Aadhaar Update: 1 जुलाई से ईमेल आईडी अपडेट करना होगा मुफ्त, UIDAI ने खत्म की ₹75 फीस

 ग्वालियर
 यदि आपके आधार कार्ड में अभी तक ईमेल आईडी अपडेट नहीं है या आप उसे बदलना चाहते हैं, तो आपके लिए एक बेहद अच्छी और राहत भरी खबर है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानि यूआईडीएआई ने एक नया नोटिफिकेशन जारी करते हुए आधार कार्ड के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। इस नए नियम के तहत अब आधार कार्ड पर ईमेल आईडी अपडेट कराने के लिए नागरिकों को कोई शुल्क नहीं देना होगा, यह सेवा पूरी तरह से मुफ्त कर दी गई है।

यह नया नियम आगामी एक जुलाई से पूरे देश के साथ-साथ ग्वालियर-चंबल अंचल में भी लागू होने जा रहा है। सरकार के इस कदम से उन करोड़ों लोगों को सीधा फायदा मिलेगा जो अपने आधार को डिजिटल रूप से अधिक सुरक्षित और अपडेटेड रखना चाहते हैं। मुफ्त में ईमेल अपडेट छह महीने तक कर सकते हैं।

छह महीने के लिए खुली है मुफ्त सुविधा की खिड़की
यूआईडीएआई द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, आम जनता को सहूलियत देने के लिए प्रशासन ने छह महीने की एक विशेष समय-सीमा तय की है। इसके अंतर्गत, नागरिक जुलाई से लेकर दिसंबर तक कभी भी अपनी ईमेल आईडी को आधार कार्ड में बिल्कुल मुफ्त में अपडेट करवा सकते हैं। आपको बता दें कि इस नए नियम के लागू होने से पहले तक, आधार कार्ड में ईमेल आईडी जुड़वाने या उसमें किसी भी तरह का संशोधन कराने के लिए उपभोक्ताओं को 75 रुपये का निर्धारित शुल्क देना पड़ता था, जिसे अब पूरी तरह से हटा लिया गया है।

ईमेल आईडी अपडेट होना क्यों है जरूरी
    सुरक्षित ओटीपी:
कई बार मोबाइल नेटवर्क न होने या सिम बंद होने की स्थिति में आधार से जुड़े जरूरी काम रुक जाते हैं। ईमेल आईडी अपडेट होने पर आधार वेरिफिकेशन का ओटीपी आपकी मेल पर भी आ जाता है।

    फर्जीवाड़े पर रोक: यदि कोई आपके आधार कार्ड का गलत इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो तुरंत आपके रजिस्टर्ड ईमेल पर अलर्ट आ जाता है, जिससे आप होने वाले फ्राड से बच सकते हैं।

    ऑनलाइन सेवाएं: कई सरकारी और बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठाने के लिए डिजिटल वेरिफिकेशन में ईमेल आईडी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

 

BJP के 7 लाख कार्यकर्ताओं की होगी ऑनलाइन परीक्षा, ऐप पर सवालों के जवाब देने पर मिलेगा डिजिटल सर्टिफिकेट

भोपाल
 भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) आज देशभर में बूथ और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए बड़े स्तर पर डिजिटल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगी। इस दौरान करीब 7 लाख कार्यकर्ताओं की ऑनलाइन परीक्षा संगठन ऐप के माध्यम से कराई जाएगी। पार्टी के अनुसार, 65 हजार से अधिक बूथ समितियों के कार्यकर्ता और मंडल स्तर के मोर्चा पदाधिकारी इस डिजिटल लर्निंग कार्यक्रम में शामिल होंगे। प्रशिक्षण का उद्देश्य संगठन को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना और कार्यकर्ताओं को पार्टी की विचारधारा एवं योजनाओं की बेहतर जानकारी देना है।

संगठन ऐप के जरिए होगा प्रशिक्षण
डिजिटल लर्निंग प्रोग्राम के तहत कार्यकर्ताओं को पार्टी की विचारधारा, संगठन का सफर, नेतृत्व और केंद्र की मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं से जुड़े विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद संगठन ऐप पर ऑनलाइन परीक्षा आयोजित होगी।

संगठन एप के जरिए मिलेगी ट्रेनिंग
बीजेपी की 65 हजार से ज्यादा बूथ समितियों में शामिल कार्यकर्ताओं और मंडल स्तर के 6 मोर्चों की कार्यकारिणी में शामिल पदाधिकारियों को संगठन एप के जरिए डिजिटल लर्निंग यानी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस प्रशिक्षण में चार पाठ्यक्रम संगठन एप पर दिए जाएंगे।

इनमें बीजेपी की विचारधारा, पार्टी का सफर, नेतृत्व, मोदी सरकार की विकास योजनाएं जैसे चार पाठ्यक्रम शामिल होंगे।

कार्यकर्ता अपने मोबाइल पर हर पाठ्यक्रम के वीडियो देखकर उस पाठ्यक्रम से संबंधित शब्दावली के उत्तर ऑनलाइन दर्ज करेंगे। चारों पाठ्यक्रमों के सवाल-जवाब पूरे होने के बाद उनके मोबाइल पर प्रशिक्षित होने का सर्टिफिकेट जनरेट होगा।

इस प्रशिक्षण को लेकर सभी जिला अध्यक्षों को कार्ययोजना भेज दी गई है। यह महाअभियान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि 23 जून से शुरू होकर उनकी जयंती 6 जुलाई 2026 तक पूरे 14 दिनों तक चलेगा।

बीजेपी क्यों और कैसे कराने जा रही है यह कोर्स?
बीजेपी इस बड़े अभियान को पूरी तरह अचूक बनाने के लिए इसे अपने नियमित कार्यक्रमों से जोड़ रही है। रणनीति के अनुसार, बूथ अध्यक्ष और ‘मन की बात’ प्रभारी यह सुनिश्चित करेंगे कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम के तुरंत बाद बूथ समिति के सभी सदस्यों को मौके पर ही संगठन ऐप खुलवाकर डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म का प्रशिक्षण पूरा कराया जाए और सर्टिफिकेट डाउनलोड करवाया जाए ।

तीन सदस्यों की टीम भी बनाई
इसके साथ ही, शक्ति केंद्र प्रभारियों और मंडल कार्यकारिणी को सभी बूथों पर प्रवास (दौरा) करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि वे हर कार्यकर्ता के स्मार्टफोन में इस प्लेटफॉर्म की जानकारी और ट्रेनिंग सुनिश्चित कर सकें । बीजेपी यह कदम इसलिए उठा रही है ताकि उसका पूरा कैडर ‘कागज-रहित’ और ‘हाई-टेक’ हो सके। इस पूरी व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए जिलों में (1+2 सदस्यों की) विशेष डिजिटल प्रशिक्षण टीमें बनाई गई हैं, जिनकी कमान प्रदेश स्तर पर संयोजक शैलेन्द्र बरूआ (प्रदेश उपाध्यक्ष) और सदस्यों के रूप में राजेन्द्र सिंह, सुयश त्यागी संभाल रहे हैं।

6 जुलाई तक पूरा होगा अभियान
बीजेपी ने इस डिजिटल प्रशिक्षण अभियान को 6 जुलाई तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। पार्टी पहले ही जिला और मंडल स्तर पर प्रशिक्षण वर्ग आयोजित कर चुकी है। अब अंतिम चरण में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कार्यकर्ताओं का मूल्यांकन किया जा रहा है। पार्टी का मानना है कि डिजिटल प्रशिक्षण से संगठन की कार्यशैली अधिक प्रभावी होगी और कार्यकर्ताओं को सरकार की योजनाओं व संगठनात्मक गतिविधियों की बेहतर समझ विकसित करने में मदद मिलेगी।

 

सऊदी अरब के रियल एस्टेट में बढ़ा भारतीय निवेशकों का भरोसा, तेजी से बढ़ रही प्रॉपर्टी खरीदारी

दुबई 

खाड़ी देशों के रियल एस्टेट बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सऊदी अरब ने पहली बार विदेशी नागरिकों और विदेशी कंपनियों के लिए अपने प्रॉपर्टी बाजार के दरवाजे खोल दिए हैं। नए विदेशी रियल एस्टेट स्वामित्व कानून के लागू होने के साथ ही सरकार ने पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ पोर्टल भी शुरू कर दिया है। इस फैसले को सऊदी अरब के आर्थिक परिवर्तन कार्यक्रम ‘विजन 2030’ का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य विदेशी निवेश बढ़ाना, वैश्विक पूंजी आकर्षित करना और देश को अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश का प्रमुख केंद्र बनाना है।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के असर से दुबई का रियल एस्टेट बाजार दबाव में दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब का नया कानून भारतीय प्रवासियों, एनआरआई निवेशकों और वैश्विक खरीदारों के लिए एक नए विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है।
दशकों बाद विदेशियों को मिला प्रॉपर्टी का मालिक बनने का अधिकार

सऊदी अरब (Saudi Arabia Property News) में लंबे समय से लाखों विदेशी नागरिक काम करते रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल किराए के मकानों में रहने की अनुमति थी। अब पहली बार विदेशी नागरिकों को कानूनी रूप से आवासीय और निर्धारित श्रेणी की व्यावसायिक संपत्तियों का स्वामित्व प्राप्त करने का अवसर दिया गया है।

भारतीय समुदाय सऊदी अरब में सबसे बड़े प्रवासी समुदायों में शामिल है। ऐसे में इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ भारतीय पेशेवरों, कारोबारियों और लंबे समय से वहां रह रहे परिवारों को मिलने की संभावना जताई जा रही है। अब वे केवल किराएदार नहीं बल्कि निर्धारित नियमों के तहत संपत्ति के मालिक भी बन सकेंगे।
दुबई बाजार की सुस्ती के बीच सऊदी बना नया विकल्प

पिछले कुछ समय से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर दुबई के रियल एस्टेट बाजार पर भी देखने को मिला है। विशेषज्ञों के अनुसार निवेशकों की सतर्कता बढ़ने से वहां संपत्तियों की खरीद-बिक्री की गति कुछ धीमी हुई है। इसी बीच सऊदी अरब ने विदेशी निवेशकों के लिए अपने बाजार को खोलकर क्षेत्रीय निवेश के समीकरण बदल दिए हैं।

हालांकि एक्सपर्ट व्यू से दुबई की तुलना में सऊदी का रियल एस्टेट बाजार अभी शुरुआती चरण में है। यहां भविष्य की संभावनाएं मजबूत हैं, लेकिन रीसेल मार्केट और लिक्विडिटी को परिपक्व होने में अभी समय लग सकता है। इसके बावजूद विजन 2030 के तहत हो रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इस बाजार को तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं।
‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ पोर्टल से पूरी प्रक्रिया होगी ऑनलाइन

रियल एस्टेट जनरल अथॉरिटी (REGA) ने विदेशी रियल एस्टेट स्वामित्व कानून के साथ ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ नाम का डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य आवेदन प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और पूरी तरह ऑनलाइन बनाना है। विदेशी खरीदारों को अब विभिन्न सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। आवेदन, सत्यापन और पात्रता की अधिकांश प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से पूरी की जाएगी, जिससे निवेश प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाएगी।
किन लोगों को मिलेगा संपत्ति खरीदने का अधिकार

नई नीति के तहत सऊदी अरब में वैध रूप से रह रहे विदेशी निवासी अपने रेजिडेंसी नंबर यानी इकामा के आधार पर सीधे आवेदन कर सकेंगे। पोर्टल पर उनकी पात्रता का डिजिटल सत्यापन किया जाएगा। सऊदी अरब से बाहर रहने वाले विदेशी नागरिक भी निवेश कर सकेंगे, लेकिन उन्हें अपने देश में स्थित सऊदी दूतावास या वाणिज्य दूतावास से डिजिटल पहचान प्राप्त करनी होगी। इसके बाद वे ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। विदेशी कंपनियों को भी पहली बार सऊदी अरब में सीधे प्रॉपर्टी खरीदने की अनुमति दी गई है। इसके लिए उन्हें निवेश मंत्रालय (MISA) के ‘इन्वेस्ट सऊदी’ प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कर राष्ट्रीय एकीकृत नंबर प्राप्त करना होगा।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों अहम है यह फैसला

भारतीय निवेशकों के लिए यह निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सऊदी अरब में पहले से बड़ी भारतीय आबादी मौजूद है, जिससे किराए की मांग और आवासीय जरूरतें लगातार बनी रहती हैं। इसके अलावा देश में तेजी से विकसित हो रहे स्मार्ट शहर, औद्योगिक कॉरिडोर और पर्यटन परियोजनाएं भविष्य में प्रॉपर्टी की मांग को और बढ़ा सकती हैं।

    रियल एस्टेट एक्स्पर्ट्स की माने तो लंबे समय के निवेश की सोच रखने वाले भारतीय निवेशकों के लिए यह बाजार बेहतर अवसर प्रदान कर सकता है। हालांकि निवेश से पहले स्थानीय कानून, कर व्यवस्था, स्वामित्व नियम और रीसेल शर्तों का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक होगा।

    सऊदी अरब ने जिन क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला है, उनमें दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें रेड सी प्रोजेक्ट, दिरियाह, अलउला और भविष्य का स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट नियोम (NEOM) प्रमुख हैं। सरकार इन क्षेत्रों को पर्यटन, व्यापार, तकनीक और वैश्विक निवेश का केंद्र बनाने की दिशा में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है।

    इन परियोजनाओं के विकसित होने के साथ आवासीय, व्यावसायिक और होटल सेक्टर में भी बड़े निवेश की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

मक्का और मदीना के लिए अलग नियम

हालांकि नई नीति के साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रतिबंध भी लागू किए गए हैं। धार्मिक महत्व को देखते हुए मक्का और मदीना में संपत्ति स्वामित्व के नियम अलग रखे गए हैं। इन दोनों पवित्र शहरों में संपत्ति खरीदने का अधिकार सीमित श्रेणी के पात्र व्यक्तियों और सऊदी कंपनियों तक ही रखा गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों की विशेष पहचान को सुरक्षित बनाए रखना है।

सऊदी अरब के इस फैसले के प्रमुख फायदे

    विदेशी नागरिकों को पहली बार कानूनी रूप से प्रॉपर्टी खरीदने का अवसर।
    भारतीय प्रवासियों और एनआरआई निवेशकों के लिए नया निवेश विकल्प।
    पूरी आवेदन प्रक्रिया डिजिटल और पारदर्शी बनाई गई।
    विजन 2030 के तहत विकसित हो रहे मेगा प्रोजेक्ट्स में निवेश की संभावना।
    विदेशी कंपनियों को भी रियल एस्टेट बाजार में प्रवेश की अनुमति।
    वैश्विक निवेश आकर्षित करने और अर्थव्यवस्था को विविध बनाने की दिशा में बड़ा कदम।

किन बातों का रखना होगा ध्यान

    निवेश से पहले स्थानीय संपत्ति कानूनों का अध्ययन आवश्यक होगा।
    शुरुआती वर्षों में बाजार की लिक्विडिटी दुबई जितनी मजबूत नहीं हो सकती।
    मक्का और मदीना में स्वामित्व संबंधी विशेष नियम लागू रहेंगे।
    निवेश करने से पहले प्रोजेक्ट, डेवलपर और कानूनी दस्तावेजों का सत्यापन महत्वपूर्ण होगा।
    लंबी अवधि के निवेश की रणनीति अपनाने वाले निवेशकों के लिए यह बाजार अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।

विजन 2030 के साथ बदल रहा है सऊदी अरब

सऊदी अरब केवल तेल आधारित अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहता। विजन 2030 के तहत देश पर्यटन, तकनीक, रियल एस्टेट, मनोरंजन, वित्तीय सेवाओं और वैश्विक निवेश के नए केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। विदेशी नागरिकों के लिए रियल एस्टेट बाजार खोलना इसी व्यापक आर्थिक बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में यदि यह नीति सफल रहती है तो खाड़ी क्षेत्र में निवेश का संतुलन बदल सकता है और भारतीय निवेशकों के लिए भी नए अवसर लगातार बढ़ सकते हैं।

Modi Cabinet Reshuffle: जल्द हो सकता है बड़ा फेरबदल, TMC-शिवसेना के बागियों को मिल सकता है बड़ा इनाम!

नई दिल्ली

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठन में अगले कुछ दिनों में बड़े स्तर पर फेरबदल हो सकता है. सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में मंत्रिमंडल के विस्तार और संगठनात्मक बदलाव दोनों पर गंभीरता से मंथन चल रहा है. इस कवायद में कुछ नए चेहरों को सरकार में जगह मिल सकती है, जबकि कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियां बदली जा सकती हैं। 

सूत्रों के अनुसार, हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद एनडीए का कुनबा मजबूत हुआ है. ऐसे में सहयोगी दलों और हाल में एनडीए के साथ आए नेताओं को भी सरकार में प्रतिनिधित्व देने की तैयारी की जा रही है. इसी क्रम में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से कुछ अहम नेताओं के नाम चर्चा में हैं। 

टीएमसी के एक बागी को कैबिनेट में जगह
सूत्रों का कहना है कि शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसद श्रीकांत शिंदे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट रैंक के साथ शामिल किया जा सकता है. वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों में काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी राय के नामों पर भी विचार चल रहा है. इनमें से किसी एक को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। 

इसके अलावा शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) से अलग हुए सांसद संजय दीना पाटिल का नाम भी संभावित मंत्रियों की सूची में बताया जा रहा है. माना जा रहा है कि सहयोगी दलों और नए राजनीतिक साथियों को उचित प्रतिनिधित्व देकर एनडीए अपने राजनीतिक विस्तार को और मजबूत करना चाहता है। 

कुछ मंत्रियों का बदलेगा रोल
सूत्रों के मुताबिक, केवल नए मंत्रियों की नियुक्ति ही नहीं, बल्कि कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियां भी बदली जा सकती हैं. उत्तर प्रदेश और दिल्ली बीजेपी की कमान संभाल चुके पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को संगठन में अधिक सक्रिय भूमिका देने के लिए केंद्र सरकार से मुक्त किया जा सकता है. यदि ऐसा होता है तो उनके स्थान पर नए चेहरों को मंत्री बनाया जा सकता है। 

जानकारी यह भी है कि भाजपा सरकार में शामिल कुछ वरिष्ठ नेताओं को संगठन में अहम जिम्मेदारी देने की रणनीति पर काम कर रही है. इसके बदले सरकार में अपेक्षाकृत युवा नेताओं को अवसर देकर नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार करने की कोशिश की जा सकती है। 

सिर्फ सरकार ही नहीं, बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में भी व्यापक बदलाव की संभावना जताई जा रही है. सूत्रों के अनुसार, पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम दो महिला उपाध्यक्षों की नियुक्ति कर सकती है. इसके अलावा त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं को भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद दिए जाने पर विचार चल रहा है। 

70 साल पुराने जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जजों का जन्म भी नहीं हुआ था जब शुरू हुआ था मामला

 नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे अनोखे और 70 साल पुराने जमीन विवाद का निपटारा किया है, जो देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल से होकर गुजरा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच के दोनों जजों का तब जन्म भी नहीं हुआ था, जब यह कानूनी विवाद शुरू हुआ था। यह पूरा मामला साल 1957 की एक सेल डीड (बिक्री विलेख) से जुड़ा हुआ है।

क्या है 70 साल पुराना यह जमीन विवाद?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद 4 जून 1957 को हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव में 15.5 बीघा जमीन की खरीद से जुड़ा है। इस जमीन को अपीलकर्ता शराफत अली के पूर्वजों ने खरीदा था। उस समय शराफत अली के पूर्वज नाबालिग थे, इसलिए जमीन की यह खरीद उनके पिता ने की थी। शुरुआत में यह मामला दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की कार्यवाही के रूप में शुरू हुआ, जो बाद में यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 और चकबंदी ढांचे (कंसोलिडेशन फ्रेमवर्क) के दायरे में चला गया।

चार पीढ़ियों ने लड़ी कानूनी लड़ाई, गुजर गए लोग
इस केस का सफर इतना लंबा रहा कि इस दौरान एक के बाद एक पीढ़ियां गुजर गईं। मुकदमे की इस लंबी और घुमावदार यात्रा के दौरान अपीलकर्ता शराफत अली का भी निधन हो गया। इसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट तक इस लड़ाई को लड़ा। इस तरह एक ही परिवार की चार पीढ़ियां इस 70 साल पुरानी मुकदमेबाजी में उलझी रहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया। इससे पहले निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) और हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ता इस सेल डीड के निष्पादन को साबित करने में विफल रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों के निष्कर्षों को खारिज कर दिया और डीड को वैध माना।

म्यूटेशन और चकबंदी में कैसे उलझा था मामला?
जमीन की खरीद के बाद जब खरीदार के नाम पर दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) का समय आया, तो बेचने वाले ने शुरुआत में आपत्ति जताई। हालांकि, बाद में उसने आपत्ति वापस ले ली ताकि राजस्व अधिकारी अपीलकर्ताओं के पक्ष में जमीन का म्यूटेशन कर सकें।

लेकिन, जब गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई, तो अपीलकर्ताओं ने पाया कि खरीदी गई जमीन के मालिक के रूप में उनका नाम रिकॉर्ड से गायब था और वह अभी भी बेचने वाले के नाम पर ही दर्ज थी। चकबंदी अधिकारी ने म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अपीलकर्ताओं का नाम जमीन के मालिक के रूप में दर्ज कर दिया। लेकिन बेचने वालों ने इसे फिर से चुनौती दी, जिसके बाद चकबंदी अधिकारी ने नए सिरे से फैसला करने का आदेश दिया था। आखिरकार, अब 70 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का अंतिम समाधान हो गया है।

उत्तर रेलवे का बड़ा रिकॉर्ड: सोलर एनर्जी से 2 महीने में ₹2.2 करोड़ की बचत, 3.4 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन

नई दिल्ली
 नॉर्दर्न रेलवे पर्यावरण संरक्षण और बिजली की लागत कम करने के मकसद से सोलर एनर्जी को बढ़ावा दे रहा है। इस पहल के तहत, अप्रैल और मई के दौरान रूफटॉप सोलर क्षमता में 2.2 MW की बढ़ोतरी की गई है। आने वाले दिनों में सोलर पैनल लगाने के काम को और तेज करने की कोशिश की जाएगी।

चीफ पब्लिक रिलेशंस ऑफिसर हिमांशु शेखर उपाध्याय ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी, एनर्जी सिक्योरिटी, कार्बन उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, नॉर्दर्न रेलवे ने अपने रिन्यूएबल एनर्जी सफर में एक और अहम उपलब्धि हासिल की है।

कुल सोलर क्षमता बढ़कर लगभग 28.35 MW 
इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती दो महीनों में, अलग-अलग रेलवे स्टेशनों और सर्विस बिल्डिंग्स में लगभग 2.2 MW क्षमता वाले ग्रिड-कनेक्टेड रूफटॉप सोलर पावर प्लांट चालू किए गए। इन नए प्लांट के लगने से, नॉर्दर्न रेलवे की कुल सोलर क्षमता बढ़कर लगभग 28.35 MW हो गई है।

यह उपलब्धि कार्बन उत्सर्जन कम करने, नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को पूरा करने और पर्यावरण के अनुकूल ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा देने की इंडियन रेलवे की कोशिशों को और मजबूत करती है।

इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती दो महीनों में, नॉर्दर्न रेलवे के सोलर पावर प्लांट से लगभग 3.4 मिलियन यूनिट बिजली पैदा हुई, जिससे एनर्जी की लागत में लगभग ₹2.2 करोड़ की बचत हुई। इस सोलर पावर जनरेशन से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 2,820 टन की कमी आने की उम्मीद है।

 

धर्म परिवर्तन के बाद OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, इस्लाम अपनाने पर नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग का लाभ

चेन्नई

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम’ का दर्जा और आरक्षण देने की बात कही गई थी।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पी बी बालाजी की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ एक मुस्लिम होता है। पीठ ने कहा, “कोई भी शख्स इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ ‘एक मुसलमान’ रह जाता है, बस बात यहीं खत्म। वह बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के दर्जे या आरक्षण का दावा कतई नहीं कर सकता।”

क्या था मामला?
यह मामला थूथुकुडी जिले के रहने वाले समीर अहमद की याचिका के बाद सामने आया। पहले उसका नाम परमशिवम था। परमशिवम का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। 2015 में उसने इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और मुस्लिम रीति-रिवाजों से शादी की। धर्म परिवर्तन के बाद समीर ने तहसीलदार के पास ‘मुस्लिम लेब्बाई’ जाति का कम्युनिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए आवेदन किया। इस जाति को तमिलनाडु में ‘पिछड़े वर्ग के मुसलमानों’ का दर्जा प्राप्त है।

तहसीलदार ने समीर का आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद समीर ने हाईकोर्ट का रुख किया और तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कनवर्टेड मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि कनवर्ट होने वाले व्यक्ति को आरक्षण इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वह अपनी पुरानी आरक्षित श्रेणी का लाभ उठा सके। हालांकि हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलील को खारिज कर दिया।

क्या बोला मद्रास हाईकोर्ट?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि मुस्लिम समाज में भी कई ऐसे समुदाय मौजूद हैं, लेकिन इन समुदायों की सदस्यता केवल जन्म से तय होती है। बेंच ने कहा, “बेझिझक यह कहा जा सकता है कि वे हिंदू धर्म की जातियों के समान हैं। जैसे जाति जन्म से तय होती है, वैसे ही कोई व्यक्ति जन्म से ही राउथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। यह कहना बेतुका है कि किसी को राउथर मुस्लिम में बदला जा सकता है।”

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के इस सरकारी आदेश को संविधान और इस्लाम दोनों के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। बेंच ने साल 1951 के ‘जी माइकल बनाम एस वेंकटेश्वरन’ मामले का हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है, तो वह ‘सिर्फ एक मुसलमान’ बनता है और मुस्लिम समाज में उसका स्थान उसकी पिछली जाति से तय नहीं होता।

सिर्फ आरक्षण के लिए नहीं दे सकते लाभ
अदालत ने कहा, “ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने दशकों और सदियों तक यह प्रचार किया कि उनके धर्मों में सामाजिक समानता है, जबकि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था है। धर्म-परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद, अब यह दावा करना गलत है कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच है। हमारी राय में, कुछ समुदायों को ‘पिछड़ा’ और बाकी को ‘अगड़ा’ मानना ​​कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है। इस्लाम एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें सब बराबर हों। अल्लाह की नजर में सब समान हैं। वहां कोई सामाजिक ऊंच-नीच नहीं है।” अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सिर्फ इसलिए विभिन्न जातियों के कनवर्टेड मुस्लिमों का एक समूह बनाकर उन्हें आरक्षण नहीं दे सकती कि वे लाभ उठाते रहें।

सुवेंदु अधिकारी का नया कानून चर्चा में, गुंडई पर सख्त कार्रवाई का दावा; ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी कड़ा बताया

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार का दिन एक बड़े धमाके की तरह होगा. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी राज्य के 54 साल पुराने कानून में बदलाव करने जा रही है. एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ लाने जा रहे हैं, जो अपराधियों की रीढ़ तोड़ देगा. इस नए कानून को उत्तर प्रदेश के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी कई गुना अधिक घातक और सख्त माना जा रहा है. इसे लेकर पूरे बंगाल के गुंडा-बवालियों में अभी से मौत का खौफ है. जानते हैं पूरी कहानी। 

54 साल पुराने कानूनों की विदाई
बंगाल राज्य सरकार1972 में बने कानून The West Bengal Maintenance of Public Order Act, 1972 उसमें संशोधन करने जा रही है.  इसे 1972 में पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित किया गया था और उसी वर्ष राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून लागू हुआ था। 

इस कानून का संक्षिप्त इतिहास
1960 और 70 का दशक के दौर में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक आंदोलन और कानून-व्यवस्था की भारी समस्याएं थीं. सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को बनाए रखने, उग्रवादी गतिविधियों को रोकने और अवैध हथियारों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार को विशेष शक्तियों की जरूरत थी, जिसके लिए यह कानून 1972 में लाया गया था। 

 ‘पश्चिम बंगाल में नया कानून?
लेकिन अब बंगाल सरकार ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ को विधानसभा में पेश करने जा रही है. उसने दशकों पुराने ढर्रे को बदल दिया है. 1972 के कानून अब आधुनिक संगठित अपराध और दंगाई मानसिकता से लड़ने के लिए नाकाफी साबित हो रहे थे. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बंगाल में ‘कानून का राज’ होगा, न कि ‘सिंडिकेट का राज’. 54 सालों से चली आ रही ढील अब हमेशा के लिए खत्म होने वाली है। 

7 पीढ़ियों तक होगी वसूली, कोई नहीं बचेगा!
इस कानून का सबसे खौफनाक पहलू इसका ‘रिकवरी मैकेनिज्म’ है. यदि कोई दंगाई सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो उसकी भरपाई सिर्फ अपराधी से नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति से होगी. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रावधान इतने कड़े हैं कि एक बार दंगा करने पर अपराधी की आने वाली सात पीढ़ियां हर्जाना भरते-भरते कंगाल हो जाएंगी. यह केवल दंड नहीं, बल्कि ‘आर्थिक खात्मा’ है, जो दंगाइयों को कानून हाथ में लेने से पहले सोचने पर मजबूर कर देगा। 

बुलडोजर मॉडल का भी ‘बाप’ है ये बिल
उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ के मॉडल ने देशभर में दंगाइयों के बीच खौफ पैदा किया था, लेकिन सुवेंदु अधिकारी का यह नया बिल उससे भी दो कदम आगे है. इसमें ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ (बिना मुकदमे हिरासत) और ‘एक्सटर्नमेंट’ (जिले से निष्कासन) जैसी शक्तियां पुलिस को असीमित अधिकार देती हैं. यह बिल दंगाइयों को पनाह देने वालों के खिलाफ भी ‘जीरो टॉलरेंस’ रखता है. किसी को पनाह देना भी अब दो साल की सीधी जेल का निमंत्रण होगा। 

विपक्ष की रूह क्यों कांप रही है?
जैसे ही इस बिल का ड्राफ्ट सामने आया, विपक्ष के गलियारों में सन्नाटा पसर गया है. जिन नेताओं को लगता था कि वे दंगों के जरिए अपनी राजनीति चमका लेंगे, उनकी रूह अब कांप रही है. वे जानते हैं कि यह कानून न केवल गुंडों को खत्म करेगा, बल्कि उन बड़े चेहरों को भी बेनकाब करेगा जो दंगों को स्पॉन्सर करते हैं. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि दंगा करना है, तो कीमत चुकाने के लिए तैयार रहो। 

शांति और सुरक्षा का नया युग
यह बिल बंगाल की बदलती तस्वीर का गवाह है. सरकार का कहना है कि यह कानून शरीफ नागरिकों की रक्षा के लिए एक ढाल है. जो बंगाल कल तक अराजकता की आग में जलता था. वह अब अपराधियों के लिए एक बड़ी जेल साबित होगा. सोमवार को जब यह कानून विधानसभा में बहस के लिए आएगा तो देखना यह होगा कि असल में क्या हुआ। 

मिडिल ईस्ट में फिर जंग की आहट! नेतन्याहू के ऐलान पर ईरान की जंगी धमकी, लेबनान बॉर्डर पर बढ़ा तनाव

बेरूत

लेबनान दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व का एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण देश है. यहां इजरायल की सीमा से लगा दक्षिणी इलाका लंबे समय से तनाव का केंद्र रहा है. हिज्बुल्लाह ईरान समर्थित एक मजबूत संगठन है, यहां सक्रिय है. हाल के वर्षों में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच कई बार झड़पें हुई हैं। 

2026  में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है. इजरायल ने साफ कहा है कि जब तक हिज्बुल्लाह अपने हथियार नहीं छोड़ता, उसके सैनिक लेबनान के दक्षिणी हिस्से से नहीं हटेंगे. वहीं ईरान का रुख है कि इजरायल को पहले पूरी तरह हटना चाहिए और लड़ाई बंद करनी चाहिए. यह जिद दोनों तरफ से नई जंग की स्क्रिप्ट लिख रही है। 

विश्लेषकों के अनुसार, यह सिर्फ सीमा विवाद नहीं है. यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, हथियार नियंत्रण और बड़े देशों की रणनीति से जुड़ा मुद्दा है. लेबनान की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर है, लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और अगर नई जंग छिड़ी तो मानवीय संकट और बढ़ जाएगा। 

इजरायल का रुख: सुरक्षा पहले, हथियार छोड़ो
इजरायल बार-बार कह रहा है कि उसकी सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है. हिज्बुल्लाह के पास हजारों रॉकेट और हथियार हैं जो इजरायल के शहरों को निशाना बना सकते हैं. इजरायली प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि दक्षिणी लेबनान में एक सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखना जरूरी है. अगर हिज्बुल्लाह हथियार नहीं छोड़ता तो इजरायली सेना वहां बनी रहेगी। 

इजरायल का तर्क है कि पिछले समझौतों में हिज्बुल्लाह ने हथियार छोड़ने का वादा किया लेकिन पूरा नहीं किया. इसलिए अब वे भरोसा नहीं कर रहे. इजरायल के अनुसार, हिज्बुल्लाह का हथियार रखना न सिर्फ इजरायल के लिए खतरा है बल्कि लेबनान की संप्रभुता को भी कमजोर करता है. इजरायल ने कई बार हवाई हमले किए हैं ताकि हिज्बुल्लाह की क्षमता कम हो. लेकिन इससे तनाव और बढ़ा है. अगर हिज्बुल्लाह फिर से हमला करता है तो इजरायल बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर सकता है। 

हिज्बुल्लाह और लेबनान की स्थिति 
हिज्बुल्लाह खुद को लेबनान का रक्षक बताता है. उसके नेता कहते हैं कि इजरायल की मौजूदगी के खिलाफ वे हथियार नहीं छोड़ेंगे. हिज्बुल्लाह का मानना है कि इजरायल पहले लेबनान की जमीन छोड़े, तब बात हो सकती है. उन्होंने कुछ हथियार लेबनानी सेना को सौंपे लेकिन पूरी तरह से हथियार छोड़ने की बात नहीं मानी। 

लेबनान सरकार कमजोर है. देश में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और विभिन्न गुटों के बीच मतभेद हैं. हिज्बुल्लाह लेबनान की राजनीति में भी मजबूत है. अगर इजरायल नहीं हटता तो हिज्बुल्लाह समर्थकों में गुस्सा बढ़ेगा और नई लड़ाई शुरू हो सकती है. लेबनानी सेना दक्षिण में तैनात है लेकिन हिज्बुल्लाह की ताकत के आगे उसकी भूमिका सीमित लगती है। 

ईरान का रणनीतिक खेल: इजरायल पहले हटे
ईरान हिज्बुल्लाह का मुख्य समर्थक है. वह हथियार, पैसा और प्रशिक्षण देता है. ईरान का कहना है कि इजरायल को लेबनान से पूरी तरह हटना चाहिए और लड़ाई बंद करनी चाहिए. ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल हमले जारी रखता है तो वह जवाब देगा. ईरान-इजरायल के बीच अप्रत्यक्ष युद्ध लंबे समय से चल रहा है। 

ईरान के लिए लेबनान सिर्फ एक मोर्चा है. वह पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है. अगर इजरायल लेबनान में बना रहा तो ईरान दूसरे मोर्चों पर भी दबाव डाल सकता है. हाल के बयानों में ईरान ने कहा कि कोई भी समझौता लेबनान को कवर करे. इससे अमेरिका और इजरायल के बीच भी तनाव बढ़ा है। 

नई जंग की संभावित स्क्रिप्ट: क्या हो सकता है?
विश्लेषक मानते हैं कि अगर बात नहीं बनी तो नई जंग की स्क्रिप्ट इस तरह हो सकती है. पहले छोटी-छोटी झड़पें बढ़ेंगी. हिज्बुल्लाह रॉकेट दागेगा, इजरायल हवाई हमले करेगा. इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में और अंदर घुस सकती है. ईरान हिज्बुल्लाह को और मदद भेजेगा या दूसरे इलाकों से दबाव डालेगा। 

इससे लेबनान में बड़े पैमाने पर तबाही होगी। हजारों लोग मारे जा सकते हैं, लाखों विस्थापित होंगे. बुनियादी ढांचा बर्बाद होगा. इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा क्योंकि सैनिकों की तैनाती महंगी है. अमेरिका, जो शांति चाहता है, बीच में फंस सकता है। 

संयुक्त राष्ट्र और अन्य देश सीजफायर की कोशिश कर रहे हैं लेकिन दोनों पक्षों की जिद इसे मुश्किल बना रही है. अगर इजरायल हटने से इनकार करता रहा और हिज्बुल्लाह हथियार नहीं छोड़ा तो युद्ध टलना मुश्किल होगा। 

लेबनान की जंग सिर्फ दो देशों की नहीं है. यह पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित करेगी. सऊदी अरब, तुर्की जैसे देश प्रभावित होंगे. तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ेगा. मानवीय संकट गहराएगा. लेबनान में पहले से लाखों शरणार्थी हैं. नई जंग से भूख, बीमारी और बेघर होने की समस्या बढ़ेगी. बच्चे स्कूल नहीं जा पाएंगे, अस्पताल नष्ट हो जाएंगे। 

क्या है समाधान?
समाधान मुश्किल लेकिन नामुमकिन नहीं. दोनों पक्षों को समझौता करना होगा. इजरायल को सुरक्षा गारंटी मिले और हिज्बुल्लाह हथियारों का कुछ हिस्सा लेबनानी सेना को सौंप दे. ईरान को भी आश्वासन चाहिए कि उसके हित सुरक्षित हैं. अमेरिका और अन्य शक्तियां मध्यस्थता कर सकती हैं. लेबनान की सरकार को मजबूत होना चाहिए ताकि वह अपने पूरे इलाके पर नियंत्रण रख सके. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आर्थिक मदद देकर लेबनान को स्थिर करना चाहिए। 

CG Deputy CM साव का कांग्रेस पर हमला, बोले- UCC पर फैला रही दुष्प्रचार; आदिवासी परंपराएं रहेंगी सुरक्षित

रायपुर.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार प्रदेश में समान नागरिक संहिता याने UCC लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है. सरकार की तैयारियों के साथ ही राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है. पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अमरजीत भगत ने इसे सत्ता बचाने के लिए भाजपा का प्रपंच करार दिया है. इस पर उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने कांग्रेस पर हर बात पर गलत प्रचार करने का आरोप मढ़ा है.

वहीं भाजपा नेता केदार गुप्ता ने प्रदेश में UCC लागू होने के बाद भी आदिवासी समाज की परंपराओं के पूरी तरह सुरक्षित रहने का भरोसा दिलाया है. समान नागरिक संहिता पर कांग्रेस नेता अमरजीत भगत ने मीडिया से चर्चा में कहा कि UCC देश के लिए एक पेचीदा विषय है. भारत विविधताओं का देश है, जहां सभी पर एक कानून उचित नहीं है. जंगल में रहने वाले आदिवासी को UCC की जानकारी तक नहीं है, ऐसे में जनता पर UCC का सकारात्मक असर नहीं होगा. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के बयान पर उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने पलटवार करते हुए कहा कि UCC लागू करने के लिए कमेटी का गठन किया गया है, जो विभिन्न वर्गों के लोगों से बातचीत करेगी.

कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार आगे की कार्रवाई करेगी. रही बात अमरजीत भगत के बयान की तो कांग्रेस पार्टी हर बात पर भ्रम फैलाने का काम करती है. UCC से आदिवासी समाज को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. वहीं केदार गुप्ता ने कहा कि अमरजीत भगत आदिवासी समाज से आते हैं, फिर भी आदिवासियों की समझ पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है. आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपरा बेहद समृद्ध है. UCC लागू होने पर भी आदिवासी समाज की परंपराएं पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. UCC लव जिहाद और धर्मांतरण जैसी घटनाओं पर रोक लगाने में भी मददगार होगा. अगर कांग्रेस इन सब बातों को समय रहते समझ जाती, तो आज उसकी यह दुर्गति नहीं होती.

कांग्रेस के प्रशिक्षण शिविर से बढ़ा BJP का BP
पूर्व मंत्री अमरजीत ने मीडिया से चर्चा में कांग्रेस के प्रशिक्षण शिविर के संबंध में कहा कि इससे भाजपा का BP बढ़ेगा. भाजपा कांग्रेस की विचारधारा से घबराई हुई है. भाजपा नेता डॉक्टरों से बीपी चेक करा कर देखें. उन्होंने कहा कि कांग्रेस मजबूत हो रही है, इसलिए भाजपा बेचैन है. सरकार के खिलाफ कांग्रेस ने जमीनी लड़ाई तेज कर दी है. प्रशिक्षण के बाद जिलाध्यक्षों का नया कलेवर दिखेगा. भगत के बयान पर उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि बीपी किसका बढ़ा हुआ है, यह प्रदेश की जनता बता देगी. देश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी पर बीजेपी की सरकार है. इनके गठबंधन के दल इनको छोड़कर जा रहे हैं. बीपी तो कांग्रेस का बढ़ा हुआ है. वहीं बीपी बढ़ने वाले बयान पर केदार गुप्ता ने कहा कि भाजपा का ब्लड प्रेशर, शुगर और मेंटल लेवल एक जैसा रहता है. कांग्रेस को पूरा बॉडी चेकअप करवाना चाहिए. 22 राज्यों में उन्हें खदेड़ दिया गया है. उन्होंने कहा कि यह बात भूपेश बघेल के बयान में दिखता है, जब वह बार-बार कहते है ‘कका अभी जिंदा है.’ भूपेश बघेल दीर्घायु हों, चिरायु हों, पर अमरजीत भगत को उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए. कांग्रेस का स्वास्थ्य इससे पता चल रहा है.

खाद-बीज संकट पर सरकार असहाय
कांग्रेस नेता अमरजीत भगत ने प्रदेश में खाद-बीज के संकट के साथ मानसून की बेरुखी का जिक्र करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है. कृषि पर आधारित जीवन है. अगर खेती नहीं हो रही है, तो समस्या खड़ी हो जाएगी. किसान को खाद-बीज और पानी चाहिए. कांग्रेस सरकार ने अच्छी व्यवस्था की थी, लेकिन इस सरकार में खाद नहीं मिल रहा है. बड़े पैमाने पर काला बाजारी हो रही है. किसान आखिर कहां जाएगा. पूरी परिस्थिति प्रदेश के किसानों के विरुद्ध है. कुछ करने में सरकार निसहाय दिख रही है.
इस विषय पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि सरकार ने खाद बीज के वितरण की पूरी व्यवस्था की है. किसानों को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है. कांग्रेस किसानों को भ्रमित करने का काम कर रही है. किसान समझ रहे हैं. इसके साथ उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन्होंने किसानों को परेशान किया, आज किस मुँह से किसानों की बात कर रहे हैं. 

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