टैक्स लॉ बार एसोसिएशन ने उपमुख्यमंत्री को सौंपा ज्ञापन, वैट अपीलों की समय-सीमा बढ़ाने सहित तीन प्रमुख मांगें उठाईं

विवेक झा, भोपाल, 25 जून। प्रदेश के व्यापारियों, करदाताओं और कर पेशेवरों की समस्याओं के समाधान को लेकर टैक्स लॉ बार एसोसिएशन, भोपाल ने मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री जगदीश देवड़ा को विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में विशेष रूप से लंबित वैट अपीलों के त्वरित निस्तारण, डीम्ड असेसमेंट स्कीम लागू करने और वैट अपीलेट बोर्ड में अधिकारियों की नियुक्ति जैसी महत्वपूर्ण मांगें रखी गईं।

एसोसिएशन का कहना है कि इन मांगों पर सकारात्मक निर्णय होने से व्यापारियों को राहत मिलेगी, अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी और राजस्व संग्रहण की प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी बन सकेगी।

वैट प्रथम अपीलों की समय-सीमा बढ़ाने की मांग

टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट मनोज कुमार पारख ने बताया कि ज्ञापन में पहली प्रमुख मांग मध्यप्रदेश वैट प्रथम अपीलों की सुनवाई की समय-सीमा को 30 जून 2026 से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 तक किए जाने की है।

उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में पुराने प्रकरण अभी भी लंबित हैं और कई मामलों में आवश्यक अभिलेखों एवं दस्तावेजों के संकलन में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है। वर्तमान में वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था के कारण प्रतिदिन सीमित मामलों की ही सुनवाई हो पा रही है, जिससे करदाताओं को अपने पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहा।

पेट्रोलियम उत्पादों के लिए डीम्ड असेसमेंट स्कीम लागू करने का सुझाव

ज्ञापन में दूसरी महत्वपूर्ण मांग वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए पेट्रोलियम उत्पादों से संबंधित मामलों में डीम्ड असेसमेंट स्कीम लागू करने की की गई है।

एसोसिएशन का मानना है कि इस व्यवस्था से अनावश्यक जांच और स्क्रूटनी की आवश्यकता कम होगी, कर अनुपालन सरल बनेगा और विभाग तथा करदाताओं—दोनों का समय एवं संसाधनों की बचत होगी। इससे प्रशासनिक प्रक्रिया अधिक सुगम और पारदर्शी भी बन सकती है।

वैट अपीलेट बोर्ड में अधिकारियों की कमी से बढ़ रही परेशानी

तीसरी प्रमुख मांग मध्यप्रदेश वैट अपीलेट बोर्ड में लंबित अपीलों के शीघ्र निराकरण के लिए आवश्यक अधिकारियों की तत्काल नियुक्ति की है। एसोसिएशन ने ज्ञापन में उल्लेख किया कि अधिकारियों की कमी के कारण अपीलों के निपटारे में काफी विलंब हो रहा है, जिससे व्यापारी वर्ग को आर्थिक और प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

बार एसोसिएशन का कहना है कि समयबद्ध सुनवाई और पर्याप्त न्यायिक व्यवस्था से लंबित मामलों का तेजी से समाधान संभव होगा।

अपील लंबित रहने तक कार्रवाई पर रोक लगाने की अपील

ज्ञापन में यह भी आग्रह किया गया कि जिन मामलों में विवादित राशि पहले से राज्य सरकार के पास सुरक्षित है, उन मामलों में अंतिम अपील के निर्णय तक व्यापारियों पर अनावश्यक दबाव या कठोर कार्रवाई नहीं की जाए।

एसोसिएशन के अनुसार, इससे व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित नहीं होंगी और करदाता निष्पक्ष तरीके से अपनी अपील की प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे।

व्यापारिक माहौल को मिलेगा बढ़ावा

संस्था का मानना है कि यदि सरकार इन सुझावों पर सकारात्मक निर्णय लेती है तो लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण होगा, अनावश्यक मुकदमेबाजी में कमी आएगी और व्यापारिक वातावरण अधिक अनुकूल बनेगा। साथ ही, कर प्रशासन और राजस्व संग्रहण व्यवस्था भी अधिक प्रभावी और पारदर्शी हो सकेगी।

इनकी रही उपस्थिति

उपमुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपने के दौरान टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट मनोज कुमार पारख, सीए संजय श्रीवास्तव, सीए एस. कृष्णन (पूर्व अध्यक्ष) तथा मुनेंद्र वेद उपस्थित रहे और उन्होंने व्यापारियों एवं करदाताओं से जुड़े विभिन्न व्यावहारिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

ज्ञापन की तीन प्रमुख मांगें

  • वैट प्रथम अपीलों की समय-सीमा 30 जून 2026 से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 की जाए।
  • वित्तीय वर्ष 2024-25 के पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़े मामलों में डीम्ड असेसमेंट स्कीम लागू की जाए।
  • मध्यप्रदेश वैट अपीलेट बोर्ड में लंबित अपीलों के त्वरित निस्तारण के लिए आवश्यक अधिकारियों की शीघ्र नियुक्ति की जाए।

एसोसिएशन का दावा

इन मांगों के लागू होने से लंबित कर विवादों का तेजी से समाधान होगा, व्यापारियों को राहत मिलेगी, विभागीय कार्यभार कम होगा और राज्य में बेहतर व्यापारिक एवं निवेश अनुकूल वातावरण विकसित करने में मदद मिलेगी।

होर्मुज में बढ़ा खतरा! ईरानी ड्रोन हमले के बाद 11 हजार नाविकों की जान पर संकट, समुद्री रास्ते में फिर तनाव

 नई दिल्ली

होर्मुज स्ट्रेट में ड्रोन हमले के बाद एक बार फिर तनाव बढ़ गया है. यह हमला तब हुआ जब यूनाइटेड नेशन की टीम इस क्षेत्र में रेस्क्यू अभियान में जुटी थी. ओमान के तट के पास एक कार्गो शिप पर हुए हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की समुद्री एजेंसी इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) ने इस रेस्क्यू अभियान को रोक दिया है. इस फैसले से करीब 11 हजार नाविकों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, जो अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों पर मौजूद हैं। 

पिछले कुछ दिनों से संयुक्त राष्ट्र, ओमान और कई सदस्य देशों की मदद से फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का अभियान चला रहा था. इस मिशन का मकसद उन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट पार कराना था, जो युद्ध और सुरक्षा प्रतिबंधों की वजह से कई दिनों से फंसे हुए थे। 

इसी दौरान ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले कार्गो शिप एवर लवली पर ड्रोन हमला हो गया. हमले में जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा. हालांकि किसी नाविक की मौत या गंभीर चोट की खबर नहीं है. इसके तुरंत बाद IMO ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पूरे रेस्क्यू अभियान को अस्थायी रूप से रोक दिया। 

UN ने रेस्क्यू क्यों रोक दिया?
IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगेज ने कहा कि जब तक इवैक्युएशन लिस्ट में शामिल जहाजों की सुरक्षा की गारंटी नहीं मिल जाती, तब तक अभियान आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. हालांकि जिस जहाज पर हमला हुआ, वह UN के रेस्क्यू मिशन का हिस्सा नहीं था. लेकिन घटना ने यह साफ कर दिया कि समुद्री रास्ता अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। 

IMO के मुताबिक इस पूरे इलाके में करीब 20 हजार से ज्यादा नाविक अलग-अलग जहाजों पर फंसे हुए हैं. इनमें से लगभग 11 हजार नाविकों को निकालने के लिए विशेष इवैक्युएशन प्लान तैयार किया गया था. अब रेस्क्यू अभियान रुकने के बाद ये नाविक फिर से बीच समंदर में फंस गए हैं. उन्हें नहीं पता कि वे कब सुरक्षित तरीके से होर्मुज स्ट्रेट पार कर पाएंगे। 

यूनाइटेड नेशन ने पहले ही जहाजों को स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि बिना इजाजत किसी भी तरह की आवाजाही न करें. इसके साथ ही IMO ने भी चेतावनी दी थी कि निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. जहाजों की आवाजाही तभी शुरू की जानी थी, जब IMO, UKMTO और MICA सेंटर के कोऑर्डिनेटेड सिस्टम के जरिए सभी वेसल्स से संपर्क स्थापित हो जाए. इसके बाद संबंधित कोस्टल लाइन्स से बातचीत के बाद ही आगे बढ़ने की इजाजत थी। 

ईरान ने हमला क्यों किया?
ईरान ने कुछ दिन पहले ही चेतावनी दी थी कि उसकी इजाजत के बिना कोई भी जहाज संयुक्त राष्ट्र और ओमान द्वारा तैयार किए गए नए समुद्री मार्ग का इस्तेमाल न करे. ड्रोन हमले के कुछ घंटों बाद ईरान की नई पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने बयान जारी कर कहा कि जो जहाज ईरान द्वारा तय किए गए आधिकारिक रास्ते के बजाय दूसरे मार्ग का इस्तेमाल करेंगे, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी। 

होर्मुज से गुजरने वाले सभी जहाजों के लिए ईरान की तरफ से एक समुद्री कॉरिडोर तय किया गया है. जहाजों को सिर्फ लारक आईलैंड (Larak Island) के पास बनाए गए आधिकारिक मार्ग से ही गुजरने की इजाजत दी गई है. इस रूट के अलावा किसी भी रूट से गुजरने पर सख्त चेतावनी दी गई थी. ईरान ने एक नोटिफिकेशन में स्पष्ट कहा था कि, किसी भी उल्लंघन की स्थिति में होने वाले नुकसान, जुर्माने या दुर्घटना की पूरी जिम्मेदारी संबंधित जहाज के मालिक और कप्तान (मास्टर) की होगी। 

यानी ईरान साफ संदेश देना चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को उसके नियम मानने होंगे. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने ओमान की तरफ से दक्षिणी रास्ते को खतरनाक बताकर खारिज कर दिया था और जहाजों को चेतावनी दी थी कि वे सिर्फ तेहरान से मंजूर रास्तों का ही इस्तेमाल करें। 

आखिर विवाद किस रास्ते को लेकर है?
इस समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने के लिए दो अलग-अलग समुद्री कॉरिडोर मौजूद हैं. पहला रास्ता ईरान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरता है. इस मार्ग पर जहाजों को ईरान की नई एजेंसी PGSA से पहले इजाजत लेनी होती है. बिना परमिट किसी जहाज को प्रवेश नहीं दिया जाता. ईरान का कहना है कि सिर्फ एक यही रूट ही जिससे जहाज को सुरक्षित पासेज दिया जाएगा। 

दूसरा रास्ता ओमान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरता है. इसी मार्ग को संयुक्त राष्ट्र और ओमान मिलकर सुरक्षित निकासी के लिए इस्तेमाल कर रहे थे. दर्जनों जहाजों को इस रास्ते से पार भी कराया गया है. 24 जून को ही 60 से ज्यादा विमानों को पार कराया गया था. ईरान का कहना है कि उसके तय रास्ते को छोड़कर दूसरे कॉरिडोर का इस्तेमाल करना नियमों का उल्लंघन है। 

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा कॉरिडोर माना जाता है. दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी-एलपीजी की सप्लाई इसी रास्ते से होती है. भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई देशों की ऊर्जा जरूरतें इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं. अगर यहां लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं। 

अब आगे क्या होगा?
फिलहाल IMO, ओमान, ईरान और अन्य सदस्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है ताकि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही फिर शुरू की जा सके. IMO ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक हजारों नाविक समुद्र में फंसे रह सकते हैं. यानी अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच होर्मुज स्ट्रेट में हुए ड्रोन हमले ने पूरी वैश्विक शिपिंग व्यवस्था और हजारों नाविकों की सुरक्षा को फिर से संकट में डाल दिया है. अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला तो इसका असर सिर्फ समुद्री व्यापार ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में तेल की सप्लाई और कीमतों पर भी पड़ सकता है। 

LPG उपभोक्ताओं के लिए नया नियम, 30 दिन के भीतर पूरा करना होगा यह जरूरी काम

नई दिल्ली

मिडिल ईस्ट टेंशन के चलते देशभर में एलपीजी की सप्लाई पर असर पड़ते हुए नजर आया. इस बीच सरकार ने कई बड़े फैसले लिए जिसका सीधा असर एलपीजी उपभोक्ताओं पर पड़ा है. देश में एलपीजी सप्लाई को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है. अब जिन घरों में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सुविधा उपलब्ध है और उपभोक्ता PNG कनेक्शन ले चुके हैं, उन्हें निर्धारित समय के अंदर अपना LPG कनेक्शन सरेंडर करना होगा. सरकार का मानना है कि इससे गैस डिस्ट्रिबुशन प्रोसेस अधिक ट्रांसपरेंट बनेगा, डुप्लिकेट कनेक्शनों पर रोक लगेगी और जरूरतमंद परिवारों तक LPG की पहुंच बेहतर हो सकेगी। 

हाल के सालों में कई शहरों में PNG नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है. इसके बावजूद कई ऐसे परिवार हैं जो PNG और LPG दोनों सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. सरकार का कहना है कि इससे रिसोर्स और सब्सिडी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. इसी को ध्यान में रखते हुए नए नियम लागू किए गए हैं। 

क्या है नया 30 दिन वाला नियम?
सरकार द्वारा जारी किए गए नियमों के अनुसार, अगर किसी घरेलू उपभोक्ता ने अपने घर में PNG कनेक्शन ले लिया है, तो उसे 30 दिनों के भीतर अपना LPG कनेक्शन सरेंडर करना होगा. यह नियम इंडेन, भारतगैस और एचपी गैस समेत सभी प्रमुख घरेलू LPG कनेक्शनों पर लागू होगा. जैसे- अगर किसी उपभोक्ता को 10 जून को PNG कनेक्शन मिला है, तो उसे अगले 30 दिनों के भीतर LPG कनेक्शन वापस करना होगा. फिक्स्ड अवधि के बाद ऐसे उपभोक्ताओं को LPG रिफिल या संबंधित सुविधाएं मिलने में दिक्कत आ सकती है. सरकार का फोकस है कि एक परिवार में एक ही घरेलू गैस व्यवस्था को बढ़ावा देना है। 

सरकार ने क्यों उठाया यह कदम?
सरकार की ‘वन हाउसहोल्ड, वन गैस कनेक्शन’ सोच के तहत यह कदम उठाया गया है. अधिकारियों का मानना है कि कई शहरी क्षेत्रों में PNG उपलब्ध होने के बावजूद लोग LPG कनेक्शन बनाए रखते हैं, जिससे गैस डिस्ट्रिबुशन पर अनावश्यक दबाव पड़ता है. नए नियम के जरिए डुप्लिकेट कनेक्शनों को कम करने, सब्सिडी के दुरुपयोग को रोकने और उन इलाकों में LPG की सप्लाई बढ़ाने को कोशिश की जा रही है जहां अभी PNG नेटवर्क नहीं पहुंचा है. इससे गैस डिस्ट्रिबुशन अधिक बेहतर और संतुलित बनने की उम्मीद है। 

PNG अपनाने वालों के लिए क्या हैं सुविधाएं?
सरकार ने उपभोक्ताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कुछ राहत भी दी है. यदि कोई परिवार भविष्य में ऐसे क्षेत्र में ट्रांसफर होता है जहां PNG की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो उसके लिए LPG कनेक्शन दोबारा हासिल करना आसान बनाया गया है. LPG कनेक्शन सरेंडर करते समय उपभोक्ता ट्रांसफर वाउचर प्राप्त कर सकते हैं. इस डॉक्यूमेंट की मदद से वे नए स्थान पर आसान प्रोसेस के जरिए LPG कनेक्शन दोबारा शुरू करा सकते हैं. इससे उपभोक्ताओं को नए कनेक्शन के लिए लंबे प्रोसेस से नहीं गुजरना पड़ेगा। 

OTP और e-KYC से बढ़ी निगरानी
गैस डिस्ट्रिबुशन प्रोसेस को और सुरक्षित तथा ट्रांसपरेंट बनाने के लिए सरकार पहले ही OTP आधारित डिलीवरी सिस्टम लागू कर चुकी है. अब सिलेंडर की डिलीवरी के समय उपभोक्ता के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर OTP भेजा जाता है, जिसे वेरिफाई करने के लिए डिलीवरी एजेंट को बताना होता है. इसके अलावा, उज्ज्वला योजना समेत अलग-अलग लाभार्थियों के लिए e-KYC प्रोसेस भी जरूरी हो गई है. सरकार चाहती है कि सभी उपभोक्ताओं का डेटा अपडेट और वेरिफाइड रहे ताकि फायदा सही लोगों तक पहुंच सके और फर्जी कनेक्शनों पर रोक लगाई जा सके। 

7 जहाजों से शुरू हुआ सफर, आज 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट के साथ समुद्री सुरक्षा की रीढ़ बना भारतीय तटरक्षक बल

मुंबई 

भारत का समुद्री क्षेत्र देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामरिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. 11,099 किलोमीटर लंबे समुद्री तट, विशाल समुद्री क्षेत्र और विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की निगरानी और सुरक्षा आज भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है. लेकिन इस संगठन की शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ हुई थी। 

आज भारतीय तटरक्षक बल के पास 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट हैं, लेकिन 1977 में इसकी शुरुआत महज सात जहाजों के साथ हुई थी. यह सफर भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के लगातार विस्तार और बदलती जरूरतों को दर्शाता है। 

भारतीय नौसेना ने क्यों उठाई अलग समुद्री बल की मांग?
1960 के दशक से ही भारतीय नौसेना सरकार से एक ऐसे अलग समुद्री बल के गठन की मांग कर रही थी जो समुद्री कानून लागू करने और भारतीय जलक्षेत्र में सुरक्षा संबंधी कार्यों को संभाल सके. नौसेना का मानना था कि इन कार्यों के लिए अत्याधुनिक और महंगे युद्धपोतों का उपयोग सबसे उपयुक्त विकल्प नहीं है. समय के साथ सरकार ने भी इस तर्क को स्वीकार किया। 

1970 के दशक की शुरुआत तक कई ऐसे कारण सामने आए जिन्होंने अलग तटरक्षक बल की आवश्यकता को और मजबूत कर दिया। 

तस्करी बनी बड़ी चुनौती
उस दौर में समुद्री मार्गों से तस्करी तेजी से बढ़ रही थी और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन चुकी थी. उस समय मौजूद समुद्री एजेंसियां, जैसे सीमा शुल्क विभाग और मत्स्य विभाग, बड़े पैमाने पर हो रही तस्करी को रोकने में सक्षम नहीं थीं। 

इसी पृष्ठभूमि में 1970 में नाग समिति का गठन किया गया. समिति ने अपनी रिपोर्ट में समुद्री तस्करी से निपटने के लिए एक अलग समुद्री बल की आवश्यकता बताई। 

बॉम्बे हाई में तेल मिलने से बढ़ी जरूरत
मुंबई हाई क्षेत्र में तेल की खोज और वहां स्थापित महत्वपूर्ण अपतटीय संरचनाओं की सुरक्षा भी एक बड़ी आवश्यकता बन गई थी. इन परिसंपत्तियों की सुरक्षा और किसी आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए मजबूत समुद्री सुरक्षा तंत्र की जरूरत महसूस की गई। 

रुस्तमजी समिति की सिफारिश
सितंबर 1974 में सरकार ने पूर्व बीएसएफ महानिदेशक के.एफ. रुस्तमजी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. समिति को समुद्री तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों से निपटने के मौजूदा तंत्र की समीक्षा करने और सुधार के सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई. 1975 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में समिति ने स्पष्ट रूप से ‘कोस्ट गार्ड’ जैसी संस्था स्थापित करने की सिफारिश की। 

सिर्फ सात जहाजों के साथ हुई शुरुआत
वर्ष 1977 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय तटरक्षक बल की स्थापना को मंजूरी दी. इसके लिए भारतीय नौसेना से दो फ्रिगेट और पांच गश्ती नौकाएं स्थानांतरित की गईं. 1 फरवरी 1977 को भारतीय तटरक्षक बल अस्तित्व में आया. उस समय भारतीय जलक्षेत्र और विशेष आर्थिक क्षेत्र की निगरानी के लिए उसके पास केवल सात जहाज थे। 

बाद में 19 अगस्त 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने भारतीय तटरक्षक बल का औपचारिक उद्घाटन किया। 

ICGS Kuthar बना पहला तटरक्षक जहाज
1978 में भारतीय नौसेना के INS Kuthar को भारतीय तटरक्षक बल को सौंपा गया और उसका नाम ICGS Kuthar रखा गया. उद्घाटन समारोह के दौरान जहाज से नौसेना का ध्वज उतारा गया और तटरक्षक बल का ध्वज फहराया गया. इसी के साथ यह भारतीय तटरक्षक बल का पहला जहाज बना। 

जहाजों के साथ बढ़ी हवाई क्षमता
तटरक्षक बल की क्षमता बढ़ाने के लिए 1978 में निर्माणाधीन दो नौसैनिक सीवर्ड डिफेंस बोट्स को भी तटरक्षक बल को देने का निर्णय लिया गया. इन्हें क्रमशः 1980 और 1981 में सेवा में शामिल किया गया था. इसके बाद 1982 में तटरक्षक बल ने चेतक हेलीकॉप्टरों को खोज और बचाव अभियानों के लिए शामिल किया. इन्हें सुरक्षा रिकॉर्ड के आधार पर मानक सर्च एंड रेस्क्यू हेलीकॉप्टर के रूप में चुना गया। 

22 मई 1982 को गोवा के डाबोलिम एयरफील्ड में भारतीय तटरक्षक बल के पहले एयर स्क्वाड्रन 800 स्क्वाड्रन (CG) को भी कमीशन किया गया। 

सात जहाजों से 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट तक
भारतीय तटरक्षक बल की शुरुआत ऐसे समय में हुई थी जब उसके पास केवल सात जहाज थे. उसका मुख्य उद्देश्य समुद्री तस्करी पर नियंत्रण, कानून प्रवर्तन और समुद्री क्षेत्रों की निगरानी था. समय के साथ भारत के समुद्री हितों, व्यापारिक गतिविधियों और सुरक्षा आवश्यकताओं का दायरा बढ़ता गया. इसके अनुरूप तटरक्षक बल का भी विस्तार हुआ। 

आज भारतीय तटरक्षक बल 11,099 किलोमीटर लंबे भारतीय समुद्री तट की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उसके पास 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट हैं, जो निगरानी, गश्त, खोज एवं बचाव और समुद्री सुरक्षा संबंधी विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। 

भारत की समुद्री सुरक्षा का अहम स्तंभ
भारतीय तटरक्षक बल का इतिहास दिखाता है कि कैसे एक छोटे समुद्री बल ने सीमित संसाधनों के साथ शुरुआत की और धीरे-धीरे देश की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया. सात जहाजों से शुरू हुआ यह सफर आज 154 जहाजों और 82 एयरक्राफ्ट तक पहुंच चुका है, जो भारत के समुद्री हितों की रक्षा में लगातार सक्रिय हैं। 

 

हाईवे पर बीच रास्ते में फंसी गाड़ियों को मिलेगी तुरंत मदद, NHAI की 24X7 सेवा की तैयारी

 नई दिल्‍ली
 भारत में नेशनल हाइवे और एक्‍सप्रेस की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। जिसके कारण अब लोग लंबी दूरी की यात्रा भी अपनी कार से कर रहे हैं। लेकिन कई बार गाड़ी खराब होने या पंचर होने जैसी स्थिति में लोग परेशान हो जाते हैं और घंटों तक मदद का इंतजार करते हैं। ऐसे लोगों के लिए NHAI की ओर से नई सेवा को शुरू करने की तैयारी की जा रही है। यह क्‍या है और किस तरह से लोगों को मदद मिल पाएगी। हम आपको इस खबर में बता रहे हैं।

शुरू होगी सेवा
सरकार की ओर से लगातार नए हाइवे और एक्‍सप्रेस वे को बनाया जा रहा है। जिस कारण अब लंबे सफर को कार से पूरा करना भी आसान हो गया है। सफर के दौरान कार खराब हो जाए या फिर टायर पंचर हो जाएं तो परेशानी हो जाती है। इस परेशानी के हल के लिए अब नई सेवा को शुरू करने की तैयारी हो रही है।

जनसुविधाओं का नेटवर्क होगा तैयार
अब देशभर के नेशनल हाइवे और एक्‍सप्रेस वे पर जन सुविधाओं का नेटवर्क तैयार करने की शुरुआत की जा रही है। सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से हाल में ही जानकारी दी गई है कि अब हाइवे और एक्‍सप्रेस वे पर पंचर रिपेयर और ऑटोमोबाइल वर्कशॉप को भी शामिल किया जा रहा है।

क्‍या होगा फायदा
इन दोनों सुविधाओं के कारण उन लोगों को फायदा मिल पाएगा जिनकी गाड़ी में परेशानी हो जाती है या फिर टायर पंचर होने से सफर करना रूक जाता है।

PPP मॉडल पर मिलेगी सुविधा
एनएचएलएमएल सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत दीर्घकालिक पट्टे पर सड़क किनारे आधुनिक सुविधाओं का एक नेटवर्क विकसित कर रहा है। रियायतकर्ताओं और पट्टेदारों के साथ किए गए मौजूदा समझौतों के तहत, ऐसे प्रत्येक सुविधा केंद्र (डब्ल्यूएसए) के लिए निर्धारित अनिवार्य सुविधाओं के अतिरिक्त कई सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। वाहन मरम्मत की दुकानें और पंचर ठीक करने की सुविधाएं संविदात्मक ढांचे के तहत अनुमोदित सुविधाओं में शामिल हैं।

 

LPG-LNG पर बड़ी राहत! होर्मुज का टंटा खत्म, तेल-गैस लेकर भारत पहुंचे 30 जहाज

मुंबई 

पश्चिम एशिया से भारत को अब खुशखबरी मिलने लगी हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुल गया है. ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर के बाद से लगातार भारत के तेल-गैस वाले जहाज आ रहे हैं. अब तक भारत आने वाले 30 से अधिक जहाज होर्मुज को पार कर चुके हैं. हालांकि, अब भी दर्जनों जहाज होर्मुज को पार करने का इंतजार कर रहे हैं. भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए होर्मुज वाला समुद्री रास्ता काफी अहम है. कतर से गैस हो या खाड़ी देशों से तेल… भारत इसी रास्ते से अधिकतर माल मंगाता है. दुनिया भर में होने वाली एनर्जी सप्लाई का पांचवां हिस्सा यहीं से गुज़रता है. भारत के लिए एलएनजी और एलपीजी की खरीद के मुख्य पार्टनर खाड़ी देश ही हैं। 

शिपिंग मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से दावा किया कि भारत आने वाले अब तक 30 जहाज होर्मुज को पार कर चुके हैं. जी हां, भारत आने वाले 30 जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़र चुके हैं. 26 जहाज इस अहम समुद्री रास्ते से गुजरने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. होर्मुज को अभी तक जितने जहाज पार किए हैं, उनमें से आधे जहाजों में एलपीजी और एलएनजी है. वहीं, आठ में बल्क कार्गो और सात क्रूड ऑयल टैंकर थे। 

कब कितने जहाज निकले होर्मुज से
डेटा से पता चला है कि 1 मार्च से 17 जून के बीच 19 जहाजों ने होर्मुज को पार किया है. ईरान-अमेरिका की ओर से MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद 11 जहाज सुरक्षित रूप से इस होर्मुज जलडमरूमध्य से पार कर चुके हैं. इनमें से कुछ जहाज भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच गए हैं या पहुंचने वाले हैं. इन 30 जहाजों में से 17 विदेशी झंडे वाले जहाज . इनमें सबसे अधिक पांच मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले जहाज शामिल हैं। 

26 अब भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत से जुड़े 26 जहाज अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे हैं. ये जहाज अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. फारस की खाड़ी होर्मुज के पश्चिम में है. अभी इन 26 जहाजों ने होर्मुज पार नहीं किया है. इन 26 जहाजों में भारतीय झंडे वाले और भारत आने वाले विदेशी झंडे वाले दोनों तरह के जहाज शामिल हैं. इन जहाजों में तीन में ईंधन, 10 में फर्टिलाइजर यानी खाद है और बाकी 13 में अन्य सामान लदा है. गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान पर अटैक किया था. तब से ही होर्मुज में हाहाकार मचा था. अमेरिका-ईरान के बीच समझौता होने के बाद यह होर्मुज खुला है। 

भारत ने रोका सिंधु का पानी, संकट में घिरा पाकिस्तान; बाढ़ आते ही बदली कहानी, अब सिंधु सभ्यता का सहारा क्यों?

नई दिल्ली

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित करने का फैसला लिया. इसके बाद पाकिस्तान में भयंकर पानी का संकट खड़ा हो गया. जिसकी गूंज उसके सरकारी दफ्तरों से लेकर सड़कों तक सुनाई देने लगी. पाकिस्तान के जल प्रबंधन से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि 2025 के खरीफ सीजन की शुरुआत में वहां के अधिकारी 21 फीसदी तक पानी की कमी का अनुमान लगा रहे थे. झेलम और चिनाब नदी में पानी के कम फ्लो को लेकर चिंता बढ़ रही थी. पंजाब और सिंध जैसे कृषि प्रधान प्रांतों में आशंका थी कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलेगा. हालात ऐसे बन रहे थे कि पाकिस्तान को अपने जलाशयों का इस्तेमाल बेहद सावधानी से करना पड़ सकता था. लेकिन तभी प्रकृति ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरी तस्वीर बदल दी। 

दिलचस्प बात यह है कि जिस संकट की तैयारी पाकिस्तान कर रहा था, वह आखिरकार आया ही नहीं. भारत के फैसले के बाद जल संकट का डर लगातार बढ़ रहा था. पाकिस्तान के अधिकारियों ने अपनी बैठकों में ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम जल आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ का भी जिक्र किया. लेकिन कुछ महीनों बाद ऊपरी इलाकों में बर्फ तेजी से पिघली और अगस्त 2025 में आई भीषण बाढ़ ने पाकिस्तान की जल स्थिति को पूरी तरह बदल दिया. जो देश पानी की कमी से जूझने की तैयारी कर रहा था, उसके जलाशय कुछ ही महीनों में लगभग पूरी क्षमता तक भर गए. हालांकि यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही, क्योंकि अब एक नया और कहीं बड़ा खतरा सामने खड़ा दिखाई दे रहा है। 

जल संकट की तैयारी में जुटा था पाकिस्तान
पाकिस्तान की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक खरीफ सीजन शुरू होने से पहले देश के दो सबसे बड़े जलाशय टरबेला और मंगला लगभग डेड स्टोरेज स्तर के करीब पहुंच चुके थे. पिछले सीजन का बचा हुआ पानी भी बेहद कम था. ऐसे में अधिकारियों ने पूरे सिस्टम में करीब 21 फीसदी जल कमी का अनुमान लगाया था. हालात को देखते हुए पूरे सीजन के लिए जल वितरण योजना को भी टाल दिया गया था. सबसे ज्यादा असर पंजाब और सिंध पर पड़ने की आशंका जताई गई थी, क्योंकि पाकिस्तान की सिंचित कृषि का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर करता है। 

    पाकिस्तानी अधिकारियों की चिंताओं की वजह भी थी. रिपोर्ट के अनुसार कई बैठकों में झेलम-चिनाब नदी प्रणाली में कम जल प्रवाह को लेकर गंभीर चर्चा हुई. एक बैठक में अधिकारियों ने साफ तौर पर कहा कि ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ से निपटने के लिए जलाशयों का संचालन बेहद सावधानी से करना होगा ताकि सभी प्रांतों को निर्धारित हिस्से का पानी मिल सके। 

फिर बदली किस्मत, बाढ़ बनी वरदान
सीजन के दूसरे हिस्से में मौसम ने अप्रत्याशित करवट ली. ऊपरी सिंधु बेसिन में तापमान बढ़ने से बर्फ तेजी से पिघलने लगी. इससे नदी में पानी का प्रवाह बढ़ गया. इसके बाद अगस्त 2025 के आखिर में चिनाब और पूर्वी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश हुई. इस बारिश ने बड़े पैमाने पर बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने खरीफ सीजन के लिए 104.03 मिलियन एकड़ फीट (MAF) जल प्रवाह का अनुमान लगाया था. लेकिन वास्तविक जल प्रवाह 122.36 MAF दर्ज किया गया, जो अनुमान से करीब 18 फीसदी अधिक था. इससे पाकिस्तान का पूरा जल संतुलन बदल गया. जहां पहले कमी की आशंका थी, वहीं बाद में जरूरत से ज्यादा पानी मिलने लगा। 

99 फीसदी तक भर गए जलाशय
बाढ़ और बर्फ पिघलने से मिले अतिरिक्त पानी का असर बहुत जल्दी दिखाई देने लगा. सितंबर 2025 तक पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय लगभग 99 फीसदी क्षमता तक भर चुके थे. सीजन की शुरुआत में जो जलाशय डेड स्टोरेज के करीब थे, वे कुछ ही महीनों में पानी से लबालब हो गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोटरी बैराज के नीचे बहने वाले अतिरिक्त पानी की मात्रा 30.85 MAF तक पहुंच गई थी. यह अनुमानित मात्रा से तीन गुना अधिक और पिछले पांच सालों के औसत से लगभग 71 फीसदी ज्यादा थी. यानी जिस संकट से पाकिस्तान डर रहा था, उसे प्रकृति ने अस्थायी तौर पर टाल दिया। 

लेकिन अब सामने है टरबेला डैम का बड़ा संकट
हालांकि पाकिस्तान को बाढ़ ने तत्काल संकट से राहत दिला दी, लेकिन उसकी जल व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी अब भी बरकरार है. रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता टरबेला जलाशय की घटती क्षमता को लेकर जताई गई है. टरबेला पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक डैम नहीं, बल्कि उसकी कृषि और जल सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है. जब टरबेला डैम शुरू हुआ था तब इसकी लाइव स्टोरेज क्षमता 9.68 MAF थी. लेकिन अब यह घटकर करीब 5.73 MAF रह गई है. यानी दशकों में इसमें लगभग 48 फीसदी क्षमता की कमी आ चुकी है. इसका मुख्य कारण तलछट (Sediment) का लगातार जमा होना बताया गया है। 

इस्लाम भूला पाकिस्तान, सिंधु घाटी सभ्यता को क्यों कर रहा याद

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने जो सिंधु जल समझौते पर भारत को जंग की धमकी दी तो भारत ने जवाब तो दे दिया. लेकिन पिछले साल से पाकिस्तान एक और बड़ा खेल खेलने लग गया है जिसपर ध्यान देने की ज़रूरत है. आज तक पाकिस्तान कभी सिंधु घाटी सभ्यता का नाम भी नहीं लेता था. वो तो अपने स्कूलों-कॉलेजों में उसके बारे में ना ज़्यादा पढ़ाता था और ना ही ज़्यादा कोई रिसर्च वगैरह करवाता था. क्योंकि पाकिस्तान ने अपनी पहचान ही इस्लाम पर खड़ी कर के रखी है. और अपना इतिहास भी वहीं से शुरू हुआ मानता है, जब साल 712 में मोहम्मिद बिन क़ासिम ने हमला कर के सिंध पर क़ब्ज़ा कर लिया था. यानी आज तक वो अपने लोगों को भी यही पढ़ाता था कि जहां से इस्लाम इस इलाक़े में आया वहीं से एक तरह से इतिहास शुरू होता है. लेकिन अब उसको अचानक सिंधु घाटि सभ्यता याद आने लग गई है. अब वो अचानक पिछले कुछ दिनों में सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी राष्ट्रीय पहचान का बहुत बड़ा हिस्सा बताता फिर रहा है। 

ये कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है. सोचने वाली बात ये कि है कि अब अचानक पाकिस्तान को हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (मूअन-जो-दड़ो) से इतना प्यार कहां से हो गया? किसको बेवकूफ़ बनाने की कोशिश हो रही है ये? ये सिंधु नदी के पानी पर अपना ऐतिहासिक हक़ जताने का पैंतरा है, ये क्या किसी को समझ नहीं आ रहा? मूअन-जो-दड़ो में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी खुदाई 1965 में पाकिस्तान ने रुकवा दी थी. एक अमेरिकी जॉर्ज डेल्स तब वो खुदाई कर रहे थे. लेकिन पाकिस्तान तो अपने को फ़ारस की सभ्यता से जुड़ा हुआ बताने में ज़्यादा इंटरेस्टेड, अरब की इस्लामी सभ्यता से ख़ुद को जुड़ा हुआ बताने में ज़्यादा इंटरेस्टेड था। 

पाकिस्तान का सिंधु पर नया गेम समझिए
असली कहानी ये है कि पाकिस्तान अब सिंधु घाटी सभ्यता और इस्लाम से पहले की विरासत का इस्तेमाल करके खुद को सिंधु नदी का वारिस बताना चाहता है. ताकि सिंधु नदी के पानी पर अपना दावा मज़बूत कर सके. अब वो मूअन-जो-दड़ो की बात कर रहा है, तक्षशिला को अपनी विरासत बता रहा है, गांधार उसको याद आ रहा है, बलूचिस्तान का मेहरगढ़ याद आ रहा है. अब तक इस्लाम से पहले का इतिहास उसको नज़र ही नहीं आता था. सरकार वहां डॉक्यूमेंट्रियां बनवा रही है, सेमिनार कर रही है और विदेशों में कार्यक्रम कर रही है कि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की पहचान का मुख्य हिस्सा है। 

पाकिस्तान की पानी वाली पॉलिटिक्स समझिए
तक्षशिला में टूरिज़्म करवाया जा रहा है, बड़ा म्यूज़ियम बनाने की बात हो रही है. गांधार की बौध विरासत और मेहरगढ़ को भी इसमें शामिल किया जा रहा है ताकि पाकिस्तान को हज़ारों साल पुरानी लगातार चली आ रही सभ्यता का वारिस बताया जा सके. अप्रैल में वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने विश्व धरोहर दिवस पर तो ये तक कह दिया कि पाकिस्तान सिंधु घाटी, मेहरगढ़ और गांधार सभ्यताओं का चौराहा है. हालांकि इस पर अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने तीखा जवाब दिया कि गांधार का मुख्य इलाक़ा अफगानिस्तान में है और कोई एक देश इस विरासत का पूरा मालिक नहीं बन सकता. हाल ही में पाकिस्तान में ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर टिमथी केन तक्षशिला गए और कहा कि ये जगह ज्ञान का केंद्र थी जो इस पूरे इलाके को जोड़ती थी. तो पाकिस्तान के एक विश्लेषक हैं अकबर अली शाह, उन्होंने जवाब में लिखा कि सिंधु पाकिस्तान की है और उसका इतिहास भी पाकिस्तान का है. तो ये सब जो सिंधु नदी के लिए प्यार उमड़ रहा है और अपने आप को सिंधु नदी का वारिस बताने की कोशिश हो रही है ये सिंधु जल समझौता रोके जाने के बाद ही क्यों हुई क्या किसीको समझ नहीं आता? बहुत अच्छी बात है अगर आप अपनी पहचान इस्लाम से पहले से जोड़ने की कोशिश कर रहे हो. क्योंकि जब यूनानी इस इलाक़े में आए तो सिंधु को उन्होंने इंडस बोला। 

पाकिस्तान किस मुंह से उस सभ्यता का वारिस?
और इंडस के लोगों को बोला इंडो. और ये इलाक़ा हुआ इंडिया. फिर जब फ़ारस के लोग आए तो फ़ारसी में ‘स’ का ‘ह’ हो जाता है. इसलिए सात दिनों का जो यहां सप्ताह था, उसको उन्होंने बोला हफ़्ता. और जैसे सप्ताह का हफ़्ता हो गया, वैसे ही सिंध का हिंद हो गया और सिंधु नदी के लोग कहलाए गए हिंदू. तो बहुत अच्छी बात है कि पाकिस्तान कह रहा है कि वो सिंधु घाटी सभ्यता का वारिस है. क्योंकि इंडस का वरिस तो इंडिया है, सिंधु का वारिस तो हिंद है. टू-नेशन थ्योरी की धज्जियां तो उड़ ही चुकी थीं 1971 में, उसको दफ़्न करने के लिए थैंक यू. बता देना आसिम मुनीर को भी. और सिधु घाटी सभ्यता की बात करते हो तो पता है आपको इतनी सारी खुदाई के बाद भी वहां सब कुछ मिला, एक भी हथियार नहीं निकला है खुदाई में. तो किस मुंह से ख़ुद को उस सभ्यता का वारिस बताते हो? तो ये मत समझना कि ये सब लारे-लप्पे लगाकर पानी मिल जाएगा. याद है वो समझौता क्यों रोका गया था? आतंक और पानी एक साथ नहीं बह सकते. सौ बात की एक बात। 

पाकिस्तान का सिंधु पर यूटर्न
वो तो इस्लाम आने से पहले भारत का जो इतिहास था उससे अपने आपको जोड़ कर ही नहीं देखना चाहता था. तो मूअन-जो-दड़ो में उसने 1965 में खुदाई रुकवा दी थी. जबकी भारत में तो गुजरात और राजस्थान में सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों पर खोज चलती रही थी. लेकिन पिछले साल भारत ने सिंधु जल समझौते पर रोक लगाई तो पाकिस्तान ने मूअन-जो-दड़ो में फिर से खुदाई शुरू करवा दी. अब बिलावल भुट्टो-ज़रदारी भी कहते हैं कि वो तो सिंधु घाटी सभ्यता के वारिस हैं. अब वो ख़ुद को सिंधु के सच्चे रखवाले बता रहे हैं. अब तक तो आसिम मुनीर टू-नेशन थ्योरी के गाने गा रहे थे. अब इस्लाम से पहले का इतिहास याद आने लग गया है पाकिस्तान को। 

बाढ़ भी नहीं सुलझा सकती यह समस्या
    सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार मई 2022 में टरबेला की लाइव स्टोरेज 5.827 MAF थी, जो मार्च 2026 तक घटकर 5.580 MAF रह गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 के दौरान इसमें सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई. अधिकारियों का मानना है कि असामान्य रूप से अधिक तलछट आने के कारण यह स्थिति बनी है। 

    टरबेला डैम पाकिस्तान की बिजली उत्पादन क्षमता और सूखा प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाता है. ऐसे में इसकी घटती क्षमता भविष्य में पाकिस्तान के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ अतिरिक्त पानी तो दे सकती है, लेकिन जलाशयों में जमा हो रही तलछट की समस्या का समाधान नहीं कर सकती। 

खाद्य सुरक्षा पर भी मंडरा रहा खतरा
सिंधु बेसिन सिंचाई सिस्टम पाकिस्तान की लगभग 90 फीसदी कृषि उत्पादन जरूरतों को पूरा करती है. ऐसे में सिंधु नदी प्रणाली में किसी भी तरह का बदलाव सीधे खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है. अगर टरबेला और अन्य जलाशयों की क्षमता लगातार घटती रही, तो भविष्य में पाकिस्तान को कृषि उत्पादन और जल वितरण दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। 

फिलहाल 2025 का संकट टल गया था, लेकिन पाकिस्तान की नई जल मूल्यांकन रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि असली चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. भारत के फैसले, बदलते मौसम और जलाशयों की घटती क्षमता के बीच पाकिस्तान की जल सुरक्षा आने वाले वर्षों में बड़ी परीक्षा से गुजर सकती है। 

 

CRED के पास करोड़ों यूजर्स का डेटा, क्या मार्क जुकरबर्ग को मिलेगा एक्सेस? उठे बड़े सवाल

 नई दिल्ली

अगर आप पुराने फेसबुक यूजर हैं तो आपको ये बात पता होगी. फेसबुक के लॉगइन पेज पर एक टैगलाइन लिखी होती थी. ‘फेसबुक फ्री है और हमेशा फ्री रहेगा’. लेकिन ऐसा नहीं है फेसबुक अब दर्जनों पेड सर्विस चलाता है और डेटा बेचता है। 

दिलचस्प ये है कि कई साल पहले ही वो टैगलाइन भी कंपनी ने लॉगइन पेज से हटा ली. एक वादा टूटा. फिर जब वॉट्सऐप को जकरबर्ग ने खरीदा तो एक और वादा किया गया. वादा ये था कि वॉट्सऐप को अलग रखा जाएगा और इसका डेटा नहीं बेचा जाएगा ना वॉट्सऐप से कमाई की जाएगी. ये वादा भी काफी पहले टूट चूका। 

हर बार जकरबर्ग ने तोड़ा है वादा, क्या कुणाल शाह भी ऐसा करेंगे?

अब एक और वादा देखने को मिला है. भारतीय ऐप क्रेड के फाउंडर कुणाल शाह वॉट्सऐप के ग्लोबल सीईओ बन गए हैं और क्रेड में मेटा ने 900 मिलियन डॉलर्स निवेश कर दिया है. लोगों को तुरंत लगा कि अब क्रेड का डेटा भी फेसबुक का हो जाएगा, लेकिन जैसे फेसबुक और वॉट्सऐप के शुरुआती समय में वादा किया गया था, यहां भी एक वादा दिखा। 

कंपनी का स्टैंड है कि वो क्रेड का डेटा नहीं देगी. लेकिन क्या आप इस बात को मानेंगे कि मेटा, मार्क जकरबर्ग और क्रेड के कुणाल शाह अपने इस वादे पर कायम रहेंगे? कब तक? 

वॉट्सऐप दो लोगों ने मिलकर बनाया था. ब्रायन ऐक्टन और जेन कूम. दोनों ही प्राइवेसी के बड़े एडवोकेट थे और डेटा नहीं बेचना चाहते थे. उन्होंने तय किया था कि वो कुछ भी हो जाए, लेकिन यूजर डेटा नहीं बेचेंगे। 

ऐप ने खूब तरक्की की और बाद में फेसबुक ने वॉट्सऐप को खरीद लिया. मार्क जकरबर्ग का वादा था कि वो वॉट्सऐप से कभी पैसे नहीं कमाएंगे और ना ही वॉट्सऐप का यूजर डेटा बेचेंगे। 

कुछ साल सबकुछ ठीक चला, लेकिन मार्क जकरबर्ग अपनी आदत के मुताबिक पूराना वादा भूल गए और वॉट्सऐप का यूजर डेटा पेरेंट कंपनी यानी फेसबुक सर्विसेज के साथ शेयर होने लगा. आलम ये है कि अब वॉट्सऐप पर ऐड्स आ रहे हैं और पेड प्लान लॉन्च हो गए हैं। 

वॉट्सऐप के फाउंडर का मैने इंटरव्यू किया तो उन्होंने बाताया था कि वॉट्सऐप की असली ताकत काफी पहले खत्म हो चुकी है. शुरुआत में वॉट्सऐप के दोनों फाउंडर्स ऐप बिकने के बाद भी कंपनी में काम करते रहे, लेकिन धीरे धीरे डेटा शेयरिंग को लेकर मार्क जकरबर्ग से उनकी तकरार बढ़ी और दोनों ने ही वॉट्सऐप को छोड़ दिया। 

क्रेड और कुणाल शाह के पास भारतीय यूजर्स का संवेदनशील डेटा
असल में क्रेड एक डेटा प्लेटफॉर्म है, जो भारत के सबसे प्रीमियम यूजर्स का बेहद गहरा और संवेदनशील डेटा अपने पास रखता है. यह डेटा सिर्फ नाम और नंबर तक सीमित नहीं है. इसमें यूजर का खर्च करने का तरीका, उसकी फाइनेंशियल आदतें, उसकी क्रेडिट हिस्ट्री, यहां तक कि उसकी लाइफस्टाइल तक शामिल है। 

अगर कोई यूजर अपने ईमेल को क्रेड से लिंक करता है, तो ऐप को उसके क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट, बिल, इंश्योरेंस, निवेश और लोन से जुड़ी जानकारी तक पहुंच मिल जाती है. यानी यूजर की पूरी फाइनेंशियल प्रोफाइल एक ही जगह तैयार हो जाती है। 

यही वजह है कि भले ही क्रेड सालों से घाटे में चल रही कंपनी रही हो, लेकिन उसकी वैल्यू कम नहीं हुई. क्योंकि टेक दुनिया में आज सबसे कीमती चीज प्रॉफिट नहीं, डेटा है. और वो भी ऐसा डेटा जो क्लीन हो, भरोसेमंद हो और हाई-वैल्यू यूजर्स का हो। 

अब इसे वॉट्सऐप के साथ जोड़कर देखिए. भारत में वॉट्सऐप के 50 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं. यह दुनिया का सबसे बड़ा वॉट्सऐप बाजार है. लेकिन इतने बड़े यूजर बेस के बावजूद वॉट्सऐप की सबसे बड़ी समस्या रही है… कमाई। 

मेटा पिछले कई सालों से वॉट्सऐप को मोनेटाइज करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे वैसी सफलता नहीं मिली जैसी गूगल पे, फोन पे या पेटीएम को मिली. यहीं पर CRED और कुनाल शाह का रोल अहम हो जाता है। 

मेटा के लिए क्यों जरूरी हैं कुणाल शाह?
कुणाल शाह ने FreeCharge से लेकर CRED तक एक चीज बार-बार साबित की है, वह टेक्नोलॉजी से ज्यादा लोगों के बिहेवियर को समझते हैं. वह जानते हैं कि यूजर कब खर्च करता है, क्यों करता है और उसे किस तरह के ऑफर से रोका या बढ़ाया जा सकता है. सबसे बड़ी बात कुणाल शाह के ऐप के पास भारतीय यूजर्स के सेंसिटिव डेटा का भरमार है. ऐसा डेटा जो मेटा भारत में अब तक हासिल नहीं कर पाया है। 

मेटा को अब ऐसे ही लीडर की जरूरत है. क्योंकि वॉट्सऐप का अगला फेज सिर्फ मैसेजिंग का नहीं, बल्कि पेमेंट, लोन, इंश्योरेंस और शॉपिंग का होने वाला है. लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा और ज्यादा गंभीर पहलू भी है। 

जब फेसबुक ने वॉट्सऐप को खरीदा था, तब यह कहा गया था कि वॉट्सऐप यूजर डेटा को फेसबुक के साथ शेयर नहीं करेगा. लेकिन समय के साथ यह वादा कमजोर होता गया. आज वॉट्सऐप और मेटा के बीच डेटा शेयरिंग को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं। 

अब मेटा ने क्रेड में करीब 900 मिलियन डॉलर का निवेश किया है. साथ ही क्रेड के फाउंडर को वॉट्सऐप की कमान सौंपी जा रही है. मेटा यह जरूर कहता है कि उसे क्रेड यूजर डेटा तक सीधी पहुंच नहीं मिलेगी. लेकिन टेक इंडस्ट्री के पैटर्न को देखें तो यह भरोसा पूरी तरह से सहज नहीं लगता। 

इतिहास यही बताता है कि जब निवेश, लीडरशिप और प्लेटफॉर्म एक ही दिशा में जुड़ते हैं, तो डेटा का फ्लो भी धीरे-धीरे उसी डायरेक्शन में बढ़ता है. अगर फ्यूचर में क्रेड और वॉट्सऐप के बीच किसी भी तरह का डेटा इंटीग्रेशन होता है, तो इसके नतीजे बहुत बड़े हो सकते हैं. क्योंकि क्रेड के पास भारत के सबसे प्रीमियम और फाइनेंशियली एक्टिव यूजर्स का डेटा है, जबकि वॉट्सऐप के पास सबसे बड़ा यूजर बेस। 

क्रेडिट कार्ड और तमाम फिनांशियल डिटेल्स
इन दोनों के मेल से एक ऐसा सिस्टम बन सकता है जो यूजर के बिहेवियर को समझकर उसे टारगेटेड ऑफर दे, लोन दे, खरीदारी कराए और पूरी डिजिटल लाइफ को कंट्रोल करे. यह सुविधा के नाम पर एक सुपर ऐप होगा, लेकिन इसके पीछे डेटा सेंट्रलाइज्ड भी होगा। 

भारत के लिए यह स्थिति और सेंसिटिव है. भारत पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल मार्केट बन चुका है. यहां के यूजर्स की संख्या भी सबसे ज्यादा है और डेटा भी. ऐसे में अगर इस डेटा का इस्तेमाल सिर्फ कंपनियों के फायदे के लिए होता है, तो यह चिंता का विषय है। 

कुणाल शाह की कहानी जरूर एक नजीर है. उन्होंने 2010 में फ्रीचार्ज नाम का ऐप शुरू किया, जिसे 2015 में स्नैपडील को लगभग 449 मिलियन डॉलर में बेच दिया। 

दिलचस्प बात यह है कि स्नैपडील ने कुछ ही सालों बाद फ्रीचार्ज ऐप को भारी नुकसान में बेच दिया. इसके बाद 2018 में उन्होंने क्रेड शुरू किया, जो आज भी कई सालों से घाटे में होने के बावजूद एक हाई-वैल्यू कंपनी बनी हुई है। 

हाल ही में ये भी देखने को मिल रहा है कि कैसे भारत को ग्लोबल AI कंपनियां डेटा कलेक्शन के लिए यूज कर रही हैं. चूंकि भारत में सबसे ज्यादा यूजर्स हैं, इसलिए फ्री सर्विसेज दे कर यहां के यूजर्स के डेटा पर एआई को ट्रेन किया जा रहा है. अगर इतना डेटा कंपनी खरीदे तो अरबों डॉलर्स देने होते, लेकिन भारतीय यूजर्स फ्री में ग्लोबल एआई मॉडल्स को ट्रेन कर रहे हैं. इतना ही नहीं, अमेरिकी कंपनियां अपने एडवांस्ड एआई मॉडल भारत में लॉन्च भी नहीं कर रही हैं। 

ये तमाम चीजें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि क्या भारत फिर से सिर्फ एक डेटा सोर्स बनकर रह जाएगा? क्या भारतीय यूजर्स की फाइनेंशियल और पर्सनल जानकारी धीरे-धीरे ग्लोबल टेक कंपनियों के कंट्रोल में चली जाएगी? और क्या हम सुविधा के बदले अपनी डिजिटल पहचान और प्राइवेसी खो देंगे?

परिवहन सचिव ने बस संचालकों और अधिकृत वेंडरों के साथ की समीक्षा बैठक

रायपुर

छत्तीसगढ़ में यात्री सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए परिवहन विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। अब सभी यात्री बसों में वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) लगाना और उसे सक्रिय रखना अनिवार्य होगा। निर्धारित समय सीमा के भीतर नियम का पालन नहीं करने वाले बस संचालकों के खिलाफ मोटरयान अधिनियम, 1988 के तहत कार्रवाई की जाएगी।
        
 परिवहन सचिव एवं परिवहन आयुक्त श्री एस. प्रकाश ने आज इंद्रावती भवन नवा रायपुर स्थित परिवहन कार्यालय में सभी बस संचालकों एवं विभाग द्वारा वीएलटीडी लगाने हेतु अधिकृत वेंडरों की संयुक्त बैठक लेकर यात्री बसो में स्थापित वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस की अद्यतन स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कहा है कि जिन बसों में अभी तक वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) नहीं लगी है, उनमें 15 दिनों के भीतर इसे अनिवार्य रूप से स्थापित किया जाए। वहीं जिन बसों में यह उपकरण लगा हुआ है लेकिन संचालित नहीं है, उन्हें तत्काल चालू किया जाए।
          
परिवहन विभाग के अनुसार वर्ष 2025 में राजस्थान के फलोदी और तेलंगाना के रंगारेड्डी में हुए भीषण सड़क हादसों के बाद सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों और भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुरूप यह निर्णय लिया गया है। सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने वाली महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था लागू की जा रही है।
           
विभाग ने बताया कि राज्य मुख्यालय के कमांड एवं नियंत्रण केंद्र से सभी बसों की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी। उपग्रह आधारित ट्रैकिंग प्रणाली के माध्यम से यह पता लगाया जा सकेगा कि बस निर्धारित मार्ग पर चल रही है या नहीं तथा समय पर संचालन हो रहा है या नहीं। यात्रियों को भी संगवारी ऐप के जरिए बसों की वास्तविक समय की लोकेशन की जानकारी मिल सकेगी।
      
अतिरिक्त परिवहन आयुक्त श्री डी. रविशंकर ने बताया कि राज्य के सभी जिलों में स्वचालित नंबर प्लेट पहचान कैमरे और बुद्धिमान यातायात प्रबंधन प्रणाली स्थापित की जा रही है। इससे नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों की तत्काल पहचान कर कार्रवाई की जा सकेगी।
    
उल्लेखनीय है कि वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस एक ऐसी उपग्रह आधारित प्रणाली है, जो वाहन की हर पल की स्थिति और लोकेशन की जानकारी नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाती है। किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराने में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। परिवहन विभाग ने स्पष्ट किया है कि 15 दिन की मोहलत समाप्त होने के बाद नियमों की अनदेखी करने वाले बस संचालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

MP ट्रांसको का बड़ा कदम, वेंडर-फ्रेंडली पोर्टल लॉन्च; बिल से भुगतान तक होगी रियल-टाइम ट्रैकिंग

एमपी ट्रांसको ने लॉन्च किया वेंडर-फ्रेंडली पोर्टल

बिल से लेकर भुगतान तक की रियल-टाइम ट्रैकिंग होगी संभव : ऊर्जा मंत्री तोमर

भोपाल

ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने बताया कि डिजिटल इंडिया अभियान में प्रदेश के ऊर्जा विभाग की भागीदारी को और आगे बढाते हुए मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी (एमपी ट्रांसको) ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। इसके तहत कंपनी के वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स की पारदर्शिता के लिए अत्याधुनिक वेंडर-फ्रेंडली पोर्टल लॉन्च किया गया है। इस पोर्टल के माध्यम से वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स अपने बिलों की संपूर्ण प्रक्रिया को ऑनलाइन और रियल-टाइम में ट्रैक कर सकेंगे।

तोमर ने बताया कि वर्तमान में कार्यरत वेंडर्स एवं कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए वर्ष 2022 से इंटरनेट आधारित वेंडर्स पोर्टल संचालित है। इस व्यवस्था के तहत कॉन्ट्रैक्ट्स एवं वेंडर्स अपने देयक, आवश्यक दस्तावेज एवं अन्य संबंधित जानकारी ऑनलाइन प्रस्तुत करते हैं तथा उनके बिलों की जांच, स्वीकृति, भुगतान एवं अन्य समस्त प्रक्रियाएं पूर्णतः डिजिटल माध्यम से संपादित की जाती हैं। पोर्टल के जरिए बिलों की वर्तमान स्थिति की जानकारी कॉन्ट्रैक्टर्स को एसएमएस एवं ई-मेल के माध्यम से स्वतः प्राप्त होती रहती है। साथ ही वे किसी भी समय लॉग-इन कर अपने देयकों एवं भुगतान की अद्यतन स्थिति देख सकते हैं।

बढेगी पारदर्शिता

ऊर्जा मंत्री ने बताया कि इस डिजिटल व्यवस्था के पूर्ण रूप से लागू होने पर वेंडर्स, कांट्रेक्टर्स एवं अधिकारियों के समय की बचत होगी, कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी तथा देयक निपटान प्रक्रिया अधिक सरल, त्वरित एवं प्रभावी बन सकेगी।

सुविधा का किया जा रहा है विस्तार

एमपी ट्रांसको के संयुक्त निदेशक विकास श्रीवास्तव ने जानकारी दी कि कंपनी ने इस सुविधा का विस्तार करते हुए टर्नकी कॉन्ट्रैक्ट्स के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के कॉन्ट्रैक्ट्स से जुड़े वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स के लिए भी इंटरनेट आधारित वेब पोर्टल प्रारंभ की है। इसके माध्यम से वेंडर्स अपने मोबाइल, टैबलेट अथवा कंप्यूटर से कहीं से भी लॉग-इन कर संबंधित कार्यालय में ऑनलाइन देयक प्रस्तुत कर सकेंगे। पोर्टल की विशेषता यह रहेगी कि वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स अपने बिलों की प्रोसेसिंग की प्रत्येक अवस्था की जानकारी रियल-टाइम में प्राप्त कर सकेंगे।

 

🏠 Home 🔥 Trending 🎥 Video 📰 E-Paper Menu