दिग्विजय सिंह पर कांग्रेस महासचिव का बड़ा हमला, बोलीं- पुत्र मोह में संगठन को पहुंचा रहे नुकसान

भोपाल
उज्जैन के वीर भारत न्यास को कथित तौर पर एक रुपए में करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन आवंटित किए जाने के मुद्दे पर कांग्रेस का अंदरूनी विवाद और गहरा गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच शुरू हुई बयानबाजी अब संगठन के भीतर खुली नाराजगी में बदलती नजर आ रही है। कांग्रेस की प्रदेश महासचिव निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी ने फेसबुक पोस्ट के जरिए दिग्विजय सिंह पर तीखा हमला बोलते हुए पार्टी नेतृत्व से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है। पूर्व सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी निधि ने अपनी पोस्ट में कहा कि किसी भी वरिष्ठ नेता को प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ सार्वजनिक मंच से बयान देकर पार्टी की छवि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी मुद्दे पर असहमति थी तो उसे संगठन के भीतर उठाया जाना चाहिए था, न कि मीडिया के सामने।

पीसी में पटवारी के दावों को खारिज करने पर कांग्रेस की प्रदेश महासचिव निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखकर दिग्विजय सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग तक कर डाली।

निधि चतुर्वेदी पूर्व सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी हैं। उन्होंने अपनी लिखा दिग्विजय का नागपाश, कांग्रेस पर प्रहार…उन्होंने लिखा कि उज्जैन भूमि विवाद में कौन सही है और कौन गलत, यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्हें कटघरे में खड़ा करना किसी भी वरिष्ठ नेता को शोभा नहीं देता।

उन्होंने कहा कि यदि जीतू पटवारी से कोई गलती हुई थी तो दिग्विजय सिंह उन्हें फोन पर, आमने-सामने या पार्टी के आंतरिक मंचों पर अपनी बात बता सकते थे। इसके बजाय उज्जैन जाकर मीडिया के सामने प्रदेश अध्यक्ष के बयान को खारिज करना और उनके लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना पार्टी अनुशासन के खिलाफ है।

मंत्री सारंग बोले- अगर कांग्रेसी ही आरोप लगा रहे तो पार्टी को ध्यान देना चाहिए
कांग्रेस में मची अंर्तकलह पर एमपी के खेल मंत्री विश्वास सारंग ने कहा- कांग्रेस के नेता ही दिग्विजय सिंह को स्लीपर सेल कह रहे हैं। सही मायनों में कांग्रेस जनता को गुमराह कर रही है। कांग्रेस की गुटबाजी और आंतरिक कलह अब पूरी तरह जमीन पर उतर आई है।

कांग्रेस नेत्री निधि चतुर्वेदी के बयान पर मंत्री सारंग ने कहा- यदि कांग्रेस का कोई नेता ऐसा आरोप लगा रहा है तो कांग्रेस को इस पर ध्यान देना चाहिए।

‘पुत्र-मोह’ में उठाया कदम
निधि चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह का यह व्यवहार उनके “पुत्र-मोह” का परिणाम है। उन्होंने लिखा कि अपने बेटे जयवर्धन सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की महत्वाकांक्षा में दिग्विजय सिंह पार्टी अनुशासन भूल चुके हैं।

‘भाजपा को ऑक्सीजन दे रहे’
पोस्ट में उन्होंने कहा कि जब राहुल गांधी और कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा और संघ की विचारधारा के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, तब पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा अपने ही प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से कमजोर करना विपक्ष को राजनीतिक फायदा पहुंचाने जैसा है। उन्होंने इसे कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान पर चोट बताया।

व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा संगठन पर भारी
निधि चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और पुत्र-मोह के कारण संगठन को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि अपने बेटे जयवर्धन सिंह को आगे बढ़ाने की राजनीति में पार्टी अनुशासन की अनदेखी की जा रही है।

बीजेपी को मिल रहा राजनीतिक फायदा
फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि जब कांग्रेस भाजपा और आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ संघर्ष कर रही है, तब अपने ही प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा करना विपक्ष को मजबूत करने जैसा है। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित हो रहा है।

2020 से राज्यसभा चुनाव तक का जिक्र
निधि ने अपनी पोस्ट में 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने, 2023 विधानसभा चुनाव, 2024 लोकसभा चुनाव और हालिया राज्यसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि लगातार अंदरूनी खींचतान से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने इसे संगठन के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।

हाईकमान से कार्रवाई की मांग
पोस्ट के अंत में निधि चतुर्वेदी ने कांग्रेस नेतृत्व से दिग्विजय सिंह के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मांग की। उनका कहना है कि संगठन की साख और कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखने के लिए शीर्ष नेतृत्व को हस्तक्षेप करना चाहिए।

बीजेपी ने भी साधा निशाना
कांग्रेस में बढ़ते विवाद पर प्रदेश के खेल मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि जब कांग्रेस के नेता ही दिग्विजय सिंह पर सवाल उठा रहे हैं तो पार्टी को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की गुटबाजी अब खुलकर सामने आ चुकी है। 

क्या है पूरा मामला
दरअसल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि उज्जैन में वीर भारत न्यास को करीब 500 करोड़ रुपए मूल्य की सरकारी जमीन मात्र एक रुपए में आवंटित की गई। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने उज्जैन में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इस आरोप से असहमति जताई। इसी बयान के बाद कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए, जिन्हें अब निधि चतुर्वेदी की पोस्ट ने और हवा दे दी। 

TMC के तीनों गुटों पर शुभेंदु अधिकारी का सियासी वार, एक ही दिन में मिले तीन बड़े झटके

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य की कमान अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के हाथों में है, सरकार बदलने के बाद तृणमूल कांग्रेस इतिहास के अपने सबसे बड़े संगठनात्मक और राजनीतिक संकट से गुजर रही है. महज दो महीनों के भीतर 28 साल पुरानी टीएमसी न सिर्फ सत्ता से बाहर हुई, बल्कि तीन अलग-अलग धड़ों में बंट गई है. अब तीनों ही गुट शुभेंदु सरकार के निशाने पर है। 

टीएमसी में टूट का आगाज चुनाव से पहले ही हो गया था. हुमांयू कबीर टीएमसी से अलग होकर अपनी पार्टी बना लगी थी और दो सीटों से चुनाव जीतने में सफल रहे थे. चुनाव नतीजे के बाद ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के 80 में से 60 विधायकों और काकोली घोष की अगुवाई में 20 लोकसभा सांसद ने ममता बनर्जी से अलग राह चुन ली. एक धड़ा ममता बनर्जी के वफादार का भी है। 

बंगाल की सत्ता पर काबिज बीजेपी और उसकी अगुवाई कर रहे सीएम शुभेंदु अधिकारी की सरकार के निशाने पर इन दिनों टीएमसी के तीनों धड़े हैं. ममता बनर्जी का वफादार खेमा हो या फिर बागी गुट. इसके अलावा हुमायूं कबीर पर भी शिकंजा कसा जा रहा है। 
 
ममता बनर्जी गुट पर सरकार की टेंढी नजर
विधानसभा चुनाव की शिकस्त और पार्टी में हुई ऐतिहासिक टूट (80 में से करीब 60 विधायकों का साथ छोड़ना) के बाद ममता बनर्जी अपने बचे-खुचे वफादार नेताओं के साथ सड़क पर संघर्ष कर रही हैं. हालांकि, शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा के पटल से साफ एलान कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस अब एक बंद अध्याय है और ममता कभी सत्ता में नहीं लौटेंगी। 

शुभेंदु सरकार अब पूरी तरह ममता बनर्जी गुट को सियासी रूप से पूरी तरह पंगु बनाने के लिए 2011 से 2026 के शासनकाल के दौरान हुए ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’, भाई-भतीजावाद और राशन-भर्ती घोटालों की जांच को तेज कर रही है, शाहजहां शेख, शौकत मोल्ला और जहांगीर खान जैसे ममता के करीबी और बाहुबली नेताओं पर कानूनी शिकंजा कसना सीधे तौर पर ममता गुट की रीढ़ तोड़ने की रणनीति का हिस्सा है। 

कोलकाता की राजनीति में21 जुलाई का ‘शहीद दिवस’ की अपनी सियासी अहमियत है. टीएमसी के लिए यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि पार्टी की आत्मा है. ममता बनर्जी का आधिकारिक खेमा इस दिन रैली करने की तैयारी की है, लेकिनप्रशासन ने पूरे इलाके में धारा 163 लागू कर कार्यक्रम के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया है. इसके चलते ममता खेमे के शक्ति प्रदर्शन की तैयारी पर पुलिस की सख्ती ने पानी फेर दिया। 

ऋतब्रत बनर्जी की खिलाफ सरकार गुई सख्त
मई 2026 में दिल्ली के बंगा भवन में सीएम शुभेंदु अधिकारी से एक ‘आकस्मिक मुलाकात’ के बाद टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी  ने पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था. अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव से नाराज ऋतब्रत बनर्जी ने 60 विधायकों को अपने साथ मिला लिया और विधानसभा में खुद को ‘असली टीएमसी’ बताते हुए विपक्ष के नेता बन गए। 

हालांकि, शुरुआत में ऋतब्रत बनर्जी की बगावत से शुभेंदु को फायदा हुआ, लेकिन अब ऋतब्रत गुट सरकार के निशाने पर है. हाल ही में जब शुभेंदु सरकार ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता(UCC) विधेयक की समीक्षा के लिए कमेटी गठित करने का प्रस्ताव रखा, तो ऋतब्रत बनर्जी  के नेतृत्व वाले इस बागी गुट ने इसका कड़ा विरोध किया और सदन से वॉकआउट कर दिया। 

सीएम शुभेंदु ने साफ कर दिया है कि सरकार के एजेंडे में बाधा डालने वाले किसी भी गुट को बख्शा नहीं जाएगा. ममता बनर्जी की तरह ऋतब्रत बनर्जी के अगुवाई वाले बागी गुट ने शहीद दिवस पर रैली करने की योजना बनाई थी. इसे बागी गुट एक नई शुरुआत के तौर पर पेश करना चाहता है, लेकिन शुभेंदु सरकार ने शहीद दिवस पर होने वाले कार्यक्रम के लिए इजाजत नहीं दिया. इस तरह ऋतब्रत बनर्जी के गुट के सियासी अरमानों पर पानी फिर गया है। 

हुमायूं कबीर के खिलाफ कसता कानूनी शिकंजा
टीएमसी से निलंबित होने के बाद ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP) बनाने वाले नौदा के विधायक हुमायूं कबीर इस समय शुभेंदु सरकार के सबसे तीखे निशाने पर हैं. मुर्शिदाबाद में एक जनसभा के दौरान हुमायूं कबीर ने भाजपा नेतृत्व को धमकी देते हुए कहा था कि जिस दिन मैंने हजारों मुस्लिमों को एकजुट कर सड़कों पर उतार दिया, उस दिन इतना कड़ा प्रहार करूंगा कि भाजपा का झंडा उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। 

हुमांयू कबीर के भड़काऊ और सांप्रदायिक बयान पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अब बहुत हुआ, ऐसे तत्वों को स्थायी सबक सिखाने का समय आ गया है. शुभेंदु सरकार ने कबीर के खिलाफ रेजिनगर और शक्तिपुर थानों में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज कराए हैं. शुभेंदु ने चेतावनी देते हुए कि यह हुमायूं कबीर का आखिरी ऐसा बयान होगा और राज्य में कानून का राज स्थापित करने के लिए गुंडागर्दी को पूरी तरह कुचल दिया जाएगा। 
 
बंगाल में हुमायूं कबीर जैसे नेताओं पर भड़काऊ बयानों के लिए कानूनी चाबुक चलाकर,शुभेंदु सरकार ने यह साफ संदेश दे दिया है कि टीएमसी का कोई भी धड़ा यदि उनके एजेंडे के आड़े आया, तो सियासी अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे। 

उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ने वाले नेता को बड़ी जीत, अगले ही दिन बने MLC

मुंबई 

शिवसेना यूबीटी को लगातार दूसरे दिन झटका लगा है। पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे की शिवसेना में गए सचिन अहीर को बुधवार को विधान परिषद का उपसभापति चुन लिया गया था। खास बात है कि चुनाव से ठीक पहले ही उन्होंने दल बदल का ऐलान किया था, जिसके बाद शिवसेना ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। इससे पहले वह उद्धव गुट से एमएलसी थे।

अहीर सत्तारूढ़ महायुति के उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध विधान परिषद के उपसभापति चुने गए हैं। उन्होंने मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, निवर्तमान उपसभापति नीलम गोरे और मंत्री चंद्रकांत पाटिल की उपस्थिति में अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। दरअसल, महाविकास अघाड़ी प्रत्याशी जेएम अभ्यंकर ने अपना नामांकन वापस ले लिया था।

पहले एनसीपी में थे अहीर
अहीर का शिंदे खेमे में जाना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। उनका जाना विशेष रूप से मुंबई के वर्ली निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी का कमजोर होना तय है। कहा जा रहा है कि यहां उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में एक मजबूत राजनीतिक और संगठनात्मक आधार तैयार किया है।

अहीर ने नब्बे के दशक में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी और बाद में वे अविभाजित शिवसेना में शामिल हो गए थे। उन्हें आदित्य ठाकरे का एक बेहद भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था।

अब विधायक टूटने की आशंका
वार्ता ने राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से बताया कि अहीर के पाला बदलने के बाद उद्धव गुट के विधायक भी बड़ा फैसला ले सकते हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है।

एजेंसी से बातचीत में सूत्रों ने बताया कि शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना पिछले कुछ समय से अहीर को अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही थी और मुंबई उत्तर-पूर्वी के सांसद संजय दीना पाटिल के पार्टी में शामिल होने के बाद यह अटकलें और तेज हो गई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें उपसभापति पद के लिए चुनाव लड़ने का आश्वासन दिया गया था, जिसके कारण उन्होंने शिंदे गुट में शामिल होने का निर्णय लिया।

6 सांसद छोड़ चुके साथ
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहा है, जब हाल ही में उद्धव गुट से 6 सांसदों ने किनारा कर लिया है। ये सभी नेता एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना को समर्थन दे रहे हैं। खास बात है कि अब शिवसेना यूबीटी के पास लोकसभा में महज 3 और राज्यसभा में 1 सांसद बचा है। वहीं, कहा यह भी जा रहा है कि जल्द ही 14 और विधायक भी टूट सकते हैं।

मोदी कैबिनेट विस्तार में यूपी से पंजाब तक का दबदबा! क्या बागियों को भी मिलेगा मौका?

नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगुवाई वाली केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में कई बदलावों की तैयारी चल रही है. माना जा रहा है कि अगले कुछ ही दिनों में मोदी सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार हो सकता है. कैबिनेट विस्तार में कई नए मंत्रियों का नाम जुड़ सकते हैं तो कुछ पुराने मंत्रियों की मंत्रिमंडल से छुट्टी हो सकती है। 

मोदी कैबिनेट के विस्तार का रोडमैप तैयार किया जा रहा है. मंत्रिमंडल विस्तार का फोकस उन राज्यों पर रहेगा, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके चलते माना जा रहा है कि मोदी मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब, उत्तराखंड जैसे राज्यों से प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। 

केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार की तारीख से लेकर मंत्रिमंडल के चेहरों तक पर कयास लगाए किए जा रहे हैं. 11 जुलाई तक पीएम मोदी का कई कार्यक्रम और दौरे लगे हुए हैं. संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरु हो सकता है. ऐसे में मॉनसून सत्र से पहले मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है? 

मोदी कैबिनेट विस्तार से समीकरण साधने का दांव
देश की सियासत में सबसे ज्यादा चर्चा मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर हो रही है. बीजेपी और सरकार के शीर्ष नेतृत्व के बीच राय प्रबल हो रही है कि अहम मंत्रालयों में नए चेहरों को शामिल किए जाए. साथ ही क्षेत्रीय, राज्यवार, जातीय और राजनीतिक निष्ठा से जुड़े समीकरणों को ध्यान में रखकर मंत्रिपरिषद में संतुलन बनाने की राजनीतिक मजबूरियां भी हैं। 

मोदी कैबिनेट में शामिल मंत्रियों में पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश और हर्ष मल्होत्रा दिल्ली के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं. ऐसे में प्रबल संभावना है कि  बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के अपने नियम का पालन करते हुए दोनों ही मंत्रियों की कैबिनेट से छुट्टी हो सकती है. इसके अलावा जॉर्ज कुरियन केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं तो केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो गया है। 

रवनीत बिट्टू भी देर-सबेर मंत्री पद छोड़ सकते हैं. इन चार जगह पर नए मंत्री बनाए जा सकते हैं तो 9 मंत्री पद पहले से ही खाली हैं. मोदी के अगुवाई सरकार में फिलहाल 72 मंत्री हैं, जिसमें 31 कैबिनेट, 5 स्वतंत्र प्रभार और 36 राज्यमंत्री. केंद्र सरकार में अधिकतम 81 मंत्री बन सकते हैं. इस लिहाज से 13 मंत्री पद की साफ जगह बन रही है. इसके अलावा कुछ मंत्रियों को कैबिनेट से हटाया भी जा सकता है तो कुछ नए मंत्रियों को एंट्री मिल सकती है। 

मंत्रिमंडल विस्तार में चुनावी राज्यों पर होगा फोकस
मोदी कैबिनेट विस्तार में बीजेपी का मुख्य फोकस उन राज्यों पर रह सकता है, जहां पर विधानसभा चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड और पंजाब सहित सात राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में साल के शुरू में ही चुनाव हैं तो हिमाचल प्रदेश और गुजरात में साल के आखिर में चुनाव होने हैं। 

विधानसभा चुनाव को देखते हुए पीएम नरेंद्र मोदी की नई कैबिनेट में चुनावी राज्यों सेप्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है ताकि सियासी समीकरणों को चुनाव के लिहाज से साधा जा सके. इसलिए इन राज्यों के कुछ नेताओं को मोदी कैबिनेट में जगह मिल सकती है. उत्तराखंड की बात करें तो अजय टम्टा मोदी कैबिनेट में परिवहन राज्य मंत्री हैं. टम्टा मोदी कैबिनेट में दूसरी बार राज्यमंत्री हैं और वे बीजेपी के दलित चेहरे हैं. ऐसे में नई टीम में उनका कद बढ़ाया जा सकता है या फिर एक और चेहरे को शामिल किया जा सकता है। 

उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब तक का दिखेगा दबदबा
यूपी से फिलहाल केंद्र सरकार में 10 मंत्री हैं, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं. अब यूपी चुनाव 2027 का रण साधने और राजनीतिक समीकरणों को जमीन पर उतारने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के जरिए बदलाव किया सकता है. 2024 में भले ही भाजपा का प्रदर्शन सूबे में खराब रहा हो, लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में यूपी की भूमिका कम नहीं हुई. विधानसभा चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में राज्य की भूमिका को बढ़ाया जा सकता है। 

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए पश्चिमी यूपी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ा स्थान मिल सकता है. पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ तक पश्चिमी यूपी पर फोकस करते दिखे हैं. इसके अलावा सूबे के जातीय समीकरण को साधने के लिए ओबीसी व दलित समुदाय से कुछ नए मंत्री बनाए जा सकते हैं। 

पंजाब में विधानसभा चुनाव है, जिसे देखते हुए मोदी मंत्रिमंडल में पंजाब का प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है. मोदी कैबिनेट में रवनीत सिंह बिट्टू एकलौते मंत्री हैं, जो पंजाब से हैं. रवनीत सिंह बिट्टू पंजाब के पूर्व सीएम बेअंत सिंह के पोते हैं. लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले वे कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे,लुधियाना सीट से लोकसभा का चुनाव हार गए थे, लेकिन फिर भी पीएम मोदी ने उन्हें अपने कैबिनेट में जगह दी थी। 

सिख समाज से आने वाले केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी यूपी कोटे से मंत्री हैं, लेकिन उन्हें पंजाब में सिख वोटों को साधे रखने के लिए कैबिनेट में जगह दे रखी है. माना जा रहा है कि पंजाब से दो से तीन मंत्री बनाए जा सकते हैं, जिसमें आम आदमी पार्टी से बीजेपी में आने वाले राज्यसभा सदस्यों में से किसी चेहरे को मौका मिल सकता है. बीजेपी का पूराव फोकस पंजाब में सरकार बनाने की है, जिसके लिए अभी से भी पार्टी जुट गई है। 

क्या बागी सांसदों को भी कैबिनेट में मिलेगी जगह?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की मिली भारी जीत के बाद राज्य से भी पार्टी के कुछ सांसदों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल किया जा सकता है. तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 लोकसभा सांसदों ने ममता बनर्जी से अलग होकर एनसीपीआई में विलय किया है और मोदी सरकार को समर्थन करने का ऐलान किया है. ऐसे में सभी की निगाहें लगी हुई हैं कि टीएमसी के किसी बागी सांसद को मोदी सरकार में क्या मंत्री बनाए जा सकता है? 

महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) को 9 में से 6 लोकसभा सांसद उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ आ गए हैं. इस तरह शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में सांसदों की संख्या महाराष्ट्र के एनडीए में सबसे ज्यादा हो गई है. इसके चलते माना जा रहा है कि शिंदे कोटे से कैबिनेट में एक-दो चेहरे बढ़ सकते हैं. अभी शिवसेना से सिर्फ एक ही मंत्री केंद्र में है। 

मोदी कैबिनेट के विस्तार और फेरबदल में बिहार से मंत्रियों की संख्या बढ़ सकती है.  बिहार की राजनीति में हुए बड़े घटनाक्रमों ने इस संभावना को और मजबूत कर दिया है. बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ है. नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सम्राट चौधरी सीएम बने हैं. ऐसे में नीतीश कुमार के राज्यसभा चुने जाने के बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या उन्हें कैबिनेट में एंट्री मिलेगी। 

उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका, आदित्य ठाकरे के करीबी सचिन अहीर ने भी छोड़ा साथ

मुंबई
 लोकसभा के छह सांसदों के साथ छोड़ने के बाद उद्धव ठाकरे को एक और गहरा जख्म मिला है. आदित्य ठाकरे के सबसे भरोसेमंद और करीबी नेता सचिन अहीर ने भी बगावत कर दी है. अहीर अब एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं. मंगलवार को उन्होंने विधान परिषद उपसभापति पद के लिए महायुति के उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन दाखिल किया. यह चुनाव बुधवार को होना है. सचिन अहीर ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में पर्चा भरा. इस मौके पर डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार भी मौजूद थीं. वर्ली में आदित्य ठाकरे का राजनीतिक आधार मजबूत करने में अहीर का बड़ा रोल रहा है. ऐसे में उनका जाना ठाकरे परिवार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है. सचिन अहीर साल 2019 में एनसीपी छोड़कर शिवसेना में आए थे. उन्हें 2022 में एमएलसी बनाया गया था। 

बीजेपी नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने इस टूट के लिए उद्धव ठाकरे और संजय राउत के अहंकार को जिम्मेदार ठहराया है. बावनकुले ने साफ कहा कि बीजेपी का अहीर के इस कदम से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा कि ठाकरे गुट अपने कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं देता. यही वजह है कि पार्टी में भारी नाराजगी है और नेता लगातार साथ छोड़ रहे हैं। 

शिवसेना के दोनों गुटों में यह सियासी जंग काफी तेज हो गई है. कुछ ही दिन पहले पार्टी के छह सांसदों ने भी शिंदे गुट जॉइन किया था. पार्टी के नेता इसे ‘ऑपरेशन टाइगर’ का नाम दे रहे हैं. विधान परिषद चुनाव से पहले यह बगावत महाविकास अघाड़ी के लिए खतरे की घंटी है। 

शरद पवार गुट के विधायक रोहित पवार ने क्या दावा किया?
इस बड़े सियासी फेरबदल पर एनसीपी शरद पवार गुट के विधायक रोहित पवार ने कहा, ‘सचिन अहीर पहले हमारी पार्टी में थे. फिर वह उद्धव ठाकरे के साथ गए और अब शिंदे गुट में चले गए.’ उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक बताया. रोहित ने आरोप लगाया कि पैसे और सत्ता के दम पर नेताओं को खरीदा जा रहा है. उन्होंने आशंका जताई कि शिंदे गुट अब उनकी पार्टी को भी निशाना बना सकता है। 

हालांकि उन्होंने दावा किया कि शिंदे गुट को अब वैसी सफलता नहीं मिलेगी. वहीं ठाकरे गुट के नेता अंबादास दानवे ने एक अहम जानकारी दी. उन्होंने बताया कि इस चुनाव में जगन्नाथ अभ्यंकर महाविकास अघाड़ी के उम्मीदवार हैं। 

रतलाम से पैदल भोपाल पहुंचे दो कांग्रेस कार्यकर्ता, निष्कासन के विरोध में PCC कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे

भोपाल 

मध्य प्रदेश कांग्रेस में इस समय ऊपर से नीचे तक सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। प्रदेश के जिलों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा नवीन जिला कार्यकारिणी पर सवाल खड़े करने का सिलसिला जारी हैं। अब कार्यकर्ताओं को सवाल खड़े करने पर उसका खामयाजा भी भुगतना पड़ रहा है। 

रतलाम के कांग्रेस कार्यकर्ता गौरव पोरवाल और संजय रावत को 6 साल के लिए जिला कांग्रेस कमेटी ने निष्कासित किया है, उससे नाराज होकर उन्होंने न्याय के लिए रतलाम से भोपाल तक पैदल पद यात्रा की और सोमवार सुबह से ही वह दरी बिछाकर कांग्रेस कार्यालय के सामने धरने पर बैठे हुए हैं। हालांकि इस दौरान पीसीसी कार्यालय में आयोजित बैठक में शामिल होने के लिए प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी पहुंचे थे, उन्होंने कार्यकर्ताओं को देखा भी लेकिन उनसे मुलाकात करना जरूरी नहीं समझा और चलो चलो कहते हुए आगे बढ़ गए, प्रदेश अध्यक्ष के इस रवैया से भी कांग्रेस के दोनों कार्यकर्ता हताश होते हुए नजर आए। 

जिला कार्यकारिणी पर सवाल उठाए
रतलाम से आए कांग्रेस के निष्कासित कार्यकर्ता गौरव पोरवाल ने भास्कर को बताया कि हम तीन सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए भोपाल आए हैं। गौरव ने बताया हम इसलिए आए हैं क्योंकि अभी रतलाम की जिला कार्यकारिणी बनी थी तो किसी को तीन पद दे दिए, किसी को चार पद दे दिए तो हमने सोशल मीडिया और व्यक्तिगत रूप से जिला अध्यक्ष जी को मैसेज पहुंचाया था कि आप संगठन में एक व्यक्ति को तीन चार पद दे रहे हैं तो ये शोभा नहीं देता।

हमारी जिलाध्यक्ष से बात हुई थी। वे कह रहे थे हमारे पास कार्यकर्ता नहीं हैं। गकांग्रेस की इतनी स्थिति खराब हो गई है कि नए कार्यकर्ता नहीं मिल रहे इसलिए आप एक-एक व्यक्ति को तीन-तीन पद दे रहे हो।

कार्यकर्ताओं को दो-दो पद देने के आरोप
गौरव पोरवाल ने चर्चा करते हुए बताया कि 21 जून को उन्होंने कार्यकर्ता सम्मान पदयात्रा रतलाम से शुरू की थी, निरंतर 8 दिन 300 किलोमीटर चलने के बाद वह भोपाल पहुंचे हैं। उनका आरोप है कि रतलाम जिले की नवीन कार्यकारणी में जिला अध्यक्ष ने एक ही कार्यकर्ता को दो से तीन पद दे दिए हैं। गौरव पोरवाल और संजय रावत ने बीते चार जून को इस संबंध में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से मुलाकात की थी। 

मुलाकात के दौरान उन्होंने जिला कार्यकरणी में मूल कार्यकर्ताओं की अपेक्षा करने की शिकायत की। दोनों का प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात करना जिला अध्यक्ष को अच्छा नहीं लगा। उसके बाद जिला अध्यक्ष हर्ष विजय गहलोत के निर्देश पर संगठन महासचिव जगदीश पाटीदार ने दोनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं को 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इससे नाराज होकर उन्होंने मुख्य संगठन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कार्यकर्ताओं के सम्मान में पदयात्रा निकालने का निर्णय लिया और रास्ते भर वह कार्यकर्ता सम्मान का संदेश देते हुए भोपाल पहुंचे। उन्होंने साफ कहा है कि जब तक उनकी बात नहीं सुनी जाती वह भोपाल में ही डटे रहेंगे और जरूरत पड़ी तो आगे दिल्ली तक भी पदयात्रा कर राहुल गांधी के समक्ष अपनी बात रखेंगे।

वापसी नही हुई तो बाहर से करेंगे कांग्रेस के लिए कार्य 
गौरव ने  बातचीत करते हुए कहा कि वह कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता है, जिस दिन उनका निष्कासन हुआ उसी दिन बीजेपी की ओर से उन्हें पार्टी में शामिल होने का ऑफर दिया गया था। लेकिन उन्होंने बीजेपी में शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। गौरव ने यह भी कहा कि उन्हें कोई पद की लालसा नहीं है। वह कोई पद नहीं चाहते हैं वह एक आम कार्यकर्ता बनाकर कांग्रेस के संगठन को मजबूत करने के लिए कार्य कर कार्यकर्ताओं के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहां कि अगर कांग्रेस का मुख्य संगठन उन्हें स्पष्ट कर की उनका निष्कासन समाप्त नहीं होगा तो वह बाहर से भी बिना कांग्रेस का कार्यकर्ता होते हुए भी पार्टी के लिए काम करेंगे।

जीतू पटवारी से मिले तो जिला कांग्रेस ने निष्कासित कर दिया
गौरव ने बताया 4 जून को नामली में हम यही दरी लेकर प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के पास गए थे। उनसे बात की तो उन्होंने हमें गले लगाया और साथ में बिठाकर लेकर गए थे। उसके बाद जिला कांग्रेस कमेटी को प्रदेश अध्यक्ष से मिलना इतना बुरा लगा कि हमें पार्टी से निष्कासित कर दिया। उन्होंने हमारे पर आरोप लगाया लेकिन उनके पास ठोस सबूत आज भी नहीं हैं कि किस कारण से निष्कासित किया है।

कौन से व्यक्तियों को तीन-चार पद दिए गए हैं? एक रवि तिवारी हैं जिनके पास तीन पद हैं। प्रकाश पाटीदार के पास भी ऐसे ही पद हैं। सुनील पोरवाल के पास दो पद हैं। वे युवा कांग्रेस में भी हैं और जिला कांग्रेस में भी पद दिया गया है। मैं किसी पद पर नहीं हूं। मैं आम कार्यकर्ता हूं।

सवाल- आपकी क्या मांग है? गौरव: मेरी यही मांग है कि मुझे पद नहीं चाहिए लेकिन जो मजबूती से कांग्रेस के लिए काम करते हैं उनका सम्मान होना चाहिए।

सवाल- जीतू पटवारी से आप मिले? गौरव: जीतू पटवारी हमसे नहीं मिले। वो आए थे तो उन्होंने कहा चलो-चलो…. ये बातें शोभा नहीं देती। कार्यकर्ता अगर इतनी दूर से पैदल आया है तो उनको हमसे बात करनी चाहिए। ऐसे अगर चलो-चलो करने में रहेंगे तो फिर क्या स्थिति रहेगी। हम पार्टी का विरोध करने नहीं बैठे हैं।

सवाल: आप कब तक धरने पर बैठेंगे? गौरव: जब तक हमारी बात नहीं मानी जाती तब तक बैठेंगे। अगर लगा कि हमारी बात नहीं सुनी जा रही तो दिल्ली पैदल-पैदल जाएंगे। और अपनी बात पार्टी के सीनियर नेताओं को बताएंगे।

UP Election: राजेंद्र गौतम ने सपा को दिया साफ संदेश, बोले- कांग्रेस बड़ी पार्टी, सीट शेयरिंग में बराबरी की हिस्सेदारी चाहिए

लखनऊ
 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विपक्षी गठबंधन इंडिया अलायंस में सीट शेयरिंग को लेकर अभी से खींचतान शुरू हो गई है. यूपी चुनाव में संभावित गठबंधन के सहयोगी कांग्रेस ने खुद को सपा से बड़ी पार्टी बताते हुए ज्यादा सीटों की डिमांड की है. नवनियुक्त कांग्रेस यूपी प्रभारी राजेंद्र गौतम ने  कहा कि यूपी में सीटों में बराबर की हिस्सेदारी होनी चाहिए. कांग्रेस बड़ा भाई है. राजेंद्र गौतम ने यूपी में समाजवादी पार्टी से गठबंधन से जुड़े सवाल पर ये बातें कहीं। 

राजेंद्र गौतम ने कांग्रेस को बताया बड़ा भाई
समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन और सीट शेयरिंग के सवाल पर कांग्रेस के राजेंद्र गौतम ने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है. कांग्रेस के नेतृत्व में आजादी मिली और देश का निर्माण हुआ. बीजेपी का मुकाबला करने की हिम्मत क्षेत्रीय पार्टियों में नहीं. इस सच को स्वीकार करना होगा. बीजेपी ने क्षेत्रीय पार्टियों के सांसदों और विधायकों को तोड़ा. कांग्रेस ही बीजेपी को हरा सकती है. कांग्रेस तो बड़ा भाई है ही, क्योंकि हम राष्ट्रीय पार्टी हैं. यूपी में हम बराबर के साझेदार हैं, भाई-भाई हैं. हिस्सेदारी और सम्मान बराबर का होनी चाहिए। 

बीएसपी को गठबंधन के लिए भेजा सिग्नल
मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर कांग्रेस नेता ने कहा कि बीजेपी के खिलाफ संविधान बचाने वालों को एकजुट होना चाहिए. जो देश को बचाना चाहते है उन्हें एकजुट होना चाहिए. मेरा स्पष्ट मानना है कि बीजेपी के खिलाफ संविधान में विश्वास करने वाले को एक साथ होना चाहिए. कहा कि यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के संगठन को मजबूत करेंगे. हम हर तरह के लोगों से मिलेंगे। 

सीएम योगी को बताया डरा हुआ सीएम
उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बौखलाहट में नजर आ रहे हैं. कहा कि बीजेपी भगवान श्रीराम के चंदा चोरों को बचा रही है. चंदा चोरी से बीजेपी की मंशा सामने आई है. बीजेपी का बस चले तो भविष्य में चुनाव न कराएं. न्यायपालिका डरी हुई है और चुनाव आयोग बीजेपी के लिए काम कर रहा है। 

आरोप लगाया कि सीएम योगी ने पुलिस को हत्यारा बना दिया है, गरीबों के घर बुलडोजर चल रहा है. योगी डरे हुए हैं और उनकी सत्ता जाने वाली है. चंदा चोर को बचाने की कोशिश है. कांग्रेस नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा और जीता जाएगा। 

राजेंद्र गौतम ने कहा कि यूपी चुनाव में जिस भी पार्टी के साथ गठबंधन होगा उससे बात करके ही घोषणापत्र तैयार किया जाएगा. उन्होंने ऐलान किया कि एक जुलाई से यूपी का दौरा शुरू करेंगे। 

तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा दावा, स्टालिन बोले- थलपति विजय की सरकार बनने से पहले ही खत्म हो जाएगी चर्चा

चेन्नई

तमिलनाडु में CM थलपति विजय की सरकार को लेकर तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने बहुत बड़ा दावा कर दिया है। स्टालिन ने कहा है कि विजय की सरकार जल्द ही गिर सकती है और राज्य में जल्दी चुनाव भी हो सकते हैं। राज्य में बीते महीने आए चुनाव परिणामों के बाद सत्ता से बाहर होने वाली मुख्य विपक्षी दल द्रमुक (DMK) के अध्यक्ष स्टालिन ने रविवार रात एक जनसभा को संबोधित करते हुए यह बातें कही हैं। उन्होंने इस दौरान राज्य में बहुत जल्द मध्यावधि चुनाव होने की भविष्यवाणी भी की।

स्टालिन ने दावा किया कि अभिनेता से नेता बने मुख्यमंत्री विजय की अगुवाई वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार के पास बहुमत नहीं है और अगले 3 से 6 महीनों के भीतर राज्य में विधानसभा चुनाव दोबारा हो सकते हैं। पार्टी कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए स्टालिन ने टीवीके सरकार के आंकड़ों का गणित भी समझाया।

क्या बोले स्टालिन?
बता दें कि तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए कम से कम 118 सीटें चाहिए। हालिया विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके सबसे पार्टी बन कर उभरी थी। लेकिन TVK केवल 108 सीटें ही जीत सकी थी। इसके बाद विजय ने कांग्रेस, IUML और VCK जैसे दलों के समर्थन से सरकार बनाई। स्टालिन ने इन दलों का हवाला देते हुए आगे कहा कि टीवीके सरकार अपने दम पर नहीं, बल्कि द्रमुक गठबंधन के पूर्व सहयोगियों के समर्थन के भरोसे ही चल रही है। उन्होंने कहा, “चुनाव कभी भी आ सकते हैं। यह जल्द ही हो सकते हैं, तीन महीने बाद या छह महीने बाद आ सकते हैं, क्योंकि मौजूदा सरकार अपने दम पर बहुमत से नहीं जीती है। बहुमत का मतलब 234 सदस्यों वाले सदन में 118 सीटें हासिल करना है, लेकिन उन्होंने हालिया विधानसभा चुनावों में केवल 108 सीटें ही जीतीं।”

कार्यकर्ताओं को तैयार रहने का आदेश
स्टालिन ने कहा कि आगामी चुनावों को देखते हुए द्रमुक कैडरों को चुनावी मोड में रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “टीएमसी सरकार का इंजन कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता। चुनाव किसी भी क्षण, किसी भी स्थिति में आ सकते हैं। हमें इसके लिए 100 फीसदी तैयार रहना होगा। आप सभी आज और इसी वक्त से चुनावी तैयारियों में जुट जाएं।”

कानून व्यवस्था को लेकर घेरा
इस दौरान स्टालिन ने कानून-व्यवस्था से लेकर आर्थिक मोर्चे पर सरकार को बुरी तरह घेरा। स्टालिन ने आरोप लगाया कि राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। महिला और बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़ गए हैं। वहीं राज्य में अघोषित बिजली कटौती शुरू हो गई है और सरकार की खराब नीतियों के कारण बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज तमिलनाडु छोड़कर दूसरे राज्यों में जा रही हैं।

MDMK ने भी छोड़ा साथ
स्टालिन का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब द्रमुक के एक और पुराने सहयोगी MDMK ने DMK गठबंधन छोड़ने का ऐलान कर दिया है। 2 महीने में यह स्टालिन के लिए दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले कांग्रेस ने भी DMK लेड अलायंस का साथ छोड़ दिया और विजय की सरकार को समर्थन दे दिया। DMK ने तब इसे विश्वासघात कहा था।

मोदी कैबिनेट विस्तार की चर्चा तेज, दूसरी पार्टियों से आए सांसदों को मिल सकती है बड़ी जिम्मेदारी

नई दिल्ली

कैबिनेट फेरबदल का ऐलान मंगलवार को हो सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार की तरफ से तारीख को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे से भारत लौटने के बाद मंत्री परिषद में बदलाव किए जा सकते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा चर्चा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम की है। फिलहाल, साफ नहीं हो सका है कि उन्हें लेकर NDA की तरफ से क्या फैसला लिया जाएगा।

खास बात है इस बार कैबिनेट फेरबदल में हाल ही में पार्टियों की टूट के बाद NDA को समर्थन देने वाले नेताओं को भी जगह दी जा सकती है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव बालासाहब ठाकरे) और आम आदमी पार्टी के सांसदों ने एनडीए को समर्थन दिया था।

मंत्रिमंडल में फेरबदल की तारीख प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम को ध्यान में रखकर तय किए जाने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 से 29 जून तक सेशेल्स की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। वह 6 से 11 जुलाई के बीच तीन देशों की यात्रा कर सकते हैं, जिनमें इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल है। वहीं जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची भी भारत दौरे पर आ रहीं हैं और यह कार्यक्रम 1 से 3 जुलाई का है।

अब संसद का मॉनसून सत्र 18 जुलाई से शुरू हो रहा है, जो अगस्त तक चलेगा। ऐसे में अटकलें तेज हैं कि मंगलवार को बड़ी घोषणा की जा सकती है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली बार फेरबदल होगा।

मानसून सत्र से पहले हो सकता है कैबिनेट फेरबदल
संसद का मानसून सत्र आम तौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। मंत्रिमंडल में फेरबदल की तारीख प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम को ध्यान में रखकर तय किए जाने की संभावना है। प्रधानमंत्री मोदी 27 से 29 जून तक सेशेल्स की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। उनके छह से 11 जुलाई के बीच इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाने की भी संभावना है। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची का भी एक से तीन जुलाई तक नयी दिल्ली की यात्रा का कार्यक्रम है।

पार्टी संगठन पर भी फोकस
सूत्रों के अनुसार, सरकार के शीर्ष अधिकारियों के बीच यह राय प्रबल हो रही है कि अहम मंत्रालयों में नए चेहरों को शामिल किए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा क्षेत्रीय, राज्यवार, जातीय और राजनीतिक निष्ठा से जुड़े समीकरणों को ध्यान में रखकर मंत्रिपरिषद में संतुलन बनाने की राजनीतिक मजबूरियां भी हैं। दो केंद्रीय मंत्रियों पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को क्रमशः बीजेपी की उत्तर प्रदेश और दिल्ली इकाई की जिम्मेदारी पहले ही दी जा चुकी है।
‘एक व्यक्ति एक पद’ का नियम होगा लागू
इस बात की प्रबल संभावना है कि बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के अपने नियम का पालन करेगी जिसके कारण दोनों को सरकार से हटना पड़ सकता है। दो अन्य केंद्रीय मंत्रियों जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को हाल में संपन्न राज्यसभा चुनावों के लिए पार्टी ने दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया। उच्च सदन में उनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो गया। कुरियन अपने पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं जबकि बिट्टू अब भी मंत्री हैं।

रवनीत सिंह बिट्टू को लेकर चल रही ये चर्चा
ऐसा बताया जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व ने बिट्टू को आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा है। कांग्रेस के पूर्व नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पौत्र बिट्टू प्रभावशाली जाट सिख समुदाय का प्रमुख चेहरा हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए इन तीन राज्यों के और प्रतिनिधियों को मोदी मंत्रिपरिषद में जगह मिलने की संभावना है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी की भारी जीत के बाद राज्य से भी पार्टी के कुछ सांसदों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल किया जा सकता है।

TMC, शिवसेना-UBT, AAP से आए MPs को मिल सकता है मौका
तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बागी गुटों के कुछ प्रतिनिधियों को भी मंत्री पद मिलने की संभावना है। ऐसी भी संभावना है कि शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। सूत्रों ने बताया कि आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सात राज्यसभा सदस्यों में से एक या दो को मंत्रिपरिषद में जगह मिल सकती है।

हालांकि, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उबाठा) के बागी गुटों के सदस्यों को मंत्रिपरिषद में शामिल करने का कोई भी फैसला लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा। दोनों के मूल दलों ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की है।

राष्ट्रपति से मिले पीएम मोदी, तभी से शुरू हुई चर्चा
प्रधानमंत्री मोदी की 23 जून को राष्ट्रपति भवन में पद्म पुरस्कार समारोह के इतर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें तेज हो गईं। इसके दो दिन बाद 25 जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राष्ट्रपति से मुलाकात से इन अटकलों को और बल मिला। अधिकारियों ने इन मुलाकातों को शिष्टाचार भेंट बताया और कहा कि दोनों नेता नियमित अंतराल पर राष्ट्रपति से मिलते रहते हैं। हालांकि, इस बात की प्रबल संभावना है कि प्रधानमंत्री की राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान मंत्रिमंडल में फेरबदल के मुद्दे पर भी चर्चा हुई होगी।

हरदीप पुरी और बीएल वर्मा को लेकर भी अपडेट
दो केंद्रीय मंत्रियों हरदीप पुरी और बी एल वर्मा का राज्यसभा में कार्यकाल नवंबर में समाप्त होगा। अब यह देखना होगा कि उच्च सदन के लिए उन्हें फिर से उम्मीदवार बनाए जाने के संबंध में शीर्ष नेतृत्व क्या फैसला करता है। तीन राज्यपालों-कर्नाटक के थावर चंद गहलोत, मध्य प्रदेश के मंगुभाई पटेल और उत्तराखंड के लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह-का कार्यकाल आने वाले महीनों में पूरा होने वाला है।

गहलोत और पटेल का कार्यकाल जुलाई में तथा सिंह का कार्यकाल सितंबर में पूरा होगा। सरकार से हटाए जाने वाले कुछ मंत्रियों को राज्यपाल पद की जिम्मेदारी दिए जाने की भी संभावना है। हालांकि, जानकार हलकों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी बड़े फैसलों को अंतिम समय तक गोपनीय रखते हैं और औपचारिक घोषणा होने पर ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

कौन हो सकता है शामिल
अब तक यह साफ नहीं है कि कैबिनेट फेरबदल में किसे मौका मिलने जा रहा है। अटकलें हैं कि नए सदस्यों में भाजपा सांसद अरुण गोविल, शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे, पूर्व RBI गवर्नर शक्तिकांत दास, बिहार के पूर्व CM नीतीश कुमार, संजय दीना पाटिल, वीडी शर्मा, तरुण चुघ, राघव चड्ढा को शामिल किया जा सकता है।

इनका कट सकता है नाम
कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान, रवनीत सिंह बिट्टू और हरदीप सिंह पुरी को बदला जा सकता है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसे लेकर कुछ नहीं कहा गया है। संभव है कि इन मंत्रियों के विभाग भी बदले जा सकते हैं। साथ ही मंत्री बीएल वर्मा का भी राज्यसभा कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है। कहा यह भी जा रहा है कि 6 राज्यमंत्री भी बदले जा सकते हैं। इनके अलावा मनोहर लाल खट्टर और निर्मला सीतारमण के विभाग बदले जा सकते हैं।

संतुलन बनाने की कोशिश
एजेंसी भाषा के सूत्रों के अनुसार, सरकार के शीर्ष अधिकारियों के बीच यह राय प्रबल हो रही है कि अहम मंत्रालयों में नए चेहरों को शामिल किए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा क्षेत्रीय, राज्यवार, जातीय और राजनीतिक निष्ठा से जुड़े समीकरणों को ध्यान में रखकर मंत्रिपरिषद में संतुलन बनाने की राजनीतिक मजबूरियां भी हैं।

एक ही फ्लाइट में फडणवीस-उद्धव, शिंदे के बयान से बढ़ी सियासी हलचल

 मुंबई
 महाराष्ट्र की राजनीति में उस समय अचानक सरगर्मी बढ़ गई, जब दो धुर विरोधी नेता एक ही फ्लाइट में एक साथ सफर करते नजर आएं। दोनों नेता मुंबई से नागपुर जा रही एक फ्लाइट में बैठे थे। सीएम देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे की इस हवाई यात्रा खबरों पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का रिएक्शन आया है।

दरअसल, शिंदे से जब फडणवीस और उद्धव के एक ही विमान में सफर करने को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री फडणवीस इतने समझदार हैं कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि चालाक और षड्यंत्रकारी दोस्त कितना खतरनाक हो सकता है।

2019 चुनाव को लेकर क्या कहा?
एकनाथ शिंदे ने 2019 चुनाव की ओर इशारा करते हुए बोले कि जब भाजपा और तत्कालीन अविभाजित शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ा था, लेकिन बाद में ठाकरे द्वारा कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाने के बाद वे अलग हो गए थे।

आने वाले दिनों में पता चलेगा परिणाम
ठाकरे से उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के साथ एक ही विमान में यात्रा करने के बारे में पूछा गया, तो शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख ने कहा कि दोनों के बीच उच्च स्तरीय चर्चा हुई थी। वहीं जब उनसे बातचीत के परिणाम के बारे में पूछा गया, तो ठाकरे ने कहा कि आने वाले दिनों में इसका परिणाम पता चल जाएगा, जिससे राजनीतिक चर्चाओं को और हवा मिली।

हालांकि, भाजपा ने बैठक के किसी भी राजनीतिक महत्व को खारिज करते हुए कहा कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद विभिन्न दलों के नेता अक्सर सौहार्दपूर्ण व्यक्तिगत संबंध साझा करते हैं।

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