ग्वालियर में जनभागीदारी जनगणना अभियान की बैठक, महिला विंग के 31 सदस्य नियुक्त

आज जनभागीदारी जनगणना कार्य की मीटिंग डॉ अजित जैन के ग्वालियर निवास पर हुई जिसमें जनगणना कार्य में जनजागृति अभियान से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्णय लिए गए। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए राष्ट्रीय संयोजक डॉ अजित  जैन ने इस कार्य के लिए महिला इकाई के 31 सदस्यों का गठन करते हुए भारत के संपूर्ण नगरों में कार्य हेतु महिला विंग को यह जिम्मेदारी सौंपी । महिला विंग के सभी पदाधिकारीगण और सदस्यों ने शपथ ली कि वे 15 दिवस में ही सभी नगरों में अपनी अपनी टीम गठित करके अति शीघ्र ही यह कार्य प्रारंभ कर देंगी।

मप्र में सेवानिवृत्त कर्मचारी केस,सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद भी भुगतान लंबित, उठे सवाल

शासकीय अधिकारियों की हठधर्मिता

माननीय उच्चतम न्यायालय का भी आदेश नहीं मान रहे अधिकारी।
मप्र सरकार में ऐसे अधिकारियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जो माननीय न्यायालयों के आदेशों के प्रति टाल-मटोल का रवैया अपना रहे हैं। और ऐसी फायलो पर बजाय आदेश क्रियान्वयन के एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय घुमाया जाता है। इस तरह के अनेकों प्रकरण इस दफ्तर से उस दफ्तर में घूमते मिल जाएंगे । ऐसा ही एक प्रकरण 2016 में भोपाल से सेवानिवृत्त हुई श्रीमती लाजवर का है। सेवानिवृत्त होंने के पश्चात उनसे अधिक भुगतान वसूली की गई। न्याय दृष्टांतों के विपरीत होंने से माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर की प्रिंसीपल बैंच ने वसूली आदेश निरस्त कर वसूली गई राशि 8 प्रतिशत व्याज सहित याचिकाकर्ता को भुगतान करने के आदेश पारित किए। किन्तु प्रशासन द्वारा आदेश का पालन न कर माननीय उच्चतम न्यायालय में अपील दाखिल की गई। यह अपील माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 12-2-2026 को निरस्त करते हुए प्रिंसीपल बैंच जबलपुर का आदेश पालन करने का आदेश दिया गया। किंतु तीन माह व्यतीत होने के बाद भी आवेदिका को भुगतान नहीं किया गया है। शासन को इस मुद्दे पर गहराई से विचार करना चाहिए कि माननीय न्यायालय द्वारा निर्णीत प्रकरणों में इस प्रकार की लापरवाही और उदासीनता के पीछे की मंशा क्या हो सकती है? यह गंभीर प्रश्न है।
SLP(c)no. 030907/2025

श्योपुर में बड़ा हादसा, मजदूरों से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटी, 40 घायल

 श्योपुर

मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले से एक बड़े हादसे की खबर आ रही है। यहां आवदा थाना इलाके के भोजका गांव के पास तेंदूपत्ता तोड़कर लौट रहे मजदूरों से भरी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली अनियंत्रित होकर पलट गई। इस दर्दनाक हादसे में ट्रॉली में सवार करीब 40 मजदूर घायल हो गए हैं।

बताया जा रहा है कि सभी मजदूर काम खत्म करके वापस लौट रहे थे, तभी यह हादसा हुआ। घटना के बाद मौके पर चीख-पुकार मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस और स्थानीय प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची। सभी घायलों को तुरंत जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां 6 मजदूरों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। पुलिस मामले की जांच में जुट गई है।

 

खंडवा में मासूम पर कुत्तों का हमला, 6 डॉग्स ने 50 मीटर तक घसीटा

खंडवा

 जिले के छैगांव माखन ब्लाक अंतर्गत ग्राम सुरगांव जोशी में आवारा श्वानों के हमले से छह वर्षीय मासूम गंभीर रूप से घायल हो गया। बच्चे की हालत इतनी गंभीर हो गई कि उसे खंडवा से इंदौर रेफर करना पड़ा, जहां उसकी प्लास्टिक सर्जरी तक करनी पड़ी। घटना के बाद क्षेत्र में दहशत का माहौल है और ग्रामीणों ने प्रशासन से आवारा कुत्तों की समस्या के स्थायी समाधान की मांग की है।

जानकारी के अनुसार अवि पुत्र अनिल पटेल, निवासी ग्राम चिचगोहन भेरू खेड़ा, अपनी बुआ के घर सुरगांव जोशी आया हुआ था। 14 मई को दोपहर करीब एक बजे वह घर के बाहर शौच के लिए गया था। इसी दौरान वहां घूम रहे 6 से 7 आवारा श्वानों ने उसे घेर लिया और हमला कर दिया। कुत्ते बच्चे को करीब 50 मीटर दूर खेत तक घसीटकर ले गए और बुरी तरह नोच डाला।

एमपी पुलिस में 10 हजार पदों पर भर्ती की तैयारी, परीक्षा एजेंसी पर अभी संशय

भोपाल

भोपाल में 11 मई को केएफ रुस्तम जी सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पुलिस आरक्षकों सहित पुलिस में 10 हजार पदों पर शीघ्र भर्ती किए जाने की घोषणा की। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि भर्ती कर्मचारी चयन मंडल (ईएसबी) से होगी या पुलिस भर्ती बोर्ड से। पुलिस मुख्यालय भी भ्रम की स्थिति में है। मुख्यालय ने भर्ती का प्रस्ताव शासन को भेज दिया है। इसमें 1,041 पद उप निरीक्षक और सूबेदारों के भी हैं।

भर्ती बोर्ड के गठन का प्रस्ताव अब भी लंबित
भर्ती प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने के बाद चयन की प्रक्रिया प्रारंभ होनी है। पुलिस मुख्यालय के अधिकारी चाहते हैं कि इसके पहले भर्ती बोर्ड गठित हो जाए जिससे तेज गति से इन पदों पर भर्ती की जा सके।

मुख्यमंत्री ने पिछले वर्ष अप्रैल में पुलिस मुख्यालय में एक बैठक के दौरान पुलिस भर्ती बोर्ड बनाने के लिए कहा था, जिससे भर्तियों में देरी नहीं हो। घोषणा के एक माह बाद पुलिस मुख्यालय ने शासन को प्रस्ताव भी भेज दिया था, पर तब से परीक्षण ही चल रहा है।

गृह विभाग करेगा व्यवहार्यता का अध्ययन
अब गृह विभाग के नए एसीएस संजय शुक्ला प्रस्ताव का परीक्षण करेंगे। इसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) और विधि विभाग के साथ बैठक कर प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, गृह विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बोर्ड बनाने के संबंध में व्यवहार्यता (फिजिबिलिटी) अध्ययन किया जा रहा है। शीघ्र ही गठन को लेकर निर्णय हो जाएगा।

अन्य राज्यों की तर्ज पर तैयारी
बता दें, मुख्यमंत्री ने प्रतिवर्ष 7500 पदों के मान से तीन वर्ष में 22,500 पदों पर भर्ती करने के लिए कहा है। ईएसबी में अन्य परीक्षाओं का दबाव होने के कारण कई बार लिखित परीक्षा आयोजित कराने में देरी होती है। इसी कारण पुलिस भर्ती बोर्ड बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, आंध्र प्रदेश सहित 15 से अधिक राज्यों में पुलिस की भर्ती के लिए अलग भर्ती बोर्ड बने हुए हैं।

 

MP में शक्ति प्रदर्शन करने वाले नेताओं पर सख्ती, पीएम मोदी की अपील अनसुनी पड़ने पर तलब

भोपाल 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कह दिया था कि नेता सादगी से काम करें और बड़े-बड़े काफिले न निकालें। वहीं, मध्यप्रदेश में कई भाजपा नेताओं ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया। सैकड़ों गाड़ियों के साथ दौरे किए, जेसीबी से फूल बरसवाए और पूरे इलाके में जाम जैसे हालात बना दिए थे। इन सबके वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए हैं।

अब पार्टी ने इसे गंभीरता से लिया है। मध्यप्रदेश भाजपा सरकार और संगठन ने ऐसे सात नेताओं को दिल्ली से फटकार लगाने के बाद भोपाल तलब किया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने 17 मई को इन नेताओं को बुलाया है। वन टू वन बात होगी और संतोषजनक जवाब न मिला तो कार्रवाई होगी।

दिल्ली स्थित भाजपा हाईकमान ने भी पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। 15 मई को पीएम की अपील के बावजूद नेताओं द्वारा वाहन रैलियां निकालने और कार्रवाई नहीं होने का मुद्दा उठाया था। इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश भाजपा से जवाब मांगा।

8-9 जगह निकलीं वाहन रैलियां, आलाकमान नाराज
सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री की 10 मई की अपील के बाद भी मध्य प्रदेश में 8-9 स्थानों पर बड़े वाहन काफिलों के साथ स्वागत रैलियां निकाली गईं। इसे सीधे पीएम की अपील की अवहेलना माना जा रहा है। प्रदेश भाजपा ने तत्काल कदम उठाते हुए संबंधित नेताओं को 17 मई को भोपाल बुलाया है।

बैठक में संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी, मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी और अन्य जिम्मेदार नेता मौजूद रहेंगे। नेताओं से पूछा जाएगा कि पीएम की अपील के बावजूद रैलियां क्यों निकाली गईं। जवाब संतोषजनक नहीं होने पर आगे कार्रवाई भी हो सकती है।

इन पर पहले ही हो चुकी है कार्रवाई
    सज्जन सिंह यादव (भिंड जिला किसान मोर्चा अध्यक्ष) – सौ वाहनों के काफिले के साथ बग्घी पर सवार होकर रैली निकाली। नियुक्ति रद्द कर दी गई।

    सौभाग्य सिंह ठाकुर (मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम अध्यक्ष) – 700 गाड़ियों का काफिला लेकर उज्जैन से भोपाल आए। कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। कुछ अधिकार छीन लिए गए।

इन नेताओं की रैलियों पर सवाल उठे, भोपाल तलब किया

    टिकेंद्र प्रताप सिंह (देवास जिला किसान मोर्चा अध्यक्ष) – 200 गाड़ियों (कुछ वापस लौटीं) के साथ जिला कार्यालय पहुंचे।

    पवन पाटीदार (ओबीसी मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष) – 24 गाड़ियों का काफिला लेकर चंबल दौरे पर गए।

    वीरेंद्र गोयल (सिंगरौली विकास प्राधिकरण अध्यक्ष) – 30 से ज्यादा गाड़ियों का काफिला, खुद ई-रिक्शा में बैठे।

    रेखा यादव (महिला आयोग की अध्यक्ष) – छतरपुर में सैकड़ों लग्जरी गाड़ियों का काफिला निकाला, ट्रैफिक जाम हुआ।

    सत्येंद्र भूषण सिंह (लघु उद्योग निगम अध्यक्ष) – खुद ई-रिक्शा से आए, पर समर्थकों का बड़ा कार-बाइक काफिला साथ चला।

    राकेश सिंह जादौन (खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड उपाध्यक्ष) – ई-रिक्शा से पहुंचे, लेकिन पीछे काफिला होने की खबर है।.

मुख्यमंत्री ने काफिले से कम कर दिए 5 वाहन

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुद अपने काफिले से 5 वाहन कम कर दिए हैं। डिप्टी सीएम व अन्य मंत्रियों ने भी काफिले में गाड़ियां कम की है। पार्टी अब इस बात पर जोर दे रही है कि प्रधानमंत्री की अपील सभी स्तरों पर लागू होनी चाहिए।

17 मई को भोपाल में होने वाली पूछताछ के बाद अनुशासनहीनता पाए जाने पर और कार्रवाई हो सकती है। भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी अनुशासन बनाए रखने के लिए किसी भी नेता को छूट नहीं देगी।

‘मैं घोर सनातनी हूं…’ धर्म और भोजशाला पर दिग्विजय सिंह-उषा ठाकुर के बीच जुबानी जंग, Video वायरल

 इंदौर

“मैं घोषणा करता आया हूं और आज फिर कह रहा हूं कि मैं घोर सनातन धर्म का मानने वाला हूं।” पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ यह कहा बल्कि भाजपा विधायक उषा ठाकुर को यह भी कह दिया कि मेरे कहने के बाद ही आपने सनातन धर्म को स्वीकार किया, पहले आप हिंदू-हिंदू धर्म करती थीं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और भाजपा विधायक उषा ठाकुर शनिवार को इंदौर में एक-दूसरे से मिले। इस बीच धर्म पर चर्चा छिड़ी और उनके संवाद का वीडियो शनिवार को वायरल हो गया।

दिग्विजय-उषा ठाकुर की मुलाकात

शुक्रवार देर रात कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह इंदौर पहुंचे थे। रेसीडेंसी कोठी में ठहरे सिंह शनिवार सुबह जब निकल रहे थे तो परिसर में उनकी मुलाकात भाजपा विधायक उषा ठाकुर से हुई। औपचारिक मुलाकात के दौरान उषा ठाकुर ने दिग्विजय सिंह का स्वागत करते हुए उन्हें “बड़े भाई” कहकर पुकारा।

इसके बाद दिग्विजय सिंह ने कहा, “मैं घोर सनातन को मानने वाला हूं, मेरे कहने के बाद आपने सनातन कहना शुरू किया।” इस पर उषा ठाकुर ने जवाब दिया, “हम अनादि काल से सनातनी हैं।” दिग्विजय सिंह ने कहा, “अनादि काल से सनातनी तो तुम हो, हम क्या दुश्मन हैं उसके।”

नर्मदा परिक्रमा, एकादशी व्रत और भोजशाला फैसले पर चर्चा

बातचीत के दौरान दिग्विजय सिंह ने उषा ठाकुर से पूछा, “तुमने नर्मदा परिक्रमा की है क्या?” इस पर उषा ठाकुर ने कहा, “नहीं करी।” फिर दिग्विजय ने पूछा, “एकादशी का व्रत करती हो क्या?” उषा ठाकुर ने जवाब में कहा, “आप व्यक्तिगत रूप से तो पक्के सनातनी हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं करते।” इस पर दिग्विजय सिंह ने तुरंत कहा, “मैं सार्वजनिक रूप से ही तो कह रहा हूं, अब और कैसे सार्वजनिक करूं? मैं सही सनातनी हूं।”

बातचीत के दौरान उषा ठाकुर ने हाई कोर्ट के भोजशाला फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि सिंह को फैसले का सम्मान करना चाहिए। इस पर दिग्विजय सिंह ने कहा, “तूने कैसे मान लिया कि मैंने विरोध किया?” उषा ठाकुर ने कहा, “अब ये किसी ने बोला…” तो दिग्विजय सिंह मुस्कुराते हुए बोले, “किसी ने बोला…!” दोनों नेताओं के बीच यह संवाद राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

एक व्यक्ति एक पद की पैरवी

शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे के पास संगठन का पद है और निगम में नेता प्रतिपक्ष का भी। दिग्विजय सिंह ने एक व्यक्ति एक पद की बात छेड़ते हुए किसी एक पद को त्यागने की सलाह कांग्रेसियों के बीच दे दी। दरअसल दोपहर में भोजन के लिए सिंह पूर्व शहर कांग्रेस अध्यक्ष सुरजीत सिंह चड्डा के घर पहुंचे थे।

वहां उन्होंने कहा कि मैंने कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी व संगठन के अन्य जिम्मेदारों को भी एक व्यक्ति एक पद की नीति लागू करने का सुझाव दिया है, क्योंकि दो पदों की जिम्मेदारी पर कोई भी व्यक्ति एक साथ न्याय नहीं कर सकता। दिग्विजय सिंह ने जब यह बात कही उस दौरान शहर के तमाम कांग्रेसी भी उनके साथ मौजूद थे।

 

मध्य प्रदेश में शहीद परिवारों को बड़ा सम्मान, हर कोर्स में पत्नी और बच्चों के लिए सीट आरक्षित

भोपाल

प्रदेश में अब पुलिस और होमगार्ड की सेवा दे रहे कर्मचारियों, अधिकारियों की ड्यूटी के दौरान शहादत पर उनके परिजनों को ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए सरकार हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में सीट रिजर्व करेगी। उच्च शिक्षा विभाग ने इसके लिए आदेश जारी कर दिए हैं।

इस व्यवस्था में तय किया गया है कि अगर किसी शहीद की पत्नी या उसके पुत्र या पुत्री को ग्रेजुएशन की पढ़ाई करनी है तो ऐसे लोगों के लिए हर पाठ्यक्रम में कम से कम एक सीट रिजर्व रखी जाएगी और उन्हें एडमिशन दिया जाएगा।

उच्च शिक्षा विभाग ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों और सभी महाविद्यालयों के प्राचार्यों को इस संबंध में पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि प्रवेश मार्गदर्शिका 2026-27 में एक अतिरिक्त सीट का आरक्षण करना अनिवार्य है। यह अतिरिक्त सीट प्रदेश के सभी स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में आरक्षित रखी जाएगी। इसमें पुलिस, होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा (सिविल डिफेंस) के शहीदों की विधवा और उनके आश्रित बच्चों के लिए रिजर्वेशन दिया जाएगा।

आयुक्त उच्च शिक्षा ने कहा है कि हर स्नातक पाठ्यक्रम में स्वीकृत सीट के अलावा एक सीट सुपर न्यूमेरेरी सीट बनाई गई है। यह सीट नियमित सीट्स की संख्या को प्रभावित नहीं करेगी यानी प्रवेश के लिए जितनी सीट्स पहले से तय हैं उनकी संख्या में कोई कमी नहीं होगी।

ये होंगे इस अतिरिक्त सीट के लिए पात्र

    उच्च शिक्षा विभाग ने कहा है कि जो अतिरिक्त सीट तय की गई है उसमें केवल ऐसे उम्मीदवार पात्र होंगे जो पुलिस, होमगार्ड या नागरिक सुरक्षा के शहीद की विधवा या उनके आश्रित पुत्र या पुत्री होंगे।

    इसके लिए सक्षम प्राधिकारी घोषित किए गए गृह विभाग या अन्य संबंधित विभाग द्वारा जारी आश्रित होने का प्रमाण पत्र और अन्य सामान्य प्रवेश संबंधी दस्तावेज लिए जाएंगे।

    ऐसे उम्मीदवार को ऑनलाइन प्रवेश पोर्टल पर अलग कैटेगरी या विकल्प के माध्यम से आवेदन करना होगा।

    हर पाठ्यक्रम में अधिकतम एक अतिरिक्त सीट ही इसके लिए दी जा सकेगी।

    यदि एक से अधिक पात्र अभ्यर्थी हैं तो मेरिट के आधार पर चयन किया जाएगा।

    यदि किसी पाठ्यक्रम में पात्र उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होता है तो सीट रिक्त रखी जाएगी। यह सीट किसी अन्य श्रेणी या अभ्यर्थी को आवंटित नहीं की जाएगी।

मोहन कैबिनेट में बड़े फेरबदल की अटकलें, रिपोर्ट कार्ड के आधार पर कई मंत्रियों की छुट्टी तय?

भोपाल
 मध्य प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री Mohan Yadav के नेतृत्व वाली सरकार 13 जून को अपने ढाई साल पूरे करने जा रही है, लेकिन उससे पहले सत्ता के गलियारों में कैबिनेट फेरबदल की चर्चाओं ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। खबर है कि बीजेपी आलाकमान ने सरकार और संगठन दोनों की परफॉर्मेंस का फीडबैक लेना शुरू कर दिया है। 17 और 18 मई को पार्टी के केंद्रीय समीक्षक भोपाल पहुंचेंगे, जहां मंत्रियों के कामकाज का विस्तृत रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो इस बार समीक्षा सिर्फ औपचारिक नहीं होगी, बल्कि मंत्रियों के विभागीय प्रदर्शन, जिलों में पकड़, संगठन के साथ तालमेल और जनता के बीच उनकी छवि तक का आकलन किया जाएगा। माना जा रहा है कि जिन मंत्रियों का प्रदर्शन कमजोर पाया जाएगा, उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस संभावित फेरबदल की जद में कुछ बड़े और वरिष्ठ चेहरे भी आ सकते हैं।

आमने-सामने होगी जवाबदेही की परीक्षा
पार्टी सूत्र बताते हैं कि मंत्रियों को व्यक्तिगत रूप से बैठाकर उनसे सवाल-जवाब किए जाएंगे। चर्चा का फोकस सिर्फ योजनाओं की फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों में कितने सक्रिय हैं, संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ उनका व्यवहार कैसा है और जनता के बीच सरकार की छवि मजबूत करने में उनकी भूमिका कितनी प्रभावी रही है। समीक्षक मंत्रियों द्वारा पेश किए गए दावों की जमीनी हकीकत भी जांचेंगे। यही रिपोर्ट आगे कैबिनेट में बने रहने या बाहर होने का आधार बन सकती है।

मॉनसून सत्र से पहले हो सकता है बड़ा बदलाव
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जुलाई में प्रस्तावित मॉनसून सत्र से पहले कैबिनेट में बड़ा बदलाव संभव है। वर्तमान में मोहन कैबिनेट में चार पद खाली हैं। ऐसे में सिर्फ विस्तार ही नहीं, बल्कि कई मंत्रियों की छुट्टी और नए चेहरों की एंट्री का रास्ता भी साफ हो सकता है। बताया जा रहा है कि पार्टी 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अभी से नई रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे नेताओं को मौका देने की तैयारी है, जिन्हें संगठन और सरकार दोनों में संतुलन बनाने वाला माना जाता है।

पुराने दिग्गजों की वापसी के संकेत
कैबिनेट विस्तार को लेकर जिन नामों की चर्चा है, उनमें कुछ पूर्व मंत्री और लंबे समय से संगठन में सक्रिय चेहरे भी शामिल बताए जा रहे हैं। पिछले ढाई साल से कई नेता सत्ता और संगठन में बड़ी जिम्मेदारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब उन्हें मौका देकर पार्टी क्षेत्रीय और जातीय समीकरण साधने की कोशिश कर सकती है।

बीजेपी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि अगर अभी बदलाव होता है, तो नए मंत्रियों को 2028 चुनाव से पहले करीब दो साल का पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे वे अपने क्षेत्रों में सरकार की पकड़ मजबूत कर सकें।

सत्ता और संगठन दोनों की अग्निपरीक्षा
मध्य प्रदेश बीजेपी के लिए आने वाले महीने बेहद अहम माने जा रहे हैं। एक तरफ संगठन सरकार के प्रदर्शन को कसौटी पर कस रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष भी सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में मोहन कैबिनेट का संभावित फेरबदल सिर्फ मंत्रियों की अदला-बदली नहीं, बल्कि 2028 के चुनावी रण की शुरुआती बिसात माना जा रहा है।

भोजशाला केस क्यों है अयोध्या-काशी से अलग? मां सरस्वती की रहस्यमयी मूर्ति से जुड़ी धार से लंदन तक की पूरी कहानी

धार

सौ बात की एक बात ये कि भोजशाला पर कोर्ट के फ़ैसले की ख़बर तो पब्लिक ने सुन ली कि हाई कोर्ट ने उसको मां सरस्वती का मंदिर माना है, लेकिन ज़्यादातर लोग मां सरस्वती की उस मूर्ती का रहस्य नहीं जानते जो माना जाता है कि वहां हुआ करती थी. कहां और क्या है वो मूर्ति जो मिली भोजशाला में? धार के लोग भले ही कहानी जानते हों लेकिन बाक़ी जगहों के लोगों को ज़्यादा नहीं पता है. और ये भी ज़्यादा जानकारी नहीं है कि ये केस अयोध्या, काशी या मथुरा वाले मामले से अलग था. अब भी वैसे ये हाई कोर्ट का फ़ैसला है और मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट तो शायद जाएगा ही. तो अभी हाई कोर्ट ने इसे मां सरस्वती का मंदिर बता दिया है, मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां से भी फ़ैसला आ जाएगा, लेकिन क्या राजा भोज की स्थापित मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की मूर्ति अब भी है? है तो कहां है? वो कहानी भी जाननी ज़रूरी है। 

धार से लंदन तक की कहानी
मध्य प्रदेश का धार परमार राजवंश की राजधानी हुआ करती थी आज से कोई 1000 साल पहले. वहां पर है ये भोजशाला जिसको लेकर सारा विवाद था. भोजशाला भी कहते हैं, मां वाग्देवी का मंदिर भी कहते हैं और मुसलमान इसको कमाल मौला की मस्जिद कहते आ रहे थे. लेकिन ये इमारत बाक़ी मंदिरों-मस्जिदों की तरह नहीं है क्योंकि ये प्राचीन धरोहरों का संरक्षण करने वाली एजेंजी ASI के अधीन है. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के संरक्षण में है. यानी पुरातत्व विभाग. वो इसकी देखरेख करता है. और आज से नहीं. 1909 से. यानी 100 साल से भी ज़्यादा पहले से, अंग्रेज़ों के ज़माने से। 

राजभोज और भोजशाला की कहानी
इसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा करने की इजाज़त थी और शुक्रवार को मुसलमानों को. लेकिन विवाद बना हुआ था और फिर एक सायंटिफ़िक सर्वे करवाया गया था जिसकी रिपोर्ट दो साल पहले कोर्ट को दी गई थी और उसी के आधार पर फ़ैसला आया है. इमारत जो है वो 11वीं सदी की मानी जाती है. हिंदू पक्ष का मानना है कि ये सरस्वती मंदिर था जो परमार राजवंश के राजा भोज ने बनवाया था. राजा भोज का शासन था साल 1000 से 1055 तक. और राजा भोज के राज में संस्कृत का बहुत अध्ययन होता है. तो हिंदू पक्ष मानता है कि यहां मां वागदेवी यानी सरस्वती का मंदिर स्थापित किया गया था और ये जो पूरा कॉम्प्लेक्स जो था जिसको भोजशाला कहते हैं, ये संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र हुआ करता था. जिसको बाद में 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी से लेकर 15वीं सदी में महमूद शाह खिलजी तक ने तोड़ा और बर्बाद किया और मंदिर की जगह पर कमाल मौला मस्जिद बना दी गई थी। 

भोजशाला पर मुसलमानों की क्या दलील
मुसलमानों का पक्ष ये था कि ये सूफ़ी संत कमालुद्दीन चिश्ती की दरगाह थी, जिनकी मृत्यु 13वीं सदी में धार में ही हुई थी और उनकी मज़ार के पास ही ये मस्जिद बन गई थी. ब्रिटिश राज के टाइम धार एक रियासत हुआ करती थी और महाराजा सर उदाजी राव पुआर द्वितीय के शासनकाल में 1909 में इस कॉम्प्लेक्स को अंग्रेज़ों की ASI के संरक्षण में दे दिया गया था. आज़ादी के बाद 1951 में इसको मॉन्युमेंट ऑफ़ नैशनल इंपॉर्टेंस, राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया गया था. और फिर इस घटनाक्रम में सबसे अहम फ़ैसला जो हुआ था वो हुआ था 2003 में जब ASI ने ये व्यवस्था की कि मंगलवार को हिंदू पूजा कर सकेंगे और शुक्रवार को मुसलमान. इस व्यवस्था से दोनों पक्ष ख़ुश नहीं थे और मामला अदालत में चल रहा था जिसपर हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि ये मंदिर ही था और मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने का अधिकार नहीं होगा. लेकिन जो समझने वाली बात है वो ये कि ये केस बाक़ी मामलों से अलग कैसे था। 

मां सरस्वती के सबूत
एक तो इस मामले में कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं था. दूसरा ये अग्रेज़ों के ज़माने से ही पुरातत्व विभाग के पास था. और तीसरा ये कि इस विवाद ने भले ही 1992 में अयोध्या में ढांचा गिराये जाने के बाद तूल पकड़ा हो लेकिन ये विवाद 1902 से चला आ रहा था. 2024 में जो ASI का सर्वे हुआ उसकी रिपोर्ट कहती है कि ये जो खंभों पर खड़ा हुआ बड़ा हॉल है ये एक पुराने मंदिर के अवशेषों से बना हुआ दिखता है. खंभों पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां नज़र आती हैं, मां सरस्वती की स्तुति में संस्कृत में शिलालेख दिखते हैं, परमार राजवंश के समय के पत्थर मिलने की बात है और हवन कुंड दिखता है. साथ ही कमाल मौला की दरगाह भी दिखती है और फ़ारसी में लिखी हुई भी पंक्तियां नज़र आती हैं. 1902 में धार रियासत जो थी उसमें शिक्षा के अधीक्षक होते थे के. के. लेले. कहते हैं उस टाइम वहां अग्रेज़ वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न को धार आना था तो उनकी यात्रा के लिए इस जगह पर एक दस्तावेज़ तैयार किया था के. के. लेले साहब ने. और भोजशाला नाम इस दस्तावेज़ में पहली बार मिलता है। 

भोजशाला, धार और अंग्रेजों की एंट्री
उससे पहले जो अंग्रेज़ आए 1822 में, जॉन मैल्कम 1888 में विलियम किनकेड, उन्होंने इस जगह के बारे में लिखते हुए भोजशाला नाम का इस्तेमाल नहीं किया था. लेकिन पास ही में राजा भोज के महल से कई चीज़ें विलियम किनकेड को मिल चुकी थीं. राजा भोज परमार वंश के बहुत बड़े और विद्वान राजा माने जाते थे. वो ज्ञान, कला, विज्ञान और साहित्य के बहुत बड़े प्रेमी थे. और सबसी बड़ी बात तो ये कि उन्होंने खुद 84 किताबें लिखी थीं और 100 से ज्यादा मंदिर बनवाए. राजा भोज मां सरस्वती, जिन्हें मां वाग्देवी भी कहते हैं, उनके के बहुत बड़े भक्त माने जाते थे. ये तो आप जानते ही हैं कि सरस्वती ज्ञान, विद्या, वाणी और कला की देवी हैं. इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी धार में एक बड़ा शिक्षा केंद्र बनवाया. इसी को के. के. लेले ने अपने दस्तावेज़ में भोजशाला नाम दिया था. कहते हैं कि ये 1035 में वसंत पंचमी के दिन बनकर तैयार हुआ. भोजशाला सिर्फ एक शाला नहीं थी, बल्कि कहते हैं कि ये सरस्वती सदन भी था, यानी मां सरस्वती का मंदिर भी था. और राजा भोज ने मां वाग्देवी की एक सुंदर मूर्ति स्थापित की थी.  मूर्ति को भोजशाला के मुख्य स्थान पर रखा गया ताकि छात्र-छात्राएं पहले मां सरस्वती की पूजा करें, फिर पढ़ाई करें। 

भोजशाला मतलब ‘विद्या की काशी’
माना जाता है इस भोजशाला में दूर-दूर से छात्र आते थे. यहां संस्कृत व्याकरण, विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और कला पढ़ाई जाती थी. और भोजशाला धार शहर का गौरव था. तो अब सवाल ये था कि वो मूर्ति भी तोड़ दी गई थी? जब आक्रमणकारियों ने धार पर हमला किया था? या मूर्ति ढहा दी गई? आज़ादी के बाद प्रसिद्ध पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने खोज शुरू की तो उनको पता चला कि 1875 में ब्रिटिश अधिकारी मेजर किंकेड को धार के पुराने महल के खंडहर से बहुत कुछ मिला था. और वो सब उन्होंने इंग्लैंड भिजवा दिया था. पता चला कि मेजर किंकेड को जो मिला था वो लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखा हुआ है. डॉक्टर वाकणकर ने राजा भोज की ख़ुद की लिखी किताबों का अध्ययन किया हुआ था. उनमें एक किताब ख़ास थी। 

लंदन में है मां सरस्वती की मूर्ति?
किताब का नाम था ‘समरांगण सूत्रधार’. राजा भोज ने ये किताब लिखी थी मंदिर बनाने की विद्या पर. डॉक्टर वाकणकर 1961 में लंदन गए. ब्रिटिश म्यूज़ियम पहुंचे. वहां एक हॉल में वो चीज़ें थीं जो धार के महल से मिली थीं विलियम किंकेड को. एक मूर्ति थी. वाग्देवी की मूर्ति. डॉक्टर वाकणकर ने उसका अध्ययन किया. उसको नापा. फोटो खींचे. फिर शिलालेख पढ़े. और फिर राजा भोज की लिखी मंदिर के वास्तुशास्त्र की किताब से मैच किया. मूर्ति की मुद्रा, आभूषण, 11वीं सदी की कलाकारी.  सब मैच कर रहा था. और उन्होंने सब प्रमाणों के साथ साबित कर दिया कि ये वही मूर्ति है जो ख़ुद राजा भोज ने स्थापित की थी भोजशाला में. ये भोजशाला से ना मिलकर धार के महल के खंडहर से कैसे मिली इसकी भी कई थ्योरियां हैं. लेकिन मूर्ति पर शिलालेख में राजा भोज का नाम और वाग्देवी का ज़िक्र है. और ये 11वीं सदी की शैली में बनी है, जो ठीक राजा भोज के काल से मेल खाती है। 

मां सरस्वती की मूर्ति की मूर्ति पर विवाद नहीं
तो भोजशाला का केस भले ही अब सुप्रीम कोर्ट में चला जाए. लेकिन जिसपर विवाद नहीं है वो है मां सरस्वती की मूर्ति. कोर्ट ने भी कहा है कि भारत सरकार को वो मूर्ति लाने की कोशिश तेज़ करनी चाहिए और ब्रिटिश सरकार से बात करनी चाहिए उसके लिए. कई बार सरकार ने कोशिश तो की है लेकिन उस कोशिश का कुछ हुआ नहीं है अभी तक. क्योंकि भोजशाला मंदिर है ये तो फ़ैसला अदालत ने सुना दिया, लेकिन मंदिर की देवी को जब मंदिर में स्थान मिलेगा वही तो असली ऐसतिहासिक दिन होगा. कोहिनूर को अंग्रेज़ों से वापस लेना ये तो सब बोलते रहते हैं, लेकिन वो तो एक रत्न ही है. ये तो देवी हैं. वो धरोहर है जो निस्संदेह हमारी है, भोजशाला की है, धार की है, देश की है. सौ बात की एक बात। 

 

 

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