10 साल बाद फिर जुड़ा बिखरा परिवार, सखी की पहल से बेटियों को मिला माता-पिता का साथ

10 साल पहले हुआ था तलाक

सखी की समझाइश से बेटियों के लिए फिर एक हुआ परिवार

भोपाल 

मध्यप्रदेश में संकटग्रस्त, पीड़ित और असहाय महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए संचालित ‘वन स्टॉप सेंटर’ (सखी) मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और दिल को छू लेने वाला मामला मध्यप्रदेश के दतिया जिले से सामने आया है, जहां कानूनी तौर पर तलाक होने के 10 वर्ष बाद वन स्टॉप सेंटर के प्रयासों से एक परिवार को पुनः मिलाया गया। इस पहल ने न सिर्फ दो मासूम बच्चियों को उनके पिता का साया वापस दिलाया, बल्कि टूट चुके एक वैवाहिक रिश्ते में फिर से खुशियों के रंग भर दिए।

यह कहानी दतिया की रहने वाली 36 वर्षीय उर्मिला (बदला हुआ नाम) की है। 10 वर्ष पूर्व न्यायालय द्वारा पति से तलाक होने के बाद उर्मिला अपनी दो मासूम बच्चियों के साथ मायके में रह रही थी। उर्मिला के वृद्ध पिता मजदूरी करके किसी तरह अपनी बेटी और दोनों नातिनों का पेट पाल रहे थे और तंगहाली के बावजूद बच्चियों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे थे। वर्तमान समय में महंगाई और बढ़ती उम्र के कारण वृद्ध पिता के लिए पूरे परिवार का खर्च उठाना असंभव हो गया। अपनी बच्चियों के भविष्य को अंधकार में डूबता देख, उर्मिला ने हिम्मत जुटाई और दतिया कलेक्टर की जनसुनवाई में न्याय की गुहार लगाते हुए एक शिकायती पत्र सौंपा।

वन स्टॉप सेंटर से मिली मदद

महिला एवं बाल विकास विभाग दतिया के जिला कार्यक्रम अधिकारी अरविंद कुमार उपाध्याय के माध्यम से यह संवेदनशील मामला तुरंत ‘वन स्टॉप सेंटर’ को ट्रांसफर किया गया। सेंटर पर जब उर्मिला को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया, तो 10 साल का दर्द और भविष्य की चिंता उसकी आँखों से बह निकली। उसकी बस यही चिंता थी कि क्या तलाक के इतने सालों बाद उसका पति उसे और बच्चियों को स्वीकार करेगा? वन स्टॉप सेंटर की प्रशासक सुरीना गौतम ने उर्मिला को ढांढस बंधाया और हर संभव प्रयास कर उसका हक दिलाने का अटूट विश्वास दिलाया।

कानूनी पेचीदगियों पर भारी पड़ी ‘समझाइश’

वन स्टॉप सेंटर की टीम ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की मदद से उर्मिला के पति और उसके परिवारजनों को कार्यालय आमंत्रित किया। काउंसलिंग के दौरान पति ने 10 साल पुराने तलाक के कानूनी दस्तावेज पेश किए। कानूनी रूप से रिश्ता खत्म हो चुका था, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण अभी बाकी था। विभाग के अधिकारियों और वन स्टॉप सेंटर की टीम ने कड़े वैधानिक रुख के बजाय बेहद संवेदनशील तरीके से संयुक्त काउंसलिंग की। उन्होंने पति और उसके परिवार को बच्चियों के भरण-पोषण, शिक्षा और उनके सुरक्षित भविष्य का अहसास कराया।

और खिल उठे चेहरे, लौट आई खुशियां

इस मैराथन काउंसलिंग और मानवीय समझाइश का असर यह हुआ कि पति और उसके भाइयों का दिल पिघल गया। पति न केवल कानूनी तलाक को भुलाकर उर्मिला को पत्नी के रूप में दोबारा स्वीकार करने को राजी हुआ, बल्कि दोनों बच्चियों की पढ़ाई और पूरी जिम्मेदारी उठाने की सहर्ष सहमति दे दी। 10 साल से मायूसी का जीवन जी रही उर्मिला का चेहरा उम्मीद की नई किरण से खिल उठा। वन स्टॉप सेंटर के दफ्तर में जो परिवार कभी कानूनी तौर पर अलग हुआ था, वह एक-दूसरे का हाथ थामकर, खुशी-खुशी अपने घर के लिए रवाना हुआ। उर्मिला ने नम आंखों से दतिया प्रशासन और वन स्टॉप सेंटर का आभार व्यक्त किया।

 

कोरोना वायरस लैब विवाद में बड़ा खुलासा, क्या अमेरिकी वैज्ञानिक ने की थी चीन की रिसर्च फंडिंग?

बीजिंग /न्यूयॉर्क

पूरी दुनिया को झकझोर देने वाली कोरोना महामारी को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. कुछ दिनों पहले अमेरिकी खुफिया विभाग की निदेश का पद छोड़ने का ऐलान करने वाली तुलसी गबार्ड नेकोरोना वायरस को लेकर बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने कहा कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के चीफ मेडिकल एडवाइजर एंथोनी फुसी ने चीन स्थित वुहान के उस लैब को फंडिंग की थी, जहां से कोरोना महामारी फैली थी। 

प्रतिबंधित दस्तावेज हुए सार्वजनिक
अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने हाल ही में अमेरिकी की ओर से फंड किए गए बायोलैब्स से संबंधित कई दस्तावेज को सार्वजनिक कर दिया.  उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि अमेरिका के राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान (एनआईएआईडी) के पूर्व निदेशक एंथनी फौसी ने कोरोना महामारी की शुरुआत पर खुफिया आकलन को प्रभावित किया और बाद में संसद के सामने कसम खाकर ऐसे कनेक्शन को खारिज किया था। 

राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के दफ्तर (ओडीएनआई) ने इस दस्तावेज को जारी किया. गबार्ड का यह कदम ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास में एक बड़ा कदम है, जिसमें महामारी की उत्पत्ति की फिर से समीक्षा करने और वैश्विक स्वास्थ्य संकट के दौरान अमेरिकी सरकारी एजेंसियों, वैज्ञानिकों और खुफिया अधिकारियों की भूमिका की जांच करने की बात कही गई है। 

गबार्ड के अनुसार, नए जारी किए गए बातचीत और दस्तावेजों से पता चलता है कि जब वायरस नैचुरली निकला या चीन के वुहान की लैब से, इसपर बहस तेज हुई तो कैसे फौसी ने राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान (एनआईएआईडी) के निदेशक के तौर पर काम करते हुए खुफिया अधिकारियों के साथ बातचीत की। 

बाइडेन के अधिकारी पर तुलसी गबार्ड का बड़ा आरोप
गबार्ड ने कहा, ‘कोविड-19 महामारी की वजह से हमारे लाखों साथी, अमेरिकियों और दुनिया भर के अनगिनत लोगों को बहुत मुश्किल भरे दौर से गुजरना पड़ा. सालों के झूठ, सेंसरशिप और छिपाने के बाद, अमेरिकी लोग पारदर्शिता, सच्चाई और जवाबदेही के हकदार हैं.’ उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. फौसी जैसे राजनीतिक स्वार्थी नेताओं ने अपने गलत कामों और सत्ता के दुरुपयोग को छुपाया, खुफिया जानकारी में हेरफेर किया, कांग्रेस से झूठ बोला और देश को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी सूचानाओं तक निर्वाचित राष्ट्रपति की पहुंच सीमित करके उनकी छवि को कमजोर किया। 

ओडीएनआई ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पारदर्शिता संबंधी निर्देश के तहत उसने एक वर्ष तक चली गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की समीक्षा प्रक्रिया संचालित की. इस दौरान अनियमितताओं का खुलासा करने वाले अधिकारियों की गवाही भी एकत्र की गई. इन अधिकारियों ने आरोप लगाया कि वायरस की उत्पत्ति को लेकर आधिकारिक आकलनों पर सवाल उठाने के कारण उनके खिलाफ प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की गई। 

ओडीएनआई ने दावा किया कि फौसी के खुफिया अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध थे, जिससे वह कोविड-19 की शुरुआत के बारे में चर्चा में अहम भूमिका निभा पाए. इसमें आरोप लगाया गया कि फौसी ने खुफिया एजेंसियों से सलाह लेने वाले विशेषज्ञों के बारे में सुझाव दिए और ऐसे आकलन बनाने में मदद की जिन्हें बाद में वैज्ञानिक सहमति के तौर पर सबके सामने पेश किया गया। 

बाइडेन सरकार ने की थी समीक्षा बैठक
जुलाई 2021 के एक इंटेलिजेंस कम्युनिटी ईमेल में कहा गया था कि अधिकारी फौसी के सुझावों पर आगे बढ़ना चाहते थे क्योंकि उन्हें एक एसएमई के ​​तौर पर देखा जाता था, जिसके पास मौजूदा और ऐतिहासिक रिसर्च के बारे में बहुत जानकारी है और जो शायद ज्यादातर लोगों से बेहतर जानता है कि असली कोरोना वायरस विशेषज्ञ कौन हैं। 

तत्कालीन बाइडेन सरकार ने कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर 90 दिनों की समीक्षा बैठक की थी. इसे लेकर दस्तावेज में बताया गया है कि 2021 में खुफिया अधिकारी ने 90-दिनों की समीक्षा के दौरान फौसी की तरफ से रिकमेंड किए गए वैज्ञानिक तक पहुंचने को लेकर चर्चा कर रहे थे. आंतरिक पत्राचार में उन्हें एक सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट बताया गया था, जिनकी रिकमेंडेशन्स को समीक्षा प्रक्रिया के लिए जरूरी माना गया था। 

फौसी ने 2024 में कोरोना वायरस महामारी पर हाउस सिलेक्ट सबकमेटी के सामने अपनी गवाही में वायरल रिसर्च के बारे में इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ बातचीत की जानकारी से इनकार किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉक्यूमेंट्स में इंटेलिजेंस अधिकारियों और कोविड-की उत्पत्ति की जांच के बीच कई बातचीत दिखाई गई हैं. उस समय कुछ सरकारी कम्युनिकेशन ने इस दावे को खारिज कर दिया था कि वायरस को लैब में बनाया गया था, जबकि दूसरों ने लैबोरेटरी एक्सीडेंट सिनेरियो और वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की क्षमताओं की जांच की। 

वुहान लैब को लेकर बड़ा खुलासा
लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी की ओर से मई 2020 में तैयार किए गए एक आकलन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि वुहान में लेबोरेटरी में बदले गए कोरोना वायरस के गलती से फैलने के लिए हालात मौजूद थे और लेबोरेटरी और प्राकृतिक उत्पत्ति की परिकल्पनाओं को बराबर महत्व दिया गया. ओडीएनआई रिलीज में अनियमितताओं का खुलासा करने वाले अधिकारियों के आरोप भी शामिल हैं कि जिन खुफिया विश्लेषकों ने लैब-लीक हाइपोथीसिस का समर्थन किया, उन्हें परेशानी झेलना पड़ी, किनारे कर दिया गया या अलग राय रखने से रोका गया। 

तुलसी गबार्ड ने कहा कि इनमें से कई शिकायतों को आगे की समीक्षा के लिए इंटेलिजेंस कम्युनिटी इंस्पेक्टर जनरल के पास भेज दिया गया है. कोविड-19 की शुरुआत महामारी के सबसे विवादित मुद्दों में से एक है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ​​लंबे समय से बंटी हुई हैं, कुछ का मानना ​​है कि यह जानवरों से प्राकृतिक रूप से फैला है और कुछ लैब से जुड़ी घटना को ज्यादा संभावित वजह मानते हैं। 

 

ब्रह्मोस की ताकत का दुनिया ने माना लोहा, अब रूस भी अपनी सेना में करेगा शामिल; जानिए इसकी खासियत

 नई दिल्ली

भारत और रूस के संयुक्त प्रयासों से बनी दुनिया की सबसे तेज और सटीक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस मिसाइल ने वैश्विक रक्षा बाजार में एक नया इतिहास रच दिया है. अब तक जिस मिसाइल तकनीक के लिए भारत विदेशी ताकतों पर निर्भर रहता था, आज उसी भारत से रूस जैसा महाशक्ति देश ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रहा है। 

ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख डॉ. जयतीर्थ आर. जोशी ने नागपुर में आयोजित एक रक्षा कार्यक्रम के इतर इसकी पुष्टि की है कि रूस अपनी सेना में ब्रह्मोस को शामिल करने का इच्छुक है और इसके लिए द्विपक्षीय बातचीत बेहद एडवांस्ड स्टेज में पहुंच चुकी है. भारत जल्द ही रूस को इन घातक प्रणालियों की आपूर्ति शुरू कर सकता है। 

यह घटनाक्रम न केवल वैश्विक भू-राजनीति में भारत के बढ़ते कद को दर्शाता है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान की सबसे बड़ी सफलता की गवाही भी देता है. जिस मिसाइल को फिलीपींस जैसे देश पहले ही खरीद चुके हैं, उसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में अपनी संहारक क्षमता साबित कर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। 

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की अचूक मारक क्षमता
मई 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भारतीय वायुसेना और थलसेना ने सीमा पार आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के लिए ऑपरेशन सिंदूर चलाया था. इस ऑपरेशन के दौरान पहली बार ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल केवल परीक्षणों या सिमुलेशन तक सीमित न रहकर वास्तविक युद्धक्षेत्र में किया गया। 

भारतीय सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों से दागी गई एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों ने दुश्मन के हवाई क्षेत्रों और आतंकी बुनियादी ढांचों पर पिन-पॉइंट सटीकता से हमला किया। 

रडार को चकमा देने की इसकी काबिलियत और मैक 2.8 से 3.0 की सुपरसोनिक रफ्तार के कारण दुश्मन का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम इसे ट्रैक या इंटरसेप्ट नहीं कर सका. ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के इस प्रदर्शन ने पूरी दुनिया, खासकर रूस के सैन्य कमांडरों का ध्यान खींचा. रूस ने देखा कि यह मिसाइल घने हवाई सुरक्षा कवच को भेदकर अत्यंत सटीक हमले करने में पूरी तरह सक्षम है। 

आखिर रूस को क्यों पड़ी ब्रह्मोस की जरूरत?
रणनीतिक तौर पर ब्रह्मोस को भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन- DRDO और रूस के NPO Mashinostroyenia ने मिलकर विकसित किया है. शुरुआत से ही इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता भारत रहा है. वर्तमान में रूस द्वारा ब्रह्मोस को अपनी सेना में शामिल करने के पीछे कई बड़े कारण हैं…

    वॉर टेस्टेड और विश्वसनीय तकनीक: यूक्रेन संकट और हालिया वैश्विक तनावों के बीच रूस को ऐसी मिसाइलों की आवश्यकता है जो पहले से ‘बैटल-प्रूवन’ हो. ब्रह्मोस ने भारतीय सेना के तीनों अंगों में रहकर और ऑपरेशन सिंदूर में हिस्सा लेकर अपनी विश्वसनीयता साबित की है। 

    तेज गति और रडार से बचने की क्षमता: ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी गति है. ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज 3704.4 km/hr चलने के कारण यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल क्रूज मिसाइल है. समुद्र या जमीन की सतह से बेहद कम ऊंचाई पर उड़ने से रडार इसे बहुत देर से पकड़ पाते हैं, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता।  

    स्वदेशीकरण और लागत में कमी: भारत ने ब्रह्मोस में बड़े पैमाने पर स्वदेशीकरण किया है. इसके स्वदेशी बूस्टर और वॉरहेड अब भारत में ही बन रहे हैं, जिससे इसके निर्माण और कच्चे माल की लागत में भारी गिरावट आई है. रूस के लिए भारत से रेडी-टू-यूज़ मिसाइल प्रणालियों की आपूर्ति लेना आर्थिक और रणनीतिक दोनों रूप से बेहद फायदेमंद है। 

वैश्विक बाजार में भारत का डंका: फिलीपींस के बाद रूस की बारी
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के लिए यह दौर रिकॉर्ड मुनाफे और वैश्विक विस्तार का रहा है. वर्ष 2022 में फिलीपींस ने भारत के साथ लगभग 3,100 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक सौदा कर ब्रह्मोस का पहला अंतरराष्ट्रीय खरीदार बनने का गौरव हासिल किया था, जिसकी मिसाइल खेपें पहले ही पहुंचाई जा चुकी हैं। 

फिलीपींस के बाद अब वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ भी निर्यात वार्ता अंतिम चरण में है. अब इस कड़ी में रूस का नाम जुड़ना भारत के रक्षा निर्यात इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है. अब तक सैन्य साजो-सामान के लिए रूस पर निर्भर रहने वाला भारत अब खुद रूस को मिसाइल एक्सपोर्ट करेगा। 

इस कदम से न केवल दोनों देशों के कूटनीतिक संबंध नए मुकाम पर पहुंचेंगे, बल्कि भविष्य में बनने वाली हाइपरसोनिक मिसाइल ‘ब्रह्मोस-II’ और इसके छोटे वेरिएंट ‘ब्रह्मोस-एनजी’ के संयुक्त विकास को भी नई रफ्तार मिलेगी। 

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- फुटपाथ पर चलना भी नागरिकों का मौलिक अधिकार

नई दिल्ली

देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने शुक्रवार (19 जून 2026) को माना कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है. अदालत ने कहा कि नागरिकों को सुरक्षित, बाधारहित और दिव्यांगों की सुविधा के मुताबिक फुटपाथ उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है। 

लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें सड़क सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान कही. याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि देश के कई शहरों में या तो फुटपाथ हैं ही नहीं, और जहां हैं भी वहां अतिक्रमण, पार्किंग या अन्य बाधाओं के कारण पैदल चलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में लोगों को मजबूर होकर सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है। 

अदालत ने और क्या कहा?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने कहा, “संविधान के भाग-III के तहत पैदल चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. यह अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत प्राप्त आवागमन की स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. इसे अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b), अनुच्छेद 19(1)(c) और अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिए. पैदल चलने के इस मौलिक अधिकार के दायरे में स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथों का अधिकार भी शामिल है. ये अधिकार प्राथमिक हैं और इन्हें मोटर चालित वाहनों की आवाजाही पर वरीयता प्राप्त होगी। 

कोर्ट ने कहा, “यह वास्तव में अजीब है कि हम पैदल चलने के अधिकार को पहचानने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते. शायद इसकी वजह यह है कि पहियों ने हमारी सोच पर कब्जा कर लिया है. हमारी नगरपालिकाएं ऐसी सड़कें बनाने में व्यस्त रहीं जो मोटर वाहनों के लिए अधिक उपयुक्त हों। 

दिव्यांगजनों की सुविधा पर दिया जोर
कोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से दिव्यांगजनों के अधिकारों पर भी जोर दिया. अदालत ने कहा कि फुटपाथ ऐसे होने चाहिए, जिनका इस्तेमाल व्हीलचेयर या अन्य सहायक उपकरणों का इस्तेमाल करने वाले लोग भी आसानी से कर सकें. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे फुटपाथों की उपलब्धता, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करें. साथ ही, फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने को भी अनिवार्य बताया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर उचित फुटपाथ नहीं होंगे, तो पैदल यात्रियों को सड़क का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जो उनकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है. इसलिए सुरक्षित फुटवे और फुटपाथ उपलब्ध कराना सिर्फ प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। 

उत्तराखंड चुनाव 2027: धामी के सामने मिशन रिपीट की चुनौती, कांग्रेस और UKD कितना बिगाड़ेंगे खेल?

देहरादून 

उत्तराखंड की सियासत में ‘चुनावी बिगुल’ बज चुका है. विधानसभा चुनाव होने में आठ महीने से कम का समय बचा है. देवभूमि की सत्ता पर काबिज होने के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जहां इतिहास रचने के इरादे से मैदान में उतरने की तैयारी में है, तो वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) इस बार सत्ता परिवर्तन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। 

70 विधानसभा सीटों वाले इस पहाड़ी राज्य में चुनावी सरगर्मियां चरम पर हैं और हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुट गया है। 

कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में जुटी है. दूसरी ओर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) भी राज्य निर्माण से जुड़े मूल मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 

उत्तराखंड में सियासी शह-मात का खेल 
बीजेपी ने 2022 में सत्ता परिवर्तन की रिवायत को तोड़ने में कामयाब रही, जब से उत्तराखंड बना है, 2022 में पहली बार था, जब कोई पार्टी लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने में कामयाब रही. इस पर बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है तो कांग्रेस दस साल से चले आ रहे अपने सियासी वनवास खत्म करने की कवायद में है। 

उत्तराखंड का चुनाव दो ध्रुवीय रहा है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है, लेकिन बसपा से लेकर सपा तक किस्मत आजमाती रही है. इसके अलावा उत्तराखंड राज्य बनवाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले उत्तराखंड क्रांति दल भी पूरे दमदारी के साथ चुनावी तैयारी में जुटी है। 

क्या रहे थे 2022 के चुनावी समीकरण?
आगामी जंग को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों और सियासी उलटफेरों को देखना बेहद जरूरी है। 

     सीटें और वोट शेयर: 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 44.33% वोट शेयर के साथ 47 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की थी. वहीं, कांग्रेस 37.91% वोट पाकर महज 19 सीटों पर सिमट गई थी. इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 2 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2 सीटें मिली थीं। 

    ‘आप’ का सूपड़ा साफ: आम आदमी पार्टी (AAP) ने कर्नल अजय कोठियाल (जो अब भाजपा में हैं) को सीएम चेहरा बनाकर बहुत जोर-शोर से चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी का खाता भी नहीं खुला और उसे केवल 3.3% वोटों से संतोष करना पड़ा। 

    दो बड़े सियासी उलटफेर: 2022 के चुनाव ने दो सबसे बड़े दिग्गजों को धूल चटाई थी. कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को लालकुआं सीट से हार का सामना करना पड़ा. वहीं, भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी अपनी पारंपरिक खटीमा सीट से कांग्रेस के भुवन कापड़ी से चुनाव हार गए थे। 

    धामी की चंपावत से वापसी: चुनाव हारने के बावजूद भाजपा आलाकमान ने पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया. इसके बाद दिवंगत भाजपा नेता कैलाश गहतोड़ी ने चंपावत सीट खाली की, जहां हुए उपचुनाव में धामी ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की। 

मंडलों का गणित: कुमाऊं बनाम गढ़वाल
उत्तराखंड की सियासी कुमाऊ और गढवाल में बंटी हुई है. राजनीतिक रूप से दोनों ही क्षेत्र की अपनी सियासी अदावत भी रही है. हालांकि, सत्ता का रास्ता कुमाऊं (29 सीटें) और गढ़वाल (41 सीटें) मंडलों से होकर गुजरता है. पिछले चुनाव में दोनों मंडलों का मिजाज काफी अलग रहा था। 

2022 के चुनाव में गढ़वाल मंडल की 41 सीटों में से भाजपा ने 29 और कांग्रेस ने 8 सीटें जीती थीं. इसके अलावा बसपा दो सीटें और दो सीटें निर्दलीय ने जीती थी. कुमाऊं मंडल की 29 सीटों में से बीजेपी ने 18 और कांग्रेस ने 11 सीटें जीती थीं . इस तरह दोनों ही मंडलों पर बीजेपी का दबदबा रहा। 

उत्तराखंड विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 2022 के चुनाव में भाजपा ने 47 सीटों पर जीत दर्ज कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी. कांग्रेस 19 सीटों तक सिमट गई थी, जबकि बसपा और निर्दलीय उम्मीदवारों को दो-दो सीटें मिली थीं। 

वोट प्रतिशत के लिहाज से भी भाजपा कांग्रेस से आगे रही थी. भाजपा को 44.33 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के खाते में 37.91 प्रतिशत वोट आए थे. वहीं आम आदमी पार्टी, जिसने कर्नल अजय कोठियाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा था, कोई सीट नहीं जीत सकी और उसका 

2022 में भाजपा ने गढ़वाल में एकतरफा प्रदर्शन किया था, जबकि कुमाऊं मंडल में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. यही वजह है कि इस बार दोनों दलों ने इन मंडलों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। 

हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में रैलियां प्रस्तावित थीं. अल्मोड़ा की रैली में भारी भीड़ भी जुटी, लेकिन खराब मौसम के कारण राहुल गांधी वहां पहुंच नहीं सके. कार्यकर्ताओं की मायूसी को देखते हुए उन्होंने अल्मोड़ा की रैली को फोन के माध्यम से और गढ़वाल की रैली को वर्चुअल माध्यम से संबोधित किया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल इन दिनों पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं तथा लोगों से सीधे संपर्क में जुटे हैं। 

भाजपा का ‘मिशन 23’ और विकास का रोडमैप
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के इतिहास में ऐसे पहले भाजपा सीएम बनने जा रहे हैं, जो अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. भाजपा इस बार ‘एंटी-इंकंबेंसी’ को मात देने के लिए माइक्रो-लेवल पर काम कर रही है। 

हारी हुई सीटों पर महा-मंथन: पार्टी ने 13 से 16 जून तक एक बड़ा अभियान शुरू किया है. इसके तहत भाजपा के लोकसभा सांसद, राज्यसभा सदस्य और कोर ग्रुप के वरिष्ठ नेता उन 23 विधानसभा सीटों पर उतर रहे हैं, जहां पिछले चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। 

ये नेता इन क्षेत्रों में न केवल प्रवास करेंगे बल्कि रात्रि विश्राम भी करेंगे. इसके जरिए पार्टी स्थानीय संगठन की सक्रियता का आकलन करेगी और हार के कारणों को समझेगी. इस तरह बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी मजबूत सीटों के साथ-साथ कमजोर सीटों पर मशक्कत करने में जुट गई है। 

चुनावी मुद्दे और हथियार: भाजपा इस बार बुनियादी ढांचे के विकास, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लागू करने और धार्मिक पर्यटन विकास (चारधाम यात्रा और मानसखंड मंदिर माला मिशन) को मुख्य मुद्दा बना रही है. इसके अलावा 2027 में हरिद्वार में होने वाला कुंभ मेला भाजपा के लिए जनता के बीच अपनी प्रशासनिक और विकासपरक छवि को चमकाने का सबसे बड़ा मौका होगा। 

कांग्रेस की डगर: मुद्दे अनेक, पर गुटबाजी से है संताप- कांग्रेस इस बार सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह आक्रामक है. प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल लगातार जमीन पर संघर्ष करते दिख रहे हैं और सभी नेताओं को एकजुट करने में जुटे हैं. इसके अलावा सात महीने हो गए हैं, लेकिन प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं हो सका। 

कांग्रेस की प्रभारी कुमारी शैलजा  दो दिन के कार्यक्रम के लिए पहुंची, लेकिन एक ही दिन में निपटाकर दिल्ली वापस लौट गई. चुनावी तैयारियों के बीच प्रदेश संगठन का न होना, एक बड़ा सवाल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के लिए बना हुआ है। 

कांग्रेस की चुनौती
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा
‘अपनों’ से निपटना है. पिछले दिनों पूर्व सीएम हरीश रावत जब ‘मौन अवकाश’ पर गए थे, तो सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया था. हालांकि, बाद में रावत ने साफ किया कि वह कांग्रेस को जिताने के लिए पूरे दमखम से मैदान में उतरेंगे। 

कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने बातचीत में कहा, “हम पूरी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे. अपने कांग्रेस शासन काल की कानून व्यवस्था से अन्य मुद्दों की तुलना आज की सरकार से करेंगे और जनता के सामने जाएंगे.  हमारी नीतियां ही हमारा चेहरा हैं. लोकतंत्र में सभी नेताओं को बोलने की आजादी है, मुद्दों पर राय अलग हो सकती है, लेकिन हम एकजुट हैं. हम आगामी चुनाव में भाजपा के कुशासन, कानून व्यवस्था की बदहाली और रोजगार के मोर्चे पर उनकी विफलता को जनता के सामने रखेंगे। 

उन्होंने कहा,  ‘एक साल से कम का समय बचा है और हम सब चुनाव में जा रहे हैं तो कांग्रेस पार्टी निश्चित रूप में कांग्रेस शासन की उपलब्धियों को एक बार फिर जनता के सामने रखकर और वर्तमान में वर्तमान सरकार के नाकामयाबियों को सामने रखकर दोनों के कंपेयर दोनों के तुलनात्मक अध्ययन के साथ जनता के बीच जाएगी. मेरा ये मानना है कि जैसे हम क्षेत्रों में लोगों के साथ मिल रहे हैं तो लोग इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि कांग्रेस ने बढ़िया काम किया था. जहां तक विकास की बात है जहां तक रोजगार की बात है, जहां तक लॉ एंड ऑर्डर की बात है इस के लिए कांग्रेसी सरकार जरूरी है। 

विपक्ष के तरकश के तीर
कांग्रेस इस बार अंकिता भंडारी हत्याकांड,  विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामले, पहाड़ों में बढ़ता पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और जंगली जानवरों से हो रहे जान-माल के नुकसान को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है। 

यूकेडी (UKD) की हुंकार: क्षेत्रीय अस्मिता और ‘मूल निवास’ का दांव
उत्तराखंड के राज्य गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) इस बार पूरी मजबूती से वापसी की तैयारी में है. पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष आशुतोष नेगी और युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष आशीष नेगी लगातार जिलों में जनसभाएं कर रहे हैं। 

आशुतोष नेगी ने  बातचीत में अपने तीन सबसे बड़े चुनावी मुद्दों का खुलासा किया, उन्होंने कहा, ‘यूकेडी का मानना है कि जब तक पहाड़ में स्थायी राजधानी नहीं बनेगी, तब तक पहाड़ का समग्र विकास नहीं हो सकता. जब मुख्यमंत्री और विधायक पहाड़ में बैठेंगे, तभी बंजर हो रही भूमि आबाद होगी. यूकेडी ‘मूल निवास’ और सख्त भू-कानून की मांग को लेकर मुखर है. 1950 से यहां रह रहे लोगों को ही मूल निवासी का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए. आज मूल निवासियों को साइडलाइन किया जा रहा है, जिससे युवाओं के रोजगार के अधिकार छिन रहे हैं। 

आशुतोष नेगी ने कहा कि अगर उनकी सरकार आती है और पेपर लीक होता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होगी और सीएम को तुरंत इस्तीफा देना पड़ेगा. आशुतोष नेगी के अनुसार, पार्टी वर्तमान में 30 से 35 सीटों पर बेहद मजबूती से काम कर रही है. उन्होंने यह भी साफ किया कि अगर दूसरे दलों के साफ-सुथरी छवि वाले नेता उनसे जुड़ना चाहते हैं, तो उनका स्वागत है, बशर्ते उनकी क्रेडिबिलिटी पर कोई शक न हो. यूकेडी इस बार युवाओं, मातृशक्ति और पूर्व सैनिकों के सहारे सूबे में बदलाव लाना चाहती है। 

क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?
वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल कहते हैं,  “गढ़वाल की 41 सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है. यूकेडी के आशीष नेगी जमीन पर अच्छा काम कर रहे हैं. यूकेडी जितना मजबूत होगी, वह कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी क्योंकि भाजपा का कोर वोटर फिलहाल इंटैक्ट है. हालांकि भाजपा के खिलाफ नाराजगी है, लेकिन विपक्ष के पास अभी भी पुष्कर सिंह धामी के टक्कर का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है. हरिद्वार में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है. कुल मिलाकर भाजपा की सीटें पिछली बार से घटेंगी जरूर, लेकिन सरकार बनाने की दौड़ में वह आगे दिख रही है। 

वहीं कुमाऊं मंडल  की सीटों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार गणेश पाठक कहते हैं, “कुमाऊं मंडल में मुकाबला बेहद कांटे का होने वाला है. अगर कांग्रेस ने टिकटों का सही वितरण किया और पार्टी के भीतर बगावत नहीं हुई, तो पहाड़ और मैदान दोनों जगह कांग्रेस को बड़ा फायदा हो सकता है. लेकिन इसके लिए कांग्रेस के ‘सभी सरदारों’ (दिग्गजों) को अपनी आपसी खींचतान भूलकर एक मंच पर आना होगा. दूसरी तरफ, भाजपा को अपने मजबूत पन्ना प्रमुख स्तर के संगठन का लाभ अभी भी मिल रहा है। 

किस दिशा में बढ़ रही चुनावी लड़ाई?
फिलहाल तस्वीर साफ है. भाजपा विकास, स्थिर नेतृत्व और संगठन की ताकत के भरोसे सत्ता बरकरार रखने की कोशिश करेगी. कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और अंकिता भंडारी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरकर वापसी का रास्ता तलाशेगी. वहीं यूकेडी राज्य आंदोलन से जुड़े पुराने सवालों को फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश करेगी। 

कुल मिलाकर उत्तराखंड का 2027 का चुनाव बेहद रोमांचक मोड़ पर है. जहां भाजपा अपनी सत्ता बचाने के लिए संगठनात्मक चक्रव्यूह रच रही है, वहीं कांग्रेस और यूकेडी जनता की नाराजगी को वोटों में बदलने की फिराक में हैं. ऊंट किस करवट बैठेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आगामी महीनों में कौन सा दल पहाड़ों के बुनियादी मुद्दों को सबसे बेहतर ढंग से उठा पाता है। 

निर्मला सप्रे दलबदल मामला: हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, जल्द आ सकता है बड़ा फैसला

 जबलपुर
 मप्र हाई कोर्ट ने गुरुवार को मध्य प्रदेश की राजनीति से जुड़े बहुचर्चित दलबदल प्रकरण में सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सागर जिले की बीना सीट से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त करने की मांग वाली याचिका पर हुई सुनवाई के बाद अब सभी की निगाहें कोर्ट के फैसले पर टिक गई हैं।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में भाग लेकर दलबदल कानून का उल्लंघन किया है। याचिका में उनकी विधानसभा सदस्यता शून्य घोषित करने की मांग की गई है।

विधानसभा अध्यक्ष की देरी पर कोर्ट जता चुका है नाराजगी
दरअसल, मामले ने तब और गंभीर स्वरूप ग्रहण कर लिया था, जब पिछली सुनवाई में हाई कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के समक्ष लंबित कार्रवाई में हो रही देरी पर तीखी नाराजगी व्यक्त की थी। न्यायालय ने स्पष्ट पूछा था कि जब दलबदल संबंधी मामलों में सुप्रीम कोर्ट 90 दिनों के भीतर निर्णय का मानक तय कर चुका है, तब लगभग दो वर्ष बाद भी अंतिम निर्णय क्यों नहीं हो पाया।

याचिका के अनुसार, 30 जून 2024 को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दलबदल संबंधी आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आरोप है कि लोकसभा चुनाव के दौरान पांच मई 2024 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से भाजपा के मंच पर पहुंचकर निर्मला सप्रे ने अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलने का संकेत दिया था। इसके बावजूद उन्होंने विधायक पद से त्यागपत्र नहीं दिया।

 

पाकिस्तानी हैंडलर का खतरनाक प्लान बेनकाब, युवकों को जिम जाने और पासपोर्ट बनवाने के दिए थे निर्देश

भोपाल
 मध्य प्रदेश आतंकवाद निरोधी दस्ता (एटीएस) की जांच में देश विरोधी गतिविधियों के आरोपितों से जुड़े नए और चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। पूछताछ में खुलासा हुआ है कि इंटरनेट मीडिया और वाट्सएप के जरिए संपर्क में रहने वाला पाकिस्तानी हैंडलर आरोपित युवकों को नियमित रूप से जिम जाने, शारीरिक रूप से फिट रहने और पासपोर्ट बनवाने का निर्देश दे रहा था। जांच एजेंसियों को आशंका है कि उन्हें भविष्य में प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान भेजने की तैयारी की जा रही थी।

एटीएस सूत्रों के अनुसार पाकिस्तानी हैंडलर युवकों को कथित तौर पर “लड़ाके” बनने के लिए शारीरिक रूप से तैयार रहने की सलाह देता था। इसी क्रम में पासपोर्ट बनवाने पर भी विशेष जोर दिया गया था। अब तक गिरफ्तार आरोपितों में केवल भोपाल निवासी फराज के पास पासपोर्ट मिलने की पुष्टि हुई है।

चार राज्यों से चार आरोपित गिरफ्तार
इस मामले में एटीएस अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। इनमें भोपाल से फराज, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से नईम अब्दुल्ला, राजस्थान के अलवर से शाकिर मेव और बिहार के मधुबनी से इजहार उल हक को पकड़ा गया है। सबसे पहले गिरफ्तार किए गए फराज को न्यायिक हिरासत में जेल भेजा जा चुका है।

आतंकी संगठनों से संबंधों की जांच जारी
एटीएस अब यह पता लगाने में जुटी है कि आरोपितों के संबंध किसी आतंकी संगठन से थे या नहीं। हालांकि प्रारंभिक पूछताछ में सभी आरोपित किसी बड़े संगठन से जुड़े होने से इन्कार करते रहे हैं। इसके बावजूद जांच एजेंसियां इस दावे की गहन पड़ताल कर रही हैं।

डिजिटल सबूतों की होगी फोरेंसिक जांच
जांच का फोकस अब आरोपितों से जब्त किए गए मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों पर है। एटीएस इन डिवाइसों से डेटा रिकवर कर उनके ऑनलाइन नेटवर्क, सोशल मीडिया संपर्कों और चैटिंग रिकॉर्ड की पड़ताल कर रही है। इसके साथ ही उन लोगों की पहचान भी की जा रही है, जो इन आरोपितों के संपर्क में थे।

सूत्रों का मानना है कि डिजिटल जांच के बाद इस मामले में और लोगों की संलिप्तता सामने आ सकती है, जिससे गिरफ्तार आरोपितों की संख्या बढ़ने की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।

फंडिंग के सबूत अभी नहीं मिले
जांच एजेंसियों के मुताबिक अब तक किसी संस्था, संगठन या व्यक्ति द्वारा देश विरोधी गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता दिए जाने के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं। हालांकि आरोपितों के बैंक खातों और लेन-देन की विस्तृत जांच की जा रही है, ताकि किसी संभावित फंडिंग नेटवर्क का पता लगाया जा सके।

 

PM Kisan Yojana: किसानों को आज मिलेगा ₹2000 का तोहफा, जानें किस समय खाते में आएगी किस्त और कैसे चेक करें स्टेटस

नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 20 जून 2026 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के तारकेश्वर से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM Kisan) योजना की 23वीं किस्त जारी करेंगे. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, शनिवार को 3.45 बजे 23वीं किस्त के तहत 18 हजार 880 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे 9 करोड़ 44 लाख से ज्यादा किसानों के खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए ट्रांसफर की जाएगी. 23वीं किस्त में 2 करोड़ 18 लाख से अधिक महिला किसानों को लाभ मिलेगा। 

सरकार की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, 23वीं किस्त जारी होने के साथ ही 24 फरवरी 2019 से शुरू हुई इस योजना के तहत कुल वितरण राशि 4 लाख 46 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी. योजना की 23वीं किस्त में पश्चिम बंगाल में 45 लाख 35 हजार से अधिक लाभार्थियों को 907 करोड़ 21 लाख रुपये से अधिक की राशि दी जाएगी। 

बता दें कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के तहत देश के करोड़ों गरीब किसानों की आर्थिक मदद के लिए हर साल 6,000 रुपये दिए जाते हैं, जो तीन किस्तों में सीधे किसानों के खाते में पहुंचते हैं. इससे पहले 13 मार्च 2026 को पीएम किसान योजना की 22वीं किस्त जारी की गई थी। 

इन किसानों की अटक सकती है किस्त
PM-KISAN योजना का लाभ लेने के लिए कुछ शर्तें जरूरी हैं. जैसे बिना e-KYC के खातों में पैसा नहीं आएगा. बैंक खाता आधार से लिंक होना जरूरी है. फार्मर आईडी भी होनी चाहिए.वहीं,पीएम किसान योजना का लाभ लेने के लिए जमीन का रिकॉर्ड सही होना चाहिए. अगर सभी जरूरी शर्तें पूरी नहीं होंगी तो पीएम किसान योजना की 23वीं किस्त के पैसे अटक सकते हैं. अगर आप  प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के पात्र हैं, तो आज ही आधिकारिक वेबसाइट pmkisan.gov.in पर जाकर बेनिफिशियरी लिस्ट में अपना स्टेटस चेक कर सकते हैं। 

Beneficiary लिस्ट में कैसे चेक करें नाम?
सबसे पहले योजना की आधिकारिक वेबसाइट pmkisan.gov.in पर जाएं. जहां आपको ‘Farmers Corner’ सेक्शन में ‘Beneficiary Status’ विकल्प पर क्लिक करना है. इसके बाद आधार नंबर, मोबाइल नंबर या रजिस्ट्रेशन नंबर समेत मांगी गई सभी जानकारी भरने के बाद “Get Report” पर क्लिक करके बेनिफिशियरी लिस्ट में अपना स्टेटस चेक कर सकते हैं। 

वहीं, अगर किसी किसान को अपना रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं पता है तो ‘Know Your Registration Number’ ऑप्शन पर क्लिक करके आधार या लिंक मोबाइल नंबर की मदद से इसे जान सकते हैं. फिर कैप्चा कोड और OTP डालकर चेक कर सकते हैं कि बेनिफिशयरी लिस्ट में नाम है या नहीं। 

AI नहीं सीखने वाले टेक कर्मचारियों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, छंटनी की आशंका 3 गुना ज्यादा: गैलप स्टडी

 नई दिल्ली

क्या आप भी इस मुगालते में हैं कि बिना एआई सीखे आपका काम मजे से चलता रहेगा? अगर हां, तो ग्लोबल सर्वे एजेंसी ‘गैलप’ की यह ताजा स्टडी आंखें खोलेने के ल‍िए है. टेक इंडस्ट्री में इस समय एआई सिर्फ काम को आसान बनाने का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह आपकी नौकरी बचाने का सबसे बड़ा ‘सुरक्षा कवच’ बन चुका है। 

गैलप के नए शोध के मुताबिक, जो टेक कर्मचारी अपने रोजमर्रा के काम में एआई का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, उनके नौकरी गंवाने (ले ऑफ) का खतरा एआई इस्तेमाल करने वाले साथियों की तुलना में तीन गुना ज्यादा है। 

बता दें कि गैलप ने ये अनुमान अमेरिका के 23,000 से अधिक कामकाजी लोगों पर किए गए सर्वे के आधार पर लगाया है. इसमें वो 660 लोग भी शामिल थे जिनकी हाल ही में नौकरी चली गई थी. इसके स्टेटेस्ट‍िक मॉडल से कई बातें निकलकर आईं, जैसे जो टेक कर्मचारी महीने में कम से कम एक बार या उससे अधिक एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, उनके छंटनी की संभावना सिर्फ 6 फीसदी पाई गई। 

वहीं नॉन-एआई यूजर्स कर्मचारी यानी जो एआई से दूरी बनाकर रखते हैं या बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, उनकी नौकरी जाने का रिस्क सीधे 18 फीसदी तक पहुंच जाता है. रिपोर्ट में साफ किया गया है कि टेक इंडस्ट्री से बाहर के सेक्टर्स में भी एआई का इस्तेमाल न करने वाले कर्मचारी छंटनी के काफी करीब हैं, हालांकि वहां रिस्क का यह अंतर टेक सेक्टर जितना बड़ा नहीं है। 

कंपनियों की नई ‘फॉल्ट लाइन’ बना एआई
ये स्टडी इशारा करती है कि एआई यानी आर्ट‍िफ‍िश‍ियल इंटेल‍िजेंस अब कंपनियों के भीतर एक ऐसी विभाजक रेखा (फॉल्ट लाइन) बन चुका है, जो सीधे तौर पर लोगों के करियर को प्रभावित कर रहा है. कंपनियां अब न सिर्फ नए उम्मीदवारों को हायर करते समय ‘एआई साक्षरता’ चेक कर रही हैं, बल्कि मंदी या छंटनी के वक्त यह भी देख रही हैं कि किस कर्मचारी को रोकना है और किसे बाहर का रास्ता दिखाना है। 

कर्मचारी कुछ और कह रहे हैं, कंपनियां कुछ और!
इस रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू कंपनियों और कर्मचारियों के बीच का वैचारिक अंतर है. छंटनी का शिकार हुए केवल 1 फीसदी कर्मचारियों ने माना कि उनकी नौकरी जाने की सीधी वजह एआई है. अधिकांश ने इसके लिए कंपनियों के पुनर्गठन (Restructuring), कॉस्ट-कटिंग या खराब आर्थिक हालातों को ज़िम्मेदार ठहराया। 

इसके उलट, ‘चैलेंजर, ग्रे एंड क्रिसमस इंक’ के डेटा के मुताबिक, पिछले महीने कंपनियों द्वारा की गई छंटनी की घोषणाओं में एआई सबसे बड़ा कारण था, जो कुल घोषणाओं का लगभग 40 फीसदी था. गैलप के मुख्य वैज्ञानिक जिम हार्टर का मीड‍िया को द‍िया बयान काफी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा कि कर्मचारी अपनी नौकरी जाने के लिए सीधे एआई को दोष नहीं दे रहे हैं, जिससे एआई का वह अप्रत्यक्ष प्रभाव छिप जाता है जो कंपनियां छंटनी का फैसला लेते समय मन में रखती हैं। 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बड़ा दावा, 3 लाख करोड़ के रक्षा उत्पादन और ₹50,000 करोड़ निर्यात का लक्ष्य समय से पहले होगा पूरा

 

नयी दिल्ली 
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि देश रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है और तीन लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन तथा 50,000 करोड़ रुपए के रक्षा निर्यात के लक्ष्यों को समय से पहले हासिल कर लिया जायेगा।

सिंह ने नागपुर में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ यंत्र इंडिया लिमिटेड की आयुध निर्माणी अंबाझरी इकाई में अत्याधुनिक 10,000 टन एल्यूमिनियम एक्सट्रूज़न प्रेस के भूमि पूजन के अवसर पर यह बात कही। उन्होंने कहा है कि निगमीकरण के बाद आयुध निर्माणी बोर्ड का उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में 26,282 करोड़ रुपए तक पहुँच गया जो वित्त वर्ष 2019-20 में 12,755 करोड़ रुपए था।

निर्यात भी 81 करोड़ से बढ़कर 4,561 करोड़ रुपए पहुंच गया है।

उन्होंने कहा , “जो राष्ट्र अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करने में सक्षम होता है, वह अपने हितों की सुरक्षा के लिए सबसे अधिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।” उन्होंने कहा कि यह एक्सट्रूज़न प्रेस देश के दृष्टिकोण में उस परिवर्तन का प्रतीक है, जिसमें आयात पर निर्भर रहने के बजाय महत्वपूर्ण वस्तुओं का घरेलू उत्पादन किया जा रहा है। उन्होंने मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य में भविष्य के लिए तैयार रहने के लिए सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं पर नियंत्रण को अनिवार्य बताया।

उन्होंने कहा कि प्रस्तावित प्रेस देश में अपनी तरह की सबसे उन्नत सुविधाओं में से एक होगी। यह रक्षा प्रणालियों एवं विभिन्न प्लेटफॉर्म, अंतरिक्ष एवं विमानन संरचनाओं, मिसाइल कार्यक्रमों, रेलवे एवं परिवहन क्षेत्रों तथा अन्य रणनीतिक औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए आवश्यक बड़े और जटिल एल्यूमिनियम मिश्रधातु प्रोफाइलों के निर्माण में सहायता करेगी। यह परियोजना महत्वपूर्ण एल्यूमिनियम एक्सट्रूज़न के आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने तथा स्वदेशी उत्पादन के माध्यम से रणनीतिक क्षेत्रों की भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होगी।

रक्षा मंत्री ने कहा, “यह एक्सट्रूज़न प्रेस एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा करता है। आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और उन्नत अंतरिक्ष कार्यक्रम ऐसे धातुओं की मांग करते हैं जो हल्की होने के साथ-साथ मजबूत भी हों और अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकें। ऐसी धातुएँ विशेष प्रक्रियाओं के माध्यम से तैयार की जाती हैं। यदि धातु की गुणवत्ता श्रेष्ठ होगी, तो वह हर परिस्थिति में प्रभावी सिद्ध होगी।”

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता में भारत-निर्मित उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए सिंह ने मजबूत हार्डवेयर के स्वदेशी निर्माण को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी मशीनों की वास्तविक शक्ति हजारों महत्वपूर्ण अवयवों से मिलकर बनती है और यह एक्सट्रूज़न प्रेस इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज जबकि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है और शत्रुओं की पहचान करना अधिक कठिन हो गया है, फिर भी पारंपरिक युद्ध और उससे जुड़े साधनों की प्रासंगिकता 1947 की तरह आज भी बनी हुई है और 2047 में भी काफी हद तक बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि एक मजबूत सैन्य-औद्योगिक आधार का महत्व लंबे समय तक बना रहेगा और यह एक्सट्रूज़न प्रेस भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए प्रौद्योगिकी, कार्यबल, ज्ञान और राष्ट्र के प्रति विश्वास जैसे चार प्रमुख तत्वों पर एक साथ कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार के निरंतर प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और 2014 में 46,000 करोड़ रुपये का घरेलू रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ हो गया है। उन्होंने कहा कि 2014 में भारत का रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ से भी कम था, जो अब बढ़कर 38,424 करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है।

उन्होंने कहा, “यह केवल आँकड़ों में वृद्धि नहीं है, बल्कि भारत की क्षमताओं में वृद्धि का प्रतीक है। यह राष्ट्र के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी को दर्शाता है। हम अगले 2-3 वर्षों के लिए निर्धारित 3 लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपए के रक्षा निर्यात के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”

रक्षा मंत्री ने आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में यंत्र इंडिया लिमिटेड के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि बदलते समय और उभरती प्रौद्योगिकियों को ध्यान में रखते हुए आयुध निर्माणी बोर्ड का निगमीकरण प्रणाली को अधिक मजबूत और चुस्त बनाने के लिए किया गया था और यंत्र इंडिया लिमिटेड उसी परिवर्तन का परिणाम है।

उन्होंने कहा, “निगमीकरण के बाद हमारी परिकल्पना थी कि नयी इकाइयों को पर्याप्त परिचालन स्वायत्तता मिले और उन्हें नवाचार, जोखिम उठाने, अनुसंधान तथा निर्यात में उत्कृष्टता प्राप्त करने के अवसर प्राप्त हों। सभी नयी रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयाँ इस दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ी हैं। वित्त वर्ष 2019-20 में निगमीकरण से पहले आयुध निर्माणी बोर्ड का उत्पादन 12,755 करोड़ रुपए था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 26,282 करोड़ रुपए हो गया। रक्षा निर्यात के क्षेत्र में यह आँकड़ा निगमीकरण से पहले मात्र 81 करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर 4,561 करोड़ रुपए हो गया है, जिसमें यंत्र इंडिया लिमिटेड का योगदान 397 करोड़ रुपए है।”

सिंह सिंह ने कहा कि प्रतिस्पर्धी दुनिया में “अनुसंधान एवं विकास” तथा “पूंजी निवेश” किसी औद्योगिक इकाई को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख तत्व हैं। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक प्रगति और प्रतिस्पर्धा के लिए अनुसंधान एवं विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है और जो संगठन नवाचार को अपनाते हैं, वही भविष्य का नेतृत्व करते हैं।

पूंजी निवेश पर उन्होंने कहा कि नयी मशीनरी की स्थापना या आधुनिक उपकरणों में निवेश एक महत्वपूर्ण तकनीकी जुड़ाव प्रदान करता है। “आधुनिक मशीनरी के माध्यम से नयी प्रौद्योगिकियाँ विनिर्माण प्रणाली का हिस्सा बनती हैं, जिससे उत्पादन प्रक्रियाओं की दक्षता बढ़ती है, गुणवत्ता में सुधार होता है और पूरी प्रणाली अधिक आधुनिक एवं प्रभावी बनती है।”

रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कुशल मशीनरी स्थापना और आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि नवीनतम प्रौद्योगिकी और उन्नत उत्पादन प्रणालियों में निवेश भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इससे कॉर्पोरेट इकाइयाँ राष्ट्रीय अपेक्षाओं को पूरा कर सकेंगी और वैश्विक मानकों पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकेंगी। उन्होंने रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों से बदलते समय के अनुरूप आगे बढ़ने के लिए सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों का अध्ययन और आवश्यकतानुसार उन्हें अपनाने का आह्वान किया।

फडणवीस ने अपने संबोधन में एल्यूमिनियम एक्सट्रूज़न प्रेस को प्रधानमंत्री के नेतृत्व और रक्षा मंत्री के मार्गदर्शन में आत्मनिर्भर और विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के प्रयासों के कारण भारत रक्षा क्षेत्र में वैश्विक बाजार में एक प्रमुख निर्यातक के रूप में अपनी पहचान बना रहा है और विश्व भारत के रक्षा क्षेत्र की प्रगति को स्वीकार कर रहा है।

इस अवसर पर रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, रक्षा उत्पादन विभाग की संयुक्त सचिव गरिमा भगत, यंत्र इंडिया लिमिटेड के संचालन निदेशक एवं अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (अतिरिक्त प्रभार) विजयकुमार अय्यर, रक्षा उत्पादन विभाग एवं यंत्र इंडिया लिमिटेड के अन्य वरिष्ठ अधिकारी, रक्षा बलों के अधिकारी तथा उद्योग जगत के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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