शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश हमारी प्राथमिकता : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश हमारी प्राथमिकता : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा का समन्वय कर रही है राज्य सरकार : मुख्यमंत्री साय

स्कूली शिक्षा में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का संत समाज ने किया स्वागत

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से विभिन्न संत-महात्माओं ने की सौजन्य भेंट, आध्यात्मिक शिक्षा को बढ़ावा देने के निर्णय पर जताया आभार

रायपुर 
 मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास में दक्षिण कौशल पीठाधीश्वर स्वामी राजीव लोचन दास जी महाराज, निर्वाणी अखाड़ा के महंत सुरेंद्र दास जी महाराज, शदाणी दरबार से उदय लाल जी  तथा कबीर आश्रम सोनपैरी के देवकर साहब जी ने सौजन्य भेंट की।

इस अवसर पर संत-महात्माओं ने छत्तीसगढ़ के विद्यालयों में भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक मूल्यों एवं नैतिक शिक्षा से जुड़े पारंपरिक श्लोकों और मंत्रों को पुनः शामिल किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री साय के प्रति आभार व्यक्त किया।

संतों ने कहा कि पूर्व में विद्यालयों में विद्यार्थियों को “गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वर” जैसे मंत्रों एवं भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराया जाता था, जिससे बच्चों में संस्कार, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का विकास होता था। समय के साथ ये परंपराएं शैक्षणिक वातावरण से धीरे-धीरे विलुप्त होती गईं, किंतु अब राज्य सरकार द्वारा इन्हें पुनः स्थापित करने की पहल अत्यंत स्वागतयोग्य है।

संत समाज ने कहा कि विद्यालयों में शांतिपाठ, सरस्वती वंदना, भोजन मंत्र तथा अन्य प्रेरणादायी वैदिक एवं सांस्कृतिक प्रार्थनाओं का समावेश बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जुड़ सकेगी।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार, चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों के विकास का आधार भी है। हमारी सरकार बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। विद्यालयों में शांतिपाठ, सरस्वती वंदना, भोजन मंत्र एवं अन्य प्रेरणादायी प्रार्थनाओं के समावेश से विद्यार्थियों में अनुशासन, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का विकास होगा। यह पहल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए एक संस्कारित, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

संत-महात्माओं ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को इस पहल के लिए साधुवाद देते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया तथा कहा कि यह निर्णय प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक विरासत को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की मौजूदगी में एग्रो सौर पीवी के लिए हुआ एमओयू

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की मौजूदगी में एग्रो सौर पीवी के लिए हुआ एमओयू

नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग तथा इंडो-जर्मन एग्रीवोल्टाइक परियोजना मिलकर करेंगे काम
प्रदेश में एग्री सौर पीवी के विकास में जर्मन कम्पनी जीआईजेड करेगी सहयोग

भोपाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की प्रदेश में एग्रो सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने की मंशा पर एक और उपलब्धि हासिल हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की मौजूदगी में नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग, मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड तथा जर्मन सरकार समर्थित इंडो-जर्मन एग्री वोल्टाइक सहयोग परियोजना (आईजीसीए) के मध्य सोमवार को मंत्रालय, भोपाल में एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर आदान-प्रदान किया गया। एग्री वोल्टाइक, कृषि एवं सौर ऊर्जा के संयुक्त उपयोग को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया एक संगठन है। इसका उद्देश्य कृषि भूमि पर खेती के साथ-साथ उसी खेत में ही सौर ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहित करना है, जिससे अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता कम हो, खाद्य सुरक्षा बनी रहे तथा भूमि संबंधी विवादों से भी बचा जा सके। इस काम में जर्मन कम्पनी सरकार को सहयोग देगी। यह पहल पीएम-कुसुम 2.0 सहित विभिन्न योजनाओं के अनुरूप राज्य में विशिष्ट एग्रीवोल्टाइक ढांचा विकसित करने, किसानों की आय बढ़ाने, भूमि उपयोग दक्षता सुधारने, उत्पादित ऊर्जा की सुरक्षा सुदृढ़ करने तथा जलवायु-अनुकूल ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने में सहायक होगी। यह गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन मई 2030 तक प्रभावी रहेगा। इस अवसर पर नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री राकेश शुक्ला, अपर मुख्य सचिव नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग मनु श्रीवास्तव, प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड अमनवीर सिंह बैंस, भारत में जर्मन दूतावास के पदाधिकारी, एग्री वोल्टाइक संगठन से एलेक्जेंडर, जर्मनी की जीआईजेड कम्पनी के पदाधिकारी सहित अन्य विभागीय अधिकारी उपस्थित थे।

एग्री सौर पीवी के तहत सरकार किसानों को सब्सिडी देगी। इससे किसान अपनी जमीन के मालिकाना हकदार होंगे। किसान जमीन में खेती करेंगे और उसी खेत में सोलर पैनल लगाकर सौर ऊर्जा उत्पादन कर अतिरिक्त आय भी अर्जित करेंगे। यह किसानों के लिए डबल सौगात होगी।

राज्य सरकार और इंडो-जर्मन एग्री वोल्टाइक सहयोग परियोजना के मध्य हुई इस परस्पर साझेदारी के अंतर्गत कम्पनी द्वारा एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं की पहचान, तकनीकी एवं आर्थिक मूल्यांकन, डिजाइन, वित्तीय व्यवहार्यता और क्रियान्वयन में सहयोग किया जाएगा। इसके तहत प्रदेश के किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, ऊर्जा विकासकर्ताओं, डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनीज (डिस्कॉम) एवं अन्य संबंधित हितधारकों के लिए क्षमता निर्माण और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। कम्पनी द्वारा राज्य में कृषि उत्पादकता एवं खाद्य सुरक्षा को संरक्षित रखते हुए उपयुक्त नीतिगत एवं नियामक ढांचा विकसित करने में भी सहयोग किया जाएगा।

 

सभी समाजों को, उनकी परम्पराओं को जोड़ें, आल्हा-ऊदल स्मृति उत्सव और श्रावण महोत्सव भी मनायें : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

सभी समाजों को, उनकी परम्पराओं को जोड़ें, आल्हा-ऊदल स्मृति उत्सव और श्रावण महोत्सव भी मनायें : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

संस्कृति विभाग की करें पुनर्संरचना, गतिविधियों का भी करें विस्तार
सम्राट विक्रमादित्य के नाम से बनायें पृथक अकादमी
राज्य के ज्योतिर्लिंगों, शक्तिपीठों और प्रसिद्ध देवस्थानों को भी जोड़ें तीर्थदर्शन योजना में
प्रदेश में बन रहे 17 सांस्कृतिक लोक और 20 संग्रहालय
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने की संस्कृति विभाग की गहन समीक्षा

भोपाल 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि आगामी छह-सात माह में बड़े त्यौहार, सांस्कृतिक पर्व एवं मेले मनायें जायेंगे। ये सभी त्यौहार हमारी धार्मिक आस्थाओं और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता के प्रतीक हैं। इन सभी अवसरों पर संस्कृति विभाग सभी समाजों को, उनकी आस्थाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं को जोड़कर वृहद आयोजन करें। आल्हा-ऊदल वीर रस गायन के प्रतीक हैं, उनकी स्मृति में आयोजन किए जाएं। श्रावण महोत्सव और भुजरिया पर्व भी मनाएं। नागपंचमी पर जैव विविधता संरक्षण (सर्प प्रजातियों के संरक्षण) का संदेश दिया जाये। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि संस्कृति विभाग लोगों को जोड़कर ऐसे आयोजन करें, जिनसे हमारी कला और संस्कृति के संवर्धन के साथ ही सरकार के संदेश का भी प्रसार हो।

मुख्यमंत्री सोमवार को मंत्रालय में संस्कृति विभाग अंतर्गत संचालित योजनाओं एवं गतिविधियों की समीक्षा बैठक को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश की कला, संस्कृति, परम्पराएं और समृद्ध पुरातात्त्विक धरोहरें प्रदेश की अमूल्य पूंजी हैं, जिन्हें संरक्षित और संवर्धित करना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए योजनाबद्ध और प्रभावी प्रयास किए जाएं। डॉ. यादव ने कहा कि प्रदेश के सांस्कृतिक अभ्युदय के लिए हमारी सरकार हर जरूरी प्रयास कर रही है। हम समाज को साथ लेकर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बैठक में संस्कृति, पर्यटन एवं धार्मिक न्यास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेन्द्र सिंह लोधी भी उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने संस्कृति विभाग द्वारा वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तैयार किये गये ‘कला पंचांग’ का विमोचन भी किया। इसमें विभाग द्वारा वर्ष भर की जाने वाली कलात्मक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का पूरा कैलेंडर तैयार किया गया है। अब इन्हें सिलसिलेवार क्रियान्वित किया जायेगा।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भविष्य में प्रदेश में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का दायरा और तेजी से बढ़ेगा। विभागीय आंतरिक विशेषताओं और विशेषज्ञताओं का समुचित संयोजन करते हुए संस्कृति विभाग की और बेहतर पुनर्संरचना की जाये। विभागीय गतिविधियों का आधुनिक संदर्भों में विस्तार भी किया जाये। उन्होंने कहा कि संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक न्यास और कुटीर एवं ग्रामोद्योग विभाग सभी मिलकर काम करें, ताकि प्रदेश में धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिले। इससे प्रदेश में उत्कृष्ट कारीगरी से निर्मित होने वाले क्रॉफ्ट आइटम्स, हैंडलूम आइटम्स और कशीदाकारी को भी पहचान मिलेगी।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सम्राट वीर विक्रमादित्य के नाम से एक पृथक अकादमी का गठन किया जाये। इसमें विक्रमादित्य के जीवनवृत्त पर समग्र शोध एवं अन्य संगत गतिविधियां भी संचालित की जायें।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राज्य के बाहर के प्रसिद्ध मंदिरों और देव स्थानों के अतिरिक्त अब प्रदेश में मौजूद 2 ज्योतिर्लिंगों, जागृत एवं मंशापूर्ण शक्ति पीठों एवं अन्य धार्मिक स्थलों को भी मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना में शामिल किया जाये।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने विशेष रूप से श्रीराम वन गमन पथ और श्रीकृष्ण पाथेय परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को इनके निर्माण कार्यों में और अधिक गति लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि उक्त दोनों परियोजनाएं धार्मिक आस्था के केंद्र होने के साथ ही प्रदेश के सांस्कृतिक और पर्यटन विकास की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका कार्य शीघ्र पूर्ण होने से प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को नई दिशा मिलेगी।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सांस्कृतिक गतिविधियों में जनसहभागिता बढ़ाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के गांवों, कस्बों और शहरों में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ा जाए, ताकि नई पीढ़ी अपनी समृद्ध कला और सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।

बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने संस्कृति विभाग की विभिन्न योजनाओं, संरक्षण कार्यों तथा आगामी सांस्कृतिक आयोजनों की प्रगति की समीक्षा की। उन्होंने प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को और सशक्त बनाने के लिए समन्वित प्रयास किए जाने पर बल दिया।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भोपाल के नजदीक जगदीशपुर स्थित पुराने किले की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने कहा कि इस किले के इतिहास को जीवंत करने और इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए भविष्य में जल्द ही यहां स्टेट कैबिनेट मीटिंग की जायेगी।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश में जन्मे या यहां से निकलकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले गायकों, कलाकारों और अन्य जनों की जानकारी एकत्रित कर इन्हें मध्यप्रदेश में प्रस्तुति देने के लिए राज़ी किया जाये। इससे मध्यप्रदेश की कला एवं सांस्कृतिक विविधताओं को देश-दुनिया में नई पहचान और एक्सपोजर मिलेगा और अपनी माटी से जुड़कर ऐसे कलाकारों को भी खुशी होगी।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पद्म पुरस्कारों के लिए प्रदेश के कलाकारों, समाजसेवियों, पर्यावरणविदों के केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्तावों पर संस्कृति विभाग भी अपनी ओर से अनुशंसा करे। उन्होंने कहा कि प्रदेश के सभी पद्म पुरस्कार विजेताओं की आर्थिक मदद के लिए एक स्थायी योजना तैयार की जाये, ताकि जरुरतमंदों को शासन की योजना के तहत आर्थिक सहयोग दिया जा सके।

अपर मुख्य सचिव संस्कृति शिव शेख़र शुक्ला ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को बताया कि प्रदेश में वर्तमान में 17 धार्मिक/सांस्कृतिक लोक और 20 संग्रहालयों का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 से अब तक संस्कृति विभाग के अधीन करीब 4160 करोड़ रुपए के निर्माण कार्यों पर काम जारी हैं। कुछ काम पूरे भी हो चुके हैं। जल्द ही लोकार्पण भी कराया जायेगा। प्रदेश में श्रीराम वन गमन पथ निर्माण पर 160 करोड़ रुपए के काम जारी हैं। महाकाल लोक में मूर्ति स्थापना के कार्य प्रगति पर है। ओरछा में भगवान राम राजा लोक एकदम नये स्वरूप में (छह नई थीम पर) तैयार किया जा रहा है। प्रदेश के सभी लोकों के नियमित संचालन के लिए स्थायी प्रबंधन भी किये जा रहे हैं। प्रदेश के सभी संगीत महाविद्यालयों और सांची स्थित बौद्ध भारतीय ज्ञान अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के सुचारू संचालन के लिए भी जरूरी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश के नाट्य विद्यालय में विभाग द्वारा डिग्री कोर्सेस चलाये जा रहे हैं। यह विद्यालय इतना प्रसिद्ध है कि अब नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के पदाधिकारी विजिट करके यहां उपलब्ध सुविधाओं और कोर्सेस की जानकारी ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि चित्रकूट के समग्र विकास के लिए उत्तरप्रदेश सरकार के साथ लगातार समन्वय किया जा रहा है।

बैठक में मुख्य सचिव अनुराग जैन, अपर मुख्य सचिव वित्त मनीष रस्तोगी, आयुक्त पुरातत्व मदन नागरगोजे, संचालक, संस्कृति एनपी नामदेव सहित अन्य विभागीय अधिकारी भी उपस्थित थे।

 

गैस सिलेंडर का दौर खत्म होने की ओर? सरकार के नए आदेश से LPG एजेंसियों में मची हलचल

 रामपुर
 सरकार एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) के बजाय अब पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) को बढ़ावा दे रही है। जिले में भी तेजी से पीएनजी के उपभोक्ता बढ़ रहे हैं। अब शासन ने आदेश दिए हैं कि एलपीजी इस्तेमाल करने वाले शत-प्रतिशत उपभोक्ताओं के घरों तक पीएनजी पहुंचाई जाए।

इसके बाद पीएनजी अपनाने वाले उपभोक्ताओं को एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करना होगा। इससे भले ही उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी, लेकिन गैस एजेंसी पर बंदी का संकट आ जाएगा। साथ ही वहां काम करने वाले सैकड़ों स्टाफ और डिलीवरीमैन भी बेरोजगार हो जाएंगे।

अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान को लेकर चल रहे युद्ध का सबसे ज्यादा असर पेट्रोलियम पदार्थों पर पड़ा है। एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसके कारण सरकार का पूरा जोर अब पीएनजी पर है।

मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन एसपी गोयल ने सभी जिलों के डीएम को पत्र भेजा है, जिसमें एलपीजी उपभोक्ताओं को पीएनजी में स्विच कराने के आदेश दिए गए हैं।

पत्र में युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरु मध्य क्षेत्र में हाल की घटनाओं के कारण एलपीजी पर निर्भरता कम करने और खाना पकाने के ईंधन के रूप में पीएनजी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी आवश्यक कार्रवाई किए जाने के निर्देश भी दिए हैं।

इसके लिए जिला प्रशासन को अपने जिले में संचालित गैस एजेंसियों संचालकों एवं प्रतिनिधियों के साथ समन्वय स्थापित करते हुए उपलब्धता के आधार पर एलपीजी उपभोक्ताओं को शत-प्रतिशत पीएनजी पर स्विच कराने के लिए तत्काल कार्रवाई को कहा गया है।

गैस एजेंसी संचालकों की पीड़ा
गैस एजेंसी का काम अब फायदे वाला नहीं रह गया है। कई साल से एजेंसियों का कमीशन तक नहीं बढ़ा है। पीएनजी आने से एजेंसियों पर संकट मंडराने लगा है। हम इसका विरोध नहीं करते हैं, लेकिन एक एजेंसी से कई परिवार जुड़े हैं। सरकार को इस पर भी ध्यान देना चाहिए। – राजेंद्र प्रसाद, राजेंद्र गैस एजेंसी।

धीरे-धीरे एलपीजी उपभोक्ता पीएनजी में तब्दील हो जाएंगे तो गैस एजेंसी संचालकों के पास आजीविका की समस्या खड़ी हो जाएगी। गैस एजेंसी से संचालक के अलावा 20 से 25 लोगों का परिवार पलता है। सरकार को इनके विषय में भी विचार करना चाहिए। – अमित दिवाकर, अध्यक्ष रामपुर एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन।

पीएनजी की व्यवस्था महानगरों में पहले से व्यवहार में थी, लेकिन केंद्र सरकार ने 14 मार्च 2026 को अधिसूचना जारी कर इसे पूरे देश में स्पष्ट कानूनी प्रविधान के रूप में लागू कर दिया है। अब एलपीजी वालों को एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करना होगा। – अंकित जैन, टांडा गैस सर्विस।

सरकार का जोर अब पीएनजी पर है। जिले में हिंदुस्तान पेट्रोलियम कंपनी द्वारा पीएनजी का कार्य किया जा रहा है। प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप तेजी से काम किया जा रहा है। पीएनजी के करीब दो हजार कनेक्शन हो चुके हैं। – नीरज कुमार, एरिया मैनेजर एचपी।

अब शिक्षकों की होगी परीक्षा! MP में डेढ़ लाख टीचर्स देंगे TET, फेल हुए तो नौकरी पर संकट

भोपाल 

मध्य प्रदेश में स्कूली छात्रों को को पढ़ा रहे डेढ़ लाख शिक्षकों की काबिलियत जल्द ही कर्मचारी चयन मंडल परखने जा रहा है। टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) कराने राजधानी भोपाल स्थित लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से गाइड तैयार की जा रही है। इसके आधार पर शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। बताया जा रहा है कि, जल्द ही परीक्षा की तारीख तय कर ली जाएगी। खास बात ये है कि, परीक्षा में फेल होने वाले शिक्षकों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। आपको बता दें कि, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के चलते विभाग द्वारा ये कदम उठाया जा रहा है।

हालांकि, विभाग की ये तैयारी विरोध प्रदर्शन के बीच की जा रही है। राजधानी समेंत प्रदेश के स्कूलों में 3.5 लाख शिक्षक हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आधार पर इनकी पात्रता परीक्षा कराई जाएगी। आयोजन लोक शिक्षण संचालनालय कराएगा। परीक्षा के दायरे में 2009 से पहले तक भर्ती शिक्षक हैं। इनकी संख्या डेढ़ लाख है। परीक्षा के खिलाफ शिक्षकों ने याचिका दायर की थी। जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद परीक्षा प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

इन्हें रहेगी छूट
इस परीक्षा से उन शिक्षकों को छूट है जिनकी भर्ती 2009 के बाद हुई। इसके अलावा रिटायरमेंट के करीब शिक्षकों को भी इसमें बाहर रखा गया है। बाकी को इसे क्वालिफाई करना होगा।

क्या कहते हैं जिम्मेदार?
मामले को लेकर लोक शिक्षण संचालनालय के संचालक के.के द्विवेदी का कहना है कि, टीईटी के लिए प्रस्ताव तैयार हो चुका है। ये सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक किया जा रहा है। परीक्षा कर्मचारी चयन बोर्ड के द्वारा कराई जानी है। मामले में विधि विशेषज्ञों से राय ली जा रही है। शिक्षक संगठनों के सुझाव भी इसमें शामिल किए जा रहे हैं।

राजा भोज एयरपोर्ट पर लगेगा हाईटेक MSSR रडार, विमानों की सुरक्षा होगी और मजबूत

भोपाल
 मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के राजा भोज एयरपोर्ट पर हवाई यात्रियों की सुरक्षा और विमानों की बेहतर मॉनिटरिंग के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने यहां अत्याधुनिक ‘मोनोपल्स सेकेंडरी सर्विलांस रडार’ लगाने का काम शुरू कर दिया है। इस नई तकनीक के आने से न सिर्फ विमानों की पहचान तेजी से हो सकेगी, बल्कि सेंट्रल इंडिया के इस प्रमुख हवाई हब पर एयर ट्रैफिक सेफ्टी भी पहले से कई गुना मजबूत हो जाएगी।

सितंबर तक शुरू हो जाएगी सेवा
यह नया रडार सिस्टम एयरपोर्ट के पुराने बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है। राजा भोज एयरपोर्ट के डायरेक्टर रामजी अवस्थी ने बताया कि इस रडार की स्थापना का काम तेजी से चल रहा है और इसे आगामी सितंबर तक पूरी तरह से कमीशन कर दिया जाएगा। वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे पुराने सिस्टम की तुलना में MSSR रडार विमानों की स्थिति और उनकी पहचान से जुड़ा बेहद सटीक डेटा देने में सक्षम है।

राजा भोज एयरपोर्ट पर MSSR तकनीक की शुरुआत सर्विलांस क्षमता और यात्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक समय पर उठाया गया कदम है। यह रीयल-टाइम डेटा भविष्य में ऑटोमेशन और एडवांस सर्विलांस टूल्स को अपनाने का रास्ता साफ करेगा, जिससे फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।

रामजी अवस्थी, डायरेक्टर (राजा भोज एयरपोर्ट, भोपाल)

हवाई दुर्घटनाओं पर लगेगी लगाम
एयरपोर्ट डायरेक्टर के अनुसार, रडार से मिलने वाली सटीक जानकारी की मदद से एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स को आसमान की वास्तविक स्थिति समझने में आसानी होगी। किसी भी आपातकालीन या असामान्य स्थिति में प्रतिक्रिया देने का समय घटेगा और विमानों की गलत पहचान का जोखिम पूरी तरह खत्म हो जाएगा। इसके अलावा, यह रडार ‘कोलिजन-अवॉयडेंस’ (विमानों को आपस में टकराने से रोकने) और पड़ोसी एयरस्पेस के साथ बेहतर तालमेल बनाने में मदद करेगा।

उड़ानों की लेटी-लतीफी से मिलेगी राहत
क्षेत्र में लगातार बढ़ती उड़ानों की संख्या को देखते हुए यह अपग्रेड बेहद जरूरी माना जा रहा था। अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रणाली से व्यस्त समय के दौरान रनवे पर विमानों के उतरने और उड़ान भरने के क्रम को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकेगा। इससे कमर्शियल और जनरल विमानों का संचालन सुगम होगा, जिससे फ्लाइट्स की ऑपरेशनल देरी में कमी आएगी और यात्रियों का कीमती समय बचेगा।

 

मुंबई जाने वालों के लिए खुशखबरी! मध्य प्रदेश में नहीं लेट होंगी ट्रेनें, तीसरी-चौथी लाइन का काम तेज

बुरहानपुर 
 मध्य प्रदेश से मुंबई जाने वाली ट्रेनें अब इटारसी रूट पर नहीं पिटेंगी, साथ ही साथ अब इस रूट की ट्रेनों की रफ्तार भी बढ़ेगी. दरअसल, भुसावल-इटारसी मुबंई रूट की तीसरी और चौथी लाइन का काम शुरू हो गया है. इस लाइन के बनने से इटारसी जंक्शन पर भी दबाव कम होगा और ट्रेनें तेज रफ्तार से मुंबई रूट पर दौड़ेंगी. मुंबई जाने वाले मध्य प्रदेश के यात्रियों को इससे बड़ी राहत मिलेगी। 

देश के सबसे व्यस्त रेल रूटों में से एक है भुसावल-इटारसी रूट
मध्य प्रदेश से होकर गुजरा इटारसी-भुसावल रूट देश के सबसे व्यस्ततम रेल रूटों में से एक है. इस रेल रूट से रोजाना 50 नियमित और एक्सप्रेस ट्रेनें गुजरती हैं, जबकि 100 से ज्यादा लंबी दूरी की ट्रेनें गुजरती हैं. वर्तमान में दो लाइनें होने के बावजूद इस रूट पर भारी दबाव होता है. यही वजह है कि केंद्र सरकार द्वारा भुसावल-इटारसी के बीच तीसरी व चौथी लाइन बनाने के कार्य को प्राथमिकता दी गई है। 

मुंबई जाने वाली यात्रियों को होगा फायदा
मध्य प्रदेश के इटारसी जंक्शन से होते हुए महाराष्ट्र के मुंबई व अन्य शहरों को जाने वाले यात्रियों को इससे फायदा होगा. तीसरी व चौथी लाइन तैयार होने से ट्रेनों का वेटिंग टाइम कम होगा और तकनीकी समस्या आने या किसी अन्य ट्रेन की देरी की वजह से सारी ट्रेनें प्रभावित नहीं होंगी. इससे सीधे तौर पर यात्रियों को फायदा होगा। 

तीसरी और चौथी लाइन के लिए काम तेज
बुरहानपुर से लगे लालबाग रेलवे स्टेशन से भुसावल-इटारसी रेलखंड पर तीसरी और चौथी रेल लाइन बिछाने की तैयारी शुरू हो गई है. इस रेलवे लाइन में अड़ंगा बन रहे अतिक्रमणों को भी तोड़ने की कार्रवाई शुरू हुो गई है. शनिवार को चिंचाला क्षेत्र में हुए अतिक्रमण को रेलवे, जीआरपी, आरपीएफ सहित जिला प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई को अंजाम देकर तोड़ दिया ह., एसडीएम अजमेर सिंह गौड़, सीएसपी गौरव पाटिल और लालबाग पुलिस, जीआरपी सहित आरपीएफ ने व्यवस्थाओ को संभाला, इस दौरान रेल भूमि की जद में आ रहे मकानों को हटाया गया है। 

बुरहानपुर के रेलवे स्टेशन के पास ग्राम चिंचाला में भी रेलवे और जिला प्रशासन की संयुक्त टीम ने रेल भूमि पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की. इस दौरान अतिक्रमण करने वाले करीब 17 मकानों को तोड़ा गया. रेलवे प्रशासन ने करीब दो महीने पहले ही प्रभावित लोगों को अतिक्रमण हटाने के नोटिस जारी किए थे। 

एसडीएम अजमेर सिंह के मुताबिक, ” रेलवे अधिकारियों ने कहा है कि अतिक्रमण की जद में आ रही भूमि खाली होने के बाद जल्द ही तीसरी और चौथी रेल लाइन बिछाने का कार्य शुरू किया जाएगा, इससे रेलवे यातायात को गति मिलेगी, जिन-जिन स्थानों पर अतिक्रमण हुआ है, वहां अतिक्रमण हटाओ मुहीम शुरू हो चुकी है। 

ब्रिटेन का बड़ा फैसला, 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर लग सकता है बैन

लंदन 
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने एक बड़ा ऐलान कर दिया है, उन्होंने बताया है कि वह अब 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने जा रहे हैं. ब्रिटेन अपने इस फैसले की मदद से बच्चों पर सोशल मीडिया की वजह से पड़ने वाले नकारात्मक असर को खत्म करना चाहता है। 

बीते साल ऑस्ट्रेलिया ने टीनएजर्स और बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन किया था. फिर उसके बाद यूरोप समेत कई देशों ने इस फैसले की तारीफ की थी. हाल ही में कनाडा ने भी ऐलान किया था कि वह सोशल मीडिया के लिए नियम बदलने जा रहा है और बच्चों के इस्तेमाल करने को लेकर नियम बदलेगा। 

ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने कहा- आसान नहीं था फैसला 

कीर स्टारमर ने आगे बताया है कि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं है. कई बड़ी कंपनियां सरकार को अपना फैसला वापस लेने के लिए दबाव डाल रही हैं, लेकिन ये फैसला होकर रहेगा। 

ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने X प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करके इस फैसले के बारे में जानकारी दी है और बताया है कि अधिकतर माता-पिता ने उनको बताया है कि उनके बच्चे स्मार्टफोन चलाने का आदि हो चुके हैं। 

ब्रिटेन प्रधानमंत्री का पोस्ट 
ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने अपने पोस्ट में लिखा है कि हम 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को बैन करने जा रहे हैं।  

आज के दौर में बच्चों को ऐसी दुनिया में खुद को ढालना पड़ रहा है, जहां तकनीक उनकी जिंदगी के हर पहलू में दखल दे रही है. मैं अब इसे और जारी नहीं रहने दे सकता. इसलिए हम बच्चों को उनका बचपन वापस देने जा रहे हैं। 

टेक कंपनियों को कई नियम लागू करने को कहा 
ब्रिटेन ने हाल ही के दिनों में टेक कंपनियों के ऊपर दबाव बनाया है. सरकार ने इन कंपनियों से उम्र सत्यापन लागू करने और अपने एल्गोरिद्म में बदलाव करने के लिए के लिए कहा है. साथ ही बच्चों को अश्लील तस्वीर आदि से दूर रखने के लिए नए कदम उठाने को कहा है। 

ब्रिटेन की सरकार चाहती है की ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर होने वाले लाइव स्ट्रीमिंग को भी बच्चों के लिए प्रतिबंधित किया जाए। 

E100 Fuel क्या है? 100% इथेनॉल कैसे लेगा पेट्रोल की जगह, जानिए फायदे, चुनौतियां और पूरी सच्चाई

  नई दिल्ली

E100 Fuel Explained- Pros & Cons: पेट्रोल महंगा है, डीजल का भविष्य धुंधला है और इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर अभी भी रेंज एंजायटी का साया मंडरा रहा है. ऐसे में सरकार ने अब एक नया दांव चला है. E100 फ्यूल को मंजूरी मिल गई है और दावा किया जा रहा है कि यह भारत की तेल आयात पर निर्भरता कम कर सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई प्योर इथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियां पेट्रोल को रिप्लेस कर पाएंगी, या फिर यह भी लंबा प्रयोग साबित होगा? आइए समझते हैं कि E100 फ्यूल आखिर है क्या, इसके फायदे क्या हैं और इसकी राह में कौन-कौन सी बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। 

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में बड़ी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि, E100 फ्यूल के लिए नियमों को मंजूरी दे दी गई है. इसके लिए उन्होंने रात 8 बजे फाइल पर हस्ताक्षर किए और अब E100 फ्यूल कानूनी रूप से देश में इस्तेमाल होने के लिए तैयार है। 

सरकार के इस फैसले के बाद एक बार फिर इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल चर्चा में है. केंद्रीय मंत्री का कहना है कि, आने वाले डेढ़-दो महीनों में हुंडई, टोयोटा और एमजी मोटर जैसी कंपनियां भी अपनी फ्लेक्स फ्यूल कारों को पेश करेंगी. हाल ही में उन्होंने मारुति सुजुकी की लोकप्रिय कार वैनगआर के फ्लेक्स फ्यूल वर्जन को पेश किया था. जिसे शुरुआत में फ्लीट ऑपरेटर्स (कैब सर्विस प्रोवाइडर्स) के लिए उपलब्ध कराया जाएगा. आगे चलकर कंपनी इसे प्राइवेट व्हीकल के तौर पर भी पेश कर सकती है। 

क्या है E100 फ्यूल?
E100 एक ऐसा फ्यूल है जिसमें लगभग 100 प्रतिशत इथेनॉल होता है और इसमें पारंपरिक पेट्रोल नहीं मिलाया जाता. इथेनॉल एक ऐसा फ्यूल है, जिसे गन्ना, मक्का, चावल और और कृषि अपशिष्ट जैसी चीजों से तैयार किया जाता है. भारत में अभी E20 पेट्रोल का इस्तेमाल पहले से ही हो रहा है. जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है. E100 इसी दिशा में अगला कदम है, जिसे पूरी तरह इथेनॉल पर चलने के लिए तैयार किया गया है। 

E20 फ्यूल के इस्तेमाल को लेकर पहले ही तमाम शिकायतें सामने आ चुकी हैं. कई वाहन मालिकों ने कहा है कि, E20 फ्यूल के इस्तेमाल के बाद उनके वाहनों का माइलेज गिरा है और साथ ही मेंटनेंस कॉस्ट भी बढ़ी है. इस बात से सरकार भी इंकार नहीं कर रही है, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने सोशल नेटवर्किंग साइट ‘X’ पर अपने एक बयान में कहा है कि, “रेगुलर पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होने के कारण, माइलेज में मामूली कमी आती है. जो E10 के लिए डिज़ाइन किए गए और E20 के लिए कैलिब्रेट किए गए चार पहिया वाहनों के लिए अनुमानित 1-2%, और अन्य वाहनों के लिए लगभग 3-6% है। 

E100 फ्यूल पर इतना जोर क्यों?
सरकार की मानें तो भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. ऐसे में सरकार E100 फ्यूल के जरिए इंपोर्टेड तेल पर निर्भरता कम करना चाहती है. देश में तैयार होने वाला इथेनॉल के जरिए तेल आयात पर होने वाला खर्च भी घट सकता है। 

बताया जा रहा है कि, इसका एक बड़ा फायदा किसानों को भी मिलेगा. इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी, जिससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हो सकती है. सरकार के अनुसार इथेनॉल प्रोग्राम की वजह से अब तक कच्चे तेल के आयात में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई है और किसानों को करीब 80,000 करोड़ रुपये की एक्स्ट्रा इनकम हुई है। 

क्या E100 फ्यूल पेट्रोल की जगह ले सकता है?
अब एक बड़ा सवाल ये है कि, क्या E100 फ्यूल पूरी तरह से पेट्रोल को रिप्लेस कर सकता है. सैद्धांतिक रूप से E100 फ्यूल पेट्रोल की जगह ले सकता है, लेकिन यह बदलाव तुरंत संभव नहीं है. इसके लिए स्पेशली डिजाइन किए गए वाहनों की जरूरत होगी. मौजूदा समय में भारत की सड़कों पर चल रही करोड़ों पेट्रोल कारें, बाइक और स्कूटर E100 फ्यूल पर चलने के लिए तैयार नहीं हैं. ये वाहन रेगुलर पेट्रोल या E20 फ्यूल के लिए बनाए गए हैं। 

इन वाहनों में एक बड़ी संख्या उनकी भी है, जो पूरी तरह से E20 फ्यूल के लिए भी तैयार नहीं है. यही कारण है कि, पुराने वाहन मालिकों को नए फ्यूल के इस्तेमाल के बाद तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. एक अनुमान है कि, आने वाले सालों में E20 और E100 फ्यूल दोनों साथ-साथ मौजूद रहेंगे. धीरे-धीरे फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की संख्या बढ़ने के बाद ही E100 का इस्तेमाल बड़े स्तर पर संभव हो पाएगा। 

किन वाहनों में इस्तेमाल होगा E100?
E100 फ्यूल हर वाहन में नहीं डाला जा सकता. इथेनॉल का गुण और व्यवहार पेट्रोल से बिल्कुल अलग होता है, इसलिए इंजन, फ्यूल पंप, इंजेक्टर और फ्यूल लाइन में विशेष बदलाव करने पड़ते हैं. इसके लिए फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक वाले वाहन जरूरी होते हैं. मारुति सुजुकी ने वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप पेश किया है, जिसे E100 जैसे हाई इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल पर चलाया जा सकता है. दोपहिया सेगमेंट में हीरो मोटोकॉर्प ने स्प्लेंडर और HF डीलक्स के फ्लेक्स-फ्यूल वर्जन भी पेश किए हैं. इसके अलावा सुजुकी के पोर्टफोलियो में भी एक मॉडल है और होंडा ने भी अपनी सीबी 350 के फ्लेक्स फ्यूल मॉडल को पेश किया था, जिसे अब डिस्कंटीन्यू किया जा चुका है। 

फ्लेक्स-फ्यू वाले वाहन और उनकी कीमत
वाहन     कीमत (एक्स-शोरूम)
HF Deluxe Flex Fuel     72,792 रुपये 
Splendor+ Flex Fuel     82,710 रुपये 
Suzuki Gixxer SF 250 Flex Fuel     2,26,382 रुपये
Maruti Wagon R Flex Fuel     बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं

 E100 फ्यूल के बड़े फायदे
E100 फ्यूल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे भारत की विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो सकती है. चूंकि इथेनॉल देश में ही तैयार किया जा सकता है, इसलिए इसका इसका इस्तेमाल बढ़ा कर पेट्रोल की कीमतों में भी कमी आने की उम्मीद की जा रही है. हाल ही में E85 फ्यूल को दिल्ली में लॉन्च किया गया है, जिसकी कीमत 82.12 रुपये प्रतिलीटर है जो रेगुलर पेट्रोल के मुकाबले (102.12 रुपये प्रतिलीटर) तकरीबन 20 रुपये सस्ता है. पर्यावरण के लिहाज से भी इथेनॉल को बेहतर माना जाता है. यह ट्रेडिशनल फॉसिल फ्यूल की तुलना में ज्यादा क्लीन तरीके से जलता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। 

E100 फ्यूल के नुकसान
जहां E100 फ्यूल के फायदे हैं वहीं कुछ नुकसान भी हैं. पेट्रोल की तुलना में E100 फ्यूल की एनर्जी डेंसिटी कम होती है. इसका मतलब है कि समान दूरी तय करने के लिए वाहन को अधिक फ्यूल की जरूरत पड़ सकती है. दूसरी बड़ी समस्या व्हीकल कंम्पैटिबिलिटी है. मौजूदा पेट्रोल वाहन सीधे E100 पर नहीं चल सकते. इसके लिए ग्राहकों को फ्लेक्स-फ्यूल वाहन खरीदने होंगे. जो एक बड़ा निवेश होगा, क्योंकि ऐसे वाहन रेगुलर पेट्रोल वाहनों की तुलना में ज्यादा महंगे होंगे. इसके अलावा हर कोई एक बड़े इन्वेस्टमेंट के लिए तैयार नहीं होगा. ख़ासकर तब, जब उसने हाल ही में नई कार खरीदी हो. इसके अलावा पेट्रोल पंपों को भी E100 फ्यूल के स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए नई सुविधाएं डेवलप करनी होंगी, जिससे शुरुआती लागत बढ़ सकती है। 

राह नहीं… आसान
E100 फ्यूल के फायदे कई हैं, लेकिन इसका बड़े स्तर पर इस्तेमाल रातोंरात संभव नहीं होगा. सबसे बड़ी चुनौती देशभर में पर्याप्त इथेनॉल फ्यूल स्टेशन तैयार करना है. जब तक मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बनेगा, तब तक लोग E100 आधारित वाहन खरीदने में झिझक सकते हैं. दूसरी चुनौती फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की उपलब्धता है. फिलहाल ऐसे वाहन सीमित संख्या में हैं या अभी डेवलपिंग फेज में हैं। 

सरकार को आने वाले समय में ग्राहकों को फ्यूल के लिए ज्यादा विकल्प देने होंगे. मसलन, पेट्रोल पंपों पर E20 से लेकर E100 फ्यूल तक के अलग-अलग ऑप्शन मौजूद होने चाहिए और इन सभी फ्यूल के डिस्पेंसर भी भिन्न रंग-रूप में होने चाहिए. ताकि एक आम ग्राहक आसानी से ये समझ सके कि, उसे अपने वाहन के फ्यूल टाइप के अनुसार किस तरह का ईंधन लेना चाहिए. इसके लिए पेट्रोल पंपों पर मौजूद कर्मचारियों को भी बाकायदा ट्रेंनिंग देनी होगी, ताकि वो ग्राहकों को सही फ्यूल बेच सकें। 

E100 फ्यूल भारत के लिए केवल एक नया फ्यूल नहीं, बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इससे तेल आयात घट सकता है, किसानों को फायदा मिल सकता है और प्रदूषण कम करने में भी मदद मिल सकती है. हालांकि, वाहन तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन क्षमता जैसी चुनौतियों को पार किए बिना इसका बड़े स्तर पर इस्तेमाल संभव नहीं होगा. आने वाले सालों में यह देखना दिलचस्प होगा कि E100 फ्यूल भारत की सड़कों पर कितना बड़ा बदलाव ला पाता है। 

दल-बदल कानून में अटल सरकार का बदलाव भी नहीं बचा पाएगा TMC को? 28 में 20 सांसद बागी खेमे में

कलकत्ता

राजनीति का सबसे कड़वा सच है कि सत्ता खिसकते ही सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ते हैं और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस समय इसी कड़वे सच का सामना कर रही हैं. चुनावी हार के सदमे के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो कद्दावर चेहरे काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय ने 20 सांसदों के साथ मिलकर बगावत का बिगुल फूंक दिया है. इस बड़ी टूट ने ममता खेमे में हड़कंप मचा दिया है। 

अब सवाल सिर्फ पार्टी टूटने का नहीं, बल्कि वजूद का है क्या ये बागी सांसद ममता से उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी छीन लेंगे? इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच देश का ‘दलबदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) क्या ममता की नैया पार लगा पाएगा या बागियों का रास्ता साफ करेगा। 

क्या है दलबदल विरोधी कानून ?

हरियाणा में दलबदल का आया राम और गया राम वाला किस्सा जगजाहिर है. 1967 से 1983 के बीच यहां दल-बदल का खूब खेल चला. कांग्रेस से समाजवादी नेता जहां नाता तोड़ अलग हुए, वहीं कांग्रेस ने कई राज्यों में इसका जमकर फायदा उठाया और अपनी सरकार बनाई. ऐसे में देश में ‘दल बदल निषेध कानून’ लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है। 

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 के ऐतिहासिक जनादेश के बाद जब कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ यानी विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त की बीमारी को जड़ से खत्म करने का फैसला किया. इसी मकसद से साल 1985 में राजीव गांधी सरकार ‘दलबदल विरोधी कानून’ लेकर आई और इसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से सफलतापूर्वक पारित कराया गया. इस ऐतिहासिक पहल को 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक स्थिरता और शुचिता लाई जा सके। 

अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट की 
कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है या सदन में अपनी पार्टी के ‘व्हिप’ का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है. इसके अनुसार एक तिहाई विधायक और सांसद अगर दलबदल करते हैं तो फिर उनकी सदस्यता बच सकती है। 

दलबदल कानून में सबसे बड़ी कमजोरी या विसंगति यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर दल बदल पर तो रोक लगाई गई, लेकिन नेताओं को थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए के शासनकाल 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे भी असंवैधानिक करार दिया जाएगा। 

संविधान में 91वां संशोधन कर सदस्यों की संख्या एक तिहाई से बढ़ाकर दो-तिहाई कर दी गई. इसी संशोधन में धारा 3 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया, जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. इसके जरिए दल बदल का कानून को रोकने और सख्त बनाने के लिए अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट लगाई थी, अब वो भी टूटता नजर आ रहा है। 

ममता के केस में गणित
 संविधान के मुताबिक अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक एक साथ अलग होते हैं, तो उन पर दल बदल कानून लागू नहीं होता. लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 10 सांसद टीएमसी के हैं. लोकसभा सांसदों की कुल संख्या 28 के लिहाज से बागी हुए 20 सांसद हैं, जो दो-तिहाई के आंकड़े को आसानी से छू लिया है. ऐसे में दलबदल कानून ममता बनर्जी के हाथ बांध देगा. इस तरह कानूनन टीएमसी के बागी सांसदों की सदस्यता बची रहेगी। 

राजनीतिक गलियारों और हालिया कानूनी बहसों में एक दिलचस्प पेंच सामने आया है. पार्टी से बगावत करने और अलग गुट बनाने के बावजूद तकनीकी और कानूनी रूप से ये बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय कर दिया है, लेकिन पार्टी के कब्जे और चुनाव निशान पर दावेदारी के लिए जुलाई में स्पीकर से गुहार लगाएंगे. इसके अलावा ममता बनर्जी की पार्टी के बंगाल में 80 से 60 से ज्यादा विधायक अलग गुट बना लिए हैं और अपना नेता भी सदन में चुन लिया है। 

महाराष्ट्र के शिंदे और अजित पवार मामलों ने देश को दिखाया है कि दो-तिहाई लिमिट होने के बाद भी दलबदल कानून अब पार्टियों को टूटने से बचाने में ‘रामबाण’ नहीं रहा. दलबदल कानून के तहत फैसला लेने का अंतिम अधिकार सदन के अध्यक्ष के पास होता है. जब तक स्पीकर आखिरी फैसला नहीं लेते, बागी सांसद तकनीकी रूप से सुरक्षित रहते हैं और यह समय उन्हें अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दे देता है। 

दलबदल कानून केवल सांसदों की कुर्सी बचा सकता है, लेकिन पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा इसका पर चुनाव आयोग ही फैसला करता है. काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय के गुट के पास दो तिहाई संसदों का समर्थन हासिल है. सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा है कि जब दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होते हैं तो पहले दिन मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं कर सकते हैं. इसीलिए एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना. अब आगे की लड़ाई जुलाई में होगी, जब टीएमसी के बागी नेता पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा जताएंगे?

क्या ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी उनकी अपनी पार्टी?
तकनीकी और संवैधानिक रूप से ऐसा होना बिल्कुल मुमकिन है, लेकिन यह डगर इतनी आसान नहीं होगी. पूरी रणनीति के तहत, बागी सांसद सबसे पहले स्पीकर के सामने अपने ‘विधायी बहुमत’ के दम पर खुद को ‘असली टीएमसी’ घोषित करने की मांग करेंगे. इसके बाद यह जंग चुनाव आयोग पहुंचेगी. यदि आयोग के सामने बागी गुट अपना संख्याबल साबित करने में सफल रहा, तो ममता बनर्जी को अपनी ही बनाई पार्टी का नाम और सिंबल गंवाना पड़ सकता है। 

इतिहास पर नजर डालें तो हमेशा यही देखा गया है कि जब भी किसी पार्टी में दो गुट बनते हैं तो दोनों ही गुट खुद को ‘असली पार्टी’ बताते हैं ऐसे में फैसला चुनाव आयोग के हाथ में होता है. चुनाव आयोग देखता है कि पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) में से कितने लोग किस गुट के साथ हैं। 

आमतौर पर चुनाव आयोग किसी भी पार्टी के विवाद को सुलझाते समय यह बारीकी से जांचता है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, केंद्रीय पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों के बीच किसका दबदबा है. अगर संगठन के मोर्चे पर देखा जाए, तो ममता बनर्जी इस समय बेहद मजबूत स्थिति में हैं क्योंकि टीएमसी के कैडर और सांगठनिक ढांचे पर उनकी पकड़ अभी भी बरकरार है. हालांकि, इस मामले का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिवसेना और एनसीपी के हालिया विवादों में चुनाव आयोग ने संगठन के मुकाबले सदन के भीतर सांसदों और विधायकों की संख्या को ज्यादा प्राथमिकता दी थी। 

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