RG कर केस में बड़ा एक्शन! पूर्व कमिश्नर समेत 3 IPS अधिकारी सस्पेंड

 कोलकाता

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सूबे की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर कई तरह की बातें कही हैं. उन्होंने कहा कि बंगाल में कुल मिलाकर अराजकता का माहौल था और हमने अब सख्ती शुरू कर दी है. शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को नबन्ना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा, “आरजी कर डॉक्टर रेप और मर्डर केस को ठीक से न संभालने के आरोप में तीन IPS अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है. कोलकाता पूर्व पुलिस कमिश्नर विनीत गोयल, पूर्व डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (नॉर्थ) अभिषेक गुप्ता और डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (सेंट्रल) इंदिरा मुखर्जी को सस्पेंड किया गया है। 

CM शुभेंदु ने  में आगे आरोप लगाया कि ये अधिकारी पीड़ित परिवार को रिश्वत देने और बिना किसी लिखित आदेश के प्रेस कॉन्फ्रेंस करने में शामिल थे. इन तीनों IPS अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जाएगी। 

उन्होंने कहा, “हमें जानकारी मिली है कि कोलकाता की प्रेसिडेंसी जेल में स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल किया जा रहा था. हमने जांच शुरू की और पाया कि आरोप सही थे.” उन्होंने बरामद किए गए मोबाइल फोन दिखाए गए, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति का पता चल सके। 

‘हम पता लगाएंगे…’
सीएम शुभेंदु ने कहा कि मैंने आरजी कर घटना की जांच में कोलकाता पुलिस की भूमिका पर गृह विभाग से रिपोर्ट मांगी है. उस वक्त इस घटना को ठीक से नहीं संभाला गया था. पुलिस को जो भूमिका निभानी चाहिए थी, वह उसने नहीं निभाई। 

“हम पता लगाएंगे कि क्या पुलिस अधिकारियों को राजनीतिक नेताओं के इशारे पर काम करना पड़ा था. एक पुलिस DC का रवैया और भाषा अनुचित थी। 

बंगाल सरकार ने आरजी कर मामले से जुड़े तीन आईपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. कोलकाता के पूर्व CP विनीत गोयल उनमें से एक हैं। 

आरजी कर मामला क्या है?
यह घटना 9 अगस्त, 2024 को हुई थी. कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक जूनियर डॉक्टर का शव अस्पताल की बिल्डिंग के अंदर एक सेमिनार हॉल में मिला था. कोलकाता पुलिस ने 33 साल के एक सिविक वॉलंटियर, संजय रॉय को, डॉक्टर के साथ रेप और उसकी हत्या करने के शक में गिरफ्तार किया था. बाद में इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया। 

इस घटना के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और पीड़ित के लिए इंसाफ की मांग की गई. पीड़ित की मां ने हाल ही में हुए बंगाल चुनावों में पानीहाटी सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 

विधानसभा चुनावों से पहले, आरजी कर की पीड़िता को इंसाफ दिलाना बीजेपी के मुख्य वादों में से एक था. 20 जनवरी, 2025 को एक ट्रायल कोर्ट ने संजय रॉय को इस मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई. हालांकि, डॉक्टर के परिवार का आरोप है कि इस अपराध को अंजाम देने में वह अकेला नहीं था। 

पिछले दिनों परिवार ने कोलकाता हाई कोर्ट को बताया कि उन्होंने कई ऐसे पहलुओं के बारे में जानकारी जुटाई है, जिनकी सीबीआई और राज्य पुलिस ने ठीक से जांच नहीं की है. उन्होंने कहा कि एक फॉरेंसिक एक्सपर्ट की राय के मुताबिक, घटना के वक्त वहां कई लोग मौजूद हो सकते हैं। 

ट्रंप का दाव,शी जिनपिंग ने अमेरिका को “पतनशील राष्ट्र” कहा, बाइडन प्रशासन पर साधा निशाना

 नई दिल्ली

 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपनी बीजिंग यात्रा के आखिरी दिन यह दावा किया कि चीनी नेता शी चिनफिंग ने उन्हें कई शानदार सफलताओं पर बधाई दी है। ट्रंप ने कहा कि जब चिनफिंग ने बहुत ही शालीनता से अमेरिका को शायद एक पतनशील राष्ट्र बताया, तो उनका यह इशारा ट्रंप से पहले की जो बाइडन सरकार की तरफ था।

यह स्पष्ट नहीं था कि ट्रंप चिनफिंग की किसी बंद कमरे में हुई बातचीत का हवाला दे रहे थे या उनके थ्यूसीडाइड्स ट्रैप वाले बयान का। यात्रा के पहले दिन शी चिनफिंग ने कहा था कि अमेरिका-चीन संबंधों को स्थिर करना सिर्फ दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बहुत जरूरी है।

थ्यूसीडाइड्स ट्रैप का जिक्र
हालांकि, शी चिनफिंग ने सार्वजनिक तौर पर पतनशील राष्ट्र शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था, लेकिन उन्होंने यह सवाल जरूर उठाया था कि क्या दोनों महाशक्तियां थ्यूसीडाइड्स ट्रैप से बच सकती हैं। यह एक ऐसा राजनीतिक सिद्धांत है जो बताता है कि एक उभरती हुई शक्ति और पहले से स्थापित महाशक्ति के बीच युद्ध होना तय होता है।

सोशल प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक लंबी पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के पतन के बारे में शी चिनफिंग का आकलन 100% सही था। ट्रंप के अनुसार, बाइडन प्रशासन की इमिग्रेशन, जेंडर इक्वेलिटी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी नीतियों के कारण देश को अपार नुकसान उठाना पड़ा है।

ट्रंप ने लिखा, “जब राष्ट्रपति शी ने बहुत ही शालीनता से अमेरिका को एक पतनशील राष्ट्र कहा, तो वह स्लीपी जो बाइडन और बाइडन प्रशासन के उन चार सालों के दौरान हुए भयानक नुकसान का जिक्र कर रहे थे। इस मामले में वह पूरी तरह सही थे।”

उन्होंने आगे कहा कि खुली सीमाओं, भारी टैक्स, हर किसी के लिए ट्रांसजेंडर नीतियों, महिलाओं के खेलों में पुरुषों की भागीदारी, विविधता, समानता और समावेश, खराब व्यापार समझौतों और बढ़ते अपराध के कारण हमारे देश को बहुत नुकसान हुआ।

ट्रंप ने गिनाईं अपनी उपलब्धियां
ईरान और ताइवान जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारी मतभेदों के बावजूद अमेरिकी नेता ने दावा किया कि दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों के बीच संबंध अच्छे हैं और लगातार बेहतर हो रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि उनके कार्यकाल के 16 शानदार महीनों के दौरान अमेरिका ने अविश्वसनीय प्रगति की है।

उन्होंने शेयर बाजार के रिकॉर्ड स्तर, अपनी कथित सैन्य जीत, मजबूत जॉब मार्केट और निवेश के नए वादों का हवाला देते हुए इसे अमेरिका के पुनरुत्थान का संकेत बताया। ट्रंप ने लिखा कि राष्ट्रपति शी का इशारा अमेरिका की उस अविश्वसनीय प्रगति की ओर नहीं था जो ट्रंप प्रशासन के 16 शानदार महीनों में दुनिया ने देखी है। उन्होंने वेनेजुएला के साथ अच्छे संबंधों, ईरान के सैन्य पतन और अमेरिका में बाहरी लोगों द्वारा 18 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड निवेश का भी जिक्र किया।

ट्रंप ने यह भी दावा किया कि शी चिनफिंग ने इतने कम समय में मिली इन शानदार सफलताओं के लिए उन्हें बधाई दी। उन्होंने यह स्वीकार किया कि दो साल पहले अमेरिका वास्तव में पतन की ओर था, लेकिन अब यह दुनिया का सबसे हॉट देश है।

क्या है जमीनी हकीकत?
हालांकि, अमेरिका-चीन संबंधों को लेकर ट्रंप का यह सकारात्मक रवैया दोनों देशों के बीच मौजूद कई कड़वी सच्चाइयों से मेल नहीं खाता है। ईरान में चल रहे संघर्ष को सुलझाने में अमेरिका ने चीन से अधिक भागीदारी की अपील की है, लेकिन बीजिंग ने सार्वजनिक तौर पर इसमें बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है। भले ही ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के सीन हैनिटी को दिए इंटरव्यू में दावा किया हो कि शी चिनफिंग ने मदद की पेशकश की थी।

इसके अलावा, वाइट हाउस का मानना है कि मेक्सिको में जाने वाले चीनी रसायनों को रोकने के लिए चीन को अभी और कदम उठाने चाहिए, जिनका इस्तेमाल अवैध फेंटानिल ड्रग बनाने में होता है। इस ड्रग्स की वजह से अमेरिका के कई समुदाय बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

कांगो में इबोला का कहर: 65 मौतें, 246 केस सामने आने से बढ़ी चिंता

नई दिल्ली

एक दूसरे से फैलने वाला खतरनाक इबोला वायरस इन दिनों रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो में अपना कहर ढा रहा है। जानकारी के मुताबिक इबोला वायरस से संक्रिमत करीब 65 लोगों की जान चली गई है और 100 से ज्यादा संदिग्धों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। अब तक कॉन्गो में इबोला संक्रमण के 246 केस सामने आ चुके हैं। जानकारी के मुताबिक टेस्ट किए गए हर 20 सैंपल में से 13 लोग संक्रमित पाए गए हैं।

बता दें कि 2018 से 2020 के दौरान भी कॉन्गो में इबोला वायरस से बहुत मौतें हुई थीं। उस दौरान करीब 3 हजार लोगों की मौत हो गई थी। वहीं बूनिया में भी इबोला वायरस से दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। इसे दुनिया के सबसे खतरनाक वायरस में गिना जाता है। इस वायरस से संक्रमित 90 फीसदी लोगों की जान चली जाती है। इससे लोगों को डायरिया और खून बहने जासे लक्ष्ण दिखाई देते हैंय़

तीन दिन में ले लेता है जान
रिपोर्ट्स के मुताबिक यह वायरस केवल तीन ही दिन में किसी की जान ले सकता है। यह वायरस छूने से या आसपास रहने से भी फैल कता है। इसके अलावा छींकने और खांसने से भी पानी के कड़ों के साथ यह वायरस फैल जाता है। इबोला वायरस संक्रामित जीव को खाने से भी हो जाता है।

शरीर पर किसी तरह के घाव या फिर आंख, नाक, मुंह को छूने से यह वायरस संक्रमित कर देता है। इसके बाद बुखार, थकान र सिरदर्द जैसे लक्षणों का सामना करना पड़ता है। यह ऑर्थोबोलावायरस समूह का ही एक सदस्य है। इस वायरस से संक्रमित होने पर समय पर इलाज ना मिलने पर व्यक्ति की मौत हो जाती है।

क्या हैं लक्षण
इबोला वायरस से संक्रमित व्यक्ति को अत्यधिक थकान, बुखार और सिरदर्द हो जाता है। इसके अलावा उसे नॉजिया. दस्त, रैशेज और खजली जैसी समस्याएं भी होती हैं। अगर इस वायरस से कोई मुक्ति भी पा जाता है तो भी कम से कम दो साल तक इसके लक्षण दिखते रहते हैं। इसके अलावा लोगों मेंसिर दर्द और आखों में जलन की शिकायत बनी रहती है।

हंटा वायरस का भी प्रकोप
हंटा वायरस की चपेट में आए एक क्रूज जहाज के छह यात्री शुक्रवार को ऑस्ट्रेलिया पहुंचे, जहां उन्हें कम से कम तीन सप्ताह तक पृथक-वास में रहना होगा। नीदरलैंड से इन्हें लेकर आया ‘गल्फस्ट्रीम लॉन्ग-रेंज बिजनेस जेट’ पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया राज्य की राजधानी पर्थ के बाहर स्थित ‘आरएएएफ बेस पियर्स’ पर उतरा। यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को नजदीकी ‘बुल्सब्रुक’ पृथक-वास केंद्र में स्थानांतरित किया जाना था। ऑस्ट्रेलिया के स्वास्थ्य मंत्री मार्क बटलर ने बृहस्पतिवार को कहा था कि सरकार इस वायरस के प्रकोप से निपटने के लिए “दुनिया के किसी भी हिस्से की तुलना में सबसे मजबूत पृथक-वास व्यवस्थाओं में से एक” लागू करेगी।

गंगा परियोजना पर बांग्लादेश का बड़ा बयान: कहा- भारत से बात करने की जरूरत नहीं

ढाका 

बांग्लादेश ने  पद्मा नदी पर एक बड़ी बांध निर्माण परियोजना को मंजूरी दी। बांग्लादेश का कहना है कि इससे भारत के फरक्का बांध के ‘नकारात्मक प्रभाव’ को कम करने में मदद मिलेगी। यह घटनाक्रम 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल बंटवारा संधि की अवधि दिसंबर में समाप्त होने से कुछ महीने पहले सामने आया है। भारत में पद्मा नदी को गंगा कहा जाता है।

अधिकारियों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से बांग्लादेश सरकार का धन लगा है। साथ ही संभावनाएं जताई हैं कि प्रोजेक्ट 2033 तक पूरा हो सकता है। इसके जरिए राजशाही, ढाका और बरीसाल डिवीजन के जिले कवर किए जाएंगे।

कितना आएगा खर्च
अधिकारियों ने बताया कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अध्यक्षता वाली ECNEC यानी राष्ट्रीय आर्थिक परिषद कार्यकारी समिति ने परियोजना के पहले चरण को मंजूरी दी। इसकी अनुमानित लागत 34,497.25 करोड़ टका है।

‘भारत से बात करने की जरूरत नहीं’
जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने पत्रकारों को बताया कि इस परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य बांग्लादेश की ओर पानी का भंडारण कर गंगा पर फरक्का बैराज के प्रभाव को कम करना है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 नदियों से जुड़े मुद्दों का इस परियोजना से संबंध नहीं है।

बांग्लादेश के मंत्री ने कहा, ‘पद्मा बांध बांग्लादेश के अपने हित का मामला है और इस मुद्दे पर भारत से किसी भी प्रकार की चर्चा की आवश्यकता नहीं है।’ हालांकि, अनी ने कहा कि गंगा के जल को लेकर भारत के साथ बातचीत जारी है। उन्होंने कहा, ‘गंगा के संबंध में चर्चा आवश्यक है और वह जारी है।’

भारत के लिए क्यों अहम है यह बैराज
भारत ने 1975 में पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज ब
नाया था। इसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी के पानी को हुगली नदी की तरफ मोड़ना था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि हुगली नदी में जमी मिट्टी और गंदगी साफ हो सके और कोलकाता बंदरगाह तक जहाजों का आना-जाना आसान बना रहे। भारत का हमेशा से यही कहना है कि इस बैराज को केवल कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए बनाया गया था।

वहीं पानी के बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच इसे सुलझाने के लिए कई समझौते हुए हैं। इसमें 1996 की गंगा जल संधि सबसे अहम है, जिसके जरिए दोनों देश मिल-जुलकर पानी की समस्या का हल निकालते हैं।

क्यों पेचीदा हुआ मुद्दा
बांग्लादेश के लिए फरक्का का मुद्दा हमेशा से ही बहुत संवेदनशील रहा है। वहां की सरकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि सूखे के मौसम में पानी कम मिलने की वजह से उन्हें काफी नुकसान होता है। उनका कहना है कि कम पानी मिलने से नदियों का जलस्तर गिर जाता है और खेती पर असर होता है। इसके अलावा, बांग्लादेश की एक बड़ी चिंता यह भी है कि पानी का बहाव कम होने से समुद्र का खारा पानी नदियों के मीठे पानी में मिल रहा है। इससे जमीन की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है।

जिनपिंग का ट्रंप को बड़ा संदेश: दुश्मनी नहीं, साझेदारी से चलेगी दुनिया

बीजिंग 
चीन की राजधानी बीजिंग में अमेरिका और चीन के बीच हुई हाई-स्टेक्स समिट में दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने टकराव नहीं, बल्कि साझेदारी का संदेश देने की कोशिश की. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाकात ऐसे वक्त में हुई, जब दोनों देशों के रिश्ते पिछले कई वर्षों से ट्रेड वॉर, टेक्नोलॉजी बैन, ताइवान और वैश्विक प्रभाव की लड़ाई को लेकर तनावपूर्ण रहे है। 

बैठक की शुरुआत में शी जिनपिंग ने बेहद संतुलित और कूटनीतिक अंदाज में दुनिया के सामने बड़ा संदेश रखा. उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय एक नए मोड़ पर खड़ी है और ऐसे समय में चीन और अमेरिका की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ जाती है। 

जिनपिंग ने ट्रंप की तरफ देखते हुए कहा, “क्या हम मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और दुनिया को ज्यादा स्थिरता दे सकते हैं? क्या हम अपने लोगों के हित और मानवता के भविष्य को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय रिश्तों का बेहतर भविष्य बना सकते हैं?”

अमेरिका-चीन को दुश्मन नहीं, साझेदार होना चाहिए!
राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा कि ये सिर्फ दो देशों के सवाल नहीं हैं, बल्कि इतिहास, दुनिया और पूरी मानवता से जुड़े सवाल हैं, जिनका जवाब दोनों नेताओं को मिलकर देना होगा. चीनी राष्ट्रपति ने साफ कहा कि चीन और अमेरिका के साझा हित उनके मतभेदों से कहीं ज्यादा बड़े हैं. जिनपिंग ने कहा, “एक देश की सफलता दूसरे के लिए अवसर है. चीन और अमेरिका के रिश्तों में स्थिरता पूरी दुनिया के लिए अच्छी बात है। 

शी जिनपिंग ने आगे कहा कि दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार बनना चाहिए. उनके मुताबिक, टकराव दोनों देशों के लिए नुकसानदायक होगा, जबकि सहयोग से दोनों को फायदा मिलेगा. जिनपिंग ने यह भी कहा कि नई सदी में बड़ी शक्तियों को साथ रहने और साथ आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना होगा। 

शी जिनपिंग ने 2026 को चीन-अमेरिका रिश्तों के लिए “ऐतिहासिक और निर्णायक साल” बनाने की अपील भी की. उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश पुराने तनाव पीछे छोड़कर नए भविष्य की तरफ बढ़ेंगे। 

राष्ट्रपति ट्रंप ने शी जिनपिंग की सराहना की
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बैठक के दौरान जिनपिंग की खुलकर तारीफ की. उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को शानदार बताते हुए कहा कि जिनपिंग एक महान नेता हैं. ट्रंप ने कहा, “आपका दोस्त होना मेरे लिए सम्मान की बात है. चीन और अमेरिका के रिश्ते पहले से बेहतर होने जा रहे हैं.” ट्रंप ने यह भी कहा कि जब भी दोनों देशों के बीच कोई समस्या आई, उन्होंने और जिनपिंग ने सीधे बातचीत कर उसे जल्दी सुलझाया. उन्होंने चीन की उपलब्धियों और नेतृत्व क्षमता की भी सराहना की। 

हालांकि, दोनों नेताओं के सार्वजनिक बयानों में नरमी दिखी, लेकिन बंद कमरे में हुई बातचीत में व्यापार, ईरान, चिप टेक्नोलॉजी, स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। 

क्या बंद हो जाएंगे WhatsApp और UPI? ईरान के एक कदम से थम सकती है डिजिटल दुनिया

तेहरान 

दुनिया का इंटरनेट क्या अब ईरान के कंट्रोल में जा सकता है? पिछले कुछ दिनों से मिडिल ईस्ट से जुड़ी एक खबर ने टेक दुनिया में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान अब समुद्र के नीचे बिछी उन इंटरनेट केबल्स पर कंट्रोल बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिनसे दुनिया का बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। मामला सिर्फ इंटरनेट स्पीड का नहीं है, बल्कि ग्लोबल डेटा, ऑनलाइन बैंकिंग, क्लाउड सर्विस और अरबों डॉलर की डिजिटल इकॉनमी का भी है। 

शिप्स ही नहीं, इंटरनेट के लिए भी ईरान लेगा टोल?
असल कहानी फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी है. यही वह समुद्री रास्ता है जहां से तेल के बड़े जहाज गुजरते हैं. लेकिन कम लोग जानते हैं कि इसी रास्ते के नीचे दुनिया की कई अहम अंडरसी इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं. यही केबल्स एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को इंटरनेट से जोड़ती हैं। 

अब ईरान से जुड़े मीडिया नेटवर्क और IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़ी रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इन इंटरनेट केबल्स से कमाई की जा सकती है. ये ठीक वैसा ही होगा जैसे ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले शिप्स से टोल वसूलने का फैसला किया है। 

कुछ रिपोर्ट्स में इसे डिजिटल टोल बूथ जैसा मॉडल बताया गया है. यानी जो विदेशी कंपनियां या नेटवर्क इन केबल्स का इस्तेमाल करेंगे, उनसे फीस ली जा सकती है। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान से जुड़े मीडिया आउटलेट्स ने दावा किया कि इन केबल्स के जरिए हर दिन भारी मात्रा में डिजिटल ट्रैफिक गुजरता है. इसमें बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड डेटा, सोशल मीडिया ट्रैफिक और AI सर्विस तक शामिल हैं। 

समुद्र के नीचे से ट्रैवल करता है डेटा
इस खबर ने इसलिए चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दुनिया पहले ही अंडरसी केबल्स पर बढ़ते खतरे को लेकर परेशान है. इंटरनेट का करीब 95 से 99 प्रतिशत ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर केबल्स से गुजरता है. अगर इनमें बड़ी खराबी आ जाए या जानबूझकर नुकसान पहुंचाया जाए तो कई देशों में इंटरनेट, बैंकिंग और क्लाउड सर्विस पर असर पड़ सकता है। 

पोर्ट्स में बताया गया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब सिर्फ तेल का रास्ता नहीं रहा, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी बड़ा सेंटर बन चुका है. यहां कई अहम केबल्स गुजरती हैं जो एशिया और यूरोप को जोड़ती हैं। 

क्या टेक कंपनियां मानेंगी ईरानी कानून?
मामला सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ईरान फ्यूचर में विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियम मानने के लिए मजबूर कर सकता है. यहां तक कि केबल्स की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम भी अपने नियंत्रण में लेने की बात सामने आई है। 

टेक एक्सपर्ट्स का डर यह है कि अगर किसी दिन इन केबल्स पर तनाव बढ़ा या उन्हें नुकसान पहुंचा, तो उसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा. भारत समेत एशिया के कई देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी भी प्रभावित हो सकती है. वीडियो कॉल से लेकर UPI पेमेंट और AI सर्वर तक असर महसूस हो सकता है। 

अब दुनिया की चिंता यह है कि अगर भविष्य में इंटरनेट भी तेल की तरह जियोपॉलिटिकल हथियार बन गया, तो हालात कितने बदल सकते हैं. अभी तक देश तेल सप्लाई रोकने की धमकी देते थे, लेकिन आने वाले समय में इंटरनेट केबल्स भी दबाव बनाने का बड़ा जरिया बन सकती हैं। 
यानी जिस इंटरनेट को लोग सिर्फ मोबाइल डेटा और WiFi समझते हैं, उसके पीछे समुद्र के नीचे फैला हजारों किलोमीटर लंबा एक ऐसा नेटवर्क है, जिस पर अब दुनिया की राजनीति भी उतर आई है। 

आर्थिक संकट में पाकिस्तान को राहत: IMF ने दी 1.3 अरब डॉलर की नई फंडिंग

करांची 

आर्थिक तंगी और बढ़ते कर्ज के बोझ से जूझ रहे पाकिस्तान को आईएमएफ यानी इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड से बड़ी राहत मिली है. पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने बुधवार को जानकारी दी कि देश को IMF से कुल 1.3 अरब डॉलर की फंडिंग मिल गई है. यह रकम दो अलग-अलग वित्तीय कार्यक्रमों के तहत जारी की गई है। 

पाकिस्तान के स्टेट बैंक के मुताबिक, IMF ने एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी यानी EFF के तहत 1.1 अरब डॉलर और रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी यानी RSF के तहत करीब 22 करोड़ डॉलर जारी किए हैं. यह राशि 12 मई को पाकिस्तान को ट्रांसफर की गई। 

दरअसल, IMF ने सितंबर 2024 में पाकिस्तान के लिए 37 महीनों की अवधि वाला 7 अरब डॉलर का EFF पैकेज मंजूर किया था. इसके अलावा जलवायु और पर्यावरण से जुड़े जोखिमों से निपटने के लिए RSF के तहत 1.4 अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद देने का भी फैसला किया गया था। 

पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि IMF के एग्जीक्यूटिव बोर्ड ने 8 मई को हुई बैठक में EFF की तीसरी समीक्षा पूरी की और पाकिस्तान के लिए 76 करोड़ स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी SDR जारी करने को मंजूरी दी. साथ ही RSF के तहत दूसरी किस्त के रूप में 15.4 करोड़ SDR भी मंजूर किए गए। 

इन दोनों रकम को मिलाकर पाकिस्तान को कुल 91.4 करोड़ SDR मिले हैं, जिसकी कीमत करीब 1.3 अरब डॉलर बताई जा रही है. स्टेट बैंक ने कहा कि इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी और 15 मई को खत्म होने वाले सप्ताह के रिजर्व आंकड़ों में इसका असर दिखाई देगा। 

पिछले हफ्ते भी IMF ने पाकिस्तान के लिए करीब 1 अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता को मंजूरी दी थी. अब तक पाकिस्तान IMF से कुल 8.4 अरब डॉलर के दो बड़े पैकेजों में से लगभग 4.5 अरब डॉलर हासिल कर चुका है। 

IMF की यह मंजूरी ऐसे समय आई है, जब पाकिस्तान सरकार ने वित्तीय और मॉनेटरी गोल पर कुछ हद तक बेहतर प्रदर्शन दिखाया है. हालांकि देश की अर्थव्यवस्था अब भी भारी दबाव में है और विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर अलग-अलग राय है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के बाकी महीनों में हालात कितने सुधर पाएंगे। 

फिलहाल पाकिस्तान के लिए यह फंडिंग बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि देश लंबे समय से विदेशी मुद्रा संकट, महंगाई और कमजोर आर्थिक वृद्धि जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। 

8 साल बाद चीन दौरे पर क्यों जा रहे ट्रंप? शी जिनपिंग से मुलाकात पर टिकी दुनिया की नजरें

बीजिंग 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 8 साल बाद चीन दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात शी जिनपिंग से होगी. दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर, चिप टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में रहेंगे. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब व्यापार, टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे कई बड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच खींचतान जारी है। 

ट्रंप ने साफ कहा है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा एजेंडा व्यापार होगा. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि ईरान पर शी जिनपिंग के साथ लंबी बातचीत हो सकती है. ट्रंप ने कहा कि वह शी को अपना “दोस्त” मानते हैं और उन्हें उम्मीद है कि इस बैठक से अच्छी चीजें निकलकर आएंगी. चीन दौरे पर जाने से पहले उन्होंने यह भी कहा कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए उन्हें शी जिनपिंग की जरूरत नहीं है। 

दरअसल, अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही शुरू हो गया था. लेकिन पिछले साल इसमें बड़ा उछाल आया, जब ट्रंप ने चीन के सभी सामानों पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया. इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी सामानों पर जवाबी शुल्क लगा दिए और रेयर अर्थ एक्सपोर्ट पर पाबंदियां बढ़ा दीं. देखते ही देखते टैरिफ 145 प्रतिशत तक पहुंच गए। 

हालांकि बाद में दोनों देशों ने समझा कि इतना बड़ा आर्थिक टकराव लंबे समय तक नहीं चल सकता. इसके बाद व्यापारिक संघर्ष को अस्थायी रूप से रोकने के लिए समझौता हुआ. चीन ने अमेरिकी किसानों से सोयाबीन खरीदने का वादा किया, जबकि अमेरिका ने कई टैरिफ कम कर दिए. लेकिन इससे मूल विवाद खत्म नहीं हुआ। 

सबसे बड़ा विवाद अब टेक्नोलॉजी और चिप इंडस्ट्री को लेकर है. अमेरिका लगातार चीन पर एडवांस कंप्यूटर चिप्स और उनसे जुड़ी टेक्नोलॉजी के एक्सपोर्ट पर रोक लगाता रहा है. अमेरिका को डर है कि चीन इन तकनीकों का इस्तेमाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैन्य ताकत बढ़ाने में कर सकता है। 

वहीं चीन अब खुद की चिप इंडस्ट्री को मजबूत करने पर जोर दे रहा है ताकि उसे अमेरिकी तकनीक पर निर्भर न रहना पड़े. यही वजह है कि यह मुद्दा ट्रंप-शी बैठक में अहम रहने वाला है। 

इसके अलावा ईरान का मुद्दा भी बातचीत में शामिल हो सकता है. अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले, खासकर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर. वह कई बार कह भी चुके हैं कि होर्मुज पर सामान्य ट्रैफिक में चीन मदद कर सकता है लेकिन राष्ट्रपति जिनपिंग ने इसको लेकर कोई कदम नहीं उठाए हैं. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा था कि चीन ईरानी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से तेहरान की मदद कर रहा है। 

हालांकि चीन ने अब तक इस मामले में सावधानी भरा रुख अपनाया है. बीजिंग खुलकर अमेरिका का समर्थन करने से बच रहा है और खुद को एक संतुलित ताकत के तौर पर पेश करना चाहता है। 

राष्ट्रपति ट्रंप की यह चीन यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं है. यह वैश्विक व्यापार, टेक्नोलॉजी और मध्य पूर्व की राजनीति से जुड़े कई बड़े सवालों को प्रभावित कर सकती है. दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात तनाव कम करेगी या नए टकराव की शुरुआत बनेगी। 

ब्रह्मोस के खौफ में पाकिस्तान! मुनीर ने हैंगर में छिपाए ईरानी फाइटर जेट, रनवे पर उतारा जेडी वेंस का विमान

चंडीगढ़
 पाकिस्तान एक बार फिर अपनी दोहरी नीति का शिकार नजर आ रहा है. भारत के ब्रह्मोस मिसाइल हमलों से हुए घावों को ढकने के लिए आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने जो रणनीति अपनाई, वह अब उल्टी पड़ रही है. नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों को छिपाने की रिपोर्ट्स ने पाकिस्तान को बुरी तरह फंसा दिया है. सोचिए, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस का प्लेन उसी रनवे पर उतारा गया, जहां ईरान के जेट छिपे हुए थे. ये रिपोर्ट सच निकली तो यह घटनाक्रम पाकिस्तान को महागद्दार साबित करने वाला है. वैसे पहले भी पाकिस्तान ऐसा ही कर चुका है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की पुचकार पर पहली बार इस देश ने उन्हें अपनी औकात दिखाई है।

CBS न्यूज की हालिया रिपोर्ट के बताती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अप्रैल में ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा के कुछ दिन बाद ही ईरान ने अपने सैन्य विमानों को पाकिस्तान में छिपाया. जिन विमानों को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर पार्क करवा दिया, उनमें RC-130 टोही विमान भी शामिल है. ईरान अमेरिकी या इजरायली हमलों से अपने एसेट्स को बचाना चाहता था और इसमें उसका साथ दिया पाकिस्तान ने. ये वही पाकिस्तान है, जो खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ बता रहा था, वो हौले से ईरानी खेमे में सरक गया।

पाकिस्तान की गद्दारी तो देखिए
पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए इसे डेलिगेशन लॉजिस्टिक्स बताया, लेकिन तथ्य कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. इस बीच आसिम मुनीर की दोहरी छवि भी चर्चा में रही. ईरानी डेलिगेशन का स्वागत करते समय वे कॉम्बैट गियर में थे, जबकि जेडी वैंस के आने पर सूट-बूट में. नूर खान एयरबेस, जो पिछले साल भारत के ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस हमलों से क्षतिग्रस्त हुआ था, एक बार फिर सुर्खियों में है. मुनीर ने इस बेस को ढाल बनाने की कोशिश की, लेकिन यह अब पाकिस्तान की कमजोरी का प्रतीक बन गया है. ये पाकिस्तान के दोहरे चेहरे का सिंबल बन गया है, जो कभी भी पाला बदल सकता है।

अमेरिकी सीनेटर ने उठाए सवाल
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका पर पुनर्विचार की मांग की और कहा कि पाकिस्तान की निष्पक्षता पर संदेह है. ग्राहम की टिप्पणियों ने वाशिंगटन में पाकिस्तान के प्रति बढ़ते अविश्वास को रेखांकित किया. ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से चले आ रहे हैं- साझा सीमा, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन के नाम पर. साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद भी दोनों देशों ने एक-दूसरे को समर्थन दिया, लेकिन अमेरिका, पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी रहा है. वो उससे अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद, F-16 जैसे हथियार और आतंकवाद के खिलाफ साझा अभियान चलाता रहा है. बावजूद इसके पाकिस्तान ईरान को शरण दे रहा है. ये उसकी नीयत पर सवाल उठाता है।

कूटनीति या दोगलापन?

    पाकिस्तान न तो पूर्ण रूप से अमेरिकी ब्लॉक में है और न ही चीनी-ईरानी धुरी में. चीन के साथ CPEC और सैन्य सहयोग और ईरान के साथ गुप्त संबंध बनाए रखना उसे अमेरिका की नजर में अविश्वसनीय बनाता है।

    ब्रह्मोस हमलों के बाद पाकिस्तान ने अपनी वायु रक्षा को मजबूत करने का दावा किया, लेकिन ईरानी जेट छिपाने से उसकी क्षमता और विश्वसनीयता दोनों पर सवाल उठ गए हैं।

    पाकिस्तान अब बुरी तरह फंस गया है. एक तरफ अमेरिका से सहायता की उम्मीद, दूसरी तरफ ईरान और चीन के साथ पुराने गठजोड़ उसे कठघरे में खड़ा करता है. जेडी वेंस का प्लेन उसी एयरबेस पर उतरा, जो संकेत देता है कि अमेरिका की भी नजर उसकी हर चाल पर है।
    फिलहाल, पाकिस्तान सिर्फ अपना स्वार्थ देख रहा है, यही वजह है कि उसने सऊदी अरब के साथ अपने पैक्ट के तहत सेनाएं न भेजने के लिए ईरान से भी समझौता कर लिया. भले ही इससे वो अमेरिका की आंखों में धूल झोंक रहा है।

 

जापान में खोजा गया असली नोबिता का शहर, यूजर्स की यादें हो गईं ताजा

टोक्यो 

 आप सभी अपने घर में कभी न कभी डोरेमॉन कार्टून तो देखा ही होगा। वही डोरेमॉन जो अपने गैजेट्स के लिए काफी फेमस है और उनसे अपने दोस्त नोबिता की मदद करता है। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ है जिसमें डोरेमॉन के असली शहर को जिसमें स्कूल और बिल्डिंगों को हूबहू वैसा ही दिखाया गया है जैसा वे कार्टून की काल्पनिक दुनिया में हैं। एक भारतीय कंटेंट क्रिएटर ने सार्थक सचदेवा ने जापान की लगभग 6,000 किलोमीटर की यात्रा करके ये जगह ढूंढ़ी है। वीडियो में जापान के एक शांत आवासीय इलाके की उनकी यात्रा को दिखाया गया है, जो लोकप्रिय कार्टून के नोबिता और डोरेमोन की दुनिया से काफी मिलता-जुलता है।  

इंस्टाग्राम पर शेयर किया वीडियो 
इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर @sarthaksachdevva नामक हैंडल से शेयर किया गया है। इसमें सार्थक कैमरा अपनी ओर घुमाते हुए उत्साह से कहा कि वह इस घर को देखने के लिए भारत से जापान तक का लंबा सफर तय करके आए हैं। इसके बाद वीडियो में संकरी गलियों, छोटे घरों और शांत सड़कों के मनोरम दृश्य दिखाए गए, जिन्हें देखकर दर्शकों को तुरंत डोरेमॉन के जाने-पहचाने दृश्यों की याद आ गई।मोहल्ले से गुज़रते हुए, सार्थक ने उन बारीकियों की ओर इशारा किया जिन्हें पुराने प्रशंसक तुरंत पहचान गए। एक सड़क की ओर इशारा करते हुए उन्होंने समझाया कि दर्शकों ने नोबिता को श्रृंखला में अनगिनत बार “ठीक इसी सड़क” से स्कूल जाते, दोस्तों से मिलते या खेल के मैदान की ओर भागते हुए देखा है।

हूबहू वैस ही दिखा नजारा 
मोहल्ले का शांत वातावरण, साफ-सुथरी सड़कें और सादगीपूर्ण घर उस सौम्य, रोजमर्रा की सुंदरता को दर्शाते थे जिसने डोरेमॉन को पीढ़ियों से दर्शकों के लिए इतना सुकून भरा बना दिया था। वीडियो के कई दृश्य कार्टून के दृश्यों से हूबहू मिलते-जुलते थे, जिससे यह दौरा पर्यटन की बजाय बचपन की यादों में खो जाने जैसा महसूस हुआ। वीडियो के कैप्शन में लिखा था, “वास्तविक जीवन में डोरेमोन के ठिकाने।” हालांकि डोरेमॉन की कहानी टोक्यो में घटित होती है, लेकिन कई प्रशंसक इसकी दृश्य शैली को श्रृंखला की निर्माता फुजिको एफ. फुजियो से जुड़े वास्तविक जीवन के स्थानों से जोड़ते हैं, जिनका जन्म ताकाओका में हुआ था।

यूजर्स को भी पसंद आया वीडियो 
यह वीडियो स्कूल के बाद डोरेमॉन देखते हुए बड़े हुए लोगों के बीच तेज़ी से ऑनलाइन वायरल हो गया। कई दर्शकों ने माना कि मोहल्ले को असल ज़िंदगी में देखकर वे भावुक हो गए, और कई लोगों ने इसे बचपन का सपना सच होने जैसा बताया। कई लोगों ने कहा कि यह क्लिप उन्हें डोरेमोन के गैजेट्स, नोबिता के कारनामों और उस दुनिया की सादगी भरे एहसास की याद दिलाती है जो आज भी सालों बाद भी बेहद जानी-पहचानी लगती है। एक यूजर ने सिर्फ “रोंगटे खड़े हो गए” लिखा, जबकि दूसरे ने कहा, “सुनहरे दिन।” एक तीसरे व्यक्ति ने कहा, “डोरेमॉन से जुड़ी हमारी बचपन की भावनाएं,” जबकि चौथे व्यक्ति ने कहा, “इस वीडियो ने मेरा दिन बना दिया।”

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