इजरायल-ईरान जंग ने पकड़ा तूल: येरूशलम में धमाके, ट्रंप की चेतावनी को नजरअंदाज कर नेतन्याहू ने किया हमला

वॉशिंगटन/तेल अवीव
हिज्बुल्लाह पर इजरायल के हमले के बाद ईरान ने 8 अप्रैल के बाद पहली बार इजरायल पर मिसाइल हमले किए। जिसके बाद आज सुबह इजरायल ने भी ईरान में जमीन से लॉन्च होने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले किए हैं। इसके बाद एक बार फिर से युद्ध छिड़ने की आशंका काफी तेज हो गई है। इजरायल डिफेंस फोर्स ने कहा है कि कुछ देर पहले इजरायली वायु सेना ने पश्चिमी और मध्य ईरान में ईरानी आतंकी शासन के सैन्य ठिकानों पर हमला किया है। खास बात ये है कि इजरायल ने तब हमला किया है जब डोनाल्ड ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू से हमला नहीं करने को कहा था इसीलिए सवाल ये हैं कि अगर ये जंग फिर शुरू होता है तो क्या अमेरिका, इजरायल के साथ खड़ा रहेगा?

इसके अलावा मिसाइलों के आदान प्रदान के बाद अब अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी संभावित शांति समझौते में मुश्किलें आ सकती हैं। ट्रंप उम्मीद कर रहे थे कि इस मामले को दबाकर रखा जाए। उन्हें उम्मीद होगी कि यह मामला अप्रैल 2024 जैसा ही रहेगा जब इजराइल और ईरान ने एक-दूसरे पर हमले किए थे लेकिन कुछ दिनों बाद मामला शांत हो गया और यह बड़े संघर्ष में नहीं बदला जिसकी उस समय चिंता थी। लेकिन इस बार मामला अलग तरीके का है।

इजरायल-ईरान के बीच क्या टूट गया युद्धविराम?
डोनाल्ड ट्रंप को अभी भी उम्मीद हो सकती है कि ईरान और इजरायल एक बार फिर से युद्ध में नहीं फंसेगे लेकिन ऐसा होना मुश्किल है। ट्रंप ने कुछ देर पहले ही फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि वो ईरान युद्ध से जुड़े सारे फैसले वही लेते हैं। ट्रंप ने सोमवार को फाइनेंशियल टाइम्स से कहा कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास ईरान के साथ डील मानने के अलावा ‘कोई चारा नहीं’ होगा। ट्रंप ने कहा ‘फैसले मैं ही लेता हूं, सारे फैसले मैं ही लेता हूं, वह फैसले नहीं लेते।’ लेकिन इजरायल ने ईरान पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला कर साबित कर दिया है कि ट्रंप सारे फैसले नहीं लेते हैं।

ईरान-अमेरिका जंग में पिस रही दुनिया, होर्मुज के बाद बाब अल मंडेब बंद करने की धमकी

FT के मुताबिक ट्रंप ने यह भी कहा कि रविवार को इजरायल पर हुए ईरानी मिसाइल हमले का ‘डील पर कोई असर नहीं’ पड़ेगा। ट्रंप के साथ बातचीत के दौरान नेतन्याहू ने यह साफ कर दिया होगा कि भले ही ट्रंप इजरायल से शांति बनाए रखना चाह रहे हों लेकिन इजरायल अपनी मर्जी से काम करेगा। इसीलिए ट्रंप के लिए स्थिति काफी मुश्किल होने वाली है। ईरान और इजरायल को फिर से युद्धविराम के लिए मनाना आसान नहीं होगा। इजरायली पीएम नेतन्याहू पहले से ही युद्धविराम समझौतों से नाराज थे। उन्हें युद्धविराम की शर्तें भी पसंद नहीं हैं लेकिन असल सवाल ये है कि क्या ईरान अगर नये सिरे से हमले करता है तो क्या अमेरिका, इजरायल की मदद करेगा?

ट्रंप अब क्या कर सकते हैं?
ट्रंप के पास नाजुक युद्धविराम को बचाने का बहुत कम रास्ते बचे हैं। वो अब बेंजामिन नेतन्याहू पर भारी प्रेशर बना सकते हैं कि वो ईरान के अगले हमलों का जवाब ना दें। लेकिन ऐसा होना नामुमकिन की तरह है। इजरायल पर यमन की तरफ से भी हमले किए गये हैं और इजरायल हिज्बुल्लाह पर हमले जारी रखेगा। इसके अलावा ट्रंप अगर युद्ध में फिर से शामिल होता है तो ईरान के हमले मध्य पूर्व के देशों जैसे सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर पर फिर से शुरू हो जाएंगे। 8 अप्रैल से चल रहे युद्धविराम के बीच ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमता फिर से हासिल कर ली है। इसीलिए आगे का रास्ता बहुत मुश्किल नजर रहा है कि युद्धविराम जारी रह सके।
अभिजात शेखर आजाद

रूस-चीन बढ़ता सैन्य सहयोग, PLA के दौरे से भारत की चिंता बढ़ी

मॉस्को
रूस और चीन के बीच बढ़ते सैन्य संबंधों ने भारत की चिंता को बढ़ा दिया है। रूसी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस हफ्ते पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की एक निरीक्षण टीम ने रूस के पूर्वी सैन्य जिले में कई ठिकानों का दौरा किया। इसमें सुदूर-पूर्वी ज्यूइश ऑटोनॉमस रीजन में मौजूद एयर डिफेंस मिसाइल यूनिट भी शामिल थी। यह दौरा यह दौरा दशकों पुराने ‘भरोसा बढ़ाने वाले तंत्र’ के तहत किया गया। इसी दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चीन और रूस को कुदरती सहयोगी और पार्टनर बताया और जोर दिया कि उनके बीच बढ़ता सैन्य सहयोग किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ नहीं है।

रूसी समाचार एजेंसी TASS ने जिला कमांड के प्रेस ऑफिस का हवाला देते हुए बताया कि 2-3 जून को PLA का यह निरीक्षण दौरा चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के बीच हुए समझौतों के तहत एक सामान्य जांच प्रक्रिया थी। सीमावर्ती इलाकों में सैन्य क्षेत्र में भरोसा बढ़ाने पर 1996 का समझौता और सीमावर्ती इलाकों में सैन्य बलों में आपसी कटौती पर 1997 का समझौता उस कूटनीतिक ढांचे का हिस्सा थे, जो बाद में ‘शंघाई फाइव’ तंत्र और अंततः चीन और रूस के नेतृत्व वाले ‘शंघाई सहयोग संगठन’ (SCO) ब्लॉक में बदल गया।

रूस ने चीनी सेना को मिलिट्री बेस का दौरा क्यों कराया?
रूसी पक्ष ने PLA के इस दौरे को इस बात का सबूत बताया कि तीन दशक पहले बनाए गए तंत्र आज भी असरदार और प्रासंगिक हैं। TASS ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “निरीक्षण के दौरान, चीनी प्रतिनिधिमंडल ने पुष्टि की कि रूसी संघ ने अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाया है और चीन के साथ समझौतों के तहत स्थापित निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता की तारीफ की।”

चीनी सेना ने रूस की तारीफ की
रूसी समाचार वेबसाइट इजवेस्टिया के अनुसार, चीनी टीम का नेतृत्व कर रहे सीनियर कर्नल लियू जिन्सॉन्ग ने कंट्रोल सिस्टम की पारदर्शिता और संगठन व लॉजिस्टिक्स के मामले में मिले सहयोग की तारीफ की। लियू ने कहा, “दोनों पक्षों के रणनीतिक नेतृत्व में… हम आपसी समझ बनाएंगे और दोनों देशों के बीच दोस्ती को और मजबूत करेंगे।” उन्होंने यह भी कहा, “और खासकर इन पांच देशों के बीच हुए समझौते के दायरे में, हम इस क्षेत्र का विकास करना जारी रखेंगे और अपने आपसी फायदे वाले सहयोग को और मजबूत करेंगे।” रूसी प्रेस रिपोर्टों के अनुसार, चीनी प्रतिनिधिमंडल ने पूर्वी सैन्य जिले में ‘इटरनल फ्लेम मेमोरियल कॉम्प्लेक्स’ पर श्रद्धांजलि भी अर्पित की।

हम स्वाभाविक सहयोगी और साझेदार हैं। हम पड़ोसी हैं। पड़ोसी चुने नहीं जाते। हम बस चीन के साथ काम करते हैं और दोस्त हैं – किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के हितों के लिए।

रूस ने एयर डिफेंस यूनिट की जानकारी छिपाई
लेकिन मीडिया रिपोर्टों में इस दौरे के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई, जिसमें शामिल विशिष्ट एयर-डिफेंस यूनिट के बारे में भी कोई ब्योरा नहीं था। 1996 और 1997 के समझौते, चीन और सोवियत संघ के बीच दशकों तक चली सीमा पर तनाव और 1969 में उत्तर-पूर्वी चीन के हेइलोंगजियांग प्रांत में उसुरी नदी के पास हुई सशस्त्र झड़पों के बाद हुए थे। उस समय परमाणु शक्ति संपन्न ये पड़ोसी देश एक-दूसरे को गहरे शक की नजर से देखते थे – यह स्थिति 1990 के दशक की शुरुआत तक बनी रही।

रूस-चीन सैन्य सहयोग उच्चतम स्तर पर
पिछले दशक में, चीन और रूस ने नियमित संयुक्त अभ्यास, प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक बॉम्बर गश्त, कई क्षेत्रों में नौसैनिक अभ्यास और सेनाओं के बीच लगातार बेहतर होते आदान-प्रदान के जरिए अपने रक्षा सहयोग का विस्तार किया है। पुतिन ने 20 मई को चीन की 25वीं आधिकारिक यात्रा के दौरान बीजिंगमें कहा कि चीन के साथ संबंध “अभूतपूर्व उच्च स्तर” पर पहुंच गए हैं। गुरुवार को सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम के दौरान बोलते हुए, रूसी नेता ने उन सुझावों को खारिज कर दिया कि उन्होंने यूक्रेन युद्ध के बाद चीन के प्रति “कोई यू-टर्न” लिया है। उन्होंने कहा, “हम स्वाभाविक सहयोगी और साझेदार हैं। हम पड़ोसी हैं। पड़ोसी चुने नहीं जाते।”

रूस-चीन दोस्ती से भारत को कैसे खतरा?
भारत सैन्य साजोसामान के लिए लंबे समय से रूस पर निर्भर है। आज भी भारतीय सेना के लगभग 50% से 90% सैन्य उपकरण और हथियार रूस (या पूर्व सोवियत संघ) से आते हैं।
यह रूसी साजोसामान भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना की रीढ़ हैं। एयर डिफेंस के मामले में भी भारत बहुत हद तक रूसी सिस्टमों का इस्तेमाल करता है।
इनमें अत्याधुनिक S-400 मिसाइल सिस्टम से लेकर इगला-एस MANPADS, कुब (KUB) और पेचोरा (Pechora) एयर डिफेंस सिस्टम प्रमुख हैं।
ऐसे में इन सिस्टमों तक चीन की पहुंच भारत के लिए खतरे की बात है। चीन इस डिफेंस सिस्टम की कमजोरियों का पता लगा सकता है।
इसके अलावा चीन के साथ संघर्ष की स्थिति में रूस खुद को तटस्थ बना सकता है, जिससे भारत के लिए जरूरी सैन्य साजोसामान की आपूर्ति में समस्या आ सकती है।

 

ईरान मुद्दे पर अमेरिका-इजरायल में तनाव, जासूसी के आरोपों से बढ़ी खटास

नई दिल्ली
ईरान पर साथ मिलकर हमला करने वाले अमेरिका और इजरायल अब आपस में ही उलझते हुए नजर आ रहे हैं। यह पूरा मामला अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी से जुड़ा हुआ है। अमेरिकी खुफिया विभाग की रिपोर्ट में इस बात के संकेत दिए हैं कि इजरायल ने ईरान और अमेरिका की बातचीत में हिस्सा ले रहे अधिकारियों की निगरानी करनी शुरू कर दी है। बता दें, इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियां आपस में बेहद दोस्ताना रवैया रखती हैं, लेकिन इसके बाद भी ईरान के मुद्दे पर दोनों देशों की सरकार की राय अलग-अलग होने की वजह से परेशानी बढ़ गई है।

अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल की खुफिया एजेंसी, ईरान के साथ जारी बातचीत की स्थिति को समझने के लिए अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी करने की कोशिश कर रहा है। मामले से परिचित अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, इजरायली जासूसी एजेंसी ने उन लोगों पर ध्यान केंद्रित किया होगा, जो ईरान के साथ शांति वार्ता में प्रमुख रूप से भूमिका निभा रहे हैं। इसमें सबसे पहले ट्रंप के प्रमुख वार्ताकार स्टीव विटकॉफ, पेंटागन के अधिकारी एल्ब्रिुज ए कोल्बी, माइकल पी. डिमिनो शामलि हो सकते हैं

गौरतलब है कि आपस में खुफिया जानकारी साझा करने वाले यह दोनों देश इस बात को भली भांति जानते कि वह एक-दूसरे की जासूसी करते हैं। लेकिन ईरान का मुद्दा अलग है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक ईरान के मुद्दे पर जानकारी निकालने के लिए इजरायली जासूस जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिका की रक्षा खुफिया एजेंसी (DIA) की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल में तैनात अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि उनके मोबाइल फोन में निगरानी करने वाला साफ्टवेयर इंस्टॉल किया गया है। इस खबर के बाहर आते ही अमेरिका ने अपने सभी अधिकारियों के कम्युनिकेशन डिवाइसेस की सुरक्षा कड़ी कर दी।

अमेरिका की नहीं, ट्रंप की नस पकड़ने की कोशिश में इजरायल
अमेरिका और इजरायल आपस में ज्यादातर खुफिया जानकारी साझा करते हैं। दोनों देश साथ में कई युद्ध भी लड़ चुके हैं। ऐसे में अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इजरायल की दिलचस्पी अमेरिका की रणनीति या अधिकारियों की जासूसी में नहीं हैं। इजरायल, इस समय राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से दिए जा रहे संकेतों को समझने की कोशिश कर रहा है कि आखिर ट्रंप ईरान के साथ वार्ता में किस हद तक जा सकते हैं।

हालांकि, खुफिया आधार पर सामने आई इस रिपोर्ट को अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यलय ने खारिज किया है। वाइट हाउस की तरफ से बताया गया कि यह रिपोर्ट पूरी तरह से झूठी है। इजरायल अमेरिकी सरकारी अधिकारियों या संस्थानों की जासूसी नहीं करता है। उन्होंने आगे कहा, “इजरायल की खुफिया जानकारी जुटाने की कोशिशें उसके दुश्मनों पर केंद्रित हैं न कि उसके सहयोगियों पर। इसके विपरीत कोई भी दावा या तो गलत जानकारी पर आधारित है या राजनीतिक रूप से प्रेरित है।” वहीं इजरायल की तरफ से भी इन तमाम रिपोर्ट्स को खारिज किया गया है।

ईरान पर अलग-अलग क्यों दिख रहे इजरायल और अमेरिका
28 फरवरी को ईरान पर साथ मिलकर हमला करने वाले इजरायल और अमेरिका ने इस युद्ध को कुछ दिनों का सोचा था। लेकिन बाद में हालात ऐसे बिगड़े कि ट्रंप को सीजफायर करना पड़ा। इसी सीजफायर के बाद इजरायल और अमेरिका के बीच में हालात बिगड़ने लगे। अमेरिका चाहता है कि शांति वार्ता हो और ईरान के साथ दोबारा युद्ध शुरू न हो, जबकि गाजा में लंबे युद्ध लड़ चुका इजरायल लगातार ईरान पर हमला करने के प्रयास में है। इतना ही नहीं अमेरिका को सीधे तौर पर हिज्बुल्लाह से कोई परेशानी नहीं। ऐसे में ट्रंप ने नहीं चाहते कि इजरायल लेबनान पर हमला करे। लेकिन नेतन्याहू साफ तौर पर कह चुके हैं कि अगर लेबनान में हिज्बुल्लाह उसे थोड़ा सा भी खतरा समझ आता है, तो वह हमला करेंगे। अभी हाल में ही इसी मुद्दे को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू की तीखी बहस भी हो गई थी, जिसमें ट्रंप ने बीबी को अपशब्द तक कह दिए थे।

2026 में दिखेगा दुर्लभ पूर्ण सूर्यग्रहण, कई देशों में दिन में छाएगा अंधेरा

वॉशिंगटन
 खगोल वैज्ञानिक और आकाशीय घटनाओं में दिलचस्पी रखने वाले अगस्त 2027 का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जब इस सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा। लेकिन उससे पहले इसी साल पूर्ण सूर्यग्रहण की घटना होने जा रही है, जब दिन के कुछ समय के लिए सूरज चंद्रमा के पीछे पूरी तरह से छिप जाएगा। इस दुर्लभ खगोलीय संयोग के चलते दिन में अचानक कुछ समय के लिए अंधेरा छा जाएगा।

सूर्यग्रहण उस खगोलीय घटना को कहते है, जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है। इसके चलते सूर्य के कोरोना का पूरा या कुछ हिस्सा चंद्रमा के पीछे छिप जाता है, जिससे सूर्य को रोशनी बाधित हो जाती है। पूर्ण सूर्यग्रहण तब होता है, जब चंद्रमा, सूर्य को पूरी तरह से ढंक लेता है।

स्पेन में एक सदी बाद दिखाई देगा
साल 2026 का पूर्ण सूर्यग्रहण यूरोप के लिए बेहद खास है। यह एक सदी से भी ज्यादा समय में स्पेन की मुख्य भूमि से दिखाई देने वाला पहला सूर्यग्रहण होगा। उत्तरी स्पेन, ग्रीनलैंड, आइसलैंड और पुर्तगाल के कुछ हिस्सों में लोग पूर्ण ग्रहण का अनुभव करेंगे। यहां सूरज पूरी तरह से छिप जाने के कारण कुछ देर के लिए आसमान में अंधेरा छा जाएगा।

ग्रीनलैंड में इसे 2 मिनट से थोड़ा ज्यादा समय तक देखा जा सकेगा।
उत्तरी स्पेन में सिर्फ 20 सेकंड तक ही यह दिखाई देगा।

इन इलाकों में आंशिक दिखेगा ग्रहण
यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के बड़े इलाकों में आंशिक ग्रहण दिखाई देगा, जहां सूरज का कुछ हिस्सा ही चंद्रमा के पीछे छिपेगा। हालांकि, इसकी छाया भारतीय उपमहाद्वीप से होकर नहीं गुजरेगी, जिसका मतलब है कि भारत में रहने वाले लोग इसे नहीं देख सकेंगे।

एक साल बाद सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण
अगस्त 2026 के सूर्यग्रहण के ठीक एक साल बाद 2 अगस्त 2027 को दुनिया 21वीं सदी के सबसे लंबे सूर्यग्रहण का गवाह बनेगी। यह इस सदी में धरती से देखा जाने वाला सबसे लंबा सूर्यग्रहण होगा जो 6 मिनट 23 सेकंड तक चलेगा। इस दौरान दिन के दौरान लगभग अंधेरा हो जाएगा। यह स्पेन से शुरू होगा और अफ्रीका के मोरक्को, अल्जीरिया, मिस्र, सूडान होते हुए मध्य पूर्व तक देखा जाएगा। मिस्र के लक्सर में इसका चरम रूप दिखाई देगा, जहां इसकी अवधि 6.19 सेकंड होगी, जो पूर्णता से थोड़ी ही कम है।

 

होर्मुज जलडमरूमध्य तनाव के बीच US नेवी का MH-53E Sea Dragon चर्चा में

 नई दिल्ली
 मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच सामने आया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंग बिछा रखी हैं, लेकिन अमेरिका ने भी दावा किया कि वो इन बारूदी सुरंगों का लगातार खात्मा कर रहा है और जलमार्ग को सुरक्षित बना रहा है।

US नौसेना का इन बारूदी सुरंगों का खात्मा करने वाला ऐसा ही एयरक्राफ्ट इस समय चर्चा में है, जो कि अब अपनी 40 साल की सर्विस के बाद रिटायर किया जा सकता है

MH-53E सी ड्रैगन
US नेवी का MH-53E सी ड्रैगन एक विशाल हेलीकॉप्टर है, जो कि करीब चार दशकों से ‘एयरबोर्न माइन काउंटरमेजर’ (हवा से समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाने वाले) प्लेटफॉर्म के तौर पर काम कर रहा है।

यह हेलीकॉप्टर कमर्शियल शिपिंग और मिलिट्री जहाजों के लिए खतरा बनने वाली समुद्री बारूदी सुरंगों (नेवल माइन्स) का पता लगाने, उन्हें हटाने और बेअसर करने में सक्षम है।

यह एयरक्राफ्ट एडवांस्ड सेंसर और माइन काउंटरमेजर सिस्टम का इस्तेमाल करके पानी के नीचे मौजूद माइन्स का पता लगा सकता है और माइनफील्ड्स को साफ कर सकता है और माइन्स को बेअसर करने के ऑपरेशन में मदद कर सकता है।

यह हेलीकॉप्टर पानी में बड़े माइन-हंटिंग स्लेज को खींचकर कई समुद्री जहाजों की तुलना में बहुत तेजी से बड़े इलाकों में खोज और सफाई का काम कर सकता है।

‘सी ड्रैगन’ (Sea Dragon) की इसी क्षमता ने इसे दुनिया के सबसे खास और असरदार एयरबोर्न माइन-क्लियरिंग प्लेटफॉर्म में से एक बना दिया है।

क्या-क्या काम कर सकता है ये शक्तिशाली हेलीकॉप्टर?
MH-53E अमेरिकी सेना के अब तक के सबसे बड़े हेलीकॉप्टरों में से एक है। इस एयरक्राफ्ट की कुल लंबाई 99 फीट है, जबकि इसकी बॉडी ही 73 फीट से ज्यादा लंबी है। 28 फीट से ज्यादा ऊंचे इस हेलीकॉप्टर का अधिकतम वजन करीब 70,000 पाउंड है।

इस हेलीकॉप्टर को तीन जनरल इलेक्ट्रिक T64-GE-419 टर्बोशाफ्ट इंजन से पावर मिलती है, जिनमें से हर एक लगभग 4,750 शाफ्ट हॉर्सपावर पैदा करता है। ये इंजन एयरक्राफ्ट को भारी पेलोड ले जाते समय या खास माइन काउंटरमेजर सिस्टम खींचते समय लगभग 150 नॉट्स (यानी करीब 278 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार से उड़ने में मदद करते हैं।

MH-53E सी ड्रैगन माइन वॉरफेयर के अलावा, भारी सामान उठाने और वर्टिकल ऑनबोर्ड डिलीवरी (VOD) जैसे मिशन भी पूरे करता है। यह हेलीकॉप्टर जहाजों और तट पर बने ठिकानों के बीच सैनिकों, गाड़ियों, उपकरणों और जरूरी सामान को लाने-ले जाने में भी सक्षम है।

US नेवी क्यों कर रही MH-53E को रिटायर?
अपनी खास क्षमताओं के बावजूद, ‘सी ड्रैगन’ को US नेवी धीरे-धीरे हटाती जा रहा है, क्योंकि नेवी अपनी माइन वॉरफेयर फोर्स (समुद्री बारूदी सुरंगों से निपटने वाली फोर्स) में बड़े बदलाव कर रही है।

नेवी की योजना है कि MH-53E जो भी काम करता था, अब इसके कई कामों को MH-60S सीहॉक हेलीकॉप्टर से कराया जाए, जिन्हें एडवांस्ड माइन काउंटरमेजर सिस्टम, बिना क्रू वाले अंडरवॉटर व्हीकल और बिना क्रू वाले सरफेस वेसल का सपोर्ट मिले।

US नौसेना में यह बदलाव दिखाता है कि अब सेना ऑटोनॉमस टेक्नोलॉजी और डिस्ट्रिब्यूटेड ऑपरेशन पर ज्यादा ध्यान दे रही है।

सी-ड्रैगन को रिटायर करने पर विवाद
US नौसेना में इस बदलाव को लेकर भी विवाद सामने आ रहा है। कुछ डिफेंस एनालिस्ट और पुराने ऑपरेटर्स ने सवाल उठाया है कि क्या नए सिस्टम, बड़े संघर्ष के दौरान ‘सी ड्रैगन’ की तरह तेजी से बड़े माइनफील्ड (बारूदी सुरंगों वाले इलाके) को साफ करने की क्षमता की बराबरी कर पाएंगे या नहीं।

रिटायरमेंट के करीब होने के बावजूद, MH-53E अब तक बने सबसे काबिल एयरबोर्न माइन काउंटरमेजर प्लेटफॉर्म में से एक है। अमेरिका के साथ ही बाकी कई देशों के लिए भी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे जलमार्ग में बिछी नेवल माइन्स (समुद्री बारूदी सुरंगें) ग्लोबल शिपिंग और मिलिट्री ऑपरेशन के लिए गंभीर खतरा बनी हुई हैं।

भारत की गिरती जन्म दर पर एलन मस्क की चिंता: रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंचा TFR

नई दिल्ली
टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क (Elon Musk) ने भारत की जनसंख्या संबंधी बदलती तस्वीर पर चिंता जताई है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर हालिया प्रजनन दर के आंकड़ों पर प्रतिक्रिया देते हुए मस्क ने कहा कि भारत की जन्म दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है और देश के शिक्षित वर्ग में यह दर कई वर्ष पहले ही इस स्तर से नीचे आ गई थी.

मस्क ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर चुकी है. सबसे अधिक शिक्षित आबादी में यह दर कई साल पहले ही रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच गई थी.’ उनकी यह टिप्पणी 2024 के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की रिपोर्ट के बाद आई है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 2.1 से 1.9 बच्चे प्रति महिला रह गई है.

क्या होता है रिप्लेसमेंट लेवल?
जनसंख्या विशेषज्ञों के अनुसार 2.1 बच्चे प्रति महिला की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है. इसका अर्थ है कि एक जनरेशन (पीढ़ी) अपनी अगली जनरेशन को बिना माइग्रेशन (प्रवासन) के स्थिर रूप से रिप्लेस कर सके. यदि किसी देश की प्रजनन दर लंबे समय तक रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे बनी रहती है, तो जनसंख्या वृद्धि धीमी पड़ जाती है और भविष्य में नकारात्मक भी हो सकती है.

जनसंख्या वृद्धि के नकारात्मक (Negative Population Growth) होने का मतलब है कि किसी देश या क्षेत्र में लोगों की कुल संख्या बढ़ने के बजाय घटने लगे. सरल शब्दों में: यदि जन्म लेने वाले लोगों की संख्या + आने वाले प्रवासी (Immigrants), मरने वाले लोगों की संख्या + बाहर जाने वाले प्रवासी (Emigrants) से कम हो जाए, तो जनसंख्या वृद्धि दर नकारात्मक हो जाती है.

नेगेटिव पॉपुलेशन ग्रोथ क्या है?
उदाहरण के लिए: एक साल में 10 लाख बच्चे पैदा हुए और 12 लाख लोगों की मृत्यु हो गई. प्रवासन का प्रभाव शून्य रहा. मतलब दूसरे देश से कोई प्रवासी नहीं आया और अपने देश से कोई बाहर नहीं गया तो ऐसी स्थिति में आबादी 2 लाख कम हो जाएगी. इसे नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि कहा जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार कम प्रजनन दर से आबादी के बूढ़े होने, वर्क फोर्स कम होने, पेंशन, हेल्थ सर्विस, और सोशल वेलफेयर पर खर्च बढ़ने से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने जैसी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं.

कम बच्चे पैदा होने से समाज में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ जाता है. युवाओं की संख्या कम होने से उद्योगों और सेवाओं में श्रमिकों की कमी हो सकती है. वर्क फोर्स की कमी का मतलब प्राडक्शन और टैक्स कलेक्शन में कमी आना. अधिक बुजुर्ग आबादी के कारण सरकारों को पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है. यानी ऐसी स्थिति में सरकार की आमदनी घटती है और खर्चा बढ़ जाता है.

भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2025 की ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन’ रिपोर्ट में भी भारत की प्रजनन दर 1.9 बच्चे प्रति महिला बताई गई है, जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से कम है. हालांकि 1.46 अरब से अधिक आबादी के साथ भारत अब भी दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, लेकिन नए आंकड़े संकेत देते हैं कि देश अब जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition) के नए दौर में प्रवेश कर रहा है. इस चरण की पहचान छोटे परिवारों, कम प्रजनन दर और धीमी जनसंख्या वृद्धि से होती है.

जन्म दर और प्रजनन दर में अंतर
अक्सर जन्म दर (Birth Rate) और प्रजनन दर (Fertility Rate) को एक ही माना जाता है, लेकिन दोनों अलग-अलग संकेतक हैं. जन्म दर (Birth Rate): किसी वर्ष में प्रति 1,000 आबादी पर होने वाले जीवित जन्मों की संख्या. कुल प्रजनन दर (TFR): एक महिला के जीवनकाल में औसतन पैदा होने वाले बच्चों की संख्या है. दोनों संकेतक आपस में जुड़े हुए हैं.

जब प्रजनन दर लगातार घटती है तो समय के साथ जन्म दर भी कम होती है, जिससे जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और समाज में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ने लगता है. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में सिर्फ- बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड ही ऐसे राज्य हैं जहां प्रजनन दर अब भी रिप्लेसमेंट लेवल से ऊपर बनी हुई है.

अमेरिका–इज़रायल रिश्तों में तनाव: ईरान वार्ता के बीच जासूसी के आरोपों से बढ़ी खुफिया चिंता

नई दिल्ली
 मिडल ईस्ट में चल रहे युद्ध के बीच नई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इजरायली खुफिया एजेंसियां ईरान के साथ शांति समझौते के लिए प्रयासरत अमेरिकी वार्ताकारों पर जासूसी कर रही हैं। इस घटना ने अमेरिकी खुफिया अधिकारियों में इजरायल की जासूसी गतिविधियों को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

मीडिया रिपोर्ट र्ट के अनुसार, हालिया अमेरिकी खुफिया आकलनों में इस बात पर चिंता जताई गई है कि जब तेहरान के साथ बातचीत रुकी हुई है, तब इजरायल ने वाशिंगटन की बातचीत की स्थिति के बारे में जानकारी जुटाने के प्रयास तेज कर दिए हैं।

इजरायली खुफिया सेवाओं ने वार्ता में शामिल वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों की निगरानी बढ़ा दी है। इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुख्य वार्ताकार स्टीव विटकॉफ, पेंटागन के नीति प्रमुख एलब्रिज कोल्बी और वरिष्ठ रक्षा अधिकारी माइकल डिमिनो शामिल हैं।

खुफिया इकाइयों ने यह चिंता जताई है कि इजरायली एजेंसियां वाशिंगटन और तेहरान के बीच शांति समझौते को हासिल करने के उद्देश्य से विटकॉफ और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की बातचीत को मॉनिटर करने का प्रयास कर रही थीं।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ घनिष्ठ सैन्य सहयोग जारी रखे हुए हैं, लेकिन साथ ही अमेरिका तेहरान के साथ दीर्घकालिक समझौता करने के कूटनीतिक प्रयास भी कर रहा है।

क्रिटिकल स्तर पर पहुंचा खतरे का स्तर
अमेरिका और इजरायल ऐतिहासिक रूप से यह स्वीकार करते रहे हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ खुफिया अभियान चलाते हैं, लेकिन कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इजरायल की हालिया गतिविधियों ने एक स्वीकार्य सीमा को पार कर लिया है।

डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी और अन्य सैन्य खुफिया एजेंसियों द्वारा तैयार किए गए एक अलग खुफिया आकलन में हाल के हफ्तों में इजरायल द्वारा उत्पन्न काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे को हाई से बढ़ाकर क्रिटिकल कर दिया गया है। इस रिपोर्ट में अमेरिकी सैन्य कर्मियों और सरकारी अधिकारियों पर खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के इजरायली प्रयासों को रेखांकित किया गया है।

जासूसी के लिए फोन टैपिंग
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के अंत से इजरायली खुफिया गतिविधियों के संदिग्ध मामलों में वृद्धि हुई है, जब गाजा में सैन्य अभियानों के संचालन को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच तनाव पैदा हुआ था। 2025 में भी यह चिंताएं जारी रहीं, जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान के संबंध में सैन्य और कूटनीतिक विकल्पों पर विचार किया।

इन घटनाओं में यह आरोप भी शामिल है कि इजरायल में तैनात अमेरिकी रक्षा कर्मियों ने पाया कि उनके मोबाइल फोन में संचार को इंटरसेप्ट करने में सक्षम सॉफ्टवेयर गुप्त रूप से इंस्टॉल किया गया था।

रिपोर्ट में 2021 की पिछले मामलों का भी जिक्र किया गया है, जिसमें कथित तौर पर इजरायली सैन्य खुफिया अधिकारियों को DIA मुख्यालय में लिसनिंग डिवाइस लगाने का प्रयास करते हुए पकड़ा गया था। एक अन्य मामले में इजरायल की शिन बेट सुरक्षा एजेंसी के सदस्यों द्वारा अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के वाहन के अंदर लिसनिंग डिवाइस लगाने के कथित प्रयास का जिक्र है।

ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल के अलग-अलग लक्ष्य
ये चिंताएं ऐसे समय में सामने आई हैं जब ईरान को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के सामरिक उद्देश्यों में स्पष्ट मतभेद दिखाई दे रहे हैं। हालांकि दोनों देश शुरुआत में इस संघर्ष के दौरान एकजुट नजर आ रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, उनकी रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग होने लगीं

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन का ध्यान मुख्य रूप से ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने पर था ताकि बातचीत के जरिए रियायतें हासिल की जा सकें। इसके विपरीत, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के उद्देश्य कहीं अधिक व्यापक थे, जिनमें तेहरान की क्षमताओं को और अधिक नष्ट करना और ईरानी नेतृत्व को पूरी तरह कमजोर करना शामिल था।

इन खुलासों से दोनों सहयोगियों के बीच भविष्य के सैन्य समन्वय में गंभीर जटिलताएं आ सकती हैं। जानकारों का मानना है कि यदि पेंटागन इजरायली समकक्षों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का फैसला करता है, तो इसका सीधा असर दोनों देशों के सैन्य संबंधों पर पड़ेगा।

ट्रंप प्रशासन के AI सलाहकार श्रीराम कृष्णन देंगे पद से इस्तीफा

 नई दिल्ली
 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन में सबसे चर्चित भारतीय-अमेरिकी टेक्नोलॉजी सलाहकार श्रीराम कृष्णन इस महीने के आखिर में व्हाइट हाउस में अपना पद छोड़ देंगे। उन्होंने पिछले 18 महीनों में प्रशासन की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) रणनीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है।

सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कृष्णन ने कहा कि अमेरिका के सामने एआई से जुड़ी बड़ी चुनौतियों पर काम करने के लिए लौटने से पहले वे कुछ समय का ब्रेक लेंगे। उन्होंने लिखा कि मैं इस महीने के आखिर में व्हाइट हाउस में अपना पद छोड़ दूंगा। ब्रेक के बाद, मैं एआई के मामले में अमेरिका के सामने मौजूद कुछ बड़ी चुनौतियों से निपटने में मदद करने के लिए काम करूंगा।

कृष्णन ने अपनी सरकारी सेवा को जीवन भर का सौभाग्य बताया और कहा कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में काम करना सम्मान की बात थी।

उन्होंने कहा, “उनकी लीडरशिप के बिना, हम एआई की दौड़ में इतने आगे नहीं होते। उन्होंने व्हाइट हाउस के एआई और क्रिप्टो सलाहकार डेविड सैक्स का भी धन्यवाद करते हुए कहा कि एआई के क्षेत्र में अमेरिका की जीत के लिए उनकी लगातार वकालत बहुत अहम रही है और आगे भी रहेगी।”

ट्रंप प्रशासन में निभाई अहम भूमिका
कृष्णन ने उन कई पहलों का भी जिक्र किया जिन्हें विकसित करने में उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान मदद की। इनमें प्रशासन के अमेरिकन एआई एक्शन प्लान का खाका तैयार करना और उसे जारी करना, वैश्विक स्तर पर अमेरिकी एआई इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए एआई एक्सेलरेशन साझेदारियों को आगे बढ़ाना, और नेशनल एआई पॉलिसी फ्रेमवर्क से जुड़े एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में योगदान देना शामिल है।

उन्होंने एआई समिट और कूटनीतिक मुलाकातों के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी एआई हितों को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि दुनिया भर में अपने सहयोगियों के साथ अमेरिकी एआई स्टैक की वकालत करना, जैसे फ्रांस और भारत में एआई समिट, यूनाईटेड किंगडम, मध्य पूर्व और अन्य जगहों की राजकीय यात्राएं हो।

भविष्य को देखते हुए, कृष्णन ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से विकास नीति और बुनियादी ढांचे से जुड़ी बड़ी चुनौतियां पेश करता है। उन्होंने कहा, “पिछले 18 महीनों में मुझे अमेरिका और हमारे सहयोगियों के सामने मौजूद एआई से जुड़े इस अहम मोड़ को बहुत करीब से देखने का मौका मिला है। चाहे वह ऊर्जा हो, डेटा सेंटर हों या अमेरिकियों के लिए एआई के फायदों का अनुभव करने का स्पष्ट रास्ता हो, कई मुश्किल मुद्दे हैं जिनसे हमें मिलकर निपटना होगा।”

उन्होंने बताया कि वे अब ऐसे संस्थान बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की योजना बना रहे हैं जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए उन चुनौतियों से निपटने में मदद करें।

डेविड सैक्स ने की कृष्णन के काम की तारीफ
इस घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए, डेविड सैक्स ने प्रशासन के एआई एजेंडा में कृष्णन के योगदान की तारीफ़ की और संकेत दिया कि यह भारतीय-अमेरिकी टेक्नोलॉजी लीडर सरकार के बाहर से भी सलाह देना जारी रखेंगे।

सैक्स ने लिखा, “प्रशासन में मेरे कार्यकाल के दौरान पिछले 18 महीनों में आपके साथ इतनी करीब से काम करना मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात रही है। एआई में गहरी तकनीकी समझ, नीतिगत मामलों की सटीक परख, बेहतरीन रणनीतिक सोच और सच्चे कूटनीतिक कौशल का दुर्लभ मेल आपकी क्षमताएं सचमुच अनोखी हैं।”

सैक्स ने आगे कहा कि कृष्णन ने प्रशासन के एआई एक्शन प्लान को मिलकर तैयार किया, एआई को तेज़ी से आगे बढ़ाने वाली साझेदारियों को बढ़ावा देने में मदद की, नेशनल एआई पॉलिसी फ्रेमवर्क में योगदान दिया और अंतरराष्ट्रीय एआई समिट और राजकीय यात्राओं में अमेरिकी हितों का प्रतिनिधित्व किया।

सैक्स ने कहा, “यह प्रशासन के लिए एक बड़ा नुकसान होगा, लेकिन मुझे खुशी है कि हम आपके साथ बाहरी सलाहकार के तौर पर काम करना जारी रखेंगे।”

सिलिकॉन वैली और वाशिंगटन के बीच अहम कड़ी
यह विदाई कृष्णन के लिए एक अहम अध्याय का अंत है, जो ट्रंप के व्हाइट हाउस के भीतर एआई नीति पर सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक बनकर उभरे और सिलिकॉन वैली तथा वाशिंगटन के टेक्नोलॉजी एजेंडा के बीच एक अहम कड़ी बने।

एक भारतीय-अमेरिकी उद्यमी और टेक्नोलॉजी एग्जीक्यूटिव के तौर पर, कृष्णन ने पहले माइक्रोसॉफ्ट, एक्स, मेटा और स्नैप जैसी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में सीनियर प्रोडक्ट और लीडरशिप भूमिकाएं निभाई हैं। वे उभरती हुई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक जाने-माने इन्वेस्टर और कमेंटेटर भी रहे हैं।

एआई ट्रंप प्रशासन की टेक्नोलॉजी और आर्थिक रणनीति का एक मुख्य आधार बन गया है। अधिकारियों का तर्क है कि एआई के क्षेत्र में अमेरिका की लीडरशिप बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी इनोवेशन के लिए बहुत जरूरी है।

कृष्णन का काम उन्हें इन कोशिशों के केंद्र में ले आया था, क्योंकि वाशिंगटन ग्लोबल एआई पॉलिसी और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को आकार देने की कोशिश कर रहा था।

ईरानी संपत्तियों से खाड़ी देशों के नुकसान की भरपाई पर विचार, अमेरिका की नई रणनीति

नई दिल्ली
 अमेरिकी प्रशासन ईरान द्वारा कुवैत और बहरीन पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों से हुए नुकसान की भरपाई और पुनर्निर्माण के लिए ईरानी संपत्तियों को खाड़ी देशों की ओर मोड़ने का प्रयास कर रहा है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों को हुए नुकसान की लागत का आकलन करने के लिए टीम को निर्देश दिया है। इसके साथ ही वाशिंगटन भविष्य में इस संघर्ष से होने वाले किसी भी विनाश की मरम्मत के लिए भी ईरानी संपत्तियों के उपयोग पर विचार कर रहा है।

$24 बिलियन की रिहाई पर अटका शांति समझौता
यह घोषणा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के सैन्य सलाहकार मोहसिन रेजई के उस बयान के एक दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच संभावित शांति समझौता अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई 24 बिलियन डॉलर की ईरानी संपत्ति की रिहाई पर निर्भर करता है।

शुक्रवार को सीएनएन से बात करते हुए रेजई ने इस राशि की रिहाई को विश्वास की अहम परीक्षा और किसी भी व्यापक समझौते की दिशा में एक जरूरी कदम बताया था।

इस नए घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच पहले से ही नाजुक संघर्ष विराम प्रयासों के और उलझने का खतरा पैदा कर दिया है। एक अंतरिम समझौते को सुरक्षित करने के चल रहे कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद वीकेंड में फिर से लड़ाई भड़क उठी है।

सैन्य तनाव में वृद्धि और ईरानी ठिकानों पर हमला
इस बीच पूरे क्षेत्र में सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, समुद्री यातायात के लिए खतरा बने ड्रोनों को इंटरसेप्ट करने के बाद अमेरिकी बलों ने शनिवार तड़के होर्मुज में गोरुक और केशम द्वीप पर ईरानी तटीय रडार प्रतिष्ठानों पर हमला किया। अमेरिकी सेना ने रणनीतिक जलमार्ग के पास दो और ईरानी हमलावर ड्रोनों को मार गिराने का भी दावा किया है।

इसके जवाब में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइलें दागीं। कुवैती अधिकारियों ने बताया कि सात बैलिस्टिक मिसाइलें रिहायशी इलाकों के ऊपर से गुजरीं, जिससे संपत्ति का नुकसान हुआ लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई।

वहीं बहरीन में सायरन बजने के बाद निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने की सलाह दी गई। ईरानी मीडिया ने दावा किया कि मिसाइलों ने दोनों देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि अमेरिकी सेना ने कहा कि छह मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर लिया गया और सातवीं अपने लक्ष्य तक पहुंचने में विफल रही।

क्या है ईरान की मांगें?
अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत जारी है ताकि एक ऐसा अंतरिम समझौता हो सके जो शत्रुता को रोक दे और परमाणु कार्यक्रम जैसे विवादित मुद्दों पर भविष्य की बातचीत का रास्ता खोले। हालांकि, अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

तेहरान अपनी तेल आय के अरबों डॉलर तक पहुंच, कच्चे तेल के निर्यात पर प्रतिबंधों से राहत, बंदरगाहों पर लगी पाबंदियां हटाने और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अधिक नियंत्रण की मांग कर रहा है।

इसी बीच मध्यस्थता के प्रयासों के तहत, पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री मोहसिन नकवी शनिवार को तेहरान पहुंचे। ईरानी मीडिया के अनुसार, वे पाकिस्तान के सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री का अयातुल्ला खामेनेई के लिए एक ‘विशेष पत्र’ लेकर गए हैं। नकवी की ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची सहित कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों के साथ बातचीत करने की उम्मीद है।

ईरान की क्षमता पर राष्ट्रपति ट्रंप का बयान
यह संघर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर भी दबाव बढ़ा रहा है, जिन्हें ईंधन की बढ़ती कीमतों और युद्ध के कारण होने वाले व्यापक आर्थिक व्यवधानों पर घरेलू आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

एनबीसी न्यूज के अनुसार, ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी ऑपरेशनों ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को काफी हद तक कम कर दिया है, लेकिन उन्होंने माना कि तेहरान के पास अभी भी एक बड़ा शस्त्रागार मौजूद है।

ट्रंप ने कहा, “उनके पास कुछ मिसाइलें और ड्रोन बचे हैं। प्रतिशत के हिसाब से मैं कहूंगा कि शायद उनकी मिसाइलों का 21% से 22% हिस्सा। यह बहुत सारी मिसाइलें हैं, लेकिन जब हमने पहली बार हमला किया था, तब के मुकाबले यह बहुत कम है।”

लेबनान में तनाव
दक्षिणी लेबनान में एक सैन्य वाहन पर हुए इजरायली हमले में दो सैन्य अधिकारियों और एक सैनिक की मौत हो गई। इजरायली सेना इस घटना की जांच कर रही है।

ईरान ने वाशिंगटन के साथ किसी भी व्यापक समझौते को लेबनान में इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह आंदोलन के बीच संघर्ष विराम से जोड़ दिया है। हालांकि, इजरायल ने साफ किया है कि उसका सैन्य अभियान जारी रहेगा।

यह जटिल क्षेत्रीय विवाद शांति प्रयासों को और उलझा रहा है। बातचीत रुकी हुई है और युद्ध को तीन महीने पूरे हो चुके हैं, ऐसे में किसी स्थायी समझौते की उम्मीदें फिलहाल अनिश्चित बनी हुई हैं।

मोदी सरकार के 12 साल पूरे, PM मोदी ने तोड़ा नेहरू का रिकॉर्ड; 22 राज्यों में NDA का शासन

नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद भारत में सबसे लंबे समय तक पीएम पद पर बने रहने के नेहरू के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है. वो देश के सबसे लंबे कार्यकाल तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं. 9 जून 2024 को ही उन्होंने एनडीए के तीसरे कार्यकाल में पीएम पद की शपथ ली थी और उनके सत्ता में रहने के 12 साल भी आज पूरे हो रहे हैं. पीएम मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी और आज 9 जून 2026 तक उनके कार्यकाल के 4398 दिन पूरे हो गए हैं. अब वो सबसे लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री बन गए हैं। 

एनडीए 10 जून को दिखाएगा ताकत 
एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की 10 जून को बैठक होगी और इसमें एकजुटता के साथ शक्ति प्रदर्शन होगा.आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेदेपा प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू रखेंगे प्रस्ताव. अन्य सहयोगी दलों के नेता प्रस्ताव का करेंगे समर्थन. प्रस्ताव में बतौर प्रधानमंत्री पिछले बारह साल की उपलब्धियों का ज़िक्र किया जाएगा। 

पंडित नेहरू का 12 साल का रिकॉर्ड
भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 13 मई 1952 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. नेहरू लगातार 4397 दिन यानी 12 साल 14 दिन तक प्रधानमंत्री रहे थे. पीएम मोदी ने 9 जून को सबसे लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री का नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया. निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने 4398 दिन यानी 12 साल 15 दिन पूरे कर लिए हैं. नेहरू हालांकि 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री बने थे लेकिन 1952 में लोकसभा चुनाव के पहले तक वो पांच साल अंतरिम सरकार के प्रमुख थे. नेहरू तब तक चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री नहीं बने थे। 

मोदी सरकार के 12 वर्ष और 22 राज्यों में NDA शासन

संगठनात्मक विस्तार पर चर्चा
भाजपा सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने बैठक के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि बैठक दोपहर में शुरू हुई. शाम देर तक चली. उन्होंने बताया कि यह बैठक पीएम मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल की सफलताओं और एनडीए के 22 राज्यों में शासन को रेखांकित करने के लिए बुलाई गई थी, जो संगठन के व्यापक विस्तार का प्रतीक है।

युवा, महिला और वंचित वर्गों पर फोकस
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि नितिन नबिन की अध्यक्षता में हुई भाजपा की बैठक में संगठनात्मक विस्तार, युवाओं को जोड़ने, महिलाओं के सशक्तिकरण और एससी/एसटी समुदायों के विकास पर चर्चा हुई. बैठक में पार्टी के संगठन को मजबूत करने, युवा वर्ग को मुख्यधारा में लाने, महिला सशक्तिकरण और अनुसूचित जाति/जनजाति के उत्थान जैसे मुद्दों पर फोकस किया गया। 

आगामी चुनावों की रणनीति
पार्टी सूत्रों के अनुसार, बैठक में 26 मई 2026 तक मोदी सरकार के 12 वर्षों के उपलक्ष्य में जन-संपर्क अभियान तेज करने और आगामी विधानसभा व राज्यसभा चुनावों के लिए रणनीति तैयार करने पर मंथन हुआ. संगठनात्मक समन्वय बढ़ाने के लिए 10 जून को एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उपमुख्यमंत्रियों की एक हाई-प्रोफाइल बैठक प्रस्तावित है, जिसमें भावी राजनीतिक एजेंडे पर चर्चा होगी। 

नेहरू 1947 से 27 मई 1964 तक प्रधानमंत्री पद  पर रहे. ऐसे में नेहरू का पूरा टाइम तो 6130 दिन होता है. लेकिन इसमें से करीब 5 साल वो अंतरिम सरकार के प्रमुख के तौर पर प्रधानमंत्री रहे. पीएम मोदी ने 25 जुलाई 2025 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगातार 4077 दिनों के प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा था। 

शासन में सबसे लंबे वक्त का रिकॉर्ड
पीएम मोदी ने मार्च 2026 में एक बड़ा इतिहास बनाया था. गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री रहने के दोनों कार्यकालों को मिला दें तो वह 8931 दिनों से अधिक समय तक सत्ता में रहने वाले भारत के पहले नेता बन गए थे. उन्होंने तब सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन चामलिंग (8930 दिन) के रिकॉर्ड को तोड़ा था। 

सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री
पीएम मोदी भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सत्ता संभालने वाले पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी हैं. वो गैर कांग्रेसी सरकार के ऐसे पहले नेता हैं, जिन्होंने लगातार दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई और अब तीसरी बार एनडीए सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। 

लगातार तीन बार चुनाव जीतने वाले दूसरे प्रधानमंत्री
पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद 2024 में नरेंद्र मोदी देश के दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री बने थे, जिन्होंने लगातार तीन लोकसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) में अपने नेतृत्व में गठबंधन या पार्टी को जीत दिलाकर लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. वो भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनका जन्म देश की आजादी के बाद (17 सितंबर 1950) हुआ. इस तरह वो आजाद भारत में जन्मे पहले पीएम है. उनसे पहले के सभी प्रधानमंत्री 1947 से पहले जन्मे थे। 

मोदी सरकार में लोगों को मिले कौन-कौन से लाभ?
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार हमेशा अंत्योदय से प्रेरित रही है और उसका प्रयास हमेशा यह सुनिश्चित करना रहा है कि विकास के लाभ उन लोगों तक पहुंचें जो दशकों से पीछे छूट गए हैं।

पीएम ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि यह खुशी की बात है कि गरीबों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में प्रौद्योगिकी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पीएम मोदी ने कहा कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सहायता सीधे और पारदर्शी तरीके से लोगों तक पहुंच रही है। इससे भ्रष्टाचार कम हुआ है, कार्यकुशलता बढ़ी है और शासन में विश्वास मजबूत हुआ है।

इसी तरह गरीब कल्याण को आगे बढ़ाने का सफर मानव सशक्तिकरण और विकसित भारत के हमारे सपने को साकार करने की दिशा में एक सामूहिक आंदोलन बन गया है।

केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं से लोगों को वित्तीय सुरक्षा मिली: शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास और जन-धन जैसी केंद्रीय योजनाओं ने करोड़ों नागरिकों को बैंकिंग सुविधाओं और वित्तीय सुरक्षा से जोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के तीसरे कार्यकाल के दूसरे वर्ष के समापन पर एक संदेश में शाह ने कहा कि गरीब कल्याण मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

अमित शाह ने कहा कि सरकार ने अन्न योजना, प्रधानमंत्री आवास, जन-धन, मुद्रा ऋण और प्रधानमंत्री स्वनिधि जैसी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से करोड़ों नागरिकों को बैंकिंग सुविधाओं, वित्तीय सुरक्षा और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ा है।

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