SIPRI रिपोर्ट में खुलासा, ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान की परमाणु रणनीति पर सवाल

नई दिल्ली
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की जून 2026 में जारी नई रिपोर्ट ने दक्षिण एशिया की रणनीतिक सुरक्षा में एक ऐतिहासिक बदलाव को उजागर किया है. मई 2025 में हुए भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के उस परमाणु सुरक्षा कवच के भ्रम को तोड़ दिया है जिसके पीछे वह दशकों से छिपता आया था.

इस सैन्य अभियान के दौरान भारतीय वायु सेना और सेना ने सीधे पाकिस्तान के उन चुनिंदा एयरबेस और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया, जो उसके परमाणु हथियारों के बुनियादी ढांचे से जुड़े माने जाते हैं. वैश्विक स्तर पर हथियारों और सैन्य सुरक्षा पर नजर रखने वाली संस्था सिपरी की इस आधिकारिक पुष्टि ने यह साफ कर दिया है कि भारत ने पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग की नीति को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया है.

ऑपरेशन सिंदूर: जब भारत ने सीधे न्यूक्लियर ठिकानों को बनाया निशाना
मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में शुरू किए गए भारत के ऑपरेशन सिंदूर को दशकों का सबसे बड़ा सैन्य टकराव माना गया है. सिपरी की ‘इयरबुक 2026’ में यह बात रिकॉर्ड पर लाई गई है कि भारत ने इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के उन एयर और मिसाइल बेसों पर सटीक हमले किए, जिनके पास परमाणु अभियान चलाने की जिम्मेदारी थी.

इसमें पाकिस्तान के कुख्यात किराना हिल्स क्षेत्र को भी निशाना बनाया गया, जिसके बारे में माना जाता है कि वहां पाकिस्तान के गुप्त परमाणु हथियार और मिसाइल सुविधाएं मौजूद हैं. भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के रणनीतिक नूर खान एयरबेस को भी निशाना बनाया, जो पाकिस्तान का मुख्य परमाणु कमांड और कंट्रोल सेंटर माना जाता है.

पाकिस्तान हमेशा से यह दावा करता रहा है कि भारत की किसी भी बड़ी सैन्य कार्रवाई के जवाब में वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन भारत ने उसके परमाणु अड्डों पर ही पारंपरिक हमला कर इस खोखले दावे की हवा निकाल दी.

परमाणु हथियारों की होड़ में भारत आगे: बढ़े कुल वॉरहेड्स
सिपरी की रिपोर्ट में केवल सैन्य टकराव ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के परमाणु हथियारों की संख्या के ताजा आंकड़े भी जारी किए गए हैं. जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत का परमाणु हथियारों का भंडार अब बढ़कर 190 वॉरहेड्स तक पहुंच गया है, जबकि इसके मुकाबले पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार हैं.

भारत ने अपने परमाणु आधुनिकीकरण कार्यक्रम को चीन और पाकिस्तान दोनों की सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए तेज किया है, जिसके कारण पिछले एक साल में भारत के बेड़े में 10 नए परमाणु हथियार शामिल हुए हैं. हथियारों की संख्या में बढ़त ने भारत की रणनीतिक स्थिति को क्षेत्र में और अधिक मजबूत बना दिया है.   

इतिहास में पहली बार: शांतिकाल में भारत ने तैनात किए परमाणु हथियार
इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला और महत्वपूर्ण बिंदु भारत की परमाणु नीति में आया एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है. भारत ने शांतिकाल के दौरान भी अपने कुछ परमाणु हथियारों (लगभग 12 वॉरहेड्स) को ऑपरेशनली तैनात स्थिति में रखा है.

इससे पहले, भारत के सभी परमाणु हथियारों को हमेशा ‘स्टोरेज’ या रिजर्व में रखा जाता था, जिन्हें इस्तेमाल करने से पहले मिसाइलों के साथ असेंबल करना पड़ता था. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने संभवतः अपनी परमाणु-संचालित पनडुब्बी (SSBN) पर इन वॉरहेड्स को तैनात किया है, जो समुद्र के भीतर गश्त लगा रही है.

यह बदलाव भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ को कायम रखते हुए भी दुश्मन को पलक झपकते ही ‘तगड़ा और अचूक जवाबी हमला’ देने की क्षमता को प्रदर्शित करता है.   

साइबर वॉरफेयर का पहली बार खुला इस्तेमाल
सिपरी 2026 की रिपोर्ट में एक और बेहद आधुनिक पहलू का जिक्र किया गया है. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत और पाकिस्तान दोनों ने पहली बार सक्रिय सैन्य संघर्ष के साथ-साथ ‘साइबर ऑपरेशन्स’ को भी पूरी तरह से शामिल किया था.

88 घंटे चले इस संक्षिप्त लेकिन तीव्र सैन्य टकराव में पारंपरिक मिसाइल हमलों (जैसे ब्रह्मोस मिसाइल) के साथ-साथ डिजिटल मोर्चे पर भी एक-दूसरे की सैन्य संचार प्रणालियों को ठप करने की कोशिशें की गईं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहले भी यह संकेत दिया था कि भारत ने पाकिस्तान के परमाणु डर के गुब्बारे को फोड़ दिया है. अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘सिपरी’ की स्वतंत्र रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि आधुनिक दौर की जंग में भारत का पलड़ा हर मोर्चे पर भारी रहा है.  

भारत-फ्रांस साझेदारी मजबूत, पीएम मोदी ने ‘भारत इनोवेट्स’ लॉन्च को बताया नवाचार का नया मंच

नई दिल्ली
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ भारत इनोवेट्स के लॉन्च कार्यक्रम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया। रविवार को नीस में उन्होंने कहा कि इनोवेशन भारत के डीएनए में है। पीएम मोदी ने कहा, ‘दुनिया में अलग-अलग देश एक दूसरे के साथ व्यापार करते हैं। अलग-अलग देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी भी होती है लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो साझा रुचि के साथ-साथ साझा विजन से भी ड्राइव होते हैं। भारत और फ्रांस का रिश्ता कुछ ऐसा ही है। इस रिश्ते भी जुड़ाव, दृढ़ विश्वास, नवाचार, प्रेरणा, साझा मूल्य, साझा विजन भी है। इसी रिश्ते की नींव पर बीते वर्षों में हमने साथ मिलकर नई पहल शुरू की है और वैश्विक चुनौतियों के समाधान खोजने का प्रयास किया है। हम दोनों देश हमेशा एक साथ चले हैं। आज हमें खुशी है कि हम भारत इनोवेट्स की शुरुआत भी फ्रांस के साथ कर रहे हैं। मैं अपने मित्र इमैनुएल मैक्रों का यहां आने के लिए धन्यवाद करता हूं।’

पीएम मोदी ने कहा, ‘इमैनुएल मैक्रों ने अभी भारत यात्रा के दौरान उन्होंने कहा था कि इस सदी की चुनौतियों के समाधान के लिए भारत और फ्रांस को एक साथ आगे आना होगा। आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि ये पहल उसी दशा में एक कदम है। भारत इनोवेट्स हमारे टैलेंट और यूरोपियन कैपिटल के बीच एक ब्रिज बन रहा है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहां भारत के यंग माइट्स को यूपरोपियन एक्सपर्ट से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।’ उन्होंने कहा कि आज 21वीं सदी का भारत बदलाव के एक बहुत बड़े दौर से गुजर रहा है। आज भारत में एक स्टार्टअप रिवॉल्यूशन हो रहा है। इस रिवॉल्यूशन में भारत का नौजवान एक नए मानसिकता के साथ मानवता के हित में समस्याओं के समाधान ढूंढ रहा है। हमारे नौजवानों के विश्व-स्तरीय समाधान को वैश्विक मंच पर लाने का माध्यम ही भारत इनोवेट्स है।

भारत के भविष्य की एक झलक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘आज यहां इतने सारे युवा उद्यमी जुड़े हुए हैं। आपको यहां भारत के भविष्य की एक झलक दिखाई देती है। आपको भारत के युवाओं का आत्मविश्वास, आपको नए भारत की ऊर्जा दिखाई देती है। एक ऐसा भारत जो समाधान का उपभोक्ता नहीं बल्कि समाधान में योगदान देने वाला है। यहां कुछ लोग AI के जरिए ग्रामीण भारत की जिंदगी बदलने का काम कर रहे हैं, तो कुछ किसान की मदद के लिए सैटेलाइट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। आपकी क्षमता को देखते हुए, मैं कहूंगा कि भारत बड़े पैमाने पर और तेजी से इनोवेशन करता है। भारत टिकाऊ भविष्य के लिए इनोवेशन करता है और भारत पूरी दुनिया के लिए इनोवेशन करता है।’

15-मिनट सिटी: भारत में बदलता शहरी जीवन, जहां घर के पास ही मिल रही हर सुविधा

नई दिल्ली
 जरा सोच के देखिए आपको ऑफिस जाना हो और ट्रैफिक की टेंशन न हो। आपके बच्चे का स्कूल थोड़ी ही दूर पैदल रास्ते पर हो, कॉलोनी के गेट पर ही किराने की दुकान हो, सड़क के उस पार जिम हो, नीचे ही फार्मेसी हो और ऑफिस मेट्रो से या 10 मिनट की ड्राइव पर हो। वीकेंड पर मॉल, सिनेमा और रेस्टोरेंट सब पास ही हों।

शहरों में रहने वाले ज्यादातर भारतीयों के लिए यह अब कोई कल्पना नहीं रही। यह जिंदगी जीने का एक नया तरीका बनता जा रहा है। तो ’15-मिनट सिटी’ की दुनिया में आपका स्वागत है।

15 मिनट सिटी का कॉन्सेप्ट
इसका आइडिया बहुत आसान है। रोजमर्रा की जिंदगी के लिए जरूरी हर चीज काम, पढ़ाई, हेल्थकेयर, शॉपिंग, मनोरंजन और लोगों से मिलना-जुलना आपके घर से 15 मिनट की दूरी पर होनी चाहिए। चाहे आप पैदल जाएं, साइकिल से जाएं या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से थोड़ी दूर का सफर करें।

ऐसे देश में जहां रोजाना आने-जाने में आसानी से दो से तीन घंटे लगते हों वहां घर खरीदने वालों, डेवलपर्स और निवेशकों के बीच इस कॉन्सेप्ट को तेजी से अपनाया जा रहा है। JUSTO RealFintech Ltd. के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर पुष्पमित्र दास कहते हैं, “सच तो यह है कि बात एक ही चीज पर आकर रुकती है जिसे खरीदार अब बर्बाद नहीं कर सकते और वो है समय।”

उन्होंने आगे कहा, रोजाना का सफर चुपचाप शहरी जिंदगी पर लगने वाला सबसे बड़ा टैक्स बन गया है। खरीदार अब सिर्फ यह नहीं पूछते कि फ्लैट कितना बड़ा है, बल्कि यह भी पूछते हैं कि ये पता उन्हें उनकी जिंदगी का कितना हिस्सा वापस देगा? यह बदलाव भारत के रिहायशी परिदृश्य को नया रूप दे रहा है।

बदल रहा रहने का ढंग
कई दशकों तक भारत में घर खरीदने वालों का ध्यान तीन चीजों पर रहा- लोकेशन, कीमत और कब्जा मिलने का समय। पर आज जरूरतों की लिस्ट बहुत लंबी हो गई है। लोग खुली जगहें, टहलने के रास्ते, पास में स्कूल, हेल्थकेयर की सुविधा, सुरक्षा, कम्युनिटी स्पेस, मनोरंजन की सुविधाएं और खरीदारी की आसानी चाहते हैं।

इससे भी जरूरी बात यह है कि वे चाहते हैं कि ये सभी चीजें एक ही इकोसिस्टम में आपस में जुड़ी हों। दास के अनुसार, खरीदार अब सिर्फ चार दीवारों वाला घर नहीं, बल्कि एक खास तरह की जीवनशैली (लाइफस्टाइल) खरीद रहे हैं। हाइब्रिड वर्क ने घर को रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र बनाकर इस बदलाव को और तेज कर दिया है।

यही एक वजह है कि अब बड़े शहरों में नए लॉन्च होने वाले घरों में प्रीमियम और लग्जरी घरों का हिस्सा काफी ज्यादा है। खरीदार ऐसे माहौल के लिए अपना बजट बढ़ाने को तैयार हैं जो उनके जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए।

इंटीग्रेटेड टाउनशिप बना पसंदीदा विकल्प
शहरों में रहने वाले कई अमीर परिवारों के लिए ‘इंटीग्रेटेड टाउनशिप’ एक पसंदीदा विकल्प बनकर उभर रही हैं, क्योंकि इनमें एक ही मास्टर-प्लान वाले डेवलपमेंट में सुविधा, सुरक्षा, हरियाली और सामाजिक बुनियादी ढांचे जैसी सभी चीजें एक साथ मिलती हैं।

इस सुविधा के लिए कीमत चुकानी पड़ती है और खरीदार इसके लिए पैसे देने को तैयार भी दिखते हैं। दास कहते हैं, “हां और वे खुशी-खुशी ऐसा करने को तैयार हैं, बशर्ते इसकी असल कीमत हो न कि यह सिर्फ ब्रोशर पर दिखाई गई कोई दिखावटी चीज हो।”

इसका लॉजिक सीधा-सादा है। अगर स्कूल, फार्मेसी, कैफे, किराने की दुकानें और फिटनेस सेंटर पैदल दूरी पर हों तो वहां रहने वाले लोग हर हफ्ते अनगिनत घंटे बचा सकते हैं। बचाए गए उस समय का आर्थिक मूल्य है।

आरएमआर ग्रुप की डेवलपमेंट मैनेजर शगुन कालरा के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स में रहने वाले लोग सिर्फ घर के लिए पैसे नहीं दे रहे हैं। वे उस समय के लिए पैसे दे रहे हैं जो वे हर दिन बचाते हैं। वह समय जो किराने का सामान लाने, बच्चों को स्कूल छोड़ने-लाने या मेडिकल जरूरतों के लिए आने-जाने में बर्बाद हो जाता।

ऐसी जगहों पर कितनी हो सकती है फ्लैट की कीमत?
मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, चेन्नई और पुणे जैसे बड़े शहरों में एक अच्छी तरह से प्लान की गई इंटीग्रेटेड टाउनशिप में आम तौर पर 2-बीएचके अपार्टमेंट की कीमत 1.5 करोड़ रुपये से 3.5 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है।

पेंटहाउस की कीमत आम तौर पर लगभग 3.5 करोड़ रुपये से शुरू होती है और प्रीमियम डेवलपमेंट में यह आसानी से 5 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है। ऐसे डेवलपमेंट में एक ही इकोसिस्टम के अंदर रेजिडेंशियल, ऑफिस, रिटेल, वेलनेस और हॉस्पिटैलिटी जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं।

जैसे-जैसे शहरी जमीन कम होती जा रही है और भीड़-भाड़ बढ़ रही है, कालरा का मानना है कि समय के साथ यह प्रीमियम और मजबूत हो सकता है। शहरों की योजना बनाने वाले अक्सर समय की कमी की बात करते हैं। शहर में रहने वाला आम व्यक्ति घर, काम की जगह, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाओं और शॉपिंग की जगहों के बीच आने-जाने में घंटों बिताता है।

किन सिद्धातों पर आधारित है ये कॉन्सेप्ट

  • ’15-मिनट सिटी’ का कॉन्सेप्ट ठीक इसी समस्या को हल करने की कोशिश करता है। कालरा के अनुसार, सफल प्रोजेक्ट्स तीन अहम डिजाइन सिद्धांतों पर आधारित होते हैं।
  • पहला है मिक्स्ड-यूज प्लानिंग। इसमें घर, ऑफिस, स्कूल, क्लिनिक और दुकानें अलग-अलग जोन में बंटे होने के बजाय एक ही इलाके में साथ-साथ होते हैं।
  • दूसरी बात है रोजमर्रा की सुविधाओं की सोच-समझकर की गई प्लानिंग। ग्रॉसरी स्टोर, फार्मेसी, डायग्नोस्टिक सेंटर, क्रेच और प्राइमरी स्कूल जान-बूझकर टाउनशिप के मास्टर प्लान में शामिल किए गए हैं।
  • तीसरी बात है ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेशन। कालरा कहते हैं, “कोई भी टाउनशिप उन सभी सुविधाओं की नकल नहीं कर सकती जो एक शहर देता है।”
  • इसका मकसद यह पक्का करना है कि रोजमर्रा की जरूरतें पैदल दूरी पर हों, जबकि कभी-कभार होने वाली जरूरतें जैसे स्पेशलिस्ट अस्पताल, यूनिवर्सिटी या मुख्य बिजनेस इलाके मेट्रो सिस्टम या दूसरे मास ट्रांजिट नेटवर्क के जरिए आसानी से पहुंच में हों। ये सभी चीजें मिलकर लंबी दूरी की यात्रा की जरूरत को काफी हद तक कम कर देती हैं।

कंपनियों को भी यह आइडिया क्यों पसंद है?
’15-मिनट सिटी’ का कॉन्सेप्ट सिर्फ रिहायशी रियल एस्टेट को ही नहीं बदल रहा है, बल्कि यह कंपनियों के वर्कप्लेस के बारे में सोचने के नजरिए को भी बदल रहा है। ऑनवर्ड वर्कस्पेस के को-फाउंडर और सीईओ सुव्रत जैन के अनुसार, आज कंपनियां लोकेशन का मूल्यांकन कुछ साल पहले की तुलना में बहुत अलग तरह से करती हैं।

क्लाइंट्स अब सिर्फ किराए या जगह के साइज पर ध्यान नहीं देते। जैन कहते हैं, “वे पूछते हैं कि उनके लोग वहां कैसे पहुंचेंगे, बिल्डिंग के आस-पास क्या है और क्या यह जगह उस तरह के टैलेंट के लिए सही है जिसे वे लाना और बनाए रखना चाहते हैं।”

यह बदलाव कंपनियों को सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट में स्थित एक ही हेडक्वार्टर वाले पारंपरिक मॉडल से दूर जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसके बजाय, कई कंपनियां अब ऐसे डिस्ट्रिब्यूटेड ऑफिस नेटवर्क को प्राथमिकता दे रही हैं जो उन्हीं इलाकों में हों जहां कर्मचारी पहले से रहते हैं। इसका मकसद सीधा है- आने-जाने का तनाव कम करना और ऑफिस तक पहुंचना आसान बनाना।

उनका कहना है कि जो कंपनियां कर्मचारियों के रहने की जगहों के पास से काम करती हैं, वहां अक्सर ज्यादा अटेंडेंस, बेहतर जुड़ाव और कम एट्रिशन (कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर) देखने को मिलता है।

किन शहरों में हो रहा बूम
    फिलहाल सबसे ज्यादा गतिविधियां भारत के सबसे बड़े मेट्रोपॉलिटन इलाकों में केंद्रित हैं। बेंगलुरु में हॉटस्पॉट में व्हाइटफील्ड, सरजापुर रोड और एयरपोर्ट कॉरिडोर शामिल हैं।
    पुणे के खराडी, हिंजवडी, बानेर और वाकड मार्केट में भी ऐसे ही ट्रेंड देखने को मिल रहे हैं। हैदराबाद में डेवलपर्स गाचीबोवली, कोकापेट और फाइनेंशियल डिस्ट्रिक्ट पर बड़ा दांव लगा रहे हैं।
    मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में ठाणे, नवी मुंबई और पनवेल में गतिविधियां बढ़ रही हैं, जिसे बेहतर होते इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क का समर्थन मिल रहा है।
    दिल्ली-एनसीआर एक और बड़े केंद्र के तौर पर उभरा है, जहां द्वारका एक्सप्रेसवे, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड और आने वाले जेवर कॉरिडोर के किनारे कई प्रोजेक्ट्स आकार ले रहे हैं।

कालरा के अनुसार, भारत में पहले से ही कई दर्जन ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो ’15-मिनट सिटी’ की परिभाषा पर खरे उतरते हैं और मेट्रो सिस्टम के विस्तार के साथ ऐसे और भी प्रोजेक्ट सामने आने की संभावना है।

यह कॉन्सेप्ट अब बड़े मेट्रो शहरों से आगे भी फैल रहा है। लखनऊ, चंडीगढ़, देहरादून, कोयंबटूर, अहमदाबाद और कोच्चि जैसे शहर इस मॉडल की खूबियों को अपना रहे हैं, क्योंकि बढ़ती इनकम और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से खरीदारों की उम्मीदें बदल रही हैं।
क्या चुनौतियां हैं?

इन सब के बीच एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि इस मॉडल में चुनौतियां भी हैं। जमीन के बड़े और जुड़े हुए टुकड़ों को इकट्ठा करना अभी भी मुश्किल है। जमीन का मालिकाना हक अक्सर बिखरा हुआ होता है। मंजूरी की प्रक्रियाएं लंबी हो सकती हैं। बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की जरूरत होती है। सबसे जरूरी बात किफायती होना एक और बड़ी बाधा बनी हुई है।

हालांकि प्रीमियम खरीदार इंटीग्रेटेड कम्युनिटीज को अपना रहे हैं, लेकिन इस मॉडल को अलग-अलग इनकम ग्रुप्स तक फैलाने के लिए डेवलपर्स, अर्बन प्लानर्स और सरकारों के बीच सावधानी से प्लानिंग और सहयोग की जरूरत होगी।

 

भारतीय सेना ने बदले यूनिफॉर्म नियम, औपनिवेशिक परंपराओं में बड़े सुधार लागू

नई दिल्ली
भारतीय सेना ने गुलामी के दौर की परंपराओं को पीछे छोड़ते हुए अपने यूनिफॉर्म और ग्रूमिंग नियमों में बड़े ऐतिहासिक बदलाव किए हैं। नए नियमों के तहत अब फॉर्मल कार्यक्रमों में बंद गले की बंडी जैकेट पहनने की मंजूरी दे दी गई है, जबकि पारंपरिक पाउच बेल्ट को हटा दिया गया है। इसके अलावा, परेड के दौरान समीक्षा अधिकारियों के लिए तलवार ले जाने की अनिवार्यता को भी वैकल्पिक बना दिया गया है। ये सभी बदलाव सेना द्वारा जारी आर्मी यूनिफॉर्म्स-2026 (Army Uniforms-2026) नाम के एक नए 174 पन्नों के मैनुअल में दिए गए हैं। इससे पहले सेना ने करीब आठ साल पहले अपनी वर्दी को लेकर ऐसा कोई व्यापक मैनुअल जारी किया था।

इस मैनुअल के एक खंड में कहा गया है कि देश की भावनाओं और बदलती संप्रभु पहचान को ध्यान में रखते हुए ये बदलाव किए गए हैं। ये सुधार भारतीय सेना की गरिमा, कार्यक्षमता और स्थायी परंपराओं को बनाए रखते हुए औपनिवेशिक काल के बचे हुए प्रतीकों को हटाने का एक प्रगतिशील प्रयास हैं। सेना में पुराने समय से चले आ रहे रॉयल जैसे ब्रिटिशकालीन शब्दों के इस्तेमाल को भी अब पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है।

मैनुअल की प्रस्तावना में एडजुटेंट जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीपीएस कौशिक ने कहा कि यह संस्करण औपनिवेशिक काल की प्रथाओं, सामानों और शब्दावली को धीरे-धीरे हटाकर सेना के ड्रेस नियमों को समकालीन भारतीय लोकाचार के अनुरूप बनाने की दिशा में एक विचारशील कदम है।

यूनिफॉर्म में हुए मुख्य बदलाव
बंडी जैकेट की एंट्री: अधिकारियों को पहली बार औपचारिक आयोजनों में बंद गले की बंडी जैकेट पहनने की अनुमति दी गई है। इसे पूरी आस्तीन की शर्ट के ऊपर पहना जा सकता है। यह जैकेट ठोस और सौम्य रंग की होगी, जिसे बिना हुक या हुक के साथ (दोनों पैटर्न) पहना जा सकता है।

महिला अधिकारियों के लिए नियम: महिला अधिकारियों को सौम्य रंगों की साड़ी, कुर्ता-सलवार या दुपट्टे के साथ टखने तक की सीधी पैंट पहनने की अनुमति दी गई है। हालांकि, स्लीवलेस कुर्ते, प्लाजो और सिगरेट पैंट जैसे कैजुअल कपड़ों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।

नया विंटर ड्रेस: सेना ने सभी रैंकों के लिए एक नई विंटर ड्रेस ‘3B’ पेश की है, जिसमें अंगोला शर्ट के साथ बैटल जैकेट और बेरेट (टोपी) शामिल है।

पाउच बेल्ट पर रोक: मेस ड्रेस नंबर 5 और 6 से चमकीली पाउच बेल्ट को हटा दिया गया है। ये ड्रेस राष्ट्रपति भवन, राजभवन के राजकीय कार्यक्रमों या प्रधानमंत्री और सेना कमांडरों के आवासों पर आयोजित होने वाले औपचारिक भोज के दौरान पहनी जाती हैं। हालांकि, बख्तरबंद कोर, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, आर्टिलरी रेजिमेंट, राइफल रेजिमेंट और सिग्नल्स कोर के कर्नल रैंक तक के अधिकारी अभी भी रेजिमेंटल कार्यक्रमों में इसे पहन सकेंगे।

मूंछों पर भी कड़े दिशा-निर्देश
नए मैनुअल में सैनिकों के रहन-सहन, ग्रूमिंग और सजने-संवरने के मानकों को भी कड़ाई से परिभाषित किया गया है। शरीर पर टैटू बनवाने और बॉडी पियर्सिंग पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। वर्दी में किसी भी प्रकार का ब्रेसलेट पहनने की अनुमति नहीं होगी। केवल पूजा के दिन कलाई पर एक पवित्र धागा यानी कि कलावा बांधने की छूट होगी। सिख सैनिकों को छोड़कर किसी भी अन्य सैनिक को धार्मिक चिह्न प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है।

सैनिकों की मूंछों का आकार 12 सेंटीमीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। वर्दी में रहते हुए डियोड्रेंट या परफ्यूम लगाने पर पाबंदी होगी, हालांकि आफ्टर-शेव लोशन का उपयोग किया जा सकता है। महिला सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के लिए लिपस्टिक, रंगीन नेल पॉलिश, बिंदी और नोज पिन पहनने पर सख्त रोक लगाई गई है। महिला कर्मी सिंदूर लगा सकती हैं, बशर्ते वह इस तरह लगाया जाए कि बेरेट या पीक कैप पहनने के बाद बाहर से दिखाई न दे।

विकासनगर हिंसा: युवक की मौत के बाद भड़का बवाल, आरोपी का घर फूंका, इंटरनेट सेवा बंद

उत्तराखंड
उत्तराखंड के विकासनगर स्थित बैरागीवाला गांव में दो समुदायों के बीच हुई हिंसक झड़प में युवक की मौत के बाद बवाल बढ़ता जा रहा है. यहां आरोपियों की गिरफ्तारी और उनके घरों पर ध्वस्तीकरण की मांग को लेकर भीड़ ने पुलिस की मौजूदगी में पत्थराव कर दिया. आरोपी के घर को आग के हवाले कर दिया गया. वहीं प्रशासन ने मामले को देखते हुए इंटरनेट बंद कर दिया है. अब इस मामले को लेकर 12 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. वहीं इस घटना के बाद बुलडोजर एक्शन शुरू हो गया है.

इस घटना का सीसीटीवी फुटेज सामने आया है, जिसमें कई लोग लाठी-डंडों के साथ एक-दूसरे पर हमला करते दिखाई दे रहे हैं. बैरागीवाला गांव से सामने आए CCTV फुटेज ने घटना के खौफनाक मंजर को कैमरे में कैद कर लिया है. वीडियो में लाठी-डंडों से लैस लोग सड़कों पर दौड़ते दिखाई दे रहे हैं. कुछ लोग जान बचाने के लिए भाग रहे हैं, तो कहीं चीख-पुकार और अफरा-तफरी का माहौल नजर आ रहा है.

इस घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया. पुलिस का कहना है कि विवाद की शुरुआत खेत में पानी लगाने को लेकर हुई थी, लेकिन कुछ ही देर में मामूली कहासुनी हिंसक झड़प में बदल गई. अब सामने आए CCTV फुटेज में वो हिंसा दिखाई दे रही है.

वीडियो में देखा जा सकता है कि गांव की गलियों में अचानक हलचल बढ़ जाती है. कुछ लोग हाथों में लाठियां लेकर दौड़ते नजर आते हैं. इसके बाद हमला शुरू हो जाता है. लोग इधर-उधर भागने लगते हैं. महिलाएं और बच्चे भी डर के साये में सुरक्षित जगह तलाशते दिखाई देते हैं.

इस हिंसक झड़प में एक हिंदू युवक की मौत हो गई, जबकि महिला समेत तीन लोग घायल हुए हैं. युवक की मौत की खबर फैलते ही गांव का माहौल और ज्यादा गर्म हो गया. देखते ही देखते बड़ी संख्या में ग्रामीण और हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता सड़क पर उतर आए.

घटना के बाद गुस्साए हिंदूवादी संगठन के लोगों ने गांव में पहुंचकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. प्रदर्शनकारियों ने आरोपियों के एनकाउंटर समेत उनके घरों पर बुलडोजर एक्शन की मांग की और हाइवे जाम कर दिया. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि समुदाय विशेष देवभूमि को कश्मीर बनाना चाहता है. यह घटना कोई मामूली घटना नहीं है कि यह एक हिंदू युवक की मॉब लिंचिंग की गई.

गुस्साए लोगों ने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर नेशनल हाइवे जाम कर दिया. कई घंटों तक सड़क पर प्रदर्शन चलता रहा. लोगों का कहना था कि जब तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा.

स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि पुलिस को पूरे इलाके को छावनी में बदलना पड़ा. अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया और हर गतिविधि पर नजर रखी जाने लगी. प्रदर्शन के दौरान कई बार पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली.

घटना के बाद पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे भाजपा विधायक
घटना के बाद भाजपा विधायक मुन्ना चौहान पहले घायलों से मिलने अस्पताल पहुंचे. फिर वहां से सीधे बैरागीवाला गांव पहुंचे, जहां उन्होंने परिवार को ढांढस बंधाते हुए मौके पर मौजूद पुलिस के आला अधिकारियों को सख्त एक्शन के निर्देश दिए. विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने पीड़ित परिवार से सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया. इस मामले में सहसपुर कोतवाली पुलिस के मौजूदा थाना प्रभारी को सख्त लहजे में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया.

अब इस पूरे मामले में CCTV फुटेज पुलिस के लिए सबसे अहम कड़ी बन गया है. वीडियो के आधार पर हमलावरों की पहचान की जा रही है. पुलिस का कहना है कि आरोपियों की तलाश में लगातार दबिश दी जा रही है और जल्द गिरफ्तारी की जाएगी. हालांकि गांव में माहौल अब भी संवेदनशील बना हुआ है. एक तरफ परिवार अपने बेटे की मौत का इंसाफ मांग रहा है, दूसरी तरफ पूरा गांव CCTV में कैद उस हिंसा को देखकर सहमा हुआ है.

घटना को लेकर एसपी ग्रामीण ने क्या कहा?
इस घटना को लेकर एसपी देहात पंकज गैरोला ने कहा कि खेत में पानी लगाने को लेकर दो पक्षों के बीच शुरू हुए मामूली विवाद के बाद कुछ युवकों ने विनोद नाम के युवक को पीट-पीटकर मार डाला. वहीं तीन लोगों पर जानलेवा हमला कर उन्हें घायल कर दिया. घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. प्रदर्शनकारियों से बात की जा रही है, आरोपियों की धड़पकड़ के लिए पुलिस टीम दबिश दे रही है. जल्द उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

EPFO Update: पीएफ खाताधारकों का इंतजार खत्म? ब्याज की रकम जमा होने को लेकर आया बड़ा अपडेट

नई दिल्ली

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO के सदस्य अपने पीए खाते में ब्याज का पैसा जमा होने का इंतजार कर रहे हैं. FY2025-26 के लिए पीएफ की ब्याज दर (PF Interest Rate) को यथावत रखा गया है, जो 8.25% है. इसे स्थिर रखने का फैसला लिए गए दो महीने का समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक पैसा ईपीएफओ सदस्यों के खाते में जमा नहीं हुआ है. अब इसे लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। 

बीते मार्च 2026 में ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड (CBT) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ईपीएफ जमा पर 8.25% की वार्षिक ब्याज दर की सिफारिश की. श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा 2 मार्च को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, सीबीटी ने सिफारिश की कि ब्याज को सदस्यों के ईपीएफ खाते में वित्तीय वर्ष के लिए जमा किया जाए। 
 
कब तक PF खाते में जमा होगा पैसा? 
EPFO Interest के खाते में जमा करने का इंतजार कर रहे सदस्यों के लिए बता दें कि अभी तक कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की ओर से इसे लेकर कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है और न ही कोई संभावित तारीख घोषित की गई है. लेकिन अगर, पीएफ में ब्याज का पैसा आने के पिछले रुझानों पर नजर डालें, तो संकेत मिल रहा है कि ये जून और सितंबर के बीच किसी भी समय डाला जा सकता है। 

ब्याज की राशि ईपीएफओ सदस्यों के खातों में तभी जमा की जाती है जब केंद्र सरकार से सिफारिश को औपचारिक मंजूरी मिल जाती है और इसे आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया जाता है. ऐसे में इस प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं, इसलिए राशि जमा करने की कोई निश्चित तिथि घोषित नहीं की गई है। 

पिछले वर्ष, कई ग्राहकों को जून और जुलाई में खाते में ब्याज मिला था. हालांकि, इसे लेकर सटीक समय अलग-अलग हो सकता है. सदस्यों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि पीएफ ब्याज की जानकारी सभी ईपीएफ पासबुक में एक साथ दिखाई नहीं देती है, मतलब कुछ सदस्यों को यह अपडेट दूसरों की तुलना में पहले दिखाई दे सकता है और कुछ को बाद में। 

क्या देरी से ब्याज पर असर पड़ेगा?
इस उत्तर है नहीं, पासबुक अपडेट में देरी होने पर भी, ग्राहकों को उनका पूरा ब्याज मिलता है. EPF Scheme 1952 के अनुच्छेद 60 के तहत पीएफ खाते पर ब्याज की गणना मासिक चालू शेष पर होती है, जिसपर सालाना चक्रवृद्धि ब्याज लगाया जाता है. इसलिए, पासबुक में ब्याज दर्शाने में किसी भी प्रशासनिक देरी से सदस्यों को मिलने वाली रकम पर कोई असर नहीं पड़ता है। 

PF खाते में आया ब्याज, ऐके करें चेक
EPFO द्वारा अपने सदस्यों को कई ऑप्शन दिए गए हैं, जिनके जरिए वे अपने पीएफ खाते में ब्याज की रकम आने पर इसे आसानी से चेक कर सकते हैं. इसके लिए उमंग ऐप (Umang App), ईपीएफओ सदस्य ई-सेवा पोर्टल (EPFO E-Service Portal), मिस्ड कॉल सेवा (Missed Call Service) या एसएमएस सुविधाएं (EPFO SMS Service) के जरिए स्टेटस जांच सकते हैं। 

 

NCRB Report: शादीशुदा पुरुषों में बढ़े आत्महत्या के मामले, विवाहेतर संबंध भी बड़ी वजह के रूप में सामने आए

नई दिल्ली

देश में शादीशुदा पुरुषों की खुदकुशी के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2015 से अब तक यह आंकड़ा करीब दोगुना हो गया है। 10 साल पहले 2015 में एक साल में 2497 पुरुषों ने शादी से संबंधित मामलों या फिर पत्नी से विवाद को लेकर खुदकुशी की थी। वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 4536 हो गया। इस रेट में 82 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है।

2022 में पलट गए आंकड़े
रिकॉर्ड के मुताबिक पहले पुरुषों की तुलना में शादी संबंधित मामलों को लेकर महिलाएं ज्यादा खुदकुशी करती थीं। वहीं 2022 में यह आंकड़ा ही पलट गया। 2024 में लगातार ऐसा देखा गया कि शादीशुदा जीवन में कलह को लेकर पुरुष महिलाओँ की तुलना में ज्यादा खुदकुशी कर रहे हैं। 2024 की बात करें तो शादी संबंधित मामलों में कुल 8524 लोगों ने खुदकुशी की। इनमें से 4536 यानी करीब 53 फीसदी पुरुष थे औ 3986 यानी करीब 46 फीसदी महिलाएं थीं।

2015 में खुदकुशी करने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में 61 फीसदी थी। हालांकि 2023 की तुलना में 2024 में शादी से जुड़े विवादों को लेकर खुदकुशी का आंकड़ा कम हुआ है। 2024 में खुदकुसी करने वाली महिलओं में से करीब दो तिहाई 30 साल से कम उम्र की थीं। वहीं पुरुषों की बात करें तो आधे से ज्यादा लोग 30 से ज्यादा की उम्र के थे। 40 फीसदी खुदकुशी करने वाले लोग 30 से 45 की उम्र के थे।

कम उम्र में महिलाएं ज्यादा करती हैं खुदकुशी
रिपोर्ट के मुताबिक 18 से 30 की उम्र में खुदकुशी करने के मामले में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। वहीं 30 से 40 की उम्र में पुरुष ज्यादा खुदकुशी करते हैं।

रोज 24 लोग कर लेते हैं खुदकुशी
रिपोर्ट के मुताबिक शादी या फिर पति-पत्नी के बीच विवाद को लेकर रोज करीब 23 लोग खुदकुशी करते हैं। इनमें से 12 पुरुष और 11 महिलाएं होती हैं। रोज होने वाली मौतों के औसत पर गौर करें तो रोज 30 से कम की उम्र के 5 पुरुष और 30 से ज्यादा उम्र वाले 6 पुरुष खुदकुशी करते हैं। 2019 से 2024 तक पांच साल में ऐसे खुदकुशी करने वालों की कुल संख्या 24335 थी।

क्यों खुदकुशी करते हैं शादीशुदा लोग
शादी या पति-पत्नी के बीच विवाद और खुदकुशी की मुख्य वजहों में दहेज, विवाहेतर संबंध, तलाक जैसे मुद्दे शामिल हैं। 2019 से 2024 तक कुल खुदकुशी के आंकड़ों को देखों तो करीब 18359 पुरुषों और 20485 महिलाओं ने खुदकुशी की है। 2024 में खुदकुशी के 8534 मामलों में से 3052 ऐसे थे जिनमें शादी के बाद सामंजस्य नहीं बन पाया।

उत्तर प्रदेश में होती हैं सबसे ज्यादा ऐसी खुदकुशी
उत्तर प्रदेश में लोग शादी संबंधित मामलों को लेकर सबसे ज्यादा खुदकुशी करतेहैं। 2024 में उत्तर प्रदेश में शादी के बाद सामंजस्य ना बनने की वजह से कुल 764 लोगों ने खुदकुशी की थी और इनमें से 394 पुरुष और 370 महिलाएं थीं। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा नंबर महाराष्ट्र का आता है जहां 421 लोगों ने खुदकुशी की थी। विवाहेतर संबंधों को लेकर होने वाली खुदकुशी की दर काफी बढ़ गई है। 2014 में ऐसे मामले को लेकर 1624 लोगों ने खुदकुशी की थी।

RBI का बड़ा एक्शन: इस बैंक पर 6 महीने का प्रतिबंध, खाताधारकों में बढ़ी चिंता

मुंबई 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ग्राहकों के हित को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है। दरअसल, आरबीआई ने मोगावीरा सहकारी बैंक, मुंबई की वित्तीय स्थिति में गिरावट को देखते हुए इसपर कई पाबंदियां लगा दी हैं। यह पहली बार नहीं है जब आरबीआई ने किसी सहकारी बैंक पर पाबंदियां लगाई हैं। इससे पहले मई में भी एक सहकारी बैंक का लाइसेंस रद्द किया गया था।

मोगावीरा सहकारी बैंक पर क्या एक्शन?
मोगावीरा सहकारी बैंक पर लगी पाबंदियों के तहत खाताधारकों के लिए पैसे निकालने की अधिकतम सीमा एक लाख रुपये निर्धारित की गई है। ये पाबंदियां 12 जून को कारोबार बंद होने के बाद से लागू हुईं, जो छह महीने की अवधि के लिए प्रभावी होंगी। हालांकि, इनकी समय-समय पर समीक्षा की जाएगी।

क्या-क्या नहीं कर पाएगा बैंक?
आरबीआई ने कहा, ”सहकारी बैंक अब कोई भी लोन और उधार को मंजूर नहीं दे सकेगा और न ही मौजूदा लोन को रिन्यू कर पाएगा। इसके अलावा, बैंक किसी प्रकार का निवेश नहीं कर सकेगा, कोई नई देनदारी नहीं ले सकेगा और उधार लेने, नए जमा स्वीकार करने पर भी रोक रहेगी। बैंक की वर्तमान नकदी स्थिति को देखते हुए उसे निर्देश दिया गया है कि वह किसी भी जमाकर्ता को उसके बचत, चालू अथवा अन्य किसी खाते से अधिकतम एक लाख रुपये तक की निकासी की अनुमति दे।”

भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि बैंक के कामकाज में सुधार के लिए वह लगातार उसके निदेशक मंडल और वरिष्ठ प्रबंधन के साथ संपर्क में था। हालांकि, बैंक ने निगरानी संबंधी चिंताओं को दूर करने और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया। इसी कारण ये निर्देश जारी करना जरूर हो गया।

आरबीआई ने इस बैंक का किया लाइसेंस रद्द
बता दें कि बीते महीने केंद्रीय रिजर्व बैंक ने महाराष्ट्र के फलटन स्थित ‘द यशवंत सहकारी बैंक’ के पास पर्याप्त पूंजी और आय की संभावनाएं नहीं होने के आधार पर लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह सहकारी बैंक, बैंकिंग विनियमन अधिनियम के कुछ प्रावधानों का पालन करने में विफल रहा है और मौजूदा वित्तीय स्थिति में वह अपने जमाकर्ताओं को पूरी राशि लौटाने में सक्षम नहीं है।

इसके साथ ही आरबीआई ने महाराष्ट्र के सहकारिता आयुक्त एवं पंजीयक से बैंक को बंद करने और परिसमापक नियुक्त करने का अनुरोध किया है। आरबीआई ने कहा कि परिसमापन पर बैंक के जमाकर्ताओं को जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) के तहत अधिकतम पांच लाख रुपये तक की बीमा राशि मिलेगी। आरबीआई के अनुसार, बैंक के 99.02 प्रतिशत जमाकर्ताओं को उनकी पूरी जमा राशि मिलने की पात्रता है।

8th Pay Commission: केंद्रीय कर्मचारियों को बड़ी राहत! जुलाई से 63% हो सकता है महंगाई भत्ता, सैलरी बढ़ने के संकेत

नईदिल्ली 
केंद्रीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ी खबर आ रही है. जल्‍द ही इन कर्मचारियों को लेकर सरकार बड़ा फैसला ले सकती है. इनकी सैलरी में बढ़ोतरी हो सकती है और केंद्रीय कर्मचारियों के बैंक अकाउंट में जुलाई से बढ़ी हुई सैलरी आ सकती है। 

महंगाई भत्ते को लेकर अपडेट      
दरअसल, केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनर्स की करीबी नजरें 8वें वेतन आयोग पर लगी हैं. कर्मचारी संघों द्वारा ज्‍यादा फिटमेंट फैक्‍टर रखने और मिनिमम बेसिक सैलरी बढ़ाने को कह रहे हैं. इस बीच, महंगाई भत्ते को लेकर अपडेट आया है। 

किस आधार पर होगा डीए कैलकुलेशन        
कहा जा रहा है कि जुलाई में महंगाई भत्ता बढ़ सकता है. जुलाई में महंगाई भत्ता बढ़ने की उम्‍मीद की वजह इंडस्ट्रियल वर्कर्स के लिए ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI-IW) है. डीए का कैलकुलेशन इसी इंडेक्स के आधार पर किया जाता है. यह इंडेक्स इस साल मार्च में 149.1 था, जो अप्रैल में बढ़कर 149.9 हो गया। 

रिटेल महंगाई में इजाफा
इंडस्‍ट्रियल वर्कर्स के लिए रिटेल महंगाई दर भी बढ़ा है. यह 4.27 से बढ़कर 4.46 फीसदी हो गया है. अप्रैल 2026 तक उपलब्ध  AICPI-IW डेटा के आधार पर 12 महीने का एवरेज 147.51 है। 

3 फीसदी बढ़ सकता है डीए 
ऐसे में 2016 की बेस सीरीज को 2001 के बेस में कनवर्ट करने के लिए 2.88 लिंकिंग फैक्टर का यूज करते हैं तो डीए कैलकुलेशन के बाद करीब 62.51 फीसदी हो जाएगा. इसी कारण डीए में 3 फीसदी बढ़ने की उम्‍मीद की जा रही है। 

जुलाई की सैलरी में हो सकती है बढ़ोतरी 
साल में दो बार महंगाई भत्ता में बढ़ोतरी की जाती है. सरकार ने जनवरी के महंगाई भत्ता को बढ़ा दिया है और अब जुलाई में होने वाले डीए में बढ़ोतरी की उम्‍मीद की जा रही है. अगर जुलाई से ही इसमें बढ़ोतरी होती है तो केंद्रीय कर्मचारियों को जुलाई महीने की सैलरी के साथ ही बढ़े हुए महंगाई भत्ता भी भेजा जा सकता है। 

अभी 60 फीसदी महंगाई भत्ता
अभी केंद्र सरकार के कर्मचारी का महंगाई भत्ता 60 फीसदी है. ऐसे में अगर सरकार जुलाई में महंगाई भत्ता बढ़ाने का फैसला करती है तो यह बढ़कर 63 फीसदी तक पहुंच सकता है। 

केंद्र सरकार ने 8वें वेतन आयोग के नियम और शर्तों को मंजूरी दे दी है। इसके बाद अब करीब 55 लाख सेवारत कर्मचारियों और 69 लाख पेंशनर्स की सैलरी, पेंशन और भत्तों में बड़े बदलाव की उम्मीद है। आयोग को अपनी सिफारिशें सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है।

फिटमेंट फैक्टर क्या है और यह क्यों जरूरी है?
फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक यानी मल्टीप्लायर है जिसका इस्तेमाल केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की बेसिक सैलरी को रिवाइज करने के लिए किया जाता है। नया सैलरी स्ट्रक्चर तय करने में इसकी भूमिका सबसे जरूरी होती है।

7वें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था, जो 2016 से प्रभावी हुआ था। इसके तहत अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी ₹15,000 थी, तो वह बढ़कर ₹38,550 हो गई थी।

कर्मचारी यूनियनों की मांग और एक्सपर्ट्स का अनुमान
8वें वेतन आयोग के लिए केंद्रीय कर्मचारी यूनियनों और एसोसिएशनों ने मुख्य रूप से फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाने और न्यूनतम बेसिक पे में बड़ी बढ़ोतरी की मांग की है। कुछ यूनियनों ने फिटमेंट फैक्टर को 3 से 5 या उससे अधिक करने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, पेंशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इतनी बड़ी मांग वित्तीय वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं हो सकती है।

पेंशन एक्सपर्ट्स के अनुसार, आयोग न्यूनतम वेतन की गणना के तरीके में बदलाव कर सकता है। इसके लिए परिवार की उपभोग इकाइयों (कंजम्पशन यूनिट्स) को तीन से बढ़ाकर पांच किया जा सकता है और फिटमेंट फैक्टर को 2.64 करने पर विचार किया जा सकता है।

कितनी बढ़ सकती है कर्मचारियों की इनहैंड सैलरी?
सैलरी में होने वाली अंतिम बढ़ोतरी इस बात पर निर्भर करेगी कि आयोग क्या सिफारिश करता है और सरकार किसे मंजूरी देती है। इसे दो अलग-अलग उदाहरणों से समझा जा सकता है…

    पहला उदाहरण (60% DA के आधार पर): मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक पे ₹100 है। 60% महंगाई भत्ता (DA) मिलाकर उसकी कुल कमाई ₹160 हो जाती है। नए फिटमेंट फैक्टर के बाद अगर बेसिक पे दोगुनी होकर ₹200 हो जाती है, तो मौजूदा ₹160 के मुकाबले उसकी प्रभावी सैलरी में करीब 25% की बढ़ोतरी होगी।

    दूसरा उदाहरण (फिटमेंट फैक्टर 3 होने पर): अगर सरकार मौजूदा फिटमेंट फैक्टर को 2.57 से बढ़ाकर 3.0 कर देती है, तो एंट्री-लेवल की बेसिक पे में 15 से 20% से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। इस स्थिति में ₹15,000 की बेसिक सैलरी सीधे ₹45,000 हो जाएगी।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सरकार कर्मचारी यूनियनों की मांग से कम फिटमेंट फैक्टर भी रखती है, तो भी सरकारी खर्च में बड़ी बढ़ोतरी होगी और कर्मचारियों को अपनी सैलरी में एक सम्मानजनक उछाल देखने को मिलेगा।

7वें वेतन आयोग में कितना हुआ था फायदा?
तुलना के लिए 7वें केंद्रीय वेतन आयोग ने सबसे निचले स्तर के कर्मचारियों की न्यूनतम सैलरी को बढ़ाकर ₹18,000 प्रति महीने किया था।

इसके साथ ही नई भर्ती वाले क्लास-I अधिकारियों की सैलरी को ₹56,100 तय किया गया था। इसके कारण 1 जनवरी 2016 से कुल सैलरी और पेंशन में 14.29% की कुल बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।

राज्यों का दौरा कर रही है 8वें वेतन आयोग की टीम
वर्तमान में 8वां वेतन आयोग अलग-अलग राज्यों का दौरा कर रहा है। आयोग की टीम वहां कर्मचारी एसोसिएशनों और यूनियनों से मुलाकात कर रही है।

इस दौरान कर्मचारियों की मांगों और उनके प्रस्तावों के ज्ञापन (मेमोरेंडम) नोट किए जा रहे हैं। यूनियनों ने मुख्य रूप से सैलरी रिवीजन और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों में सुधार की मांग रखी है।

कब लागू होगा 8वां वेतन आयोग और कब तक आएगी रिपोर्ट?
केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2025 में 8वें वेतन आयोग की शर्तों को मंजूरी दी थी और पैनल को रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया था। हालांकि 7वें वेतन आयोग की जगह 8वें वेतन आयोग को 1 जनवरी 2026 से लागू मान लिया गया है, लेकिन आयोग को अपना काम पूरा करने में करीब 18 महीने का समय लगने की उम्मीद है।

आयोग ने मेमोरेंडम जमा करने की आखिरी तारीख को बढ़ाकर 15 जून 2026 कर दिया है। इसके बाद सभी हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के सुझावों की जांच की जाएगी और अंतिम सिफारिशें तैयार होंगी।

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अगर रिपोर्ट जून-जुलाई 2027 तक सौंपी जाती है, तो सरकार पर एरियर (बकाया) देने की देनदारी काफी बढ़ जाएगी। सिफारिशें स्वीकार और लागू होने के बाद, केंद्र सरकार बीच की अवधि का पूरा एरियर कर्मचारियों को देगी।

फिलहाल कर्मचारी संगठन ज्यादा मल्टीप्लायर और बेहतर रिटायरमेंट फायदों के लिए दबाव बना रहे हैं, जबकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अंतिम फैसला देश के वित्तीय हालातों को देखकर ही लिया जाएगा।

क्या होता है वेतन आयोग ?
केंद्रीय वेतन आयोग केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सैलरी, भत्तों, पेंशन और अन्य फायदों की समीक्षा करने के लिए गठित एक पैनल होता है।

आमतौर पर देश में हर 10 साल में एक नए वेतन आयोग का गठन किया जाता है, जो बदलती अर्थव्यवस्था और महंगाई के हिसाब से सरकारी कर्मचारियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए सिफारिशें देता है।

सड़क सुरक्षा रिपोर्ट: हेलमेट और सीटबेल्ट पहनने से 2024 में बच सकती थीं 40 हजार से ज्यादा जानें

 नई दिल्ली
 केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, स्टैंडर्ड हेलमेट और सीटबेल्ट से 2024 में हजारों जानें बचाई जा सकती थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में सड़क हादसों में मारे गए लोगों में से 40 हजार से अधिक जिंदगियों को केवल स्टैंडर्ड हेलमेट और सीटबेल्ट के इस्तेमाल से बचाया जा सकता था।

साल 2024 में सड़क हादसों में मारे गए 81,780 टू-व्हीलर सवारों में से 40% से ज्यादा अच्छी क्वालिटी के हेलमेट पहनकर बच सकते थे, जबकि सीटबेल्ट कार में सवार लोगों की 21,988 मौतों में से लगभग आधी मौतों को रोक सकती थी। यानी दोपहिया वाहनों पर जान गंवाने वाले 40% से ज्यादा लोग और कार हादसों में मारे गए करीब आधे लोग सुरक्षा उपकरणों के अभाव का शिकार हुए।

बाइक सवारों के मरने की संभावना सबसे अधिक
संयुक्त राष्ट्र (UN) की मोटरसाइकिल हेलमेट स्टडी के अनुसार, कार चालकों की तुलना में मोटरसाइकिल सवारों के सड़क हादसों में मरने की संभावना 26 गुना ज्यादा होती है, और अच्छी क्वालिटी के हेलमेट पहनने से उनके बचने की संभावना 42% बढ़ जाती है और बाइक सवारों को होने वाली 69% चोटों से बचा जा सकता है।”

इसी तरह, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि सीटबेल्ट उन हादसों में मौत को रोकने में लगभग 50% असरदार हैं, जिनमें सीटबेल्ट न होने पर ड्राइवर या यात्री की मौत हो सकती थी।

किन-किन राज्यों में हुईं सबसे अधिक मौतें?
राज्य पुलिस विभागों से मिले डेटा पर आधारित सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट से पता चलता है कि हेलमेट न पहनने के कारण तमिलनाडु में सबसे ज़्यादा 7,744 मौतें हुईं, इसके बाद महाराष्ट्र (5,946) और मध्य प्रदेश (5,543) का नंबर आता है। सीटबेल्ट न पहनने के कारण हुई मौतों के मामले में, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2,816 मौतें हुईं, इसके बाद मध्य प्रदेश (1,929) और महाराष्ट्र (1,427) का स्थान रहा।

हालांकि. सेफ्टी गियर न पहनना और तेज रफ्तार या गलत साइड से गाड़ी चलाने जैसे जानलेवा हादसों के अन्य कारण सड़क इस्तेमाल करने वालों के व्यवहार से जुड़े हैं, लेकिन सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट यह भी बताती है कि सड़क बनाने और देखरेख करने वाली एजेंसियों की बढ़ती लापरवाही ने भी कुल मौतों की संख्या बढ़ाई है।

उदाहरण के लिए, 2024 में गड्ढों के कारण होने वाली मौतें बढ़कर 2,384 हो गईं, जो 2023 की तुलना में 10.4% ज़्यादा हैं, और निर्माणाधीन साइटों पर मौतों की संख्या 5,389 रही, जो पिछले साल की तुलना में 19.4% ज़्यादा है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2024 में भारतीय सड़कों पर मारे गए लोगों में से लगभग 67% टू-व्हीलर सवार या पैदल चलने वाले थे। सड़क हादसों में कुल 1.28 लाख दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों की जान चली गई।

टक्कर रोकने वाली तकनीक के लिए रेडियो स्पेक्ट्रम लाइसेंस-मुक्त
केंद्र सरकार ने सड़क हादसों को रोकने और वाहन सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने ऑटोमोटिव रडार और ‘व्हीकल-टू-एवरीथिंग’ (V2X) कम्युनिकेशन में इस्तेमाल होने वाले रेडियो स्पेक्ट्रम को पूरी तरह लाइसेंस-मुक्त (Delicensed) कर दिया है। इस कदम से देश में उन्नत सड़क सुरक्षा तकनीकों और टक्कर रोधी प्रणालियों को बड़े पैमाने पर लागू करने का रास्ता साफ हो गया है।

दूरसंचार विभाग (DoT) ने जारी की अधिसूचना

इस संबंध में दूरसंचार विभाग (DoT) ने दो महत्वपूर्ण अधिसूचनाएं जारी की है-

77-81 GHz बैंड- इसे ऑटोमोटिव रडार सिस्टम के लिए लाइसेंस-मुक्त किया गया है।

5.9 GHz बैंड- इसे V2X कम्युनिकेशन के लिए मुक्त किया गया है।

V2X (Vehicle-to-Everything) एक अत्याधुनिक तकनीक है, जिसकी मदद से गाड़ियां न सिर्फ आपस में संपर्क साध सकती हैं, बल्कि सड़क के किनारे मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे ट्रैफिक सिग्नल और स्मार्ट पोल्स) के साथ भी डिजिटल संवाद कर सकती हैं।

इससे ड्राइवर को संभावित दुर्घटनाओं, ट्रैफिक जाम और सड़क की स्थिति की जानकारी पहले ही मिल जाएगी, जिससे सड़क हादसों में भारी कमी आने की उम्मीद है।

 

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