LPG Rules Change from 1 July: गैस कनेक्शन, KYC और बुकिंग के नियम बदलेंगे, जानें क्या होगा नया

 नई दिल्‍ली

इंडेन गैस, भारत पेट्रोलियम और भारत गैस के LPG कस्‍टमर्स को बड़ा झटका लगने वाला है, क्‍योंकि 1 जुलाई से नया नियम लागू हो रहा है. आपको बुकिंग मे दिक्‍कत, गैस नेक्‍शन कटना और अन्‍य परेशानियां उठानी पड़ सकती है. लेकिन यह सभी एलपीजी यूजर्स के लिए नहीं होगी। 

केंद्र सरकार ने हाल ही में एलपीजी नियम में संशोधन आदेश लागू किया है. नए नियम के तहत, जिनके पास पहले से ही PNG कनेक्शन है, उनका HP, Inden या भारत गैस LPG कनेक्शन एक महीने के भीतर काट दिया जाएगा, जो लोग स्वेच्छा से अपना LPG कनेक्शन छोड़ देते हैं, उन्हें पूरी तरह से नुकसान नहीं होगा. उन्हें एक कूपन मिलेगा जिससे वे जरूरत पड़ने पर बाद में अपना एलपीजी कनेक्शन फिर से एक्टिव कर सकेंगे। 

मार्च में ही सरकार ने निर्देश दिया था कि जिन क्षेत्रों में पाइपलाइन के जरिए गैस पहुंचाने का बुनियादी ढांचा मौजूद है, वहां LPG यूजर्स को तीन महीने के भीतर PNG सिस्‍टम में बदलना होगा, नहीं तो उनका एलपीजी कनेक्शन काट दिया जाएगा. यह समय सीमा जून के अंत तक समाप्त हो रही है। 

अगर पीएनजी सिस्‍टम वाले किसी भी क्षेत्र में रहने वाले जिन लोगों ने अभी तक स्विच नहीं किया है, उन्हें जल्द से जल्द कार्रवाई करनी चाहिए. इसके लिए आप अपने नजदीकी पीएनजी गैस कनेक्‍शन वाली कंपनी से संपर्क कर सकते हैं। 

30 जून E-KYC जमा करने की लास्‍ट डेट
इस नियम के अलावा, सभी एलपीजी कनेक्‍शन होल्‍डर्स के लिए ई-केवाईसी वेरिफाई करना भी जरूरी है, जिसकी लॉस्‍ट डेट 30 जून है. अगर आप इसे पूरा नहीं करते हैं, तो आपका कनेक्‍शन काटा जा सकता है. जिस कारण अगले सिलेंडर की बुकिंग करना मुश्किल हो जाएगा. जिन कस्‍टमर्स ने पहले ही अपना ई-केवाईसी पूरा कर लिया है, उन्‍हें आगे कुछ भी करने की आवश्‍यकता नहीं है। 

कमर्शियल एलपीजी के पाबंदियों में छूट 
सरकार ने पश्चिम एशिया में तनाव कम होने का हवाला देते हुए कमर्शियल एलपीजी सप्‍लाई पर लगे प्रतिबंधों को पहले ही हटा दिया है. इस कदम से अब घरेलू एलपीजी नियमों में भी इसी तरह की राहत मिलने की उम्मीदें बढ़ रही हैं। 

दोबारा बुकिंग के नियम 
फिलहाल, ग्राहकों को दोबारा बुकिंग कराने से पहले शहरों में 25 दिन और गांवों में 45 दिन का इंतजार करना पड़ता है. यह प्रतिबंध सरकार ने युद्ध के दौरान जमाखोरी रोकने और आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लागू किया था.  होर्मुज में परिचालन सामान्य होने के साथ ही, यह उम्मीद बढ़ रही है कि 1 जुलाई से यह अंतराल कम हो सकता है. हालांकि अभी तक इसकी कोई औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है। 

भारत-चीन सीमा पर कब्जे का दावा, बॉर्डर से सटे आदिवासियों ने उठाए गंभीर सवाल

नईदिल्ली 
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाके से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के स्थानीय ‘नाह’ आदिवासी समुदाय ने दावा किया है कि चीन इस क्षेत्र में उनकी जमीन हथिया रहा है। उन्होंने दावा किया है कि नियंत्रण रेखा (LAC) के पास चीनी सेना ने भारतीय जमीन पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे किए हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसे लेकर आदिवासी संगठन ‘नाह वेलफेयर सोसाइटी’ ने जिला प्रशासन को एक आधिकारिक ज्ञापन सौंपा है। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 6 सालों के अंदर चीनी सेना ने उनके पूर्वजों की खेती और मवेशियों को चराने वाले जमीन के एक बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय लोगों ने बताया कि, चीन पिछले 10 से 15 सालों से इस इलाके में धीरे-धीरे पैर पसार रहा था, लेकिन 2020 के बाद से उसकी रफ्तार बहुत ज्यादा बढ़ गई है।
किन इलाकों पर कब्जा?

आदिवासी संगठन ने अपर सुबनसिरी के ‘ताक्सिंग’ क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पांच अलग जगहों पर चीन की संदिग्ध और आक्रामक गतिविधियों की सूची प्रशासन को सौंपी है। उनके मुताबिक 2020 तक ये इलाके पूरी तरह उनके नियंत्रण में थे, लेकिन अब इस पर चीन का नियंत्रण है। ये इलाके हैं-

ओयिंग- यह स्ट्रेटेजिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इलाका है।

पोत्रंग (झील): यह स्थानीय लोगों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है।

तिन्दिनतांग (टीजी): ताक्सिंग हेडक्वार्टर के बिल्कुल नजदीक स्थित इलाका।

पनिआर (चुजार्टा क्षेत्र): स्थानीय आदिवासियों का पारंपरिक क्षेत्र।

मरपन (मर्नाफे): यहां चीनी सैनिकों की आवाजाही देखी गई है।

‘भारतीय सीमा में चीनी सड़कें और मिलिट्री कैंप’
नाह वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष केरु चादर ने अपने ज्ञापन में बेहद चौंकाने वाले दावे किए हैं। उन्होंने एक बयान में कहा, “हमें अपनी भारतीय सेना पर पूरा भरोसा है और वे सालों से हमारी जमीन की रक्षा कर रहे हैं, लेकिन ये कोशिशें काफी साबित नहीं हो रही हैं। ताक्सिंग क्षेत्र में चीनी पीएलए (PLA) जिस इरादे और बिजली की रफ्तार से आगे बढ़ रही है, वह बेहद खतरनाक है।” उन्होंने आगे कहा, “हम हर दिन, इंच-दर-इंच अपनी मातृभूमि को चीन के हाथों खो रहे हैं। चीनी सेना ने भारतीय क्षेत्र के भीतर पक्की सड़कें और अपने मिलिट्री कैंप तक बना लिए हैं।”

इस मामले पर नाचो विधानसभा क्षेत्र के विधायक नाकाप नालो ने भी अपनी चिंता व्यक्त की है। विधायक नालो ने एक बयान में कहा, “यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा है। स्थानीय लोगों ने जो आरोप लगाए हैं, जिला प्रशासन और सेना को उसकी आधिकारिक तौर पर पुष्टि करनी चाहिए।” वहीं इस पूरे मामले पर फिलहाल अरुणाचल प्रदेश की सरकार या केंद्र सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

भारत का अभिन्न हिस्सा है अरुणाचल
गौरतलब है कि चीन अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा नहीं मानता। वह इसे ‘जांगनान’ (दक्षिण तिब्बत) कहता है और इस पर अपना ऐतिहासिक दावा ठोकता है। अपनी संप्रभुता दिखाने के लिए चीन अक्सर अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के नए चीनी नाम जारी करता है, वहां के नागरिकों को स्टेपल वीजा देता है और सीमा के पास बुनियादी ढांचे का निर्माण करने की भी कोशिश करता है। हालांकि भारत ने कई मौकों पर यह स्पष्ट कर दिया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और नाम बदलने से जमीनी हकीकत नहीं बदल सकती।

बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट तक पहुंचा चीन, सेशेल्स के जरिए हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक घेराबंदी

नई दिल्ली

 हिंद महासागर में इन दिनों बड़ी भू-राजनीतिक शतरंज बिछी हुई है. एक तरफ चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स और समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार निवेश कर रहा है. पाकिस्तान का ग्वादर, श्रीलंका का हम्बनटोटा, जिबूती में नौसैनिक अड्डा और अब बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट तक उसकी पहुंच इस रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है. दूसरी ओर भारत भी अब सिर्फ समुद्र की निगरानी तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि हिंद महासागर में अपने भरोसेमंद साझेदारों का मजबूत नेटवर्क तैयार कर रहा है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा इसी बड़ी रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है. पहली नजर में सेशेल्स एक छोटा सा द्वीपीय देश दिखता है. करीब 460 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और लगभग एक लाख की आबादी वाले इस देश को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगाए कि इसकी रणनीतिक अहमियत कितनी बड़ी है. लेकिन पश्चिमी हिंद महासागर में फैले इसके 115 द्वीप ऐसे समुद्री इलाके में स्थित हैं, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक समुद्री मार्ग गुजरते हैं। 

सेशेल्स केवल एक मित्र नहीं, समुद्री सुरक्षा का अहम साझेदार
एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया को जोड़ने वाले इन रास्तों से हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल, एलएनजी, कंटेनर कार्गो और जरूरी सामान दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है. भारत के विदेशी व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी इन्हीं समुद्री मार्गों पर निर्भर है. यही वजह है कि नई दिल्ली के लिए सेशेल्स केवल एक मित्र देश नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा के लिए सबसे अहम साझेदार बन चुका है. दिलचस्प बात यह है कि जमीन के लिहाज से छोटा होने के बावजूद सेशेल्स का विशेष आर्थिक क्षेत्र करीब 13 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। 

इस विशाल समुद्री इलाके की निगरानी किसी भी छोटे देश के लिए आसान नहीं होती. भारत ने इसी जरूरत को समझते हुए पिछले कई वर्षों में सेशेल्स को डोर्नियर समुद्री निगरानी विमान, तेज गश्ती नौकाएं, तटीय निगरानी रडार नेटवर्क, हाइड्रोग्राफिक सर्वे और सैन्य प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं. इससे न केवल सेशेल्स की समुद्री क्षमता बढ़ी है, बल्कि पूरे पश्चिमी हिंद महासागर में भारत की निगरानी और साझेदारी भी मजबूत हुई है। 

चीन की बढ़ती भूमिका को करेगा काउंटर
यह पूरी रणनीति ऐसे समय में सामने आ रही है, जब चीन हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है. बीते एक दशक में बीजिंग ने बंदरगाहों, औद्योगिक परियोजनाओं और समुद्री बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर का निवेश किया है. पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह और अफ्रीका के जिबूती में उसकी मौजूदगी पहले ही भारत की रणनीतिक चिंताओं का हिस्सा रही है. अब बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट तक चीन पहुंचने जा रहा है. चीन की इस भूमिका को भारत इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख रहा है. भारत जानता है कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल जमीन पर नहीं, बल्कि समुद्र में भी तय होगी। 

हालांकि, भारत का जवाब चीन की तरह कर्ज आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल नहीं है. भारत की रणनीति भरोसे, क्षमता निर्माण और साझा विकास पर आधारित है. विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी साफ कहा है कि भारत किसी भी देश में वही परियोजना आगे बढ़ाता है, जिसे वहां की सरकार और जनता की सहमति प्राप्त हो. यही कारण है कि सेशेल्स के साथ रक्षा सहयोग के साथ-साथ डिजिटल गवर्नेंस, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु परिवर्तन, अक्षय ऊर्जा, पर्यटन और ब्लू इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी तेजी से बढ़ रही है। 

प्रधानमंत्री मोदी की 2015 की यात्रा ने दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दी थी. उसी दौरान कोस्टल सर्विलांस रडार सिस्टम की शुरुआत हुई, जिसने समुद्री गतिविधियों की रियल टाइम निगरानी को नई मजबूती दी. भारत ने डोर्नियर विमान और अन्य रक्षा उपकरण देकर सेशेल्स की समुद्री निगरानी क्षमता बढ़ाई. अब 2026 की यह यात्रा दोनों देशों के बीच 50 वर्षों के राजनयिक संबंधों को नई ऊंचाई देने की कोशिश है। 

भारत की बदलती समुद्री सोच
इस यात्रा का एक और अहम संदेश भारत की बदलती समुद्री सोच है. 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सागर’ यानी सेक्युरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन का विजन दिया था. अब इसे ‘महासागर’ यानी म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सेक्युरिटी एंड ग्रोथ एक्रॉल रीजन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है. इसका मतलब सिर्फ नौसैनिक सहयोग नहीं, बल्कि डिजिटल कनेक्टिविटी, सप्लाई चेन, जलवायु सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को भी समुद्री रणनीति का हिस्सा बनाना है. सेशेल्स इस व्यापक रणनीति का सबसे मजबूत उदाहरण बनकर उभरा है. भारत और सेशेल्स के रिश्ते केवल रणनीति तक सीमित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध भी दो सदियों से अधिक पुराने हैं. भारतीय मूल के हजारों लोग आज भी सेशेल्स की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, व्यापार और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 

यही सामाजिक जुड़ाव दोनों देशों की साझेदारी को और मजबूत बनाता है. बदलती वैश्विक राजनीति में हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है. जो देश इस समुद्री क्षेत्र में मजबूत साझेदारी और भरोसेमंद उपस्थिति बनाएगा, वही आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा. ऐसे में यदि चीन मोंगला, ग्वादर और हम्बनटोटा के जरिए अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ा रहा है, तो भारत भी सेशेल्स जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ अपने समुद्री सुरक्षा तंत्र को मजबूत कर रहा है। 

विधानसभा में CM शुभेंदु अधिकारी का सख्त संदेश, बोले- गुंडाराज खत्म होगा, नफरत फैलाने वालों को नहीं बख्शेंगे

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल विधानसभा में कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार के दो नए विधेयक पेश किए जाने से पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सख्त संदेश दिया. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार राज्य में कानून का राज स्थापित करेगी और गुंडाराज का खात्मा करेगी। 

मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि AJUP विधायक हुमायूं कबीर के खिलाफ उनके कथित भड़काऊ और नफरत फैलाने वाले भाषण को लेकर एफआईआर दर्ज कर ली गई है. उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर के दो भाषणों पर पहले ही उनकी पार्टी के विधायक ने सदन में आपत्ति उठाई थी। 

‘नफरत फैलाने वालों पर लगाम लगाने का वक्त’

सीएम शुभेंदु अधिकारी ने कहा, ‘अब बहुत हो चुका. ऐसे लोगों को सबक सिखाने का समय आ गया है.’ उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि पहले राज्य में कमजोर मुख्यमंत्री होने की वजह से लोग मनमानी बातें करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. मुख्यमंत्री ने कहा कि हुमायूं कबीर के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई हैं और कानून अपना काम करेगा. उन्होंने कहा, ‘मैं सदन को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि कोई भी इस तरह की भाषा बोलने की हिम्मत न करे। 

उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष का मकसद मुर्शिदाबाद उपचुनाव से पहले मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करना है ताकि उनके बेटे को चुनाव में फायदा मिल सके. इस दौरान उन्होंने संदेशखाली के ‘शेख शाहजहां’ और ‘फाल्टा के पुष्पा’ का उदाहरण देते हुए कहा कि कानून से कोई भी ऊपर नहीं है। 

‘पुलिस किसी को नहीं छोड़ेगी’
मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘उनकी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में कोई भी इस तरह की भाषा बोलने की हिम्मत न करे. सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “संदेशखाली के शेख शाहजहां को याद कीजिए, उनके भड़काऊ बयानों का क्या अंजाम हुआ. ‘फाल्टा के पुष्पा’ को भी याद कीजिए, जिसने कहा था ‘झुकेगा नहीं’. पुलिस किसी को नहीं छोड़ेगी। 

मुख्यमंत्री ने कहा कि वह अगले सप्ताह मुर्शिदाबाद का दौरा करेंगे और यह साबित करेंगे कि कानून अपना काम करेगा. उन्होंने हुमायूं कबीर को चेतावनी देते हुए कहा, “अपनी बयानबाजी पर लगाम लगाइए. नफरत फैलाने वाला कोई भी बयान देने से पहले 25 बार सोचिए. पुलिस आपको नहीं छोड़ेगी। 

पुणे केतन मर्डर केस: खाई के पास क्यों बैठी थी सिया? पुलिस जांच में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा

पुणे
पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में पुलिस को कई नए अहम सुराग मिले हैं. जांच अधिकारियों के मुताबिक, मुख्य आरोपी सिया गोयल का वारदात के दौरान बैठना केवल अपने कथित प्रेमी चेतन चौधरी को हमला करने का संकेत देना नहीं था, बल्कि यह उसकी अपनी सुरक्षा के लिए भी पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा था। 

पुलिस के अनुसार, 18 जून को लोहगढ़ किले पर बनाई गई योजना के तहत सिया को पानी पीने या जूते का फीता बांधने के बहाने बैठना था. जैसे ही वह बैठती, यह चेतन चौधरी के लिए संकेत होता कि अब केतन अग्रवाल को पीछे से धक्का दिया जा सकता है. पुलिस का कहना है कि दोनों ने यह तरीका इसलिए चुना ताकि धक्का दिए जाने के दौरान यदि केतन खुद को बचाने के लिए सिया को पकड़ने की कोशिश करे तो वह उसकी पहुंच से दूर रहे और खुद खाई में गिरने से बच जाए। 

कार की जगह, स्कूटर से गया चेतन
जांच में यह भी सामने आया है कि सह-आरोपी चेतन चौधरी ने अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए पूरी तैयारी की थी. पुलिस के मुताबिक, वह 18 जून की सुबह पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूर लोहगढ़ किले तक कार की बजाय स्कूटर से गया. अधिकारियों का कहना है कि उसने कार इसलिए नहीं ली क्योंकि टोल प्लाजा पर उसकी पहचान दर्ज होने का खतरा था. पुलिस ने घटना में इस्तेमाल किया गया स्कूटर भी जब्त कर लिया है। 

हुडी उतारकर काली टी-शर्ट पहन ली
पुलिस के अनुसार, चेतन किले पर चढ़ते समय हुडी पहनकर गया था. बाद में उसने हुडी उतारकर केवल काली टी-शर्ट पहन ली और लौटते समय फिर से हुडी पहन ली. जांचकर्ताओं का मानना है कि उसने पहचान छिपाने और लोगों का ध्यान भटकाने के उद्देश्य से ऐसा किया। 

 हर कोई सुनना चाहता था सिर्फ इसी सवाल का जवाब 

‘सिया, आपने आखिर केतन को क्यों मारा ?… ‘ जैसे ही पुलिस आरोपी सिया गोयल को क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए लोहागढ़ किले पर लेकर पहुंची, सवालों की बौछार शुरू हो गई. हर कोई उसके मुंह से एक जवाब सुनना चाहता था, लेकिन सिया पूरी तरह खामोश रही. उसने न किसी सवाल का जवाब दिया और न ही कोई प्रतिक्रिया दी. इस बीच पुलिस ने जांच में कई नए दावे किए हैं, जिनमें साजिश,  संकेत और पूरी प्लानिंग को लेकर अहम खुलासे शामिल हैं. हालांकि मामले की जांच जारी है। 

रविवार को लोहागढ़ किले का माहौल सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग था. पुलिस की कई गाड़ियां, अधिकारियों की मौजूदगी और बड़ी संख्या में मीडिया कर्मी किले के प्रवेश द्वार पर पहले से मौजूद थे. सभी की निगाहें एक ही गाड़ी पर टिकी थीं, जिसमें पुलिस आरोपी सिया गोयल को लेकर पहुंचने वाली थी. कुछ ही देर में पुलिस का काफिला वहां पहुंचा. सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच सिया को वाहन से उतारा गया. जैसे ही वह कैमरों के सामने आई, पत्रकारों ने एक साथ सवाल पूछने शुरू कर दिए. सबसे ज्यादा गूंजा एक ही सवाल सिया, आपने आखिर केतन को क्यों मारा?  इसके बाद कई और सवाल पूछे गए. किसी ने पूछा कि क्या उसे अपने किए पर पछतावा है, तो किसी ने जानना चाहा कि कथित साजिश की वजह क्या थी. लेकिन इन सभी सवालों के बीच सिया पूरी तरह शांत रही. उसने किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गई। 

एक शब्द नहीं बोली सिया

मीडिया के लगातार सवालों के बावजूद सिया ने न कोई बयान दिया और न ही किसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की. कुछ देर बाद वह वापस पुलिस वाहन में बैठ गई. पुलिस सिया गोयल को लोहागढ़ किले पर केवल पूछताछ के लिए नहीं, बल्कि क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए लेकर पहुंची थी. जांच अधिकारियों के मुताबिक, 18 जून को जिस स्थान पर केतन अग्रवाल की मौत हुई थी, वहां घटनाक्रम को दोबारा समझने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई गई. डमी (पुतले) की मदद से पुलिस ने उस पूरे घटनाक्रम को दोहराने की कोशिश की, जैसा आरोपियों ने पूछताछ के दौरान बताया है. इस दौरान अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद दूरी, रास्तों, चट्टानों की स्थिति और घटनाक्रम के संभावित क्रम का भी बारीकी से परीक्षण किया। 

पुलिस का दावा: पहले से बनाई गई थी योजना
जांच अधिकारियों का कहना है कि अब तक की पूछताछ में सामने आया है कि यह पूरी घटना कथित तौर पर पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा थी. पुलिस के अनुसार, 20 वर्षीय सिया गोयल और 22 वर्षीय चेतन चौधरी ने पहले ही तय कर लिया था कि लोहागढ़ किले पर किस स्थान पर घटना को अंजाम देना है. जांच में यह भी सामने आया है कि सिया को बैठकर चेतन को संकेत देना था. बैठने का बहाना पानी पीना या जूते का फीता बांधना तय किया गया था. जैसे ही वह बैठती, चेतन कथित तौर पर पीछे से आकर केतन अग्रवाल को धक्का देता. पुलिस का दावा है कि दोनों ने इसी योजना के अनुसार कथित वारदात को अंजाम दिया। 

बैठने का संकेत क्यों चुना गया?
जांच में सामने आई सबसे अहम बात यह है कि बैठने का संकेत केवल इशारा देने का तरीका नहीं था. पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पूछताछ में यह जानकारी सामने आई कि आरोपियों को डर था कि यदि धक्का दिए जाने के बाद केतन गिरते समय सिया को पकड़ने की कोशिश करेगा तो वह भी खाई में गिर सकती है. इसी वजह से कथित तौर पर ऐसा संकेत चुना गया, जिसमें सिया कुछ दूरी पर बैठ जाए और धक्का दिए जाने के समय केतन की पहुंच से बाहर रहे. यदि यह दावा जांच में पुष्ट होता है तो यह पूरे मामले की कथित योजना को और अधिक सुनियोजित बताता है। 

चेतन ने भी बनाई थी अलग रणनीति
पुलिस के मुताबिक, सह-आरोपी चेतन चौधरी ने भी अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए पहले से तैयारी कर रखी थी. जांच अधिकारियों का कहना है कि वह पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूर लोहागढ़ किले तक कार से नहीं बल्कि स्कूटर से पहुंचा. पुलिस का मानना है कि उसने ऐसा इसलिए किया ताकि टोल प्लाजा के रिकॉर्ड में उसकी कार दर्ज न हो. जांच टीम ने वह स्कूटर भी जब्त कर लिया है, जिससे वह कथित तौर पर घटनास्थल तक पहुंचा था. पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि चेतन ने लोहागढ़ पहुंचने के बाद अपना पहनावा बदला था. अधिकारियों के मुताबिक, वह किले पर चढ़ते समय हुडी पहनकर गया था. बाद में उसने हुडी उतार दी और काले रंग की टी-शर्ट में दिखाई दिया. वापस लौटते समय उसने फिर से वही हुडी पहन ली. जांचकर्ताओं का मानना है कि उसने ऐसा लोगों का ध्यान कम जाए और पहचान छिपाने की कोशिश के तहत किया। 

पहले भी किया था रेकी
जांच एजेंसियों का दावा है कि घटना वाले दिन दोनों आरोपी पहली बार लोहागढ़ नहीं पहुंचे थे. पूछताछ में दोनों ने स्वीकार किया है कि वे पहले भी किले पर आए थे. पुलिस के अनुसार, उन्होंने कथित तौर पर उस दौरान उपयुक्त स्थान की तलाश की और योजना को अमल में लाने के लिए कुछ प्रैक्टिस भी की थी. अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह अभ्यास किस स्थान पर किया गया था और क्या उस दौरान कोई अन्य व्यक्ति भी उनके संपर्क में था। 

परिवार से भी पूछताछ
पुलिस ने सिया गोयल के पिता, मां और भाई से भी लंबी पूछताछ की. तीनों के बयान दर्ज किए गए हैं. जांच अधिकारी यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या परिवार को दोनों आरोपियों के संबंधों या कथित योजना की कोई जानकारी थी. हालांकि पुलिस ने पूछताछ से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। 

सोमवार को अदालत में पेश होंगे आरोपी
दोनों आरोपियों की पुलिस हिरासत सोमवार को समाप्त हो रही है. ऐसे में पुलिस उन्हें अदालत में पेश करेगी और आगे की पूछताछ के लिए रिमांड बढ़ाने की मांग कर सकती है. जांच एजेंसियों का कहना है कि अभी कई डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाना बाकी है. मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का मिलान भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है. हालांकि पुलिस ने जांच में कई महत्वपूर्ण दावे किए हैं, लेकिन इस हाई-प्रोफाइल मामले में अभी भी कई सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं. क्या कथित योजना वास्तव में पहले से बनाई गई थी? क्या सभी परिस्थितिजन्य साक्ष्य पुलिस के दावों की पुष्टि करेंगे? क्या जांच में कोई और व्यक्ति भी सामने आएगा? इन सभी सवालों का जवाब आगे की जांच और अदालत की सुनवाई के दौरान ही सामने आएगा। 

क्राइम सीन रीक्रिएट किया गया
रविवार को पुलिस सिया गोयल को लोहगढ़ किले लेकर पहुंची, जहां डमी की मदद से पूरे घटनाक्रम का क्राइम सीन रीक्रिएट किया गया. इस दौरान यह समझने की कोशिश की गई कि 18 जून को कथित वारदात किस क्रम में हुई थी। 

पुलिस का कहना है कि अब तक की जांच से यह स्पष्ट होता है कि पूरी घटना बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम देने की कथित साजिश रची गई थी. दोनों आरोपियों ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि वे पहले भी लोहगढ़ किले पर जाकर वारदात के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश कर चुके थे और कथित तौर पर उसकी ‘प्रैक्टिस’ भी की थी. हालांकि पुलिस अभी यह पता लगा रही है कि उन्होंने यह रिहर्सल किस दूसरी जगह की थी। 

मामले की जांच के तहत शनिवार को पुलिस ने सिया गोयल के पिता, मां और भाई से भी कई घंटों तक पूछताछ कर उनके बयान दर्ज किए. वहीं, सोमवार को दोनों आरोपियों की पुलिस रिमांड समाप्त होने पर उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा, जहां जांच एजेंसी आगे की पूछताछ के लिए रिमांड बढ़ाने की मांग करेगी। 

Mumbai Rain: भारी बारिश से मुंबई बेहाल, ट्रैफिक ठप, अंधेरी सबवे बंद और कई इलाकों में जलभराव

मुंबई

मुंबई में मॉनसून की जोरदार बारिश ने शहर के कई इलाकों को पानी-पानी कर दिया है. सड़कें तालाब बन गई हैं, ट्रैफिक ठप हो गया है. लोगों को घरों से निकलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. अंधेरी सबवे (अंडरपास) में इतना पानी भर गया है कि उसे यातायात के लिए बंद कर दिया गया है। 

रातभर की बारिश से अंधेरी, बांद्रा, खार, मालाड, गोरेगांव, जुहू, वर्सोवा जैसे इलाकों में सबसे ज्यादा असर देखा गया है. वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर भी पानी भरने से गाड़ियों की रफ्तार धीमी हो गई. बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के मुताबिक, अंधेरी सबवे में पानी भर गया है, जिसके बाद उसे बंद करना पड़ा। 

बता दें कि अंधेरी सबवे मुंबई का एक ऐसा रास्ता है जो पूर्व और पश्चिम को जोड़ता है. हर रोज हजारों गाड़ियां और लोग यहां से गुजरते हैं. मॉनसून की बारिश में अंधेरी सबवे में जलजमाव होना पुरानी समस्या है। 

शहर के निचले इलाकों में कई जगहों पर भारी जलभराव की तस्वीरें सामने आ रही हैं. जलजमाव को देखते हुए एहतियातन अंधेरी सबवे को देर रात 1:45 बजे से यातायात के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया है. किसी भी अप्रिय घटना या हादसे को रोकने के लिए सबवे के बाहर पुलिस बंदोबस्त किया गया है। 

एक तरफ जोरदार बारिश से मुंबईवासियों को उमस और गर्मी से तो बड़ी राहत मिली है, तो वहीं सुबह-सुबह दफ्तर और काम पर जाने वालों को परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है। 

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मुंबई और आसपास के इलाकों के लिए आज भी बारिश का येलो अलर्ट जारी किया है. मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई इलाकों में गरज-चमक और तेज हवाओं के साथ भारी बारिश हो सकती है. बता दें कि मॉनसून इस बार 13 दिन देरी से मुंबई पहुंचा था। 

होर्मुज संकट में भी भारत की रणनीति सफल, ईंधन संकट टला: सरकार का दावा

नई दिल्ली
 मिडिल ईस्ट में संघर्ष और होर्मुज के बंद होने के कारण पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ था। वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भी भारत सीना तान खड़ा रहा है और अपनी कुशल रणनीति और पूर्व तैयारी के बल पर ईंधन संकट को पूरी तरह टाल लिया। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग के चार महीने तक बंद रहने के बावजूद देश में पेट्रोल पंपों पर कोई लंबी कतारें नहीं लगीं, घरों में एलपीजी सिलेंडर की कमी नहीं हुई और आर्थिक गतिविधियां लगभग सामान्य रहीं। सरकार के दूरदर्शी बुनियादी ढांचा विकास, आपूर्ति विविधीकरण और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने इस अभूतपूर्व चुनौती को सफलतापूर्वक पार किया।

दरअसल, 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में तेहरान ने होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बंद कर दिया। यह समुद्री जल मार्ग विश्व के कुल तेल परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। बंदी के तुरंत बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में भारी व्यवधान उत्पन्न हो गया और कीमतों में आग लग गई।

यहां आपको बता दें कि भारत अपने कच्चे तेल का करीब 90 प्रतिशत और एलपीजी का 60 प्रतिशत आयात करता है, विशेष रूप से प्रभावित होने वाला देश था। देश के कुल तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत और एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था। संकट लगभग चार महीने तक चला। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश होने के कारण इस संकट का सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका थी।

कीमतों में भारी उछाल
संकट लंबा खिंचने से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गईं। भारतीय कच्चे तेल की कीमतें संकट से पहले के 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से बढ़कर चार सप्ताह के अंदर 120 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गईं। ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्चतम स्तर को छू गया। सऊदी अरब में एलपीजी अनुबंध मूल्य में फरवरी से जून के बीच करीब 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की आयात लागत 1600 रुपये से ऊपर पहुंच गई। युद्ध-जोखिम बीमा दरों में कई गुना वृद्धि हुई, जिससे आयात और महंगा हो गया।

भारत की सफल रणनीति
सरकार ने संकट शुरू होते ही कुछ ही दिनों में सख्त नियंत्रण आदेश जारी कर दिए। रणनीति के तहत सरकार ने घरेलू उत्पादन में तीव्र वृद्धि की। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में छूट, आक्रामक आपूर्ति स्रोत विविधीकरण और सक्रिय ऊर्जा कूटनीति पर जो दिया। सरकार ने मांग प्रबंधन पर जोर दिया और फैसला लिया कि लागत का बोझ आम परिवारों पर न डाला जाए, बल्कि इसे सार्वजनिक क्षेत्र की विपणन कंपनियों के माध्यम से वहन किया जाए। इस फैसले से ईंधन की घरेलू उपलब्धता बनी रही।

पिछले दस वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किए गए भारी निवेश ने संकट के समय काम किया। एलपीजी आयात टर्मिनलों की संख्या 2014 में 11 से बढ़कर वर्तमान में 22 हो गई है। आयात क्षमता भी 12 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़कर 2026 में 32.3 मिलियन टन प्रति वर्ष पहुंच गई।

कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ। 2014 में 27 देशों से आयात करने वाला भारत अब 2026 में 41 देशों से तेल खरीद रहा है। लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए आपूर्तिकर्ता जुड़े, जबकि अमेरिका और रूस से आयात में खासी बढ़ोतरी हुई। परिणामस्वरूप, होर्मुज पर निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हो गई। वहीं, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के विस्तार से भी हर साल कच्चे तेल के आयात में बड़ी बचत हो रही है, जो संरचनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ।

आर्थिक प्रभाव और सरकार का खर्च
दो महीने से अधिक समय तक खुदरा कीमतों को स्थिर रखने के बाद विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। फिलहाल तेल कंपनियां प्रतिदिन करीब 650 करोड़ रुपये की वसूली में असफल हो रही हैं, जो पहले 1000 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर थी। सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की, जिससे राजस्व में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस तिमाही में तेल और गैस कंपनियों को 1 लाख से 1.2 लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान होने का अनुमान है। हालांकि, सरकार का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और होर्मुज के फिर से खुलने से आने वाले महीनों में खुदरा कीमतों में गिरावट आएगी।

अन्य देशों की तुलना में भारत का बेहतर प्रदर्शन
होर्मुज संकट से निपटने के लिए दुनिया भर के देशों ने अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। कई एशियाई आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को ईंधन की कमी का सामना करना पड़ा। श्रीलंका ने दो सप्ताह में पेट्रोल राशनिंग लागू कर दी और सरकारी कामकाज को चार दिन के सप्ताह में सीमित कर दिया। पाकिस्तान ने स्कूल बंद किए और कार्य सप्ताह छोटा किया। म्यांमार ने विषम-सम ड्राइविंग और क्यूआर कोड आधारित राशनिंग लागू की। बांग्लादेश ने तेल भंडारों पर सेना तैनात कर दी, जबकि इथियोपिया ने कुछ क्षेत्रों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह रोक दी।

धनी देशों ने भी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों का इस्तेमाल किया। जापान ने भंडार कम किए और सब्सिडी दी, दक्षिण कोरिया ने 30 वर्षों में पहली बार कीमतों पर नियंत्रण लगाया। यूरोपीय संघ के 22 सदस्य देशों ने अप्रैल के मध्य तक 9 अरब यूरो से अधिक की राहत पैकेज घोषित किए। इसके विपरीत, भारत ने न तो आपातकाल घोषित किया, न राशनिंग लगाई और न ही स्कूल या कार्य घंटे कम किए। केवल व्यावसायिक और थोक एलपीजी, डीजल तथा एविएशन ईंधन के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए, ताकि घरेलू जरूरतें पूरी हो सकें।

आर्थिक स्थिरता बरकरार
संकट के दौरान भारत की विदेशी मुद्रा भंडार 728 अरब डॉलर से अधिक के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया और पूरे संकट काल में स्थिर रहा। जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी रही। चालू खाता घाटा नियंत्रण में रहा और खुदरा मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के लक्ष्य के अंदर रही।

होर्मुज खुलने के बाद अब क्या?
जून में अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद होर्मुज फिर से खुल गया। अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी हटा ली। भारतीय ध्वज वाला पहला एलएनजी वाहक पोत ‘दिशा’ लगभग 62,000 टन माल लेकर तीन महीने बाद सुरक्षित लौट आया। कच्चे तेल की कीमतें अब 74 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं और आगे और गिरने की संभावना है। हालांकि, बारूदी सुरंग हटाने और फंसे जहाजों को निकालने में कुछ समय लगेगा।

भारत के पास फिलहाल कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी का दो महीने का भंडार है। आईएसपीआरएल के तहत 5.33 मिलियन टन रणनीतिक भंडार उपलब्ध है, जो करीब तीन सप्ताह के लिए पर्याप्त है। चांदीखोल और पादुर विस्तार परियोजनाओं के पूरा होने के बाद यह क्षमता 21 दिनों तक बढ़ जाएगी। दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की इस संकट प्रबंधन की सफलता न केवल ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि भविष्य के किसी भी संकट के लिए देश को बेहतर तैयार करेगी।

पीएम मोदी का सेशेल्स दौरा: 50वें राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत की अहम भागीदारी

नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन दिनी दौरे पर सेशेल्स पहुंच गए हैं. वे वहां 50 वें राष्ट्रीय दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में 29 जून को शामिल होंगे. बीते शनिवार को सेशेल्स की धरती पर उतरते ही वहां के राष्ट्रपति डॉ पैट्रिक हर्मिनी ने उनका स्वागत किया. पीएम मोदी की इस यात्रा के बहाने सेशेल्स और भारत के रिश्ते के बारे में जानेंगे. यह भी कि

आखिर यह छोटा सा द्वीपीय देश कैसे अफ्रीका का सबसे अमीर देश बन गया?
सेशेल्स एक छोटा द्वीपीय देश है. यह हिन्द महासागर में स्थित है. आबादी महज 1.35 लाख है. क्षेत्रफल लगभग 450 वर्ग किलो मीटर है. यह 115 द्वीपों का एक समूह है. जमीन बहुत कम है. फिर भी यह अफ्रीका का सबसे अमीर देश माना जाता है. हैलो सेफ प्रॉसपेरिटी इंडेक्स 2026 के मुताबिक सेशेल्स अफ्रीका के सबसे अमीर देशों की सूची में टॉप पर है. उसे 98.09 अंक मिले हैं. मॉरीशस और अल्जीरिया इस सूची में क्रमशः दूसरे एवं तीसरे नंबर पर हैं. एजेंसी ने रैंकिंग तय करने में केवल प्रति व्यक्ति आय को महत्व नहीं दिया है. कुल पांच मानकों के आधार पर रैंकिंग तय हुई है. इनमें खरीदने की शक्ति, प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, आय का समान वितरण और सापेक्ष गरीबी को आधार बनाया गया है. प्रति व्यक्ति आय 42110 अमेरिकी डॉलर है.

256 साल पुराना है भारत-सेशेल्स का रिश्ता
सेशेल्स छोटा देश भले ही है लेकिन भारत के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. यहां पहली स्थाई बस्ती साल 1770 में बसाई गई. उस पहली खेप में जो 27 नागरिक यहां पहुंचे, उनमें पांच भारतीय भी थे. बाद में तमिलनाडु, बिहार, गुजरात और देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पहुंचे. आज देश का हर आठवां व्यक्ति भारतवंशी मूल का है. 29 जून 1976 को सेशेल्स को ब्रिटेन से आजादी मिली और यह स्वतंत्र देश के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा. इस छोटे से द्वीपीय देश पर पहले फ्रांसीसी और फिर बाद में ब्रिटेन ने राज किया.

समृद्धि की आधारशिला है पर्यटन
पर्यटन सेशेल्स की मुख्य कमाई का स्रोत है. यहां के समुद्र, बीच और नेचर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. यहां लक्जरी रिसोर्ट बन गए हैं. विदेशी पर्यटक महंगा खर्च करते हैं. होटल, यात्रा, खाना और गतिविधियां सरकार को राजस्व देती हैं. निजी निवेशकों ने भी यहां पूंजी लगाई है. पर्यटन ने नौकरियां बढ़ाईं. स्थानीय सेवाओं और कारीगरों को फायदा हुआ. इस देश में हर साल 3.5 से 4 लाख तक विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं. मतलब देश की आबादी से कई गुना ज्यादा पर्यटक आते हैं. यहां सबसे ज्यादा पर्यटक यूरोप से आते हैं. फिर एशिया की बारी है. हाल के वर्षों में भारतीयों की ठीक-ठाक संख्या पहुँच रही है.

मत्स्य और समुद्री संसाधन से भी होती है कमाई
समुद्री मछली और समुद्री जीवन भी सेशेल्स की आमदनी का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है. पास के जल क्षेत्र में मछली प्रचुर मात्रा में मिलती है. मछली पालन और निर्यात से विदेशी मुद्रा आती है. समुद्री पर्यटन जैसे डाइविंग ने भी योगदान दिया. समुंद्री संरक्षण ने संसाधन को टिकाऊ बनाया. इस माध्यम से सेशेल्स हर साल 30 से 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कमाई साल भर में करता है. सेशेल्स के कुल घरेलू निर्यात में 90 फीसदी हिस्सा मछली का है.

निवेश और आर्थिक नीतियां
सरकार ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया. निवेशकों को सरल नियम और कर प्रोत्साहन दिए गए. बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेस को विकसित किया गया. कई विदेशी कंपनियों ने यहां शाखाएं खोलीं. छोटे व्यवसायों को समर्थन मिला. नवाचार और सेवा क्षेत्र पर ध्यान दिया गया. यूएई, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत ने भी यहां निवेश किया हुआ है. यह निवेश मूलतः पर्यटन, अक्षय ऊर्जा, रियल स्टेट, मछली पालन आदि क्षेत्रों में हुए हैं.

कैसी है वित्तीय और कर व्यवस्था?
सेशेल्स ने कर नीति में लचीलापन रखा. कुछ सेवाओं पर कर कम रखा गया. यह नीति निवेश को आकर्षित करती है. निजी बैंकिंग और निवेश सेवाएं मजबूत हुईं. सरकार ने सार्वजनिक खर्च में समझदारी दिखाई. वित्तीय प्रबंधन ने देश की आय स्थिर रखी. यहां आयकर, व्यावसायिक कर, और वैल्यू एडेड टैक्स लागू है. यह व्यवस्था देशी-विदेशी सब पर समान है.

विदेशी सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध
सेशेल्स ने वैश्विक साझेदारों से मदद ली. विकास परियोजनाओं में अनुदान और ऋण मिला. अंतरराष्ट्रीय संबंधों ने पर्यटन और व्यापार को बढ़ाया. राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय समझौते हुए. ये समझौते निवेश और सुरक्षा दोनों में मददगार रहे.सेशेल्स ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. साधारण शिक्षा तक अच्छी पहुंच हुई. स्वास्थ्य सेवाएं भी बेहतर हुईं. इनसे उत्पादकता बढ़ी. छोटी आबादी में कुशल मजदूरी का लाभ मिला. कौशल विकास ने सेवा क्षेत्र को मजबूत किया.

सेशेल्स ने प्रकृति को बचाने पर जोर दिया. नेचर और बायोडायवर्सिटी संरक्षण ने पर्यटन को स्थायी बनाया. समुद्री रिज़र्व बनाए गए. पर्यटन और संरक्षण में संतुलन रखा गया. यह नीतियां दीर्घकालिक आमदनी सुनिश्चित करती हैं.

चुनौतियां और सीमाएं भी कम नहीं
छोटा आकार और सीमित संसाधन सेशेल्स के सामने चुनौतियां हैं. जलवायु परिवर्तन से खतरे बनते हैं. आर्थिक निर्भरता पर्यटन पर जोखिम है. महंगाई और आय असमानता भी समस्याएं हैं. फिर भी सरकार ने योजनाएं बनाकर सुधार किए.

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के क्या हैं मायने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे ने जोर दिया कि सेशेल्स अफ्रीकी साझेदार है. दौरे ने द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ किया. यह दौरा आर्थिक सहयोग और निवेश पर सकारात्मक संकेत देता है. ऐसे दौरे से व्यापार और पर्यटन में और अवसर बन सकते हैं.

सरल शब्दों और संक्षेप में कहें तो सेशेल्स की समृद्धि कई कारणों का मेल है. पर्यटन इसका मुख्य स्तंभ है. समुद्री संसाधन, निवेश-अनुकूल नीतियां और अच्छा प्रशासन भी महत्वपूर्ण हैं. पर्यावरण संरक्षण और मानव विकास ने स्थिरता दी है. छोटी आबादी ने प्रति व्यक्ति आय बढ़ने में मदद की. प्रधानमंत्री मोदी के दौरे जैसे कदम दोस्ती और सहयोग बढ़ाते हैं. हालांकि, आगे की राह एकदम आसान नहीं है. आगे चुनौतियां बनी रहेंगी. पर अपनी सही नीतियों से सेशेल्स टिकाऊ समृद्धि बनाए रख सकता है.

    

 

AMCA पर इंजन संकट! अमेरिकी कंपनी ने बढ़ाए दाम, भारत के ड्रीम फाइटर प्रोजेक्ट पर असर

 नई दिल्ली
 भारत अपना खुद का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान (AMCA) बनाने के सपने पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन इस बीच देश के सामने एक पुरानी और बड़ी चुनौती फिर से खड़ी हो गई है और वह है, लड़ाकू विमान का इंजन बनाना।

इस बात को ऐसे समझिए कि भारत ने फाइटर जेट का ढांचा, रडार और हथियार तो खुद बना लिए हैं, लेकिन विमान का सबसे जरूरी हिस्सा यानी ‘इंजन’ के लिए हम आज भी विदेशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अब अमेरिकी कंपनी द्वारा अचानक दाम बढ़ा दिए जाने से भारत के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

अब सवाल अमेरिकी कंपनी की जरूरत क्यों?
लड़ाकू विमान के इंजन की कीमतों में भारी उछाल के बाद यह सवाल दोबारा खड़ा हो गया है कि आखिर भारत को इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी बैसाखी की जरूरत क्यों पड़ रही है? अच्छा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिकी कंपनी द्वारा बनाए गए इंजन की जरूरत केवल

भारत को है या फिर अन्य देशों को भी?
इस बात का जवाब है कि नहीं, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि तुर्किए, दक्षिण कोरिया और स्वीडन जैसे देश भी अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए पूरी तरह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि भारत अपने लड़ाकू विमान के इंजन की बनावट को लेकर क्या कदम उठाने वाला है?

पहले समझिए क्या है पूरा विवाद
बता दें कि भारत के फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से F414 इंजन खरीदने की बातचीत चल रही थी। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बातचीत अब खटाई में पड़ती दिख रही है।

इसका कारण है कि DRDO के सूत्रों के मुताबिक, जिस F414 इंजन की कीमत पहले प्रति यूनिट 70 से 80 करोड़ रुपये तय की जा रही थी, अमेरिकी कंपनी GE ने अब उसके दाम करीब तीन गुना बढ़ाकर बताए हैं।

दाम बढ़ने के बाद बजट मुख्य चुनौती
अमेरिकी कंपनी की तरफ से दाम तीन गुणा बढ़ाने के दावों के बाद समझौता अब अधर में पड़ता दिख रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत सरकार ने इस विमान के शुरुआती 5 मॉडल बनाने के लिए 15000 करोड़ रुपये का बजट रखा है। ऐसे में इंजन महंगा होने से यह पूरा बजट गड़बड़ा सकता है।

अब समझिए भारत के सामने क्या है मजबूरी?
दाम बढ़ाने के बाद अब डिजाइन को लेकर सबसे बड़ी समस्या भारत के सामने खड़ी हो रही है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत की वैमानिकी विकास एजेंसी (ADA) ने AMCA लड़ाकू विमान का पूरा ढांचा इसी अमेरिकी F414 इंजन के हिसाब से डिजाइन किया है। इस मोड़ पर आकर इंजन बदलना बिल्कुल भी आसान नहीं है।

दूसरी ओर प्रोजेक्ट में देरी की संभावना भी चिंता का विषय बन सकता है। कारण है कि भारत को शुरुआती टेस्टिंग के लिए 15 इंजनों की जरूरत है। अगर बातचीत में देरी हुई, तो विमान के आने का समय और आगे खिसक सकता है। हालांकि वैसे उम्मीद है कि यह विमान 2034 या 2035 तक भारतीय वायुसेना में शामिल हो पाएगा।

इसका असर तेजस विमानों पर भी होगा?
तो इस सवाल का जवाब है, हां शायद। रिपोर्ट की माने तो इंजनों के दाम बढ़ाने का असर सिर्फ लड़ाकू विमान AMCA ही नहीं, भारत का नया तेजस Mk2 विमान भी इसी इंजन पर चलने वाला है। वहीं, पुराने तेजस Mk1A के लिए भी अमेरिका से इंजनों की सप्लाई में देरी हो रही है, जिससे वायुसेना को विमान मिलने में लेट हो रहा है।

सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के ये बड़े देश भी हैं मजबूर
अच्छा सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इंजन के मामले में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और ताकतवर देश भी अमेरिका के भरोसे हैं। इस बात ऐसे समझिए कि तुर्किए का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान ‘KAAN’ भी शुरुआत में अमेरिकी GE F110 इंजन से ही उड़ेगा, क्योंकि उनका खुद का इंजन बनने में अभी कई साल लगेंगे।

दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का नया ‘KF-21’ लड़ाकू विमान भी अमेरिकी F414 इंजन की मदद से ही उड़ रहा है। स्वीडन का मशहूर ‘ग्रिपेन’ (Gripen E) विमान भी अमेरिकी इंजन पर निर्भर है। इसका नुकसान यह है कि स्वीडन अपनी मर्जी से इसे किसी दूसरे देश को बेच नहीं सकता, क्योंकि इसके लिए अमेरिका की मंजूरी (ITAR नियम) जरूरी होती है।

अब सवाल- आखिर लड़ाकू विमान का इंजन बनाना इतना मुश्किल क्यों?
गौरतलब है कि फाइटर जेट का इंजन बनाना दुनिया की सबसे जटिल और कठिन तकनीकों में से एक है। इन इंजनों को बहुत कम वजन और कम ईंधन में आसमान चीरने वाली ताकत पैदा करनी होती है। कारण है कि इंजन के अंदर का तापमान इतना ज्यादा होता है कि आम धातुएं तुरंत पिघल जाएं। इसके लिए खास ‘सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड्स’ और अत्याधुनिक धातुओं की जरूरत होती है।

ऐसे में फिलहाल दुनिया के सिर्फ 5 देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास ही स्वतंत्र रूप से फाइटर जेट इंजन बनाने की तकनीक है। हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि भारत ने सालों पहले खुद का ‘कावेरी इंजन’ बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह लड़ाकू विमान को उड़ाने लायक ताकत नहीं दे पाया। अब उस इंजन के बदले हुए रूप का इस्तेमाल भारत के ‘घातक’ ड्रोन में किया जाएगा।

सेशेल्स में पीएम मोदी को मिला सर्वोच्च सम्मान: ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’

विक्टोरिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में नेतृत्व के लिए सेशेल्स की ओर से देश का सर्वोच्च सम्मान ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ प्रदान किया गया है। रविवार को राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने उन्हें ये सम्मान दिया। ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ सम्मान प्रधानमंत्री मोदी की लंबे समय से जारी उस नीति और दृष्टिकोण को मान्यता देता है, जिसमें सतत विकास, हरित विकास और पर्यावरण-अनुकूल नीतियों पर जोर दिया गया है।

पीएम मोदी के ‘ग्रीन विजन’ को मान्यता
यह उपाधि उन कई वैश्विक मान्यताओं में नवीनतम है, जो प्रधानमंत्री मोदी को जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए मिल चुकी हैं। पिछले महीने मई 2026 में, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने उन्हें कृषि क्षेत्र को मजबूत करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और सतत कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए एग्रीकोला मेडल प्रदान किया था।

सेशेल्स द्वारा दिया गया यह सम्मान प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक पर्यावरणीय नेतृत्व और “ग्रीन विज़न” को और अधिक मजबूत मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। भारत के पीएम तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर शनिवार को सेशेल्स पहुंचे। जहां राष्ट्रपति हर्मिनी ने उनका औपचारिक स्वागत किया।

सेशेल्स के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता
रविवार को स्टेट हाउस में प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

नेशनल एसेंबली को संबोधित कर रचेंगे इतिहास
पीएम मोदी भारतीय समुदाय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भी शामिल होंगे और सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करेंगे। जिसके साथ ही वे दुनिया के पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री बन जाएंगे जिन्होंने 20 देशों की संसद या नेशनल असेंबली को संबोधित किया है।

सेशेल्स रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने खुद इसकी जानकारी दी थी। एक्स पर उन्होंने लिखा, “मुझे सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बनने का सम्मान प्राप्त होगा। यह ऐतिहासिक अवसर उन सशक्त लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं का प्रतीक है, जो हमारे दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं

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