत्री को एक पत्र सौंपते हुए कहा कि वीरांगना रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास की गौरवशाली वीरांगनाओं में से एक हैं। उन्होंने अपने साहस, पराक्रम और बलिदान से देश और समाज के लिए अमूल्य योगदान दिया है। विशेष रूप से महाकौशल क्षेत्र और जबलपुर से उनका ऐतिहासिक संबंध रहा है, जिसके कारण उनके नाम पर एयरपोर्ट का नामकरण क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।

लोक निर्माण मंत्री ने मुख्यमंत्री से इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर सकारात्मक विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जबलपुर एयरपोर्ट को मां रानी दुर्गावती के नाम से जोड़ना उनकी वीरता और बलिदान को सम्मान देने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से प्रेरणा लेने का अवसर भी प्रदान करेगा।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंत्री  सिंह द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन दिया। इस अवसर पर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महापुरुषों के सम्मान से जुड़े विभिन्न विषयों पर भी चर्चा हुई।

आधुनिक एवं स्मार्ट पुलिसिंग की दिशा में जीआरपी का महत्वपूर्ण कदम

भोपाल

बदलते अपराध स्वरूपों और आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप पुलिस बल को अधिक सक्षम, तकनीकी रूप से दक्ष एवं जनोन्मुख बनाने के उद्देश्य से शासकीय रेल पुलिस (जीआरपी) द्वारा आयोजित 15 दिवसीय विशेष पुलिस प्रशिक्षण (Smart Policing Training) शिविर का समापन विशेष पुलिस महानिदेशक दूरसंचार  संजीव कुमार शमी तथा अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रेल, भोपाल  राजाबाबू सिंह के मुख्य आतिथ्‍य में पी.टी.आर.आई. प्रशिक्षण केंद्र, भोपाल में सम्पन्न हुआ।

08 जून से 22 जून तक आयोजित इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में जीआरपी भोपाल, इंदौर एवं जबलपुर इकाइयों के आरक्षक से निरीक्षक स्तर तक के कुल 30 पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने सहभागिता कर प्रशिक्षण प्राप्त किया।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य पुलिस बल को आधुनिक अधिक ‘स्मार्ट’, तकनीकी रूप से सक्षम, और संवेदनशील बनाना था। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को साइबर अपराधों की जांच एवं रोकथाम, फॉरेंसिक विज्ञान, मानवाधिकार संरक्षण, तनाव प्रबंधन तथा नागरिकों के साथ बेहतर संवाद एवं जनसंपर्क स्थापित करने संबंधी विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षण में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया। पुलिस अधीक्षक रेल भोपाल  अंकित जायसवाल ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित थे।

 

उप मुख्यमंत्री शुक्ल की अध्यक्षता में मेगा स्वास्थ्य सेवा अधोसंरचना प्रोत्साहन नीति-2026 के प्रारूप पर मंत्रिपरिषद समिति ने किया विमर्श

भोपाल

उप मुख्यमंत्री एवं लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के मंत्री  राजेन्द्र शुक्ल की अध्यक्षता में वल्लभ भवन में मध्यप्रदेश (परोपकारी संस्थाओं के लिए) मेगा स्वास्थ्य सेवा अधोसंरचना प्रोत्साहन नीति-2026 के प्रारूप पर मंत्रिपरिषद समिति ने विमर्श किया। बैठक में प्रस्तावित नीति के विभिन्न प्रावधानों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया और समिति के सदस्यों ने नीति को जन-केंद्रित, सेवा-उन्मुख, गरीब एवं वंचित वर्गों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने संबंधी महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

बैठक में मंत्रिपरिषद समिति के सदस्य सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री  चैतन्य काश्यप, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री  नरेन्द्र शिवाजी पटेल, पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री मती राधा सिंह सहित अपर मुख्य सचिव लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा  अशोक बर्णवाल, आयुक्त  धनराजू एस तथा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

उप मुख्यमंत्री  शुक्ल ने कहा कि प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण तृतीयक एवं सुपर स्पेशलिटी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना समय की आवश्यकता है। विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, ग्रामीण क्षेत्रों तथा दूरस्थ अंचलों के नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए परोपकारी संस्थाओं की सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित नीति का मूल उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को सेवा-भाव एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ आमजन तक पहुंचाना है।

वर्तमान में प्रदेश गुणवत्तापूर्ण तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं पहुंच के क्षेत्र में चुनौतियों का सामना कर रहा है। सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों सहित उच्चस्तरीय स्वास्थ्य संस्थान मुख्यतः बड़े शहरों तक सीमित हैं, जिससे प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के नागरिकों को उपचार के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित करती है। प्रस्तावित नीति का उद्देश्य प्रदेश में उच्चस्तरीय तृतीयक एवं सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना को प्रोत्साहित करना, चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करना, विशेषज्ञ एवं एमबीबीएस चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाना, गरीब मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराना, अन्य राज्यों में उपचार के लिये मरीजों के पलायन को कम करना तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार लाना है।

नीति के अंतर्गत केवल सेवा-उन्मुख एवं लाभ-निरपेक्ष परोपकारी संस्थाओं को पात्र माना जाएगा। इनमें कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के अंतर्गत पंजीकृत कंपनियां, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के अंतर्गत पंजीकृत धर्मार्थ ट्रस्ट तथा सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएं शामिल हो सकेंगी। पात्र संस्थाओं के लिए न्यूनतम तीन वर्ष का पंजीकरण एवं सेवा गतिविधियों का संतोषजनक अनुभव होना प्रस्तावित किया गया है। चिकित्सा महाविद्यालय एवं नर्सिंग कॉलेज जैसी अतिरिक्त सुविधाएं विकसित करने वाली संस्थाओं को प्राथमिकता दिए जाने का भी प्रस्ताव है।

बैठक में प्रस्तावित प्रोत्साहनों की भी समीक्षा की गई। इसके अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा उपयुक्त भूमि का चयन कर रियायती दरों पर दीर्घकालीन लीज पर उपलब्ध कराने, सुपर स्पेशलिटी सेवाओं के लिये उच्च लागत वाले चिकित्सा उपकरणों पर निर्धारित शर्तों के अधीन अनुदान उपलब्ध कराने तथा विभिन्न स्वीकृतियों के लिए सिंगल-पॉइंट क्लियरेंस प्रणाली विकसित करने जैसे प्रावधानों पर चर्चा की गई।

मंत्रिपरिषद समिति ने नीति के प्रारूप का परीक्षण करते हुए सुझाव दिया कि इसके सभी प्रावधानों का केंद्र बिंदु आमजन, विशेषकर गरीब एवं वंचित वर्गों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना होना चाहिए। समिति ने नीति को अधिक सेवा-उन्मुख, पारदर्शी एवं जनहितकारी स्वरूप प्रदान करने पर बल दिया।

 

अल-नीनो और इथेनॉल की दोहरी मार! भारत के चीनी एक्सपोर्ट पर कई साल तक लग सकता है ब्रेक

 नई दिल्ली

भारत दुनिया के चीनी उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन आने वाले सालों में तस्वीर बदल सकती है. मौसम विशेषज्ञों ने इस साल अल-नीनो के असर से कम बारिश की आशंका जताई है. सरकार के इथेनॉल पर बढ़ते फोकस की वजह से गन्ने का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है. ऐसे में जानकारों का कहना है कि कम से कम तीन साल तक भारत के पास इतनी ज्यादा चीनी नहीं बच सकती कि वह बड़े पैमाने पर देशों को बेच सके। 

भारत में गन्ने की खेती काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर करती है. मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, इस साल बारिश सामान्य से कम रह सकती है. जून महीने में भी कई जगहों पर सामान्य से कम बारिश हुई है. इसी वजह से कुछ किसान गन्ने की जगह सोयाबीन, अरहर और दूसरी कम पानी वाली फसलें लगाने का फैसला कर रहें हैं. अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले सीजन में गन्ने की खेती और उत्पादन दोनों पर असर पड़ सकता है। 

चीनी की जरूरत ज्यादा, उत्पादन कम
उद्योग के अनुमान के मुताबिक, 2025-26 सीजन में भारत का चीनी उत्पादन करीब 2.79 करोड़ टन रह सकता है. वहीं देश में हर साल करीब 2.85 करोड़ टन चीनी की खपत होती है. यानी देश में जितनी चीनी बन रही है, उससे ज्यादा चीनी की जरूरत है. इसी वजह से मिलों में चीनी का स्टॉक घटकर करीब 35 लाख टन रह सकता है, जो कई दशक में सबसे कम लेवल में से एक होगा। 

इथेनॉल की बढ़ती मांग भी बड़ी वजह
सरकार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने पर जोर दे रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सके. इसके लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ रहा है. फिलहाल देश में इथेनॉल की मांग करीब 12 से 13 अरब लीटर है. आने वाले सालों में यह बढ़कर 30 अरब लीटर तक पहुंच सकती है. ऐसे में गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी की बजाय इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो सकता है। 

सरकार की नजर घरेलू सप्लाई पर 
भारत पहले दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी का एक्सपोर्टर था. 2022-23 तक पांच सालों में देश हर साल आमतौर पर 68 लाख टन चीनी विदेशों में बेचता था, जो वैश्विक चीनी करोबार का करीब 10% हिस्सा था. अब हालात बदल चुके हैं. सरकार की प्राथमिकता देश के भीतर चीनी की उपलब्धता बनाए रखना है. आने वाले सीजन में भी चीनी निर्यात को लेकर सख्त रुख देखने को मिल सकता है। 

क्या भारत को भी चीनी खरीदनी पड़ सकती है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अल-नीनो का असर ज्यादा रहा और गन्ने की खेती में बड़ी गिरावट आई, तो आने वाले वर्षों में भारत को विदेशों से चीनी खरीदने की जरूरत भी पड़ सकती है. भारत ने आखिरी बार 2016-17 और 2017-18 में चीनी आयात की थी. उस समय सूखे और कम उत्पादन की वजह से ऐसी स्थिति बनी थी। 

इससे पहले 2009 और 2010 में भारत की बड़ी खरीदारी ने दुनिया भर में चीनी की कीमतों को काफी ऊपर पहुंचा दिया था. कम बारिश की आशंका, गन्ने की खेती पर बढ़ता दबाव और इथेनॉल की बढ़ती मांग भारत के चीनी सेक्टर के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं। 

अगर मौसम के अनुमान सही साबित होते हैं, तो आने वाले कुछ सालों तक देश के पास विदेशों में बेचने के लिए अतिरिक्त चीनी कम बच सकती है. इतना ही नहीं, हालात ज्यादा बिगड़े तो भारत को भविष्य में चीनी आयात करने पर भी विचार करना पड़ सकता है। 

 

वैष्णो देवी यात्रा ने तोड़ा रिकॉर्ड, 22 जून तक 50.70 लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन, 10 लाख से ज्यादा की बढ़ोतरी

जम्मू
 उत्तर भारत के
पवित्रतम तीर्थ स्थलों में से एक श्री माता वैष्णो देवी जी की पावन यात्रा ने इस वर्ष एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। 22 जून 2026 को पवित्र गुफा में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की कुल संख्या 50 लाख के पार पहुँच गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल 50.70 लाख भक्त माता रानी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं।

यह उपलब्धि केवल एक सांख्यिकीय रिकॉर्ड नहीं, बल्कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, विश्वास और भक्ति का सशक्त प्रमाण मानी जा रही है। पिछले वर्ष इसी अवधि में लगभग 39.84 लाख श्रद्धालुओं ने यात्रा की थी, जबकि इस वर्ष यह संख्या बढ़कर 50.70 लाख तक पहुँच गई है, जो लगभग 10.86 लाख की उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाती है।

श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ यह भी स्पष्ट होता है कि यात्रा प्रबंधन और सुविधाओं में हुए सतत सुधारों पर भक्तों का विश्वास लगातार मजबूत हुआ है। श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा यात्रा को अधिक सुरक्षित, सुव्यवस्थित और सुविधाजनक बनाने के लिए पिछले वर्षों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।

बेहतर सुविधाओं पर भक्तों का भरोसा
श्राइन बोर्ड के दिशा-निर्देशन में, माननीय उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा के नेतृत्व में आधारभूत ढांचे के विस्तार, स्वच्छता व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाओं, आपदा प्रबंधन तैयारियों, बैटरी कार और रोपवे सेवाओं सहित कई क्षेत्रों में व्यापक सुधार किए गए हैं। इसके साथ ही डिजिटल सुविधाओं के विस्तार ने भी यात्रियों के अनुभव को अधिक सुगम और व्यवस्थित बनाया है।

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और सुविधा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है, और निरंतर निगरानी एवं व्यवस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के कारण यात्रा का संचालन सुचारू रूप से जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष के मध्य में ही 50 लाख का आंकड़ा पार करना आने वाले महीनों में यात्रा के और अधिक विस्तार का संकेत है। यह न केवल धार्मिक पर्यटन की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है, बल्कि इस पवित्र धाम के प्रति लोगों की गहरी आस्था और विश्वास को भी पुष्ट करता है।

माता वैष्णो देवी की यह पावन यात्रा सदैव की तरह श्रद्धा, संयम और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनी हुई है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु शांति और आशीर्वाद की अनुभूति प्राप्त करते हैं।

राम चरण बोले- अच्छी कहानियां आज भी दर्शकों को थिएटर तक खींच लाती हैं, ‘धुरंधर’ की जमकर तारीफ

 साउथ सुपरस्टार राम चरण ने अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘पेड्डी’ और आदित्य धर और रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ की जबरदस्त सफलता पर बात की. उन्होंने दावा किया कि इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर मिली जबरदस्त कामयाबी इस बात का सबूत है कि अच्छी कहानियों ने पूरे देश के दर्शकों को एकजुट किया है. अभिनेता ने आगे कहा कि कोविड-19 के बाद सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या कम होने के बावजूद, ‘केजीएफ’ और ‘पुष्पा’ जैसी अच्छी फिल्मों सुपरहिट रही.

राम चरण बोले- अच्छी फिल्में आज भी दर्शकों को थिएटर तक खींच लाती हैं
रिपब्लिक पत्रिका के शिखर सम्मेलन में राम चरण से पूछा गया कि लोग सिनेमाघरों में आना क्यों बंद कर चुके हैं. उन्होंने कहा, ”जब केजीएफ, पुष्पा 2, धुरंधर, कांतारा, आरआरआर जैसी बेहतरीन फिल्में आती हैं, तो लोग सिनेमाघरों में वापस आने लगते हैं. कोविड के बाद, हम सभी थोड़े डरे हुए थे कि क्या वे वापस आएंगे. भारत में आज भी सिनेमा सबसे किफायती एंटरटेनमेंट ऑप्शन है. पूरा परिवार साथ में फिल्म देखने जाता है और फिल्म खत्म होने के बाद भी उसी की बातें करता रहता है. यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने वाला एक शानदार एक्सपीरियंस भी है. हां, अगर पॉपकॉर्न के दाम थोड़े कम हो जाएं तो बात और भी बेहतर हो जाएगी.”

 धुरंधर की तारीफ करते हुए क्या बोले राम चरण
धुरंधर की तारीफ करते हुए राम चरण ने कहा, “मुझे यह फिल्म बेहद शानदार लगी. हाल ही में मैंने इसे OTT पर देखा और फिल्म का हर पहलू बिल्कुल सही तरीके से काम करता है. इसकी कहानी, ट्रीटमेंट और गति सब कुछ शानदार था. इस फिल्म ने लोगों को एकजुट किया है. यही वजह है कि इसने 1800 करोड़ रुपये से ज्यादा का कलेक्शन किया. बॉक्स ऑफिस का आंकड़ा सिर्फ कमाई नहीं दिखाता, बल्कि यह बताता है कि कितने लोगों ने फिल्म को पसंद किया.

 धुरंधर और धुरंधर- द रिवेंच के बारे में
आदित्य की फिल्म ‘धुरंधर’ दिसंबर 2025 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई और इसने दुनिया भर में 1300 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की. ‘धुरंधर: द रिवेंज’ इसी साल मार्च में रिलीज हुई और इसने दुनिया भर में 1800 करोड़ रुपये से अधिक का कलेक्शन किया. ये दोनों फिल्में जबरदस्त हिट रहीं और इनमें हमजा उर्फ ​​जसकिरत सिंह रंगी (रणवीर) की कहानी दिखाई गई है, जिसे आतंकी शिविरों में घुसपैठ करने के लिए पाकिस्तान के लयारी भेजा जाता है.

पेड्डी का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन
बुची बाबू सना की फिल्म ‘पेड्डी’, जिसमें राम चरण और जाह्नवी कपूर मुख्य भूमिका में हैं, 4 जून को सिनेमाघरों में रिलीज हुई. ट्रेड वेबसाइट Sacnilk के अनुसार, फिल्म ने भारत में 235 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया और रिलीज के 19 दिनों में दुनिया भर में 331 करोड़ रुपये का कुल कलेक्शन किया.

आदित्य के लिए ‘कुर्बानी’ देने वाला नेता भी बागी, उद्धव ठाकरे के सामने गहराया अस्तित्व का संकट

मुंबई 

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना की सियासत मातोश्री से ही चलती रही है. एक समय था कि ‘मातोश्री’ का हुक्म आखिरी माना जाता था, लेकिन आज मातोश्री अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. शिवसेना (यूबीटी) के मुखिया उद्धव ठाकरे के सामने एक बार फिर से पार्टी और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। 

पिछले चार साल में दूसरी बार उद्धव की पार्टी में टूट पड़ी है. 2022 में सत्ता और शिवसेना गंवाई और चार साल के बाद फिर से टूट हो गई है. इस बार 6 लोकसभा सांसद उद्धव का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ चले गए और अब विधायकों पर भी संकट गहरा गया है। 

ठाकरे परिवार के सामने संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस नेता ने साल 2019 में उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे के राजनीतिक उदय के लिए हंसते-हंसते अपनी सीट का बलिदान दे दिया था, आज वह भी उद्धव का साथ छोड़कर बागियों के पाले में जा खड़ा हुआ है. यह केवल एक विधायक का टूटना नहीं है, बल्कि ठाकरे परिवार के प्रति निष्ठा की दीवारों में आई गहरी दरार का सबूत है। 

उद्धव ठाकरे की बैठक में नहीं पहुंचे चार विधायक 
उद्धव ठाकरे ने विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों की बैठक बुलाई थी. ऑपरेशन टाइगर की चर्चा के बीच बुलाई गई उद्धव की बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के तीन विधायक और एक एमएलसी नहीं पहुंचे. इसके चलते एक बार फिर रा चर्चा तेज हो गई कि सांसदों के बाद क्या अब उद्धव गुट के विधायक भी शिंदे सेना का दामन थामेंगे। 

हालांकि, इन विधायकों ने अपनी गैरहाजिरी के बारे में पार्टी को पहले ही बता दिया था कि वे बैठक में नहीं आ पाएंगे. उन्होंने अपनी गैर-मौजूदगी के लिए एमएलसी चुनाव, खराब सेहत और निजी कामों का हवाला दिया था. ऐसी ही बातें उस समय भी सामने आई थी, जब बैठक से सांसद नदारद रहे थे. इस बार की फेहरिश्त में एक नाम बहुत अहम है, वो सुनील शिंदे का है. MLC सुनील शिंदे ही वो नेता हैं, जिन्होंने आदित्य ठाकरे के लिए अपनी वर्ली सीट खाली की थी। 

आदित्य के लिए सीट छोड़ने वाला नेता क्या होगा बागी 
उद्धव ठाकरे के सियासी विरासत को आगे बढ़ाने का बीढ़ा आदित्य ठाकरे ने उठा रखा है. ठाकरे परिवार के इतिहास में पहली बार कोई सदस्य 2019 के विधानसभा चुनाव मैदान में  उतरने का फैसला किया था. ये नाम आदित्य ठाकरे का है, जिनके लिए सबसे सुरक्षित और मुफीद सीट ‘वर्ली’ चुनी गई. इस सीट पर शिवसेना के कद्दावर नेता सुनील शिंदे का दबदबा था, वो 2014 में वर्ली से विधायक बने थे। 

आदित्य ठाकरे का जब चुनाव लड़ने का फैसला तय हो गया और मातोश्री से आदेश आया, तो सुनील शिंदे ने बिना एक पल गंवाए, अपनी जीती-जतायी सीट आदित्य ठाकरे के लिए ‘कुर्बान’ कर दी. आदित्य ठाकरे वर्ली से चुनाव लड़े और जीतकर विधायक बने. 2024 में दूसरी बार विधायक बने हैं। 

सुनील शिंदे के सीट छोड़ने के फैसले को शिवसेना की परंपरा और ठाकरे परिवार के प्रति अटूट निष्ठा के रूप में देखा गया था, लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि आज वही ‘त्याग’ करने वाला नेता उद्धव की बैठक से दूर रहा.  ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या सुनील शिंदे भी बागी गुट के साथ जाना चाहते हैं, जिसके लिए उद्धव की बैठक में शामिल नहीं हुए. सुनील शिंदे भी बागी गुट के साथ जाते हैं और उद्धव से मुंह मोड़ लेते तो फिर पार्टी के भीतर असंतोष की आग काफी गहरी है। 

उद्धव ठाकरे के लिए गहराया अस्तित्व का संकट?
शिवसेना (यूबीटी) के एक के बाद एक करीबियों का साथ छोड़ना उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ एक राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व की साख पर बड़ा सवालिया निशान है। इसके मुख्य रूप से तीन बड़े कारण नजर आते हैं. बागियों का हमेशा से यही आरोप लगाया है कि उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे तक आम विधायकों और कार्यकर्ताओं की पहुंच बेहद मुश्किल हो गई है. ‘मातोश्री’ के दरवाजे जो कभी शिवसैनिकों के लिए हमेशा खुले रहते थे, वहां एक खास घेरा तैयार हो गया था। 

उद्धव ठाकरे की पार्टी में हुई बगावत ने महाविकास अघाड़ी का ढांचा पूरी तरह हिल गया. महाराष्ट्र में कांग्रेस के बाद उद्धव की पार्टी के पास सांसद थे, लेकिन शिंदे के ऑपरेशन टाइगर ने उन्हें सियासी हाशिए पर पहुंचा दिया है. इस टूट-फूट के चलते उद्धव ठाकरे की सियासी ताकत कमजोर पड़ी है. शिवसेना के पास 3 सांसद ही रह गए हैं और उद्वव की बैठक से तीन विधायक और एक एमएलसी की गैर-मौजूदगी अगर बगावत में बदलती है तो फिर महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे के लिए मुश्किल हो जाएगी। 

महाविकास अघाड़ी के गठन के बाद से ही पारंपरिक शिवसैनिकों का एक बड़ा वर्ग असहज महसूस कर रहा था. कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन को जमीनी स्तर पर शिवसैनिक पचा नहीं पाए, जिसका फायदा विरोधी गुट ने पहले उठाया और अब भी उठा रहे हैं. बालासाहेब ठाकरे के समय शिवसेना में कोई बगावत सोच भी नहीं सकता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि जिन नेताओं को उद्वव ठाकरे के लेकर आए, वो भी बागी हो गए हैं। 

क्या आदित्य ठाकरे का सियासी भविष्य खतरे में है?
बालासाहेब ठाकरे के सियासी वारिस उद्धव ठाकरे बनकर उभरे, लेकिन बगावत के बाद एकनाथ शिंदे ने खुद को साबित किया. उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं का ठिकाना शिंदे की शिवसेना ही बन रही है. शिवसेना की असली ताकत हमेशा से मुंबई, ठाणे, और कोंकण के तटीय इलाके रहे हैं. पहली बगावत के बाद इन क्षेत्रों के विधायकों, नगरसेवक और जमीनी स्तर के नेता शिंदे के साथ जा चुके हैं। 

शिवसेना में फंड और बूथ मैनेजमेंट संभालने वाले कद्दावर नेता भी पाला बदल चुके हैं.इस तरह से जब आपकी अपनी जमीन पर ही सियासी घेराबंदी हो रही हो, तो आप सहयोगियों से राज्य स्तर पर बड़ी रियायतों की मांग नहीं कर सकते. अब उद्धव ठाकरे का सियासी वारिस आदित्य ठाकरे माने जा रहे, लेकिन जिस तरह पार्टी के नेता साथ छोड़कर शिंदे के साथ एक के बाद एक जा रहे हैं, उससे आदित्य ठाकरे लिए अपनी राजनीति को बुलंदी तक ले जाना मुश्किल हो सकती है। 

साल 2019 में मुंबई की वर्ली सीट से जिस नेता ने कुर्बानी दी थी, उसी क्षेत्र में अब आदित्य ठाकरे के लिए आने वाले चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं. 2024 में भी शिंदे और बीजेपी ने मिलकर वर्ली सीट पर आदित्य ठाकरे को घेरने का प्लान बनाया था, लेकिन जीतने में सफल रहे थे। 

आदित्य ठाकरे को शिवसेना के ‘युवा चेहरे’ और भविष्य के नेता के रूप में पेश किया गया था, लेकिन इस ताजा बगावत ने उनके नेतृत्व कौशल और टीम मैनेजमेंट पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. शिवसेना में यह लड़ाई अब सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि ‘असली विरासत’की है. ऐसे में जब त्याग करने वाले पुराने वफादार भी साथ छोड़ दें, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि नेतृत्व में कहीं न कहीं कोई गंभीर कमी है। 

क्या वापसी कर पाएंगे उद्धव और आदित्य ठाकरे? 
उद्धव ठाकरे के सामने अब अपनी बची-कुची साख और संगठन को बिखरने से बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है. सहानुभूति कार्ड हमेशा काम नहीं आता, जमीन पर उतरकर संगठन को नए सिरे से खड़ा करना होगा. एक तरफ जहां विरोधी गुट पूरी तरह से आक्रामक है और खुद को ‘असली शिवसेना’ और बालासाहेब ठाकरे के सियासी वारिस के तौर पर साबित करने में जुटा है तो उद्धव ठाकरे के लिए यह करो या मरो की स्थिति है। 

महाराष्ट्र की राजनीति को लंबे समय तक बालासाहेब ठाकरे ने अपने हिसाब से चला. सूबे में शिवसेना का अपना सियासी मुकाम हुआ करता था, लेकिन चार साल में दो बार पार्टी में टूट-फूट हो जाने से सियासी टेंशन बढ़ गई है. उद्धव ठाकरे को एक के बाद एक सियासी झटका लग रहा है, जो उनके लिए राजनीतिक टेंशन का सबब बन गया है। 

उद्धव ठाकरे के लिए बीजेपी के साथ वापस जाने के सारे रास्ते वैचारिक और राजनीतिक रूप से बंद हो चुके हैं. कांग्रेस और शरद पवार इस बात को बहुत ही अच्छी तरह से जानते हैं कि उद्धव ठाकरे के पास महाविकास अघाड़ी में बने रहने के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं है.सियासत में जब सहयोगियों को पता हो कि आपके पास जाने के लिए कोई और दरवाजा नहीं है, तो वे अपनी शर्तें ज्यादा मजबूती से थोपते हैं।   

उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे अब भी अपने बचे हुए नेताओं को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतने में नाकाम रहते हैं, तो ठाकरे ब्रांड का यह सबसे कठिन दौर उनके राजनीतिक अवसान की शुरुआत भी साबित हो सकता है, लेकिन उसके लिए मातोश्री से बाहर निकलकर जमीन पर उतरकर संघर्ष करना होगा, जैसे 2022 में बगावत के बाद पिता-पुत्र की जोड़ी जमीन पर पसीना बहाते नजर आए थे। 

धर्मांतरण विवाद पर आमने-सामने आए ईसाई और आदिवासी समाज, गांव बना पुलिस छावनी

नारायणपुर.

जिले के भरण्डा गांव में धर्मांतरण को लेकर विवाद गहरा गया है। सुबह से गांव में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। हालात को देखते हुए प्रशासन ने गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया है। बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है।

जानकारी के अनुसार, करीब 26 मतांतरित परिवारों का आरोप है कि गांव के आदिवासी ग्रामीणों ने उन्हें गांव छोड़ने का फरमान जारी किया है। उनका कहना है कि उनसे ईसाई धर्म का पालन छोड़कर आदिवासी रीति-रिवाज अपनाने का दबाव बनाया जा रहा है। परिवारों का दावा है कि उन्हें घरों से बाहर निकालने की कोशिश की गई। वहीं, आदिवासी समुदाय का कहना है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले कुछ लोग गांव की पारंपरिक आदिवासी संस्कृति, रीति-रिवाज और देवी-देवताओं का अपमान करते हैं। समुदाय का कहना है कि यदि वे गांव में रहना चाहते हैं तो उन्हें आदिवासी परंपराओं का सम्मान करना होगा अन्यथा गांव छोड़ना होगा।

पुलिस ने की शांति बनाए रखने की अपील
दोनों पक्षों के बीच इस मुद्दे को लेकर जमकर कहासुनी और झूमाझटकी हुई। हालांकि पुलिस की मौजूदगी से स्थिति फिलहाल नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन गांव में तनाव बना हुआ है। दोनों पक्ष एक-दूसरे का बात मानने तैयार नहीं हैं। किसी भी तरह का समझौता होता नहीं दिख रहा है। प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। पुलिस अधिकारियों ने लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों से बचने की अपील की है। मामले को सुलझाने के लिए प्रशासन दोनों पक्षों से बातचीत कर रहा है।

कांकेर के जंगल में नक्सलियों का विस्फोटक डंप बरामद, 4 बंदूकें और 2 वायरलेस सेट मिले

कांकेर.

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में सुरक्षाबलों को एक बार फिर बड़ी सफलता हाथ लगी है. सर्च अभियान के दौरान आमाटोला के जंगल में नक्सलियों का खुफिया डंप बरामद हुआ है. जहां हथियार समेत अन्य नक्सल सामान छिपाकर रखी गई थी.

यह पूरी कार्रवाई कांकेर पुलिस, बीएसएफ और बीडीएस की संयुक्त टीम ने की है. जानकारी के अनुसार, वरीष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार संयुक्त अभियान संचालित किया जा रहा है. इसी कड़ी में मंगलवार को छोटेबेठिया थाना क्षेत्र के आमाटोला के पास जंगल में सर्चिंग के दौरान जवानों को कुछ संधिग्ध नजर आया. जांच में नक्सलियों का विस्फोटक डंप मिला, जिसमें से कई नक्सल सामान बरामद किया गया है. 

नक्सल डंप से क्या-क्या मिला?
भारमार बंदुक-04 नग
वायरलेस सेट-02
रेडियो-01नग
नक्सल वर्दी-01नग
पोच-02 नग
चार्जर-01नग
बैटरी-01नग

नक्सल साहित्य के अलावा अन्य नक्सल सामग्री बरामद किया गया. जिसे सुरक्षित तरीके से बाहर निकाला गया. अभियान के बाद सभी जवान वापस कैंप लौट आए हैं. सुरक्षा एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि जिले के संवेदनशील और दूरस्थ क्षेत्रों में आगे भी संयुक्त सर्च अभियान लगातार जारी रहेंगे.

राजनांदगांव मंडी में जलभराव से हाहाकार, चबूतरों पर रखा धान भी भीगा

राजनांदगांव.

आज शाम को अचानक मौसम में आए परिवर्तन के बाद 1 घंटे तक कोई मूसलाधार बारिश है. बसंतपुर क्षेत्र में स्थित कृषि उपज मंडी परिसर में भी पानी का जमाव हो गया. जगह-जगह पानी का जमा होने से किस से लेकर आम लोगों की परेशानियां बढ़ी रही.

प्रवेश द्वार के समीप भी नाले की साफ सफाई नहीं होने के कारण नाले में पानी का जमाव हो जाने से प्रवेश द्वार के समीप भी अधिक पानी भर जाने से वाहन चालक भी परेशान होते रहे. अचानक हुई बारिश से शेड के नीचे चबूतरे पर रख धान भी भीग गया. बारिश से बोरों को बचाने के लिए हमाल को काफी मशक्कत करनी पड़ी. राजनांदगांव जिले में भी लगातार मौसम में आ रहे परिवर्तन की बात कभी तेज तो कभी रुक रुक कर बारिश हो रही है इससे जन जीवन प्रभावित हो रहा है.

दो दिनों तक बारिश होने के बाद आज फिर से दोपहर बाद अचानक मौसम में परिवर्तन देखने को मिला शाम 5 बजे से 6 बजे तेज गर्जना और हवाओं के बीच मूसलाधार बारिश हुई. अचानक बारिश होने से मंडी परिसर में रखा धान भी भींग गया. जगह-जगह पानी का जमाव भी देखने को मिला है. ऐसे में मंडी में व्यवस्थापन करने वालों की परेशानियां बढ़ी रही.

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