शालू जिन्दल को ‘सीएसआर विजनरी लीडर ऑफ द ईयर’ का सम्मान

 शालू जिन्दल को ‘सीएसआर विजनरी लीडर ऑफ द ईयर’ का सम्मान

नई दिल्ली/रायपुर 
जिन्दल फाउंडेशन की चेयरपर्सन श्रीमती शालू जिन्दल को सामाजिक विकास के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट नेतृत्व और अनुकरणीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘सीएसआर विजनरी लीडर ऑफ द ईयर’ अवार्ड से सम्मानित किया गया है।
यह सम्मान नई दिल्ली के एयरोसिटी स्थित होटल प्राइड प्लाजा में ‘द ब्रेनालिटिक्स’ द्वारा हाल ही में आयोजित ‘7वें भारत सीएसआर एंड सस्टेनेबिलिटी समिट एंड अवार्ड्स 2026’ में प्रदान किया गया।
यह सम्मान देश भर में विभिन्न समुदायों का जीवन स्तर सुधारने और उनके कल्याण के लिए जिन्दल फाउंडेशन के माध्यम से श्रीमती शालू जिन्दल द्वारा किये गए दूरदर्शी और समर्पित प्रयासों की कड़ी में मील का एक पत्थर है। उनके कुशल मार्गदर्शन में फाउंडेशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, आजीविका, जल और स्वच्छता, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, पर्यावरणीय विकास, कला व संस्कृति और सामाजिक उत्थान जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई है।

इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए श्रीमती शालू जिन्दल ने इस अवार्ड को फाउंडेशन की सेवा यात्रा से जुड़े सहयोगियों, साझेदारों और टीम के सामूहिक प्रयासों और उनके समर्पण का सम्मान बताया, जो सामाजिक उत्थान के पवित्र प्रयासों में निरंतर योगदान कर रहे हैं।
जिन्दल फाउंडेशन के बारे में – जिन्दल स्टील की सामाजिक सेवा शाखा ‘जिन्दल फाउंडेशन’ देशभर में लोगों के जीवन को बेहतर बनाने और समाज में समान अवसरों व खुशहाली को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। फाउंडेशन शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण, बुनियादी ढांचे के विकास, पर्यावरण संरक्षण, खेल तथा कला एवं संस्कृति जैसे विविध क्षेत्रों में जनकल्याणकारी पहल के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है।

किम जोंग उन अपनी मां का नाम लेने से क्यों बचते हैं? सामने आई बड़ी वजह

प्योंगयांग
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से जुड़े कई रहस्यों पर अक्सर बात होती है। इनमें से एक बड़ा रहस्य उनकी मां के बारे में है। अपने 15 साल के शासनकाल में किम ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपनी मां का जिक्र नहीं किया है। उत्तर कोरिया जैसे देश में जो अपनी वंशानुगत शुद्धता पर गर्व करता है, किम की मां की पहचान ना केवल एक रहस्य की तरह है। इसकी वजह उनकी मां के परिवार की जड़ों को माना जाता है।

किम के मातृपक्ष का वंश जापान से जुड़ा है। जापान के ओसाका शहर में किम की मां को योंग हुई का जन्म हुआ था। को हुई का जन्म 1952 में ओसाका में हुआ लेकिन उनके माता-पिता मूल रूप से जेजू द्वीप के रहने वाले थे, जो आज के दक्षिण कोरिया के दक्षिणी तट के पास स्थित है। वह करीब 10 साल की थीं, तो को का परिवार उत्तर कोरिया आ गया। दक्षिण कोरिया और जापान उत्तर कोरिया के दुश्मन मुल्क माने जाते हैं।

योंग राजपरिवार का हिस्सा कैसे बनीं
उत्तर कोरिया में आए लोगों को ईर्ष्या की नजर से देखा जाता था और जैपो कहा जाता था। यह एक अपमानजनक शब्द है। उत्तर कोरियाई समाज में ऊंच-नीच बहुत ज्यादा है। सख्त सामाजिक वर्गीकरण में जैपो लोग वेवरिंग क्लास में आते हैं। नॉर्दर्न रिसर्च एसोसिएशन के किम ह्युंग-सू कहते हैं कि शासन की पैकटू वंशावली को पवित्र माना जाता है। इसलिए सुप्रीम नेता के किसी जैपो का बेटा होने की बात सोचना भी नामुमकिन है।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, योंग हुई को उस वक्त किम जोंग-इल (किम जोंग उन के पिता) ने देखा था, जब उनको सत्ता संभालने के लिए तैयार किया जा रहा था। हालांकि उनकी शादी पहले ही किम यंग-सूक से हो चुकी थी लेकिन वह योंग हुई के भी करीब आ गए। दोनों साथ रहे और किम जोंग समेत तीन बच्चे हुए। इन बच्चों को लाइमलाइट ले दूर रखा गया क्योंकि उत्तर कोरिया में शादी के बिना बच्चों को बुरा माना जाता है।

साल 2004 में निधन
साल 2004 में पेरिस के एक अस्पताल में ब्रेस्ट कैंसर से हुई का निधन हो गया। उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया ने उनकी मौत के बारे में खबर नहीं दी। इसकी वजह उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को माना गया। इसके उलट उनके बच्चों की किस्मत अलग थी। किम की पत्नी किम यंग सूक ने दो लड़कियों को जन्म दिया। ऐसे में उत्तराधिकार योंग हुई के बेटे किम को मिला।

किम जोंग उन युवावस्था में ही अपने पिता के पसंदीदा बन गए थे, जिसका मुख्य कारण उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धी स्वभाव था। उन्होंने कुछ समय के लिए स्विट्जरलैंड में विदेश में पढ़ाई भी की थी। इसलिए जब 2011 में किम जोंग-इल का निधन हुआ तो उस समय 27 साल के किम जोंग-उन ने सत्ता की बागडोर संभाल ली।

मां के नाम से दूरी की वजह
किम जोंग उन ने सत्ता संभालने के बाद दादा और पिता के जन्मदिन की तरह मांग के जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया है। वह अपनी मां पर कोई बात नहीं करते हैं।

एक्सपर्ट का कहना है कि अगर इस पर चर्चा होगी कि किम की मां जापान से कोरियाई मूल की थीं तो यह उनकी वैधता को हिला देगा। इसका उत्तर कोरियाई समाज पर बहुत असर होगा

वेनेजुएला भूकंप: 7.5 तीव्रता के झटकों से तबाही, 1,430 मौतों और हजारों के लापता होने की आशंका

कराकास
 वेनेजुएला में बीते दिनों आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप ने भयंकर तबाही मचाई है। यहां मरने वालों और घायलों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस हादसे में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,430 हो गई है, जबकि 3,200 से अधिक लोग घायल हैं और करीब 50,000 लोग अभी भी लापता हैं।

इस विनाशकारी भूकंप में सबसे अधिक ला गुआइरा राज्य प्रभावित हुआ है। यहां हर तरफ मलबे और सड़ते शवों की दुर्गंध फैली हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं के बाद पहले 72 घंटे जीवित लोगों को खोजने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। वह समय अब समाप्त हो चुका है। जीवित लोगों की खोज अब शवों की खोज में बदल गई है।

सेल्फी लेते नजर आएं अधिकारी
भूकंप के बीच सरकारी संवेदनहीनता की एक बेहद शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। एक तरफ जहां हजारों लोग मलबे के नीचे दबे हैं, लाशें सड़ रही हैं। वहीं दूसरी तरफ आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने आए सरकारी कर्मचारी और अधिकारी ध्वस्त इमारतों के सामने खड़े होकर ‘सेल्फी’ खींचते नजर आए।

राहत कार्यों में सरकार द्वारा ढिलाई के बीच हद तो तब हो गई जब सरकार ने सबसे ज्यादा प्रभावित ला गुआइरा क्षेत्र में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया और मलबे से अपनों की जान बचाने के लिए जुटे स्थानीय स्वयंसेवकों के लिए भी ‘सुरक्षित प्रवेश पास (परमिट)’ लेना अनिवार्य कर दिया। जिसको लेकर स्थानीय लोगों का गुस्सा भड़क उठा और कहा कि यहां अधिकारी मदद के लिए सेल्फी लेने के लिए आए थे।

सड़ते शवों क दुर्गंध
भीषण गर्मी में सड़ते शवों की दुर्गंध फैलने के कारण अधिकाधिक लोग मास्क पहने हुए हैं। जो लोग बच गए उनकी कहानियां एक मां को अपनी बेटी का शव कराकस के मुर्दाघर तक ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बुधवार को ला गुआइरा में उनके घर के मलबे के गिरने से उनकी बेटी और दामाद की मौत हो गई। उन्होंने एएफपी को बताया, “हमने उन्हें खुद बाहर निकाला। कोई मदद नहीं आई। शवों के तेजी से सड़ने के कारण दंपति का अंतिम संस्कार बिना किसी शोक सभा के किया जाएगा।

आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं?
वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के बाद जहां एक तरफ लोग अपनों को खोने के गम में डूबे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन की सुस्ती ने इस दर्द को गुस्से में बदल दिया है।

कैराबलेडा के समुद्रतटीय कस्बे में मलबे के बीच अपनों को तलाश रही माइलेडी रोमेरो ने कहा, “वहाँ कल रात से लाशों का ढेर लगा हुआ है। उन शवों में मासूम नवजात शिशु भी हैं।

कल रात 8 बजे तक वहां मलबे के नीचे लोग ज़िंदा थे, चिल्ला रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें बचाने की कोई जरूरत ही नहीं समझी। हमने अपने स्तर पर कई लाशें बाहर निकाली हैं, लेकिन उन्हें निकालने में भी अधिकारियों ने हमारी कोई मदद नहीं की। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं।”

हालांकि, अमेरिकासहित 21 देश राहत दल खोज अभियान में जुटे हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार इस आपदा से करीब 67 लाख लोग प्रभावित हुए हैं।

पीएम मोदी का सेशेल्स दौरा: 50वें राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत की अहम भागीदारी

नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन दिनी दौरे पर सेशेल्स पहुंच गए हैं. वे वहां 50 वें राष्ट्रीय दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में 29 जून को शामिल होंगे. बीते शनिवार को सेशेल्स की धरती पर उतरते ही वहां के राष्ट्रपति डॉ पैट्रिक हर्मिनी ने उनका स्वागत किया. पीएम मोदी की इस यात्रा के बहाने सेशेल्स और भारत के रिश्ते के बारे में जानेंगे. यह भी कि

आखिर यह छोटा सा द्वीपीय देश कैसे अफ्रीका का सबसे अमीर देश बन गया?
सेशेल्स एक छोटा द्वीपीय देश है. यह हिन्द महासागर में स्थित है. आबादी महज 1.35 लाख है. क्षेत्रफल लगभग 450 वर्ग किलो मीटर है. यह 115 द्वीपों का एक समूह है. जमीन बहुत कम है. फिर भी यह अफ्रीका का सबसे अमीर देश माना जाता है. हैलो सेफ प्रॉसपेरिटी इंडेक्स 2026 के मुताबिक सेशेल्स अफ्रीका के सबसे अमीर देशों की सूची में टॉप पर है. उसे 98.09 अंक मिले हैं. मॉरीशस और अल्जीरिया इस सूची में क्रमशः दूसरे एवं तीसरे नंबर पर हैं. एजेंसी ने रैंकिंग तय करने में केवल प्रति व्यक्ति आय को महत्व नहीं दिया है. कुल पांच मानकों के आधार पर रैंकिंग तय हुई है. इनमें खरीदने की शक्ति, प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, आय का समान वितरण और सापेक्ष गरीबी को आधार बनाया गया है. प्रति व्यक्ति आय 42110 अमेरिकी डॉलर है.

256 साल पुराना है भारत-सेशेल्स का रिश्ता
सेशेल्स छोटा देश भले ही है लेकिन भारत के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. यहां पहली स्थाई बस्ती साल 1770 में बसाई गई. उस पहली खेप में जो 27 नागरिक यहां पहुंचे, उनमें पांच भारतीय भी थे. बाद में तमिलनाडु, बिहार, गुजरात और देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पहुंचे. आज देश का हर आठवां व्यक्ति भारतवंशी मूल का है. 29 जून 1976 को सेशेल्स को ब्रिटेन से आजादी मिली और यह स्वतंत्र देश के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा. इस छोटे से द्वीपीय देश पर पहले फ्रांसीसी और फिर बाद में ब्रिटेन ने राज किया.

समृद्धि की आधारशिला है पर्यटन
पर्यटन सेशेल्स की मुख्य कमाई का स्रोत है. यहां के समुद्र, बीच और नेचर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. यहां लक्जरी रिसोर्ट बन गए हैं. विदेशी पर्यटक महंगा खर्च करते हैं. होटल, यात्रा, खाना और गतिविधियां सरकार को राजस्व देती हैं. निजी निवेशकों ने भी यहां पूंजी लगाई है. पर्यटन ने नौकरियां बढ़ाईं. स्थानीय सेवाओं और कारीगरों को फायदा हुआ. इस देश में हर साल 3.5 से 4 लाख तक विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं. मतलब देश की आबादी से कई गुना ज्यादा पर्यटक आते हैं. यहां सबसे ज्यादा पर्यटक यूरोप से आते हैं. फिर एशिया की बारी है. हाल के वर्षों में भारतीयों की ठीक-ठाक संख्या पहुँच रही है.

मत्स्य और समुद्री संसाधन से भी होती है कमाई
समुद्री मछली और समुद्री जीवन भी सेशेल्स की आमदनी का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है. पास के जल क्षेत्र में मछली प्रचुर मात्रा में मिलती है. मछली पालन और निर्यात से विदेशी मुद्रा आती है. समुद्री पर्यटन जैसे डाइविंग ने भी योगदान दिया. समुंद्री संरक्षण ने संसाधन को टिकाऊ बनाया. इस माध्यम से सेशेल्स हर साल 30 से 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कमाई साल भर में करता है. सेशेल्स के कुल घरेलू निर्यात में 90 फीसदी हिस्सा मछली का है.

निवेश और आर्थिक नीतियां
सरकार ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया. निवेशकों को सरल नियम और कर प्रोत्साहन दिए गए. बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेस को विकसित किया गया. कई विदेशी कंपनियों ने यहां शाखाएं खोलीं. छोटे व्यवसायों को समर्थन मिला. नवाचार और सेवा क्षेत्र पर ध्यान दिया गया. यूएई, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत ने भी यहां निवेश किया हुआ है. यह निवेश मूलतः पर्यटन, अक्षय ऊर्जा, रियल स्टेट, मछली पालन आदि क्षेत्रों में हुए हैं.

कैसी है वित्तीय और कर व्यवस्था?
सेशेल्स ने कर नीति में लचीलापन रखा. कुछ सेवाओं पर कर कम रखा गया. यह नीति निवेश को आकर्षित करती है. निजी बैंकिंग और निवेश सेवाएं मजबूत हुईं. सरकार ने सार्वजनिक खर्च में समझदारी दिखाई. वित्तीय प्रबंधन ने देश की आय स्थिर रखी. यहां आयकर, व्यावसायिक कर, और वैल्यू एडेड टैक्स लागू है. यह व्यवस्था देशी-विदेशी सब पर समान है.

विदेशी सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध
सेशेल्स ने वैश्विक साझेदारों से मदद ली. विकास परियोजनाओं में अनुदान और ऋण मिला. अंतरराष्ट्रीय संबंधों ने पर्यटन और व्यापार को बढ़ाया. राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय समझौते हुए. ये समझौते निवेश और सुरक्षा दोनों में मददगार रहे.सेशेल्स ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. साधारण शिक्षा तक अच्छी पहुंच हुई. स्वास्थ्य सेवाएं भी बेहतर हुईं. इनसे उत्पादकता बढ़ी. छोटी आबादी में कुशल मजदूरी का लाभ मिला. कौशल विकास ने सेवा क्षेत्र को मजबूत किया.

सेशेल्स ने प्रकृति को बचाने पर जोर दिया. नेचर और बायोडायवर्सिटी संरक्षण ने पर्यटन को स्थायी बनाया. समुद्री रिज़र्व बनाए गए. पर्यटन और संरक्षण में संतुलन रखा गया. यह नीतियां दीर्घकालिक आमदनी सुनिश्चित करती हैं.

चुनौतियां और सीमाएं भी कम नहीं
छोटा आकार और सीमित संसाधन सेशेल्स के सामने चुनौतियां हैं. जलवायु परिवर्तन से खतरे बनते हैं. आर्थिक निर्भरता पर्यटन पर जोखिम है. महंगाई और आय असमानता भी समस्याएं हैं. फिर भी सरकार ने योजनाएं बनाकर सुधार किए.

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के क्या हैं मायने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे ने जोर दिया कि सेशेल्स अफ्रीकी साझेदार है. दौरे ने द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ किया. यह दौरा आर्थिक सहयोग और निवेश पर सकारात्मक संकेत देता है. ऐसे दौरे से व्यापार और पर्यटन में और अवसर बन सकते हैं.

सरल शब्दों और संक्षेप में कहें तो सेशेल्स की समृद्धि कई कारणों का मेल है. पर्यटन इसका मुख्य स्तंभ है. समुद्री संसाधन, निवेश-अनुकूल नीतियां और अच्छा प्रशासन भी महत्वपूर्ण हैं. पर्यावरण संरक्षण और मानव विकास ने स्थिरता दी है. छोटी आबादी ने प्रति व्यक्ति आय बढ़ने में मदद की. प्रधानमंत्री मोदी के दौरे जैसे कदम दोस्ती और सहयोग बढ़ाते हैं. हालांकि, आगे की राह एकदम आसान नहीं है. आगे चुनौतियां बनी रहेंगी. पर अपनी सही नीतियों से सेशेल्स टिकाऊ समृद्धि बनाए रख सकता है.

    

 

AMCA पर इंजन संकट! अमेरिकी कंपनी ने बढ़ाए दाम, भारत के ड्रीम फाइटर प्रोजेक्ट पर असर

 नई दिल्ली
 भारत अपना खुद का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान (AMCA) बनाने के सपने पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन इस बीच देश के सामने एक पुरानी और बड़ी चुनौती फिर से खड़ी हो गई है और वह है, लड़ाकू विमान का इंजन बनाना।

इस बात को ऐसे समझिए कि भारत ने फाइटर जेट का ढांचा, रडार और हथियार तो खुद बना लिए हैं, लेकिन विमान का सबसे जरूरी हिस्सा यानी ‘इंजन’ के लिए हम आज भी विदेशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अब अमेरिकी कंपनी द्वारा अचानक दाम बढ़ा दिए जाने से भारत के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

अब सवाल अमेरिकी कंपनी की जरूरत क्यों?
लड़ाकू विमान के इंजन की कीमतों में भारी उछाल के बाद यह सवाल दोबारा खड़ा हो गया है कि आखिर भारत को इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी बैसाखी की जरूरत क्यों पड़ रही है? अच्छा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिकी कंपनी द्वारा बनाए गए इंजन की जरूरत केवल

भारत को है या फिर अन्य देशों को भी?
इस बात का जवाब है कि नहीं, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि तुर्किए, दक्षिण कोरिया और स्वीडन जैसे देश भी अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए पूरी तरह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि भारत अपने लड़ाकू विमान के इंजन की बनावट को लेकर क्या कदम उठाने वाला है?

पहले समझिए क्या है पूरा विवाद
बता दें कि भारत के फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से F414 इंजन खरीदने की बातचीत चल रही थी। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बातचीत अब खटाई में पड़ती दिख रही है।

इसका कारण है कि DRDO के सूत्रों के मुताबिक, जिस F414 इंजन की कीमत पहले प्रति यूनिट 70 से 80 करोड़ रुपये तय की जा रही थी, अमेरिकी कंपनी GE ने अब उसके दाम करीब तीन गुना बढ़ाकर बताए हैं।

दाम बढ़ने के बाद बजट मुख्य चुनौती
अमेरिकी कंपनी की तरफ से दाम तीन गुणा बढ़ाने के दावों के बाद समझौता अब अधर में पड़ता दिख रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत सरकार ने इस विमान के शुरुआती 5 मॉडल बनाने के लिए 15000 करोड़ रुपये का बजट रखा है। ऐसे में इंजन महंगा होने से यह पूरा बजट गड़बड़ा सकता है।

अब समझिए भारत के सामने क्या है मजबूरी?
दाम बढ़ाने के बाद अब डिजाइन को लेकर सबसे बड़ी समस्या भारत के सामने खड़ी हो रही है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत की वैमानिकी विकास एजेंसी (ADA) ने AMCA लड़ाकू विमान का पूरा ढांचा इसी अमेरिकी F414 इंजन के हिसाब से डिजाइन किया है। इस मोड़ पर आकर इंजन बदलना बिल्कुल भी आसान नहीं है।

दूसरी ओर प्रोजेक्ट में देरी की संभावना भी चिंता का विषय बन सकता है। कारण है कि भारत को शुरुआती टेस्टिंग के लिए 15 इंजनों की जरूरत है। अगर बातचीत में देरी हुई, तो विमान के आने का समय और आगे खिसक सकता है। हालांकि वैसे उम्मीद है कि यह विमान 2034 या 2035 तक भारतीय वायुसेना में शामिल हो पाएगा।

इसका असर तेजस विमानों पर भी होगा?
तो इस सवाल का जवाब है, हां शायद। रिपोर्ट की माने तो इंजनों के दाम बढ़ाने का असर सिर्फ लड़ाकू विमान AMCA ही नहीं, भारत का नया तेजस Mk2 विमान भी इसी इंजन पर चलने वाला है। वहीं, पुराने तेजस Mk1A के लिए भी अमेरिका से इंजनों की सप्लाई में देरी हो रही है, जिससे वायुसेना को विमान मिलने में लेट हो रहा है।

सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के ये बड़े देश भी हैं मजबूर
अच्छा सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इंजन के मामले में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और ताकतवर देश भी अमेरिका के भरोसे हैं। इस बात ऐसे समझिए कि तुर्किए का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान ‘KAAN’ भी शुरुआत में अमेरिकी GE F110 इंजन से ही उड़ेगा, क्योंकि उनका खुद का इंजन बनने में अभी कई साल लगेंगे।

दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का नया ‘KF-21’ लड़ाकू विमान भी अमेरिकी F414 इंजन की मदद से ही उड़ रहा है। स्वीडन का मशहूर ‘ग्रिपेन’ (Gripen E) विमान भी अमेरिकी इंजन पर निर्भर है। इसका नुकसान यह है कि स्वीडन अपनी मर्जी से इसे किसी दूसरे देश को बेच नहीं सकता, क्योंकि इसके लिए अमेरिका की मंजूरी (ITAR नियम) जरूरी होती है।

अब सवाल- आखिर लड़ाकू विमान का इंजन बनाना इतना मुश्किल क्यों?
गौरतलब है कि फाइटर जेट का इंजन बनाना दुनिया की सबसे जटिल और कठिन तकनीकों में से एक है। इन इंजनों को बहुत कम वजन और कम ईंधन में आसमान चीरने वाली ताकत पैदा करनी होती है। कारण है कि इंजन के अंदर का तापमान इतना ज्यादा होता है कि आम धातुएं तुरंत पिघल जाएं। इसके लिए खास ‘सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड्स’ और अत्याधुनिक धातुओं की जरूरत होती है।

ऐसे में फिलहाल दुनिया के सिर्फ 5 देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास ही स्वतंत्र रूप से फाइटर जेट इंजन बनाने की तकनीक है। हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि भारत ने सालों पहले खुद का ‘कावेरी इंजन’ बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह लड़ाकू विमान को उड़ाने लायक ताकत नहीं दे पाया। अब उस इंजन के बदले हुए रूप का इस्तेमाल भारत के ‘घातक’ ड्रोन में किया जाएगा।

सेशेल्स में पीएम मोदी को मिला सर्वोच्च सम्मान: ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’

विक्टोरिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में नेतृत्व के लिए सेशेल्स की ओर से देश का सर्वोच्च सम्मान ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ प्रदान किया गया है। रविवार को राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने उन्हें ये सम्मान दिया। ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ सम्मान प्रधानमंत्री मोदी की लंबे समय से जारी उस नीति और दृष्टिकोण को मान्यता देता है, जिसमें सतत विकास, हरित विकास और पर्यावरण-अनुकूल नीतियों पर जोर दिया गया है।

पीएम मोदी के ‘ग्रीन विजन’ को मान्यता
यह उपाधि उन कई वैश्विक मान्यताओं में नवीनतम है, जो प्रधानमंत्री मोदी को जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए मिल चुकी हैं। पिछले महीने मई 2026 में, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने उन्हें कृषि क्षेत्र को मजबूत करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और सतत कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए एग्रीकोला मेडल प्रदान किया था।

सेशेल्स द्वारा दिया गया यह सम्मान प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक पर्यावरणीय नेतृत्व और “ग्रीन विज़न” को और अधिक मजबूत मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। भारत के पीएम तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर शनिवार को सेशेल्स पहुंचे। जहां राष्ट्रपति हर्मिनी ने उनका औपचारिक स्वागत किया।

सेशेल्स के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता
रविवार को स्टेट हाउस में प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

नेशनल एसेंबली को संबोधित कर रचेंगे इतिहास
पीएम मोदी भारतीय समुदाय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भी शामिल होंगे और सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करेंगे। जिसके साथ ही वे दुनिया के पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री बन जाएंगे जिन्होंने 20 देशों की संसद या नेशनल असेंबली को संबोधित किया है।

सेशेल्स रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने खुद इसकी जानकारी दी थी। एक्स पर उन्होंने लिखा, “मुझे सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बनने का सम्मान प्राप्त होगा। यह ऐतिहासिक अवसर उन सशक्त लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं का प्रतीक है, जो हमारे दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं

म्यांमार बना दुनिया का सबसे बड़ा अवैध अफीम उत्पादक, NCB रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

नई दिल्ली
 भारत का पड़ोसी देश म्यांमार अब गैर कानूनी अफीम के उत्पादन के मामले में अफगानिस्तान को पीछे छोड़ दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद आर्थिक संकट और गृहयुद्ध जैसी स्थिति के कारण म्यांमार में अफीम का उत्पादन पिछले 10 वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। यह जानकारी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की शुक्रवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट में दी गई।

एनसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार का शान राज्य अवैध अफीम की खेती का सबसे ब़ड़ा केंद्र बन गया है। NCB ने चेतावनी दी है कि ‘म्यांमार से अफीम की तस्करी का नया रास्ता सीधे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से होकर गुजरता है, जिससे भारत की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा होता है। यह रास्ता आतंकवाद को फंडिंग और हथियारों की तस्करी से भी जुड़ा है।

खुली सीमा बनी समस्या
    रिपोर्ट में कहा गया है कि खुली सीमा और ‘फ्री मूवमेंट रिजीम’ (आवाजाही की खुली व्यवस्था) तस्करी को आसान बनाते हैं, जिससे न केवल स्थानीय स्तर पर नशे की लत बढ़ती है, बल्कि विद्रोही समूहों को फंडिंग मिलती है।

अफगानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान कॉरिडोर सबसे बड़ा तस्करी मार्ग
    NCB के मुताबिक, अफगानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान कॉरिडोर अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा अफीम तस्करी मार्ग बना हुआ है, लेकिन भारत को सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय तस्करी मार्गों से रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।
    रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि कोकीन की तस्करी वाले देशों में तस्करी से जुड़ी हिंसा में बढ़ोतरी यह दिखाती है कि ड्रग मार्केट में प्रतिस्पर्धा कैसे सुरक्षा का एक बड़ा संकट पैदा कर सकती है। इसमें आगे कहा गया है कि भारत के समुद्री पड़ोस पर करीबी नज़र रखने की जरूरत है।

दुनियाभर में बढ़ रही नशे का लत
NCB ने पाया है कि डार्कनेट मार्केट, सिंथेटिक ड्रग्स और इंटरनेशनल पोस्टल सिस्टम के आपस में जुड़ने से दुनिया भर की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। दुनिया भर में ड्रग्स के इस्तेमाल पर रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2023 में दुनिया भर में लगभग 31.6 करोड़ लोगों (15 से 64 वर्ष आयु वर्ग) ने कम से कम एक बार किसी नशीले पदार्थ का सेवन किया। वर्ष 2013 में यह संख्या 24.6 करोड़ थी। यानी पिछले एक दशक में वैश्विक ड्रग्स उपयोग में लगभग 29 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

सिंथेटिक ड्रग्स सबसे बड़ा खतरा
रिपोर्ट में निटाजेन्स नामक सिंथेटिक ओपिओइड को उभरता हुआ वैश्विक खतरा बताया गया है। यह ड्रग हेरोइन से लगभग 500 गुना अधिक शक्तिशाली है। इसके अलावा एक साथ कई तरह के नशीले पदार्थों का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे मौत और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम की आशंका बढ़ गई है। एनसीबी ने कहा है कि इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

ड्रग्स से बढ़ रही हिंसा
NCB ने चेतावनी दी है कि ड्रग्स तस्करी केवल नशे तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इससे हिंसा और संगठित अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, इक्वाडोर में कोकीन तस्करी को लेकर गैंगवार के कारण वर्ष 2020 से 2023 के बीच हत्या की दर लगभग छह गुना बढ़ गई।
मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए हो रही ड्रग्स की सप्लाई
NCB के अनुसार, टेलीग्राम, व्हाट्सएप और सिग्नल जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म भारत समेत दुनिया भर में ड्रग्स की सप्लाई के लिए अहम माध्यम बनकर उभरे हैं। इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने नई तकनीकी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

 

बिजली बिल पर लेट पेमेंट सरचार्ज की नई व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए राहत -पावर कंपनी

रायपुर

 छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी ने इस संबंध में तथ्यात्मक स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि राज्य विद्युत नियामक आयोग (सीएसईआरसी) द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था वास्तव में उपभोक्ताओं को अतिरिक्त आर्थिक बोझ से राहत देने के लिए तैयार की गई है। छत्तीसगढ़ के बिजली उपभोक्ताओं के लिए लेट पेमेंट सरचार्ज (विलंब अधिभार) को लेकर सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में चल रही दोहरा झटका या रोज़ाना ब्याज जैसी खबरें पूरी तरह भ्रामक और गलत हैं।

क्या थी पुरानी व्यवस्था और क्यों था नुकसान?
    
पावर कंपनी के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, पुरानी व्यवस्था में यदि कोई उपभोक्ता नियत तिथि के बाद महज एक या दो दिन की देरी से भी बिजली बिल का भुगतान करता था, तो उससे पूरे महीने का 1.5 प्रतिशत सरचार्ज वसूल लिया जाता था। यह व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए नुकसानदेह थी।

नई व्यवस्था से ऐसे होगा उपभोक्ताओं का फायदा
        
संशोधित नियमों के बाद अब लेट फीस की गणना पूरी तरह पारदर्शी और उपभोक्ता-हितैषी कर दी गई है। अब विलंब अधिभार 0.04 प्रतिशत प्रतिदिन की दर से लिया जाएगा। इसका मतलब है कि उपभोक्ता जितने दिन बिल पटाने में देरी करेगा, उसे केवल उतने ही दिनों का शुल्क देना होगा।

एक दिन की देरी पर मामूली शुल्क
       
यदि किसी कारणवश उपभेक्ता बिल के भुगतान में केवल एक दिन का विलंब होता है, तो अब पूरे महीने का सरचार्ज नहीं, बल्कि मात्र 0.04 प्रतिशत अधिभार ही देय होगा।

महीने भर की देरी पर भी कम ब्याज 
      

यदि कोई उपभोक्ता पूरे 30 दिन का भी विलंब करता है, तब भी कुल अधिभार केवल 1.2 प्रतिशत (0.04 प्रतिशत × 30 दिन) ही बनेगा, जो कि पुरानी व्यवस्था के 1.5 प्रतिशत से काफी कम है।

भ्रामक खबरों से दूर रहने की अपील
      

पावर कंपनी ने साफ किया है कि नई व्यवस्था में अधिभार की दरें कम हुई हैं, बढ़ी नहीं हैं। इसे रोजाना ब्याज लगने या झटके के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से गलत है। कंपनी ने सभी समाचार माध्यमों और आमजन से अनुरोध किया है कि वे इस सही और स्पष्ट जानकारी को ही साझा करें ताकि उपभोक्ताओं के बीच फैला अनावश्यक भ्रम दूर हो सके।

तिलहन उत्पादन बढ़ाने की दिशा में सशक्त पहल, कोटमीकला के किसानों को मिला उन्नत मूंगफली बीज

रायपुर

 किसानों की आय बढ़ाने, तिलहनी फसलों के उत्पादन में वृद्धि करने और देश को खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार एवं कृषि विभाग द्वारा लगातार प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में जीपीएम जिले के पेंड्रा विकासखंड के ग्राम कोटमीकला में भारत सरकार की राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (एनएमईओ) योजना के अंतर्गत चयनित किसानों को उन्नत किस्म के मूंगफली बीज वितरित किए गए। यह पहल किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने तथा कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी।

मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार कृषि क्षेत्र को अधिक सशक्त, आधुनिक और लाभकारी बनाने के लिए अनेक योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन कर रही है। कृषि विभाग किसानों तक उन्नत बीज, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सलाह और शासकीय योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाकर खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में लगातार कार्य कर रहा है। राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन के माध्यम से तिलहनी फसलों के रकबे और उत्पादकता में वृद्धि कर किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है।

ग्राम कोटमीकला में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी अमित कुमार तंवर, कृषि विकास अधिकारी मधुसूदन, क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी तथा ग्राम पंचायत के सरपंच भंवर सिंह अर्मो की उपस्थिति में योजना के अंतर्गत 10 हेक्टेयर प्रदर्शन रकबे के लिए चयनित 25 किसानों को उन्नत गुणवत्ता के मूंगफली बीज वितरित किए गए। अधिकारियों ने किसानों को बताया कि प्रमाणित एवं उन्नत बीजों के उपयोग से उत्पादन बढ़ने के साथ फसल की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार होता है।

कार्यक्रम के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बीज उपचार, समय पर बुआई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, कीट एवं रोग प्रबंधन, जल संरक्षण तथा फसल की वैज्ञानिक देखभाल जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से जानकारी दी। किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने, मृदा परीक्षण के आधार पर खेती करने तथा विभागीय सलाह का पालन करने के लिए भी प्रेरित किया गया, जिससे उत्पादन लागत कम हो और अधिक लाभ प्राप्त हो सके।
कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन के माध्यम से किसानों को केवल बीज उपलब्ध कराना ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक खेती की नवीनतम तकनीकों से जोड़कर तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाना और खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत करना भी प्राथमिकता है। प्रदर्शन आधारित खेती से अन्य किसान भी प्रेरित होंगे और क्षेत्र में मूंगफली सहित तिलहनी फसलों का रकबा बढ़ेगा।

कार्यक्रम में किसानों ने शासन की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि गुणवत्तायुक्त बीज और तकनीकी मार्गदर्शन मिलने से खेती अधिक लाभकारी बनेगी। कृषि विभाग ने सभी किसानों से शासन की कृषि हितैषी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ लेने, उन्नत तकनीकों को अपनाने तथा तिलहनी फसलों के उत्पादन में वृद्धि कर अपनी आय बढ़ाने का आह्वान किया। राज्य सरकार और कृषि विभाग की ऐसी पहलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के साथ-साथ किसानों के जीवन में समृद्धि का नया अध्याय लिख रही है।

पक्के घर ने बदली जिंदगी : पीएम जनमन आवास योजना से कृष्णा बैगा के सपनों को मिला अपना आशियाना

रायपुर

किसी भी परिवार के लिए अपना सुरक्षित और पक्का घर केवल चार दीवारों का निर्माण नहीं होता, बल्कि वह सम्मान, सुरक्षा और बेहतर भविष्य का आधार होता है। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के ग्राम पंचायत पंडरीपानी के निवासी  कृष्णा बैगा के जीवन में भी ऐसा ही सुखद परिवर्तन आया है। वर्षों तक कच्चे मकान में कठिन परिस्थितियों का सामना करने वाले कृष्णा बैगा का पक्के घर का सपना अब साकार हो चुका है। प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के अंतर्गत उन्हें पक्का आवास मिलने से उनके परिवार के जीवन में खुशियों का नया सवेरा आया है।

 कृष्णा बैगा लंबे समय तक अपने परिवार के साथ कच्चे मकान में रहने को विवश थे। बरसात आते ही घर की दीवारों में सीलन भर जाती थी, छत से पानी टपकने लगता था और घर में सांप-बिच्छुओं के प्रवेश का खतरा बना रहता था। ऐसे हालात में परिवार की सुरक्षा और बच्चों के भविष्य को लेकर वे हमेशा चिंतित रहते थे। सीमित संसाधनों के कारण स्वयं पक्का घर बनाना उनके लिए संभव नहीं था।

मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जब उनके गांव तक पहुंचा, तब उनके जीवन में परिवर्तन की नई शुरुआत हुई। प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के तहत उनका आवास स्वीकृत हुआ और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मार्गदर्शन तथा सतत निगरानी में उनका पक्का घर तैयार हो गया। आज उनका परिवार एक सुरक्षित, स्वच्छ, मजबूत और सम्मानजनक आवास में जीवन व्यतीत कर रहा है।
 कृष्णा बैगा बताते हैं कि अब बरसात का मौसम उनके लिए चिंता का कारण नहीं रहा। न छत से पानी टपकने की परेशानी है और न ही दीवारों में सीलन की समस्या। सबसे बड़ी राहत यह है कि अब परिवार को सांप-बिच्छुओं और अन्य खतरों का भय नहीं सताता। पक्का घर मिलने से उनके परिवार के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार आया है और उनमें भविष्य के प्रति नया आत्मविश्वास जागा है।

उन्होंने मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पक्का घर मिलने से हमारे परिवार का जीवन पूरी तरह बदल गया है। अब हम बिना किसी डर और परेशानी के अपने घर में सुकून और सम्मान के साथ रह रहे हैं। इसके लिए मैं मुख्यमंत्री जी और सरकार का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।

राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार के सहयोग से संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) तथा विशेष रूप से प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के माध्यम से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों सहित पात्र ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने का कार्य निरंतर किया जा रहा है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जिला प्रशासन, जनपद पंचायतों तथा ग्राम पंचायतों के समन्वित प्रयासों से योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जा रहा है।

साय सरकार का लक्ष्य केवल आवास उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों को सम्मानजनक जीवन, सामाजिक सुरक्षा और बेहतर जीवन गुणवत्ता प्रदान करना है। इसी उद्देश्य से योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, समयबद्ध निर्माण, पारदर्शिता और सतत निगरानी पर विशेष बल दिया जा रहा है, ताकि प्रत्येक पात्र परिवार अपने पक्के घर का सपना साकार कर सके।

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मार्गदर्शन में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) एवं प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के अंतर्गत पात्र हितग्राहियों को तेजी से लाभान्वित किया जा रहा है। इन योजनाओं ने हजारों ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हुए उन्हें सुरक्षित आवास, सम्मान और बेहतर भविष्य का विश्वास दिया है।

कृष्णा बैगा की कहानी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि जब जनकल्याणकारी योजनाएं प्रभावी ढंग से धरातल पर पहुंचती हैं, तो वे केवल घर नहीं बनातीं, बल्कि लोगों के जीवन में सुरक्षा, सम्मान, आत्मविश्वास और नई उम्मीदों की मजबूत नींव भी रखती हैं।

 

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