नक्सलवाद के अंत के बाद विकास की नई उड़ान, बस्तर को देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाएंगे : CM साय

रायपुर 
नक्सलवाद का दंश झेलते-झेलते बस्तर चार दशकों तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहा, लेकिन अब नक्सलवाद की समाप्ति के साथ केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से बस्तर को देश का सबसे सुंदर और विकसित आदिवासी संभाग बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  आज राजधानी रायपुर में आयोजित ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ पुस्तक के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शशांक शर्मा, पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि नक्सलवाद के कारण बस्तर विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गया था। अब परिस्थितियां बदल रही हैं और एक नए, विकसित तथा समृद्ध बस्तर के निर्माण का अवसर प्राप्त हुआ है। राज्य सरकार लगातार ऐसे प्रयास कर रही है, जिनसे आमजन को मूलभूत सुविधाओं सहित सभी आवश्यक सेवाएं सहज रूप से उपलब्ध हो सकें।

मुख्यमंत्री ने कहा कि दो दिन पूर्व ही यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के 12 वर्ष पूर्ण किए हैं। उनके नेतृत्व में देश ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं, जिनमें नक्सलवाद की समाप्ति की दिशा में मिली सफलता भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री  अमित शाह के मार्गदर्शन में इस चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना किया गया।

उन्होंने कहा कि मजबूत नेतृत्व समाज में विश्वास और उत्साह का संचार करता है। प्रधानमंत्री  मोदी के नेतृत्व में देश में माओवाद के विरुद्ध सामूहिक संकल्प विकसित हुआ। सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ा, आम जनता खुलकर माओवाद के विरोध में सामने आई और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद की। इस संघर्ष में लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मुख्यमंत्री ने उल्लेख किया कि हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बस्तर आए थे, जहां उन्होंने पत्रकारों से मुलाकात कर उनके योगदान की सराहना की थी।

पहली बार मीडिया के सामने आई सोनम रघुवंशी, चुप्पी तोड़ किए कई चौंकाने वाले खुलासे

इंदौर
 राजा रघुवंशी हत्याकांड की आरोपी और फिलहाल जमानत पर रिहा सोनम रघुवंशी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आकर अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब दिया है। मीडिया से संक्षिप्त बातचीत में सोनम ने साफ कहा कि उसके नेपाल भागने की खबरें पूरी तरह बेबुनियाद हैं और लोगों को ऐसी अफवाहों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कोर्ट परिसर से बाहर निकलते समय पत्रकारों ने जब उससे सवाल किए तो उसने कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया का सम्मान कर रही है और अदालत द्वारा तय सभी शर्तों का पालन कर रही है। इंदौर लौटने को लेकर पूछे गए सवाल पर भी सोनम ने फिलहाल कोई संभावना नहीं जताई और कहा कि अभी उसका वहां जाने का कोई मन नहीं है।

लोकेशन बताने से किया इनकार
सोनम ने यह जरूर स्वीकार किया कि वह शिलांग में रह रही है, लेकिन सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपने ठिकाने की जानकारी साझा करने से मना कर दिया। आर्थिक खर्च और जीवन-यापन से जुड़े सवालों को भी उसने निजी विषय बताते हुए टाल दिया।

परिवार के आरोपों पर पलटवार
गौरतलब है कि राजा रघुवंशी के बड़े भाई ने हाल ही में आरोप लगाया था कि सोनम देश छोड़कर नेपाल जा सकती है और मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी से कराई जानी चाहिए। अब सोनम ने सामने आकर इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

जमानत पर कानूनी लड़ाई जारी
सोनम को निचली अदालत से राहत मिलने के बाद जांच एजेंसी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। जमानत रद्द कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत का फैसला आना बाकी है।

कैसे बना देशभर में चर्चा का विषय यह मामला?
राजा रघुवंशी और सोनम रघुवंशी की शादी के कुछ ही दिनों बाद दोनों मेघालय पहुंचे थे। इसके बाद उनके अचानक लापता होने से सनसनी फैल गई। बाद में राजा का शव मिलने और जांच में कई चौंकाने वाले खुलासों के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर सोनम को भी आरोपी बनाया गया था।

राष्ट्रपति मुर्मु का कूनो दौरा आज, सहरिया आदिवासियों से करेंगी संवाद; चीता सफारी भी रहेगी खास आकर्षण

ग्वालियर
 राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सोमवार, 22 जून को चीतों की धरती श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क में आ रही हैं। राष्ट्रपति यहां सहरिया आदिवासियों की संस्कृति से रूबरू होंगी और उनसे चर्चा भी करेंगी। इसके अलावा कूनो नेशनल पार्क में दो नंबर बाड़ा और तीन-ए बाड़ा में तैयारियां जारी हैं क्योंकि यहां राष्ट्रपति को सफारी का अनुभव कराए जाने का प्रस्तावित है।

तीन-ए बाड़ा में यहां जन्मी चीता मुखी व उसके चार शावक चीते हैं। कूनो में जोर शोर से तैयारियां की जा रही हैं चार हैलीपेड तैयार किए जा चुके हैं और आदिवासियों को चिन्हित भी किया जा रहा है जिन्हें राष्ट्रपति से मिलवाया जाएगा। इसके अलावा चीता मित्र भी इस दौरान मौजूद रहेंगे। राष्ट्रपति 21 जून को ग्वालियर होकर कूनो पहुंच जाएंगी और रात्रि विश्राम यहीं कर 22 जून को यहां विजिट प्रस्तावित है।

बता दें, राष्ट्रपति दौपद्री मुर्मु इन दिनों मप्र के प्रवास पर हैं जिस क्रम में उनका ग्वालियर चंबल आगमन प्रस्तावित है। श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में उनके आगमन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था सहित मैदानी इंतजाम किए जा रहे हैं। चार हैलीपेड तैयार कर दिए गए हैं और 200 बैरीकेड से हद तैयार की जा रही है। श्योपुर पुलिस प्रशासन की ओर से नो फ्लाइंग जोन के आदेश भी जारी कर दिए गए हैं।

आदिवासियों को प्रशिक्षण भी मिलेगा
सहरिया आदिवासियों के गांवों की श्योपुर जिले में काफी संख्या है, इन आदिवासियों को पहले चीते को लेकर जागरूक भी किया जा चुका है और कई चीता मित्र की भूमिका भी निभा रहे हैं। ऐसे में कुछ आदिवासियों को चिन्हित कर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है क्योंकि राष्ट्रपति सहरिया आदिवासियों से चर्चा कर सकती हैं। वन विभाग की ओर से वन रक्षकों को भी चीता मित्रों से संपर्क करने के लिए निर्देश मिले हैं।

मुखी चीता को सफारी में देख सकती हैं राष्ट्रपति
जानकारी के अनुसार मादा चीता मुखी को सफारी के दौरान राष्ट्रपति को दिखाया जा सकता है क्योंकि यह पहली भारतीय मादा चीता है। दोनों बाड़ों में विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।

 

रेलवे की बड़ी तैयारी, 220 KMPH की रफ्तार से दौड़ेंगी सेमी हाई स्पीड ट्रेनें; कोच में होगा ब्लैक बॉक्स

धनबाद
 देश में बुलेट ट्रेन की तैयारियों के बीच रेलवे ने अब 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से सेमी हाई स्पीड ट्रेन दौड़ाने के लिए भी कसरत शुरू कर दी है।आईसीएफ यानी इंटीग्रल रेल फैक्ट्री में 100 वंदे भारत और 50 वंदे भारत स्लीपर के नए रैक का निर्माण होगा। अमृत भारत 3.0 वर्जन पटरी पर उतारने की तैयारी शुरू होगी।साथ ही 220 किमी की स्पीड से फर्राटा भरने वाली सेमी हाई स्पीड ट्रेन के रैक भी विकसित किए जाएंगे। इतना ही नहीं हवाई जहाज की तरह यात्री ट्रेनों में ब्लैक बाक्स भी होंगे।

देश के अन्य जोन के साथ पूर्व मध्य रेल में ट्रेनों के मेंटेनेंस को डिजिटाइज किया जाएगा। प्रधान मुख्य यांत्रिक अभियंताओं की इसी सप्ताह होनेवाली पीसीएमई कॉन्फ्रेंस में इन सभी एजेंडा को शामिल किया गया है।

रेलवे बोर्ड के संयुक्त निदेशक यांत्रिक-इंजीनियर कोचिंग प्रांजल मिश्रा की ओर से सभी जाेन को पत्र जारी किए जाने के बाद संबंधित जोनल रेलवे ने प्रेजेंटेशन समर्पित कर दिया है।

आग लगने से पहले और बाद की हर गतिविधि को कैद करेगा ब्लैक बाक्स
हवाई जहाज में ब्लैक बाक्स अत्यंत मजबूत इलेक्ट्रानिक डिवाइस है, जिसका उपयोग विमान दुर्घटना के कारणों एवं अंतिम समय की गतिविधियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसे विमान हादसे की जांच का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा माना जाता है।

ठीक इसी तरह ट्रेनों में लगे आग के लिए फायर डिटेक्शन सिस्टम और फायर डिटेक्शन सप्रेशन सिस्टम के लिए ब्लैक बाक्स लगाए जाएंगे। इससे मजबूत और छेड़छाड़ रहित डाटा लागर तैयार होगा।

इसका उद्देश्य घटना की जांच के लिए आग लगने से पहले और बाद की गतिविधियों, सिस्टम को चालू ट्रिगर्स और सिस्टम के कामकाज के जुड़े पैरामीटर को रिकार्ड किया जा सकेगा।

वंदे भारत और अमृत भारत में आन बोर्ड कंडीशन मॉनीटरिंग सिस्टम
वंदे भारत और अमृत भारत जैसी ट्रेनों में ओबीसीएमएस यानी आन बोर्ड कंडीशन मानीटरिंग सिस्टम अपनाए जाएंगे। यह एक अहम डायग्नोस्टिक तकनीक है जिसकी मदद से ट्रेनों के पहिए व बेयरिंग की सुरक्षा, कार्यक्षमता और रियम टाम हेल्थ मॉनीटरिंग हो सकेगी। इससे दुर्घटनाओं की रोकथाम में काफी हद तक मदद मिलेगी।

नए कोचिंग डिपो व पुराने के अपग्रेडेशन के साथ कम समय में मेंटेनेंस
नए कोचिंग डिपो, कोचिंग टर्मिनल के निर्माण के साथ पुराने कोचिंग डिपो के अपग्रेडेशन की स्थिति संबंधित जोन के पीसीएमई स्पष्ट करेंगे।

रैक मेंटेनेंस को कम समय में करने, स्मार्ट मेंटेनेंस और कर्मचारियों से जुड़ी बेंचमार्किंग पर भी नीतिगत चर्चा होगी। कैरेज एंड वैगन विभाग के कर्मचारियों के लिए दुर्घटना व बेपटरी होने जैसी घटनाओं के लिए ट्रेनिंग माड्यूल तय होगा। गरीब रथ ट्रेनों के रैक के उपयोग पर भी निर्णय होंगे।

 

ट्रेन में 10 रुपये की चाय का असली खेल! जानिए रेलवे ने कितना तय किया है इसका रेट

नई दिल्ली

भले ही ट्रेन की चाय कैसी भी हो, लेकिन जब लोग ट्रेन में सफर करते हैं तो चाय पी ही लेते हैं. आपने देखा होगा कि ट्रेन में कई तरह की चाय मिलती है, एक चाय तो वो होती है, जो बिना टी बैग के होती है, लेकिन एक वो होती है जिसमें टी बैग भी होता है. इन चाय के रेट भी अलग-अलग वसूले जाते हैं. लेकिन, क्या आप  जानते हैं कि ट्रेन में बिकने वाली चाय की असली रेट कितनी होती है यानी सरकार की ओर से इनकी कितनी रेट तय की गई है? बता दें कि इससे ज्यादा रेट में ट्रेन में चाय नहीं बेची जा सकती है। 

आमतौर पर ट्रेन में वेंडर या कैटरिंग स्टाफ एक कप चाय 10 रुपये में बेचते हैं, लेकिन असली रेट काफी अलग है. रेलवे की आधिकारिक कैटरिंग दरों के अनुसार, सामान्य ट्रेनों में मिलने वाली 150 मिलीलीटर स्टैंडर्ड चाय की कीमत सिर्फ 5 रुपये तय है. अगर आपको इसी कैटेगरी की चाय 10 रुपये में बेची जा रही है तो उसकी कीमत तय दर से दोगुनी है। 

लेकिन, टीबैग वाली चाय के रेट अलग है. रेलवे के नियमों के अनुसार, टी बैग वाली चाय 10 रुपये की मिलती है. इसके अलावा इंस्टेंट कॉफी के रेट भी 10 रुपये हैं. हालांकि कुछ विशेष ट्रेनों में व्यवस्था अलग होती है. उदाहरण के लिए हमसफर ट्रेनों में एवीएम मशीन के  जरिए चाय दी जा रही है तो उस चाय की कीमत 10 रुपये तय है. यहां 100 मिलीलीटर चाय 120 मिलीलीटर के कप में दी जाती है। 

ऐसे में जब भी आप चाय खरीदें तो इस बात का ध्यान रखें कि आखिर आप कौनसी चाय पी रहे हैं, वो स्टैंडर्ड चाय है या फिर वेंडिंग मशीन वाली चाय. रेलवे में सभी ट्रेनों के लिए एक जैसी कैटरिंग व्यवस्था नहीं होती. सामान्य मेल-एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों में स्टैंडर्ड चाय का रेट 5 रुपये रखा गया है, जबकि कुछ प्रीमियम सेवाओं और वेंडिंग मशीन आधारित व्यवस्था में कीमत अधिक हो सकती है। 

क्या हैं पानी की बोतल से जुड़े नियम?
भारतीय रेलवे के नियमों के अनुसार, ट्रेन में सिर्फ रेल नीर ही बेचा जा सकता है और उसकी एक लीटर वाली बोतल की रेट 14 रुपये है. ये स्टेशन और ट्रेन दोनों में बराबर है. लेकिन, अगर कुछ परिस्थिति में वेंडर रेल नीर के अलावा दूसरी पानी की बोतल बेचता है तो वो भी कुछ निश्चित कंपनियों का पानी ही ट्रेन में बेचा जा सकता है. इसमें भी खास बात ये है कि दूसरी कंपनी की पानी की बोतल भी 14 रुपये में ही बेचनी होगी. यानी ट्रेन में कोई भी 14 रुपये से ज्यादा दाम में पानी की बोतल नहीं बेच सकता है।  

अमेरिका-ईरान युद्ध थमा तो भारत को मिल सकती है बड़ी राहत! LPG, CNG और खाद समेत 10 चीजें हो सकती हैं सस्ती

नई दिल्ली
क्या आप जानते हैं कि खाड़ी देशों में होने वाले तनाव का सीधा असर आपकी रसोई और जेब पर कैसे पड़ता है? जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा था तो भारत में सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि दूध, सब्जी से लेकर हवाई टिकट तक सब कुछ महंगा हो गया. लेकिन अब चूंकि यह युद्ध खत्म होने जा रहा है, तो अब क्या-क्या सस्ता होगा? यहां हम उन चीजों की लिस्ट दे रहे हैं। 

 1. रसोई गैस और कमर्शियल सिलेंडर (LPG): भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है. युद्ध के समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रोपेन और ब्यूटेन (एलपीजी के मुख्य घटक) की कीमतें 800 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पार कर गई थीं. तनाव खत्म होने से यह कीमत गिरकर 550-600 डॉलर के दायरे में आ सकती हैं, जिससे घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में 70 से 100 रुपये तक की कटौती देखने को मिल सकती है. हालांकि सरकार पहले से ही सिलेंडर पर सब्सिडी देती है, तो ऐसे में देखना होगा कि क्या सरकार इसे आम लोगों तक पास करेगी, या नहीं। 

2. विदेशी फल और ड्राई फ्रूट्स (खजूर और अंजीर): भारत सालाना करीब 90 हजार से 1 लाख मीट्रिक टन खजूर ईरान और खाड़ी देशों से मंगाता है. समुद्री नाकेबंदी के कारण भारतीय थोक बाजारों में कीमिया और मजलूम खजूर के दाम 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गए थे. रूट खुलते ही सप्लाई सामान्य होने से इनके थोक और रिटेल दामों में 25 से 30 फीसदी की सीधी गिरावट आने की संभावना है। 

3. सीएनजी और पीएनजी (CNG & PNG): भारत अपनी कुल नेचुरल गैस की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा (LNG के रूप में) कतर और यूएई जैसे देशों से इम्पोर्ट करता है. युद्ध के डर से स्पॉट एलएनजी की कीमतें 15-18 डॉलर प्रति mmBtu (Million British Thermal Units) तक पहुंच गई थीं. अब वैश्विक बाजार में गैस की कीमत घटकर 9-10 डॉलर प्रति mmBtu के स्तर पर आने की संभावना है, जिससे घरेलू स्तर पर सीएनजी और पीएनजी के दाम 4 से 6 प्रति किलो/Scm तक सस्ते हो सकते हैं। 

 4. रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers): भारत सालाना लगभग 70 से 80 लाख टन यूरिया और फॉस्फेटिक खादों का आयात करता है, जिसमें ओमान और सऊदी अरब की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. सप्लाई चेन टूटने से प्रति टन आयात लागत में 50 से 70 डॉलर का उछाल आया था. होर्मुज रूट खुलने से फर्टिलाइजर कंपनियों की इनपुट कॉस्ट 12 से 15 प्रतिशत तक कम होगी, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटेगा और खुले बाजार में खाद की किल्लत खत्म होगी। 

5. प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्रियां (Polymers): भारतीय प्लास्टिक उद्योग अपनी जरूरत का लगभग 40% पॉलीमर और प्लास्टिक दाना खाड़ी देशों की पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों से मंगाता है. कच्चे तेल के 125 डॉलर होने से पॉलिमर के दाम 20% तक महंगे हो गए थे. कच्चे तेल की कीमतें 75-80 डॉलर के सामान्य स्तर पर आने से प्लास्टिक इनपुट कॉस्ट में 15% तक की कमी आएगी, जिससे पैकेजिंग मैटेरियल सीधे सस्ते होंगे। 

6. हवाई सफर (Air Tickets): किसी भी एयरलाइंस कंपनी के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 40% हिस्सा अकेले एटीएफ (Aviation Turbine Fuel) पर खर्च होता है. क्रूड के 125 डॉलर पार जाने से एटीएफ की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर थीं. कच्चे तेल में गिरावट के बाद एटीएफ की कीमतों में 10% से 12% की कटौती तय है, जिससे एयरलाइंस कंपनियां हवाई किराए (Airfares) में 8% से 10% तक की कमी कर सकती हैं। 

7. स्क्रैप मेटल और रीसाइक्लिंग उत्पाद: भारत यूएई और खाड़ी देशों से हर साल लाखों टन एल्युमिनियम और कॉपर स्क्रैप इम्पोर्ट करता है. युद्ध के दौरान समुद्री जहाजों का भाड़ा (Freight Rate) और वॉर रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम 300% तक बढ़ गया था. शिपिंग रूट सामान्य होने से माल ढुलाई का भाड़ा 30% तक कम होने की संभावना है, जिससे घरेलू रिसाइक्लिंग यूनिट्स को कच्चा माल 8 से 10 प्रतिशत सस्ता मिलेगा। 

8. इंडस्ट्रियल सल्फर (Industrial Sulfur): रबर और केमिकल इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी सल्फर का भारत एक बड़ा आयातक है. खाड़ी देशों से सप्लाई रुकने से भारत में सल्फर की घरेलू कीमतें 18% से 22% तक उछल गई थीं. रिफाइनरियों में उत्पादन सामान्य होने और शिपमेंट शुरू होने से इंडस्ट्रियल सल्फर के दाम 15% तक नीचे आ सकते हैं। 

 9. पेंट्स और कोटिंग्स (Paints & Solvents): पेंट्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (जैसे रेजिन और सॉल्वैंट्स) का करीब 50% हिस्सा पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव्स होता है. कच्चे तेल और गैस के दाम टूटने से पेंट कंपनियों की कुल मैन्युफैक्चरिंग लागत में 6 से 8 प्रतिशत की कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा वे उपभोक्ताओं को कीमतों में कटौती या डिस्काउंट के रूप में देंगी। 

10. ऑनलाइन डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेवाएं: भारत का लॉजिस्टिक्स इंडेक्स सीधे तौर पर ईंधन और परिचालन लागत से जुड़ा है. वैश्विक ऊर्जा संकट थमने से माल ढुलाई इंडेक्स (Freight Index) में 7 से 10 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है. इसका सीधा असर ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों पर पड़ेगा, जिससे डिलीवरी चार्जेस और कूरियर फीस में 5 से 8 प्रतिशथ तक की राहत मिल सकती है। 

लाइसेंस का झंझट होगा खत्म? भारत में सेल्फ-ड्राइविंग कारों की एंट्री का काउंटडाउन शुरू

नई दिल्ली

कई बार कुछ फैसले इतने टेक्निकल और जटिल होते हैं कि उनकी अहमियत तुरंत समझ में नहीं आती. लेकिन कुछ साल बाद वही फैसले आपकी डेली-लाइफ, रूटीन और पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदल देते हैं. ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म करने का सरकार फैसला भी ऐसा ही एक कदम माना जा रहा है. पहली नजर में यह सिर्फ नियमों में बदलाव जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारत को सेफ, स्मार्ट और फ्यूचर की सेल्फ-ड्राइविंग मोबिलिटी की ओर ले जाने वाला बड़ा दरवाजा खोल सकता है। 

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने 77GHz से 81GHz फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करने वाले ऑटोमोटिव रडार सिस्टम के लाइसेंस की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. इसके अलावा 5.9GHz बैंड पर चलने वाले सिस्टम के लिए भी लाइसेंस की जरूरत खत्म कर दी गई है. यही फ्रीक्वेंसी वाहन और सड़क किनारे लगे इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होती है. यह फैसला भारत को अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित ऑटोमोबाइल बाजारों के बराबर खड़ा करता है, जहां ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पहले से कहीं ज्यादा आसान नियम बनाए गए हैं। 

भारत में जब भी नई ऑटोमोबाइल तकनीक आती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कीमत नहीं होती, बल्कि नियमों और मंजूरियों की जटिल प्रक्रिया भी होती है. किसी नई तकनीक को बाजार में लाने के लिए कंपनियों को ज्यादा समय और पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ता है। 

अब जब रडार बेस्ड सिस्टम के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं रहेगी, तो वाहन निर्माता कंपनियां दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और तकनीक को भारत में भी आसानी से ला सकेंगी. उन्हें भारत के लिए अलग एडिशन तैयार करने की जरूरत कम पड़ेगी. इससे लागत घट सकती है और नई तकनीकियों का इस्तेमाल आसान और तेज हो जाएगा। 

ADAS अब लग्जरी फीचर नहीं रहेगा
कुछ साल पहले तक ADAS यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम केवल महंगी लग्जरी कारों में देखने को मिलता था. लेकिन अब धीरे-धीरे यह तकनीक मुख्यधारा की कारों तक पहुंच रही है. अब कम दाम या यूं कहें कि मिड-साइज एसयूवी और अन्य कारों में भी यह फीचर दिया जाने लगा है. कम्पटीशन के इस दौर में तकरीबन हर वाहन निर्माता की कोशिश है कि, वो अपनी काम में अपने प्रतिद्वंदी के मुकाबले ज्यादा फीचर दे सके. इसके लिए ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं। 

ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स रडार सेंसर की मदद से काम करते हैं. ये सिस्टम सिर्फ सुविधा नहीं देते, बल्कि कई बार गंभीर दुर्घटनाओं को रोकने में भी मदद करते हैं. भारत में अब तक ADAS तकनीक का इस्तेमाल सिमित रहा है. इसकी एक वजह लागत और दूसरी वजह नियम और प्रोसेस हैं. ऐसे में लाइसेंस की बाध्यता हटना इस तकनीक को ज्यादा तेजी से फैलाने में मदद कर सकता है। 

सेल्फ-ड्राइविंग कारों की बुनियाद
आज दुनिया के कई देश सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों पर तेजी से काम कर रहे हैं. भारत अभी उस लेवल से काफी दूर है, लेकिन किसी भी तकनीक की शुरुआत इंफ्रा से ही होती है. रडार सेंसर और व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम भविष्य में आने वाली ऑटोनॉमस यानी सेल्फ-ड्राइविंग कारों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक हैं. इसलिए यह फैसला सिर्फ आज की कारों के लिए नहीं, बल्कि अगले दशक की मोबिलिटी को ध्यान में रखकर लिया गया कदम भी माना जा रहा है। 

इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 5.9GHz बैंड से जुड़ा है. यह V2X यानी व्हीकल-टू-एवरीथिंग सिस्टम को सपोर्ट करता है. सरल भाषा में समझें तो भविष्य में गाड़ियां सिर्फ सड़क पर नहीं चलेंगी, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत भी करेंगी. कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाए, किसी ब्लाइंड मोड़ के पीछे खतरा हो या कोई एम्बुलेंस तेजी से आ रही हो, तो ऐसी जानकारी पहले ही दूसरी गाड़ियों तक पहुंच सकती है। ऐसी तकनीकियां इंसानी आंखों की तरह काम करेंगी. जो सड़क पर अचानक से रिएक्ट करने की समय को कम करने में मदद करेंगी. यही कारण है कि दुनिया भर में इन्हें रोड सेफ्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। 

इन कंपनियों को फायदा
अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि नई तकनीक का फायदा केवल विदेशी कंपनियों को मिलता है. लेकिन इस मामले में तस्वीर कुछ अलग है. जहां मर्सिडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियां ग्लोबल टेक्नोलॉजी को आसानी से भारत ला सकेंगी. वहीं मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी भारतीय कंपनियों के लिए भी यह मौका होगा कि वे तेजी से ADAS बेस्ड फीचर्स को अपनी गाड़ियों में शामिल करें। 

हालांकि ये भारतीय कंपनियां पहले से ही अपने कुछ प्रीमियम मॉडलों में ये फीचर दे रही हैं. लेकिन आने वाले समय में जब ये तकनीकी और किफायती होगी तो इसका इस्तेमाल सस्ती कारों में भी देखने को मिल सकता है. इसके अलावा Bosch, Continental और Qualcomm जैसी तकनीकी कंपनियों को भी नए अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि आधुनिक वाहनों में इनकी टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ेगी। 

इस फैसले की सबसे मजबूत वजह रोड सेफ्टी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में लगभग पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1.77 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई. ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक नियमों या बेहतर सड़कों का मुद्दा नहीं है. आधुनिक तकनीक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ADAS और V2X जैसे सिस्टम उन परिस्थितियों में एक्स्ट्रा सेफ्टी दे सकते हैं जहां ड्राइवर की नजर या रिएक्ट करने की क्षमता कम हो जाती है। 

अभी शुरुआत है, मंजिल नहीं
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सरकार ने इस टेक्नोलॉजी को अनिवार्य नहीं बनाया है. केवल लाइसेंस की बाध्यता हटाई गई है. यानी यह फैसला रास्ता साफ करता है, लेकिन यह पक्का नहीं करता कि हर नई कार में तुरंत ये तकनीकी दिखाई देने लगेंगी. फिर भी यह एक ऐसा कदम है जो इंडस्ट्री को सही दिशा देने में मददगार साबित होगा. जब नियम आसान होते हैं, लागत कम होती है और तकनीक तेजी से पहुंचती है, तो अंततः फायदा ग्राहक को ही मिलता है। 
 

Vedanta Demerger: वेदांता से निकलीं 4 नई कंपनियां, अनिल अग्रवाल का बड़ा दावा- हर बिजनेस बनेगा $100 अरब का दिग्गज

 नई दिल्ली
अरबपति अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाली वेदांता लिमिटेड के डिमर्जर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. इसके तहत अब चार नई कंपनियां बनी हैं, इनमें वेदांता एल्युमिनियम, वेदांता आयरन एंड स्टील, वेदांता ऑयल एंड गैस और वेदांता पावर शामिल हैं, जिन्हें लिस्ट किया गया है. इस तहत वेदांता लिमिटेड को मिलाकर ग्रुप की पांच लिस्टेड कंपनियां हो गई हैं. इस मौके पर Anil Agarwal ने कहा कि भारत में बड़े अवसर मौजूद हैं और इन कंपनियों आगे बढ़कर और भी बहुत कुछ करना होगा। 

वेदांता रिसोर्सेज के चेयरमैन अनिल अग्रवाल का कहना है कि ये सभी सेक्टर्स रोमांचक हैं और इनमें अपार संभावनाएं हैं. हम डिविडेंड देने वाली कंपनी होने और कंपनियों के लिए वैल्यू क्रिएशन को लेकर बहुत सचेत हैं। 

हर कंपनी में इतनी क्षमता
Anil Agarwal ने भारत में मौजूद संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने अगले पांच सालों में 20 अरब डॉलर के निवेश की रूपरेखा बताई. अग्रवाल ने कहा कि हमारी हर एक कंपनी में 100 अरब डॉलर का रेवेन्यू हासिल करने की क्षमता है. शेयरधारकों को लेकर वेदांता चेयरमैन ने आगे कहा कि उनके हित से बढ़कर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है और पिछले पांच सालों में वेदांता ने 300% का रिटर्न दिया है।  

आयात पर निर्भरता कम करना जरूरी 
Vedanta Chairman के मुताबिक, भारत अपने नेचुरल रिसोर्सेज की 50% जरूरतों का आयात करता है, इसे कम करना जरूरी है. उन्होंने बताया कि भारत में थोरियम के विशाल भंडार हैं, और हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए इस अवसर का लाभ उठाने पर काम करना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि वेदांता के सभी बिजनेस ग्रोथ के लिए तैयार हैं. मैंगनीज, निकेल, फेरोक्रोम और तांबे में मौजूद संभावनाओं को देखकर यह साफ संकेत मिलता है कि कितना कुछ किया जा सकता है। 

‘हम ग्रोथ के लिए तैयार’
नई कंपनियों की लिस्टिंग के मौके पर अनिल अग्रवाल ने स्ट्रेटजी में टेक की अहम भूमिका भूमिका का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, AI हमारी रगों में बसा है और हम इसका इस्तेमाल अपने सभी व्यवसायों में करते हैं.  योजना के तहत वेदांता रिसोर्सेज को भविष्य में दोबारा लिस्ट किया जाएगा और ग्रुप और इससे जुड़े व्यवसायों को आगे बढ़ना है, वे विकास के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 

अनिल अग्रवाल का दिलचस्प सफर 
अपने दम पर कारोबारी साम्राज्य खड़ा करने वाले कारोबारियों का जिक्र होता है, तो फिर वेदांता (Vedanta Ltd) के अनिल अग्रवाल (Anil Agawal) का नाम लिस्ट में शामिल रहता है. साधारण परिवार में पैदा होने के बाद अनिल अग्रवाल ने अपनी मेहनत से माइनिंग व मेटल बिजनेस (Mining And Metal Business) का साम्राज्य खड़ा किया। 

बिहार से शुरू हुआ उनका सफर मुंबई से होते हुए लंदन तक पहुंच गया. इतना ही नहीं, इस सफर के दरम्यान कई शानदार मुकाम हासिल हुए और लंदन स्टॉक एक्सचेंज (London Stock Exchange) पर पहली भारतीय कंपनी वेदांता की लिस्टिंग उनमें से एक है. संपत्ति की बात करें, तो अनिल अग्रवाल की नेटवर्थ (Anil Agarwal Networth) फोर्ब्स बिलेनियर्स इंडेक्स के मुताबिक, 4.6 अरब डॉलर है। 

अमेरिका-ईरान समझौते पर इजरायल का कड़ा ऐतराज, बोला- किसी डील से बंधे नहीं; फिर बढ़ा युद्ध का खतरा

यरुशलम/वाशिंगटन

मिडिल-ईस्ट में शांति स्थापित करने के अमेरिकी प्रयासों को एक बड़ा झटका लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ परमाणु सामग्री और क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए किए गए समझौतों के दावों के बावजूद, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है. इस अनिश्चितता की सबसे बड़ी वजह यह है कि इजरायल इस अमेरिकी डील से पूरी तरह असहमत नजर आ रहा है। 

इजरायल ने ईरान और उसके समर्थित गुटों (जैसे हिज्बुल्लाह और अन्य मिलिशिया) के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों और हवाई हमलों को थामने के बजाय और तेज कर दिया है. बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का रुख यह साफ करता है कि वह वॉशिंगटन की कूटनीतिक कोशिशों के भरोसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं है, जिससे इस क्षेत्र में एक बार फिर बड़े पैमाने पर युद्ध भड़कने की आशंका पैदा हो गई है। 

ट्रंप की डील कितनी टिकाऊ? 
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ईरान को भारी वित्तीय प्रतिबंधों से राहत देने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खुलवाने के बदले उसके समृद्ध यूरेनियम को जब्त या नष्ट करने का एक कथित खाका तैयार किया है. लेकिन इस कूटनीतिक जीत के दावों के बीच सबसे बड़ा रोड़ा इजरायल ही बनकर उभरा है। 

इजरायल का मानना है कि ईरान के साथ किया जाने वाला कोई भी समझौता तब तक टिकाऊ या भरोसेमंद नहीं हो सकता, जब तक कि तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से नेस्तनाबूद न कर दिया जाए और क्षेत्र में उसके प्रॉक्सी नेटवर्क को पूरी तरह खत्म न किया जाए। 

इजरायल को डर है कि इस डील की आड़ में ईरान को दोबारा आर्थिक रूप से मजबूत होने और अपने गुप्त ठिकानों पर परमाणु हथियार विकसित करने का मौका मिल जाएगा. यही कारण है कि अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद इजरायल लगातार ईरान के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना रहा है। 

थमे नहीं हैं इजरायली हमले 
अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणाओं को दरकिनार करते हुए इजरायली वायुसेना और खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के भीतर और उसके पड़ोसी देशों (जैसे सीरिया और लेबनान) में स्थित ईरानी ठिकानों पर हमले जारी रखे हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जब बात इजरायल के अस्तित्व और सुरक्षा की होगी, तो वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। 

इजरायल की रणनीति यह है कि इससे पहले कि ट्रंप की डील पूरी तरह से जमीन पर लागू हो और ईरान को कोई सुरक्षा कवच मिले, उसके सैन्य बुनियादी ढांचे को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह पलटवार करने की स्थिति में ही न रहे. इजरायल के ये निरंतर हमले सीधे तौर पर अमेरिकी मध्यस्थता वाली शांति प्रक्रिया की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं। 

मध्य पूर्व में बढ़ सकता है बारूदी संकट
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका इजरायल की चिंताओं को शामिल किए बिना ईरान के साथ एकतरफा समझौता आगे बढ़ाता है, तो इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं. इजरायल के हमलों के जवाब में यदि ईरान ने पलटवार किया या अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया, तो यह समझौता लागू होने से पहले ही टूट जाएगा। 

इसके अतिरिक्त, यदि ईरान को लगा कि अमेरिकी डील के बावजूद इजरायली हमले नहीं रुक रहे हैं, तो वह खुद भी इस समझौते से पीछे हट सकता है. अपनी बंद पड़ी परमाणु गतिविधियों को और तेज कर सकता है. ऐसे में ट्रंप की यह ‘ऐतिहासिक शांति डील’ सिर्फ कागजों तक सीमित रह सकती है. पूरे क्षेत्र को एक ऐसे युद्ध में धकेल सकती है जिसे संभालना अमेरिका के लिए भी मुमकिन नहीं होगा। 

होर्मुज जलडमरूमध्य में 3 महीने फंसे रहे छत्तीसगढ़ के नेवी अधिकारी रुद्रांश चौबे, बोले- सिर के ऊपर से गुजरती थीं मिसाइलें

रायपुर.

समुद्र के बीचों-बीच खड़ा एक कार्गो शिप, चारों तरफ युद्ध का साया, आसमान में लगातार मंडराते ड्रोन, दहाड़ते फाइटर जेट और सिर के ऊपर से गुजरती मिसाइलें, सुनने में यह किसी हॉलीवुड फिल्म का दृश्य लग सकता है, लेकिन यह कहानी है रायपुर के युवा मर्चेंट नेवी अधिकारी रुद्रांश चौबे की।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के दौरान रुद्रांश करीब तीन महीने तक दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य के पास फंसे रहे। यूरिया लेकर कतर से रवाना हुआ उनका जहाज अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा था, लेकिन अचानक बदलते भू-राजनीतिक हालात ने सब कुछ बदल दिया। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण समुद्री गतिविधियां प्रभावित हुईं। होर्मुज का रास्ता बंद हो गया और उनका जहाज समुद्र के बीच ही ठहर गया। वापसी की उम्मीदें अनिश्चितता में बदल गईं। हर गुजरते दिन के साथ खतरा और चिंता दोनों बढ़ते चले गए।

रुद्रांश बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उनके जहाज के ऊपर से मिसाइलें और ड्रोन गुजरते थे। आसपास फाइटर जेटों की आवाजें लगातार सुनाई देती थीं। हर पल यही डर बना रहता था कि कहीं युद्ध की आग उनके जहाज तक न पहुंच जाए, लेकिन चुनौती जितनी बड़ी थी हौसला भी उतना ही मजबूत था। हमने क्षेत्र में कई ऐसी जहाजों को देखा, जो बाहर से सुंदर नजर आती थी लेकिन उसके पीछे का हिस्सा जल चुका होता था। जब भी किसी जहाज में हमला होता था हमें रेडियो के माध्यम से इसकी जानकारी मिल जाती थी और मुश्किल हालात में जहाज के कप्तान ने सभी क्रू मेंबर्स को सिर्फ एक सलाह दी कि खुद को काम में व्यस्त रखो और यही सलाह पूरे दल की सबसे बड़ी ताकत बन गई। भय और तनाव के माहौल में भी सभी ने संयम बनाए रखा और अपने कर्तव्यों को निभाते रहे।

समुद्र के बीच फंसे रुद्रांश लगातार अपने परिवार के संपर्क में रहे, जबकि हजारों किलोमीटर दूर उनका परिवार उनकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थना करता रहा। आज रुद्रांश सुरक्षित अपने घर लौट चुके हैं, लेकिन उनका जहाज अब भी उसी क्षेत्र में फंसा हुआ है। रुद्रांश चौबे के पिता डॉक्टर विजय कुमार चौबे बताते हैं कि वे अपने बेटे के सुरक्षित रहने की प्रार्थना करते थे। रुद्रांश से जब भी बात होती थी वे खुद को हमेशा सुरक्षित बताते थे, लेकिन जब वे रायपुर वापस आए तब उन्होंने हमें उस तनावपूर्ण स्थिति के बारे में बताया। उससे पहले उन्होंने खुद को सुरक्षित ही बताया था ताकि हम परेशान ना हो। रुद्रांश फिलहाल वेकेशन पर घर आए हुए हैं। उन्हें जब भी कॉल आएगा वे वापस जा सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि उनकी पोस्टिंग दोबारा भी वहीं हो।

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