तमिलनाडु में नया सियासी विवाद: फिल्म प्रोड्यूसर को दिल्ली में विशेष प्रतिनिधि बनाया गया

चेन्नई
तमिलनाडु सरकार के एक फैसले ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कारोबारी और फिल्म प्रोड्यूसर के. वेंकट नारायण को नई दिल्ली में तमिलनाडु का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया है। इस पद को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है। विपक्ष ने इस नियुक्ति को लेकर सरकार पर सवालों की बौछार कर दी है।
एक साल के लिए बनाया गया नया पद

राज्य सरकार की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, यह पद फिलहाल एक साल के लिए बनाया गया है। मुख्य सचिव एम. साई कुमार ने इस संबंध में आदेश जारी किया। नियुक्ति की बाकी शर्तों की घोषणा बाद में की जाएगी।

क्या होता है स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव का काम?
नई दिल्ली में तमिलनाडु के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव की जिम्मेदारी केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच तालमेल बनाने की होती है।

इस पद पर बैठा व्यक्ति मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों की बैठकों का समन्वय करता है, केंद्र की योजनाओं और फंडिंग पर नजर रखता है, नीति से जुड़े मामलों की निगरानी करता है और संसद सत्र के दौरान राज्य के सांसदों के साथ समन्वय बनाने में मदद करता है।

अब तक इस अहम पद पर आमतौर पर अनुभवी राजनेताओं की नियुक्ति होती रही है।
कौन हैं के. वेंकट नारायण?

के. वेंकट नारायण बेंगलुरु स्थित KVN ग्रुप के चेयरमैन हैं। उनकी कंपनी रियल एस्टेट और एंटरटेनमेंट सेक्टर में काम करती है।

वह पहले प्रेस्टीज ग्रुप के CEO भी रह चुके हैं। साल 2020 में उन्होंने KVN प्रोडक्शंस की शुरुआत की और अब वही कंपनी मुख्यमंत्री विजय की आखिरी फिल्म ‘जना नायकन’ को प्रोड्यूस कर रही है। माना जा रहा है कि राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने से पहले यह विजय की अंतिम फिल्म होगी।
विपक्ष ने उठाए सवाल

इस नियुक्ति को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा है।
DMK के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने कहा कि तमिलनाडु के हितों की रक्षा करने वाले इतने अहम पद पर एक फिल्म प्रोड्यूसर की नियुक्ति करना उस पद की गरिमा को कम करता है।

वहीं BJP के तमिलनाडु अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने सवाल उठाया कि कर्नाटक से करीबी संबंध रखने वाला व्यक्ति दिल्ली में तमिलनाडु का प्रभावी प्रतिनिधित्व कैसे करेगा। उन्होंने इसे राज्य के लोगों के साथ “बड़ा विश्वासघात” बताया।

AIADMK ने आरोप लगाया कि सरकार कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के इशारों पर काम कर रही है, जबकि AMMK प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने कहा कि सरकार प्रशासनिक योग्यता के बजाय निजी करीबी लोगों को बड़े पद दे रही है।
TVK ने किया बचाव

विजय की पार्टी TVK ने विपक्ष के आरोपों को खारिज कर दिया।
पार्टी नेताओं का कहना है कि वेंकट नारायण ने फिल्म ‘जना नायकन’ के निर्माण के दौरान विजय का मुश्किल समय में साथ दिया था और यह नियुक्ति उसी सहयोग के प्रति आभार जताने का तरीका है।

पार्टी का यह भी कहना है कि वेंकट नारायण को बड़े कॉर्पोरेट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट संभालने का लंबा अनुभव है, इसलिए उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।

पहले ज्योतिषी, अब प्रोड्यूसर… बढ़ा विवाद
यह पहली बार नहीं है जब मुख्यमंत्री विजय अपने करीबी लोगों की नियुक्तियों को लेकर विवादों में आए हैं।

इससे पहले उनके लंबे समय से मैनेजर रहे जगदीश पलानीस्वामी को प्राइवेट सेक्रेटरी (पॉलिटिकल) बनाया गया था।

वहीं ज्योतिषी रिकी राधन पंडित वेट्रिवेल को ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (पॉलिटिकल) (OSD) नियुक्त किया गया था, लेकिन भारी आलोचना के बाद सरकार को वह फैसला वापस लेना पड़ा।

दिल्ली में राहुल गांधी के ‘गुमशुदा’ पोस्टर, सियासत तेज—किसने लगाए सवाल अनसुलझा

नई दिल्ली
कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लेकर दिल्ली के कुछ इलाकों में पोस्टर लगे हैं। इन पोस्टर्स में राहुल गांधी को ‘गुमशुदा’ बताया गया है। इसमें उनके नाम के साथ पहचान का भी जिक्र किया गया है। दिल्ली के फिरोजशाह रोड समेत कई जगह पर राहुल गांधी के गुमशुदा होने के पोस्टर सामने आए हैं। जैसे ही ये पोस्टर सामने सवाल उठा कि आखिर इसे किसने लगाया है। ऐसा इसलिए क्योंकि पोस्टर में इसे लगवाने वालों को संदर्भ में कोई जानकारी नहीं दी गई है। उधर बीजेपी ने कांग्रेस नेता के इस पोस्टर पर निशाना साधा है।

राहुल गांधी के ये पोस्टर किसने लगवाए?
दिल्ली में राहुल गांधी के गुमशुदा होने के पोस्टर रविवार को नजर आए। यह सब ऐसे वक्त में हुआ है जब केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी की कथित विदेश यात्रा को लेकर उन पर लगातार हमले कर रही है। एक दिन पहले ही केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि जब भी संसद, चुनाव या उनकी पार्टी को उनकी जरूरत होती है, तो वह गायब रहते हैं। यही नहीं राहुल गांधी ‘एक और विदेश यात्रा’ पर चले जाते हैं।

बीजेपी के निशाने पर राहुल गांधी
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इस संबंध में कांग्रेस सांसद पर तीखा हमला किया है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के लिए LoP का मतलब ‘Leader of the Opposition’ (विपक्ष के नेता) नहीं, बल्कि ‘Leader of Paryatan (लीडर ऑफ पर्यटन) and Partying’ (पर्यटन और पार्टी करने वाले नेता) है। शहजाद पूनावाला ने एक वीडियो बयान में कहा कि राहुल गांधी को LoP का नाम बदलकर ‘Leader of Paryatan and Partying’ कर देना चाहिए क्योंकि वह हमेशा यही करते हैं- पार्टी करना, घूमना-फिरना और यात्रा करना।

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने क्या कहा
    बीजेपी प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों से ज्यादा विदेश यात्राओं को अहमियत देते हैं।
    उन्होंने ये भी दावा किया कि वह लोगों, संसद या देश को प्राथमिकता नहीं देते। वह घूमना-फिरना ज्यादा पसंद करते हैं।
    बीजेपी नेता बोले- अहम मौकों पर, जब पार्टी को संगठनात्मक मदद की जरूरत होती है, तो वह बाहर चले जाते हैं।
    ‘संसद सत्र के दौरान भी वह चले जाते हैं। राहुल गांधी हमेशा छुट्टियों के मूड में रहते हैं।’
    शहजाद पूनावाला ने ये टिप्पणी ऐसे समय में की है जब राष्ट्रीय राजधानी में कई अहम जगहों पर राहुल गांधी की तस्वीर के साथ ‘गुमशुदा’ लिखे पोस्टर देखे गए। यह तुरंत पता नहीं चल सका कि ये पोस्टर किसने लगाए थे।

पीएम मोदी और राहुल गांधी की तुलनाकर ये बोले पूनावाला
शहजाद पूनावाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता के बीच तुलना की और दावा किया कि बार-बार विदेश यात्राओं के कारण राहुल गांधी ‘सबसे लंबे समय तक विपक्ष के नेता’ बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि एक तरफ, प्रधानमंत्री मोदी देश के सबसे लंबे समय तक चुने गए प्रधानमंत्री बन गए हैं। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के तौर पर, सरकार के प्रमुख के रूप में 9,000 से ज्यादा दिनों तक उन्होंने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली है। इसे ही काम करने का तरीका या सेवा भाव कहते हैं। दूसरी तरफ, राहुल गांधी सबसे लंबे समय तक विपक्ष के नेता बन सकते हैं क्योंकि वह तो बस छुट्टियों पर ही रहते हैं।”

 

अमित शाह की नागा विधायकों से बैठक पर मणिपुर की सियासत गरमाई, कांग्रेस ने उठाए सवाल

नई दिल्ली
केंद्रीय गृहमंत्री शाह ने शनिवार को मणिपुर के नागा समुदाय के विधायकों के साथ बैठक की। इस बैठख में नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो मौजूद थे, लेकिन इस बैठक के बाद अटकलों का दौर तब शुरू हुआ जब कांग्रेस की मणिपुर इकाई ने सवाल उठाया कि आखिर विधायकों और गृहमंत्री की बैठक के बीच मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह मौजूद क्यों नहीं थे? कांग्रेस ने सवाल उठाया कि आखिर मणिपुर के नागा विधायकों और केंद्रीय गृहमंत्री के

बीच में बैठक मणिपुर सीएम के बिना कैसे आयोजित हो सकती है?
इस बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए मणिपुर कांग्रेस ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा। कांग्रेस विधायक दल के नेता केशम मेघचंद्र सिंह ने कहा कि इस बैठख के बाद भाजपा के नेतृत्व वाली मणिपुर सरकार के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। विधायकों और केंद्रीय गृहमंत्री के बीच की बैठक से मुख्यमंत्री को अलग रखना यह पद की गरिमा और उसके अधिकार को कम करता है। इसके साथ ही उन्होंने विधायकों के साथ केंद्रीय गृहमंत्री से मिलने के लिए पहुंचे उप मुख्यमंत्री लोसी दीखो पर भी सवाल उठाया।

विधायकों को अपने मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं- कांग्रेस
मेघचंद्र ने कहा, “यह बैठक दिखाती है कि उपमुख्यमंत्री लोसी दीखो और नागा विधायकों को अपने ही मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं है। इसलिए तो वह बिना मुख्यमंत्री के सीधे नागा विधायकों से मिलने के लिए पहुंचे हैं।” इसके अलावा उन्होंने बैठक में मौजूद नागालैंड के मुख्यमंत्री पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य का प्रशासन राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होना चाहिए न कि पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री के द्वारा आखिर

मणिपुर के विधायकों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व नागालैंड के सीएम ने क्यों किया?
दूसरे उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन पर कटाक्ष करते हुए मेघचंद्र ने कहा कि राज्य में पर्याप्त सुरक्षा होने के कबाद भी डिप्टी सीएम का दिल्ली में रहना यह दिखाता है कि उनकी प्राथमिकता क्या है। वह राज्य की नहीं केंद्र की राजनीति करना चाहते हैं। इतना ही नहीं मेघचंद्र ने सीएम को कागजी शेर करार देते हुए कहा कि राज्य के शासन पर उनका प्रभाव खत्म हो गया है।

कांग्रेस की तरफ से उठाए गए इन सवालों का अभी तक भारतीय जनता पार्टी की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है।

मोदी कैबिनेट में बड़े फेरबदल की अटकलें, युवाओं और महिलाओं को मिल सकता है ज्यादा प्रतिनिधित्व

नई दिल्ली
 केंद्र सरकार में फेरबदल की अटकलें तेज हो चली हैं। बताया जा रहा है कि इस फेरबदल के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि राजनीतिक संदेश के नजरिए से इस फेरबदल में तीन अहम मतदाता समूहों युवा, पिछड़ी जातियों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कई सांसदों को शामिल किए जाने की उम्मीद है।

फेरबदल के जरिये बड़ा संदेश देने की कोशिश
विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों और नीट पेपर लीक मामले पर सरकार के खिलाफ रुख के मद्देनजर इस फेरबदल के जरिये बड़ा संदेश देने की कोशिश की जाएगी। बताया जा रहा है कि जहां एक दर्जन से ज्यादा राज्य मंत्रियों की जगह युवा सांसदों (शायद कुछ अपने पहले कार्यकाल वाले भी) को लाया जा सकता है, वहीं मोदी लोकसभा में महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की अपनी कोशिश के तहत मंत्रिपरिषद में महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ा सकते हैं।

यूपी में कायम रखना चाहेंगे पिछड़ी जातियां को समर्थन आधार
उत्तर प्रदेश में किसी भी चुनावी जीत के लिए पिछड़ी जातियां आधार होती हैं, इसलिए उम्मीद है कि प्रधानमंत्री जुलाई 2021 के फेरबदल वाले तरीके को ही अपनाएंगे और अलग-अलग पिछड़ी जातियों के सांसदों को शामिल करेंगे, ताकि अगले साल की शुरुआत में होने वाले चुनावों में उनके बीच पार्टी का समर्थन आधार बना रहे।

राजनीतिक विजन और नैरेटिव तय करना चाहेगी बीजेपी
वहीं बीजेपी और उसके NDA गठबंधन के सूत्रों का कहना है कि इस कवायद से राजनीतिक विजन और नैरेटिव तय हो सकता है, जो मोदी के तीसरे कार्यकाल के बाकी समय में केंद्र के कामकाज और उससे भी अहम, 2029 के लोकसभा चुनावों और उससे पहले होने वाले कई विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी की चुनावी रणनीति को आकार देगा। हालांकि यह देखना बाकी है कि क्या इसमें बेरोजगारी पर काबू पाने, ईंधन की बढ़ती कीमतों और बार-बार परीक्षा के पेपर लीक होने जैसे मामलों में केंद्र के खराब रिकॉर्ड के लिए जवाबदेही भी तय की जाएगी या नहीं।

यूपी में INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर तनाव, कांग्रेस ने 50-50 हिस्सेदारी की मांग रखी

नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर INDIA गठबंधन के भीतर अभी से शह और मात का खेल शुरू हो गया है। कांग्रेस के नवनियुक्त उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने जिम्मेदारी संभालते ही समाजवादी पार्टी (सपा) के सामने ‘बराबर-बराबर’ सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग रख दी है। गौतम ने न सिर्फ आधी सीटों पर दावा ठोका, बल्कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की जमकर तारीफ भी की जिसने यूपी की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक गौतम ने साफ-साफ कहा, “व्यक्तिगत रूप से मैं चाहूंगा कि गठबंधन में दोनों पार्टियों की बराबर की हिस्सेदारी हो। हालांकि, जब दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत होगी तब अंतिम फैसला होगा। मुझे पहले से कोई घोषणा करने का अधिकार नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से आधी सीटों के लिए अपनी बात मजबूती से रखेंगे।”

403 सीटों का गणित
उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। अगर इतिहास पर नजर डालें तो ठीक 10 साल पहले भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय सपा ने 298 और कांग्रेस ने 105 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि, कई सीटों पर दोनों के बीच ‘फ्रेंडली फाइट’ भी हुई थी और अंततः बीजेपी की प्रचंड लहर में वह गठबंधन बिखर गया था।

इसके बाद दोनों दल लोकसभा चुनावों में साथ आए, जहां उन्हें बड़ी सफलता मिली। यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से सपा ने 62 पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस ने 17 में से 6 सीटों पर कब्जा जमाया।

दावों और उम्मीदों का टकराव
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के उत्साह से लबरेज कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में सपा से करीब 150 सीटों की मांग कर सकती है। शुरुआती संकेतों की मानें तो समाजवादी पार्टी कांग्रेस को 70 से 80 से ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है। ऐसे में राजेंद्र पाल गौतम का ‘बराबर हिस्सेदारी’ वाला बयान सीधे तौर पर अखिलेश यादव की पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जब 2017 में सपा सत्ता में थी, तब भी उन्होंने कांग्रेस को 105 सीटें दी थीं तो इस बार उनका हिस्सा और बड़ा होना चाहिए। कांग्रेस रणनीतिकारों को लगता है कि चूंकि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने की रेस में हैं, इसलिए वे कांग्रेस को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाएंगे। उनका मानना है कि यदि कांग्रेस को गठबंधन में मजबूत भूमिका मिलती है तो वह सपा के पाले में दलित और ब्राह्मण वोटों का ट्रांसफर आसानी से करवा सकती है।

मायावती पर डोरे और कांसीराम कार्ड
राजेंद्र पाल गौतम ने बातचीत के दौरान बसपा प्रमुख मायावती को भी साथ आने का न्योता दिया। उन्होंने कहा, “संविधान और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए बहुजन समाज के मुद्दों पर काम करने वाले सभी लोगों को इस दमनकारी मनुवादी सरकार के खिलाफ एकजुट होना चाहिए।” मायावती की तारीफ करते हुए गौतम ने कहा, “बहनजी हमारे समाज की एक बड़ी और कद्दावर नेता हैं, हम उनका सम्मान करते हैं। वे हमेशा एक मजबूत नेता रही हैं। समझ नहीं आता कि आज उनकी क्या मजबूरियां हैं

दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने ही राजेंद्र पाल गौतम अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ बिना किसी तय कार्यक्रम के लखनऊ में मायावती के घर पहुंचे थे, हालांकि तब उनकी मुलाकात नहीं हो पाई थी।

चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते कद को रोकने की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय से आने वाले सांसद चंद्रशेखर आजाद का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में दलित समुदाय के ही राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का जिम्मा सौंपकर कांग्रेस एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है। वह मायावती के छिटक रहे दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ-साथ चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव को भी नियंत्रित करना चाहती है। यही वजह है कि अब कांग्रेस के कार्यक्रमों में मान्यवर कांसीराम की तस्वीरें भी दिखाई देने लगी हैं।

भले ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच बेहतर तालमेल की वजह से अंत में कोई बीच का रास्ता निकल आए, लेकिन नए प्रभारी के इन बयानों ने समाजवादी पार्टी के भीतर असहजता जरूर पैदा कर दी है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज 2 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि सपा ने 111 सीटें जीती थीं। अब देखना होगा कि जमीन पर कमजोर सांगठनिक ढांचे के बावजूद कांग्रेस का यह बराबर का दांव कितना कामयाब होता है।

मोदी कैबिनेट में बड़े फेरबदल की चर्चा, शक्तिकांत दास को वित्त मंत्री बनाए जाने की अटकलें

 नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में फेरबदल को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संसद के मॉनसून सत्र से पहले कैबिनेट में बड़ा फेरबदल हो सकता है। इस फेरबदल में कई मंत्रियों को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। वहीं विवादों में रहे मंत्रियों के पोर्टफोलियो में भी बदलाव किया जा सकता है। चर्चा यह भी है कि पूर्व आईएएस अधिकारी और आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास को वित्त मंत्री बनाया जा सकता है और निर्मला सीतारमण को शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा मिल सकता है। बता दें कि NEET पेपर लीक मामले के बाद धर्मेंद्र प्रधान का विरोध तेज हो गया है। कई संगठन उनके इस्तीफे का मांग कर रहे हैं। ऐसे में मोदी कैबिनेट में फेरबदल करके बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।

मोदी कैबिनेट के संभावित नए मंत्री
1- नीतीश कुमार

2- शक्तिकांत दास

3- सुखेंदु शेखर राय

4- तरुण चुग

5- राघव चड्ढा

6- श्रीकांत शिंदे

7- अनुराग ठाकुर
इनके बदल सकते हैं पोर्टफोलिया, या फिर बाहर का रास्ता

1- मनोहरलाल खट्टर

2- रवनीत सिंह बिट्टू

3- अश्विनी वैष्णव

4- धर्मेंद्र प्रधान

5- निर्मला सीतारमण

6- हरदीप सिंह पुरी

7- नितिन गडकरी

शक्तिकांत दास के अनुभव का फायदा उठाना चाहती है सरकार?
पूर्व आईएएस और आरबीआई गवनर्र शक्तिकांत दास इस समय 69 साल के हैं। सरकार के साथ काम करने और वित्तीय मामलों का उनका लंबा अनुभव है। अगर उन्हें वित्त मंत्री बनाया जाता है तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री सीडी देशमुख की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। सीडी देशमुख आरबीआई के पहले गवर्नर थे और उन्हें 1950 से 1956 तक वित्त मंत्री के तौर पर काम करने का मौका मिला। वहीं डॉ. मनमोहन सिंह 1982 से 1985 तक आरबीआई गवर्नर रहे। इसके बाद 1991 से 1996 तक देश के वित्त मंत्री रहे। इसके बाद 2004 से 2014 तक वह देश के प्रधानमंत्री भी रहे। डॉ. मनमोहन सिंह ऐसे अकेले ही व्यक्ति थे जो कि आरबीआई गवर्नर, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री रह चुके हैं।

शक्तिकांत दास की बात करें तो वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। हालांकि उन्हें 6 महीने के अंदर ही राज्यसभा भेजा जा सकता है। अटकलें हैं कि उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजा जा सकता है। नवंबर 2026 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटें खाली हो जाएंगी।

क्यों वित्त मंत्रालय के लिए योग्य माने जा रहे शक्तिकांत दास?
शक्तिकांत दास को वित्त मंत्री के पद के लिए योग्य माना जा रहा है। उन्हें टैक्स और निवेश के साथ ही आर्थिक नीति की गहरी जानकारी है। इसके अलावा वित्त मंत्रालय में काम करते हुए वह 8 बजट तैयार करने में शामिल रह चुके हैं। इसके अलावा 2018 से 2024 तक आरबीआई गवर्नर रहने के दौरान उन्हें वैश्विक स्तर पर भी पहचान मिली। उन्हें A+ रेटिंग के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार भी मिले हैं।

विधानसभा चुनावों का भी रखा जाएगा ध्यान
कैबिनेट में फेरबदल में आने वाले यूपी, पंजाब के विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखा जाएगा। नीट पेपर लीक के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान विवादों में घिर गए हैं। ऐसे में उनपर कार्रवाई हो सकती है। वहीं पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की जगह भी पंजाब से राघव चड्ढा या फिर किसी सिख चेहरे को लाया जा सकता है। पंजाब में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं।

पंजाब से इस समय रवनीत सिंह बिट्टू केंद्रीय मंत्रिमंडल में हैं। वहीं राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी जा सकती है। इसके अलावा नए चेहरों में महाराष्ट्र से श्रीकांत शिंदे का नाम शामिल हो सकता है जो कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बेटे है। श्रीकांत शिंदे ही शिवसेना यूबीटी के 6 सांसदों को एनडीए के साथ लेकर आए हैं। वहीं टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में जाने वाले सुखेंदु शेखर को भी केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह दी जा सकती है।

कैबिनेट रीशफल में सबकी निगाहें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर टिकी होंगी। हालांकि अटकलें यही हैं कि निर्मला सीतारमण को कैबिनेट से बाहर नहीं किया जाएगा बल्कि शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जाएगी। वहीं धर्मेंद्र प्रधान को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। वहीं कई जानकारों का कहना है कि अगर धर्मेंद्र प्रधान से शिक्षा मंत्रालय ले लिया जाता है तो यह संदेश जाएगा कि सरकार झुक गई है। इसके अलावा नौकरशाही से कैबिनेट में आए दो मंत्रियों की भूमिका कम की जा सकी है। इनमें अश्विनी वैष्णव और हरदीप सिंह पुरी शामिल हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मंत्रिमंडल में होने वाले फेरबदल में आरएसएस की पसंद का ध्यान रखा जा सकता है। बीते दिनों आरएसएस के पदाधिकारियों के साथ बीजेपी की बैठक भी हुई थी। विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए रवनीत बिट्टू को पंजाब में चुनाव का जिम्मा दिया जा सका है और तरुण चुग को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है।

तमिलनाडु में बड़ा सियासी बदलाव: एमडीएमके ने डीएमके से 9 साल पुराना गठबंधन तोड़ा

 चेन्नई
तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। मरुमलारची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके) ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के साथ अपना 9 साल पुराना गठबंधन आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया है।

यह फैसला आज पार्टी की जनरल काउंसिल की बैठक में लिया गया। हालांकि, एमडीएमके ने अभी औपचारिक रूप से सत्ताधारी टीवीके (टीवीके) के नेतृत्व वाले मोर्चे में शामिल होने की घोषणा नहीं की है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके साफ संकेत मिल रहे हैं।

मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार का स्वागत
अपनी जनरल काउंसिल बैठक में पारित प्रस्तावों में एमडीएमके ने मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार का स्वागत किया। इसके साथ ही पार्टी ने नई सरकार से अपने प्रमुख चुनावी वादों पर अडिग रहने का आग्रह किया, जिसमें भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना और मेकेदातू बांध परियोजना जैसे मुद्दों पर तमिलनाडु के अधिकारों की रक्षा करना शामिल है।

हालांकि, पार्टी के प्रस्तावों में टीवीके (टीवीके) गठबंधन में शामिल होने का कोई सीधा जिक्र नहीं किया गया है, भले ही तमाम राजनीतिक संकेत इसी दिशा में इशारा कर रहे हैं।

डीएमके पर लगाए गंभीर आरोप
गठबंधन से बाहर निकलने के फैसले को सही ठहराते हुए एमडीएमके ने आरोप लगाया कि डीएमके के भीतर एमडीएमके को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही थीं। पार्टी ने यह दावा भी किया कि एआईएडीएमके को सरकार बनाने में मदद करने के लिए एक गुप्त योजना पर काम चल रहा था, जिसके कारण एमडीएमके के लिए इस गठबंधन में बने रहना नामुमकिन हो गया था।

दूसरी तरफ, डीएमके ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। डीएमके के सैयद हफीजुल्लाह ने कहा यह डीएमके ही थी जिसने एमडीएमके को विधानसभा और संसद में प्रतिनिधित्व दिलाने में मदद की।

वाइको के बेटे दुरई वाइको को एमडीएमके में आगे बढ़ाना ही पार्टी के कमजोर होने की असली वजह है, क्योंकि यह वंशवादी राजनीति के खिलाफ खुद वाइको के पुराने अभियानों के बिल्कुल विपरीत है।

एमडीएमके के दो विधायकों का बगावती रुख
यह घटनाक्रम जहां एक तरफ डीएमके के लिए एक झटका है, वहीं खुद एमडीएमके को भी इससे नुकसान उठाना पड़ा है। साल 2026 के विधानसभा चुनाव में डीएमके के उगते सूरज चुनाव चिह्न पर चुने गए एमडीएमके के दो विधायकों ने इस जनरल काउंसिल बैठक का बहिष्कार कर दिया।

इन विधायकों ने संकेत दिया है कि वे डीएमके के साथ ही बने रहेंगे। उनके इस फैसले का मतलब यह है कि अगर एमडीएमके औपचारिक रूप से टीवीके के साथ गठबंधन कर भी लेती है, तो भी सत्ताधारी दल की विधायी संख्या में तुरंत कोई बढ़ोतरी नहीं होगी और न ही कोई सीट खाली होगी जिससे उपचुनाव की नौबत आए।

टीवीके सरकार के साथ बढ़ती नजदीकियां
एमडीएमके के इस अलगाव के संकेत पहले ही मिल चुके थे, जब पार्टी ने टीवीके सरकार के विश्वास मत (Trust vote) के दौरान मतदान से दूरी बना ली थी। इसके बाद एमडीएमके प्रमुख वाइको, उनके बेटे और सांसद दुरई वाइको ने मुख्यमंत्री विजय और टीवीके के वरिष्ठ नेताओं के साथ कई बैठकें भी की थीं।

एमडीएमके के बाहर निकलने के बाद अब कांग्रेस, वीसीके, आईयूएमएल और एमडीएमके सत्ताधारी टीवीके के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। इस नई सरकार में कांग्रेस दो मंत्रियों के साथ गठबंधन सहयोगी बन चुकी है, जबकि VCK और IUML के पास कैबिनेट में एक-एक मंत्री पद है। वहीं, सीपीआई और सीपीएम जैसी वामपंथी पार्टियां बाहर से अल्पसंख्यक टीवीके सरकार को अपना समर्थन दे रही हैं।

डीएमके के भीतर अकेले चुनाव लड़ने की उठ रही मांग
यह सियासी बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब डीएमके के भीतर भी भविष्य के चुनाव अकेले दम पर लड़ने की आवाजें तेज हो रही हैं। सबसे पहले डीएमके सांसद कनिमोझी ने यह विचार सामने रखा था, जिसके बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री और डीएमके सांसद ए. राजा ने भी इसी सुर में अपनी बात दोहराई।

राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो वाइको को कभी पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि का राजनीतिक उत्तराधिकारी (Protege) माना जाता था। हालांकि, 1993 में उनकी बढ़ती लोकप्रियता और करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन के लिए एक चुनौती के रूप में देखे जाने के कारण उन्हें डीएमके से निष्कासित कर दिया गया था।
डीएमके के साथ उनका यह ‘खट्टा-मीठा’ रिश्ता सालों से उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जहां वे कई बार गठबंधन के अंदर और बाहर आते-जाते रहे हैं। अब एक बार फिर वाइको ने एमडीएमके की कश्ती को डीएमके के किनारे से अलग कर लिया है।

NDA में बदला सियासी गणित! नायडू-नीतीश के बिना भी बहुमत, शिंदे का बढ़ा कद, क्या बेटा बनेगा मंत्री?

नई दिल्ली

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे जब सामने आए थे, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) 240 सीटों पर सिमट गई थी। पूर्ण बहुमत के 272 के जादुई आंकड़े को छूने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ा था। उस वक्त 16 सांसदों के साथ चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी (TDP) और 12 सांसदों के साथ नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) ‘किंगमेकर’ बनकर उभरे थे। ऐसा माना जा रहा था कि तीसरी बार बनी मोदी सरकार की चाबी इन्हीं दोनों नेताओं के हाथ में है और इनके बिना NDA का बहुमत खतरे में पड़ सकता है। लेकिन, अब 2026 आते-आते सियासी समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। पश्चिम बंगाल और फिर महाराष्ट्र में एक ऐसा राजनीतिक भूचाल आया जिसने न सिर्फ मोदी सरकार को और मजबूत कर दिया है, बल्कि नायडू और नीतीश पर सरकार की निर्भरता को भी काफी हद तक कम कर दिया है।

महाराष्ट्र: ‘ऑपरेशन टाइगर’ से उद्धव गुट में बड़ी सेंधमारी
हाल ही में महाराष्ट्र की सियासत में ‘ऑपरेशन टाइगर’ के तहत एक बड़ा उलटफेर हुआ है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने उद्धव ठाकरे गुट (UBT) को तगड़ा झटका दिया है। उद्धव गुट के 6 लोकसभा सांसदों ने पाला बदलते हुए एकनाथ शिंदे गुट का दामन थाम लिया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर इन सांसदों ने आधिकारिक तौर पर अपना गुट बदल लिया है।

शिंदे गुट में शामिल होने वाले 6 सांसद:

    ओमप्रकाश राजेनिंबालकर (धाराशिव)
    नागेश पाटिल आष्टीकर (हिंगोली)
    संजय हरिभाऊ जाधव (परभणी)
    संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व)
    भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी)
    संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम)

इस बगावत के बाद लोकसभा में उद्धव गुट (UBT) के पास अब मात्र 3 सांसद बचे हैं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर सीधे 13 हो गई है। दल-बदल कानून से बचने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी, जिसे इन 6 सांसदों ने आसानी से पार कर लिया।

बंगाल में तो खेला ही हो गया, NDA में सबसे बड़ी पार्टी बनी NCPI
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद TMC ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। लोकसभा में TMC के 29 सांसदों में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी और महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया है। इस बड़ी बगावत की अगुवाई बारासात से सांसद काकोली घोष दस्तीदार और बीरभूम से सांसद शताब्दी रॉय जैसी कद्दावर नेता कर रही हैं। इन सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर आधिकारिक तौर पर NDA को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है।

दल-बदल कानून के तहत संसद सदस्यता रद्द होने के खतरे से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक बेहद चालाक रणनीतिक कदम उठाया है। कानूनन दल-बदल से बचने के लिए दो-तिहाई सांसदों का एक साथ आना जरूरी था। इन सभी ने ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नामक एक बेहद कम चर्चित और गैर-मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय पार्टी में अपने गुट का विलय कर लिया है। 2023 के आसपास पंजीकृत हुई यह गुमनाम सी पार्टी रातों-रात भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। 20 सांसदों के विलय के साथ ही यह अब लोकसभा में पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी और NDA के भीतर दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी बनकर उभरी है।

NDA का मजबूत अंकगणित और कैसे कम हुई निर्भरता?
शिंदे के 6 नए सांसदों और NCPI के 20 सांसदों के NDA में शामिल होने से गठबंधन का कुल आंकड़ा लोकसभा में काफी मजबूत हो गया है। 2024 में सरकार गठन के समय NDA के पास लगभग 293 सांसद थे। अब यह आंकड़ा 318 तक पहुंच गया है।

ऐसे में मौजूदा स्थिति यह है कि अगर आज चंद्रबाबू नायडू (16) और नीतीश कुमार (12) किसी बात पर नाराज होकर NDA से अपना समर्थन वापस भी ले लेते हैं, तब भी नए सांसदों और अन्य छोटे दलों के समर्थन से मोदी सरकार पूर्ण बहुमत (272) के आंकड़े के ऊपर ही रहेगी। यानी सरकार पर से ‘किंगमेकर्स’ का दबाव अब खत्म हो गया है।

लोकसभा में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक दलों और उनकी सीटों की मौजूदा स्थिति की टेबल नीचे दी गई है:

 

क्र. सं. राजनीतिक दल लोकसभा सीटें
1 BJP (भारतीय जनता पार्टी) 240
2 NCPI (नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) 20
3 TDP (तेलुगु देशम पार्टी) 16
4 SHS (शिवसेना – शिंदे गुट) 13
5 JD(U) (जनता दल – यूनाइटेड) 12
6 LJP(RV) (लोक जनशक्ति पार्टी – रामविलास) 5
7 JD(S) (जनता दल – सेक्युलर) 2
8 JSP (जनसेना पार्टी) 2
9 RLD (राष्ट्रीय लोक दल) 2
10 AD(S) (अपना दल – सोनेलाल) 1
11 AGP (असम गण परिषद) 1
12 AJSU (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) 1
13 HAM(S) (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा – सेक्युलर) 1
14 NCP (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी – अजीत पवार गुट) 1
15 SKM (सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा) 1
  कुल (Total NDA Seats) 318

NDA में बढ़ा शिंदे का रुतबा 

इस पूरे घटनाक्रम ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अंदर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का कद काफी बढ़ा दिया है। 2022 में विधायकों की बगावत के जरिए शिवसेना में दो फाड़ करने के बाद, अब लोकसभा में भी शिंदे ने यह साबित कर दिया है कि ‘असली शिवसेना’ उन्हीं के पास है और उनके पास जमीनी नेताओं का समर्थन है। 

मास्टरमाइंड श्रीकांत शिंदे को मिलेगा मंत्री पद का इनाम?

उद्धव गुट के सांसदों को तोड़ने वाले इस गुप्त अभियान ‘ऑपरेशन टाइगर’ को अंजाम तक पहुंचाने का श्रेय एकनाथ शिंदे के बेटे और कल्याण से लगातार तीसरी बार लोकसभा सांसद चुने गए डॉ. श्रीकांत शिंदे को दिया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कई महीनों से श्रीकांत शिंदे ही इस ऑपरेशन की रणनीति बना रहे थे। बागी सांसदों को दिल्ली लाने के लिए निजी विमान बुक करने से लेकर उनकी सुरक्षा और स्पीकर से मुलाकात तक का पूरा जिम्मा श्रीकांत शिंदे ने ही संभाला था।

अब दिल्ली के सियासी गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि मोदी सरकार में जल्द ही होने वाले कैबिनेट विस्तार में शिवसेना (शिंदे गुट) को इसका बड़ा इनाम मिल सकता है। NDA के कुनबे में 6 नए सांसद जोड़ने और गठबंधन को मजबूती प्रदान करने के ‘रिटर्न गिफ्ट’ के तौर पर श्रीकांत शिंदे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले शिंदे गुट के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत होगी। 

बंगाल में TMC का ‘एंडगेम’?

वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं है। एक तरफ राज्य विधानसभा में 60 से ज्यादा विधायकों ने अलग गुट बना लिया है और बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है। वहीं दूसरी तरफ, दिल्ली में उनकी पार्टी के दो-तिहाई से ज्यादा सांसद छिटक कर उस NDA के पाले में बैठ गए हैं, जिसके खिलाफ ‘दीदी’ ने पिछले एक दशक से सबसे मुखर राजनीति की है।

‘पार्टी से गद्दारी मां से धोखा देने जैसी’, ममता बनर्जी ने बागी नेताओं को दी कड़ी चेतावनी

कलकत्ता

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी ने शुक्रवार को पार्टी छोड़ने वाले नेताओं को खरी-खरी सुनाई है. उत्तर कोलकाता जिला तृणमूल कांग्रेस की वर्चुअल मीटिंग में ममता ने पार्टी छोड़कर जाने वालों और दल बदलने वाले विधायकों-सांसदों और पार्षदों को ‘गद्दार’ करार दिया है. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी ने किसी नेता को पहचान और सम्मान दिया, मुश्किल समय में उसे छोड़ देना वैसा ही है जैसे कोई अपनी बीमार मां का साथ छोड़ दे। 

ममता बनर्जी ने कहा, ‘जिस मां ने आपको पूरी जिंदगी पाला-पोसा, जब वही मां बीमार पड़ जाए तो उसकी सेवा करने से इनकार कर देना सबसे बड़ा विश्वासघात है. गद्दारों के लिए कोई माफी नहीं है. आज वे खुद को बचा सकते हैं, लेकिन आने वाले समय में जनता भी उनसे हिसाब मांगेगी और पार्टी के कार्यकर्ता भी। 

मौजूद राजनीतिक माहौल डर और आर्थिक संकट से भरा

बैठक की शुरुआत में कार्यकर्ताओं का अभिवादन करते हुए ममता ने मौजूदा राजनीतिक माहौल को डर और आर्थिक संकट से भरा बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार लगातार विपक्ष को निशाना बना रही है. उन्होंने कहा, ‘हर तरफ दमन का माहौल है. एक के बाद एक मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं. लोग डर के कारण आत्महत्या तक करने को मजबूर हो रहे हैं. फुटपाथ दुकानदारों की दुकानें तोड़ी जा रही हैं. कई लोगों की नौकरियां चली गई हैं और उनके सपने टूट रहे हैं। 

ममता ने दावा किया कि इस संकट का सामना केवल एकजुट तृणमूल कांग्रेस ही कर सकती है. उन्होंने कहा कि भाजपा द्वारा पैदा किए गए इस माहौल में पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं, बीएलओ और जमीनी कैडर ने अपनी जान जोखिम में डालकर संघर्ष किया है. ‘आज जो लोग सत्ता में हैं, उनकी सफलता के पीछे हमारे कार्यकर्ताओं का खून-पसीना और बलिदान है। 

पार्टी के साथ विश्वासघात करना अक्षम्य
टीएमसी प्रमुख ने दल-बदलने वाले नेताओं पर आरोप लगाया कि वे अपने खिलाफ चल रहे मामलों और परिवार की संपत्ति बचाने के लिए भाजपा का दामन थाम रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग सिर्फ खुद और अपने परिवार को बचाने के लिए पार्टी छोड़ रहे हैं. उनमें धैर्य नहीं है. जिनके खिलाफ हम लड़ते रहे, उन्हीं के साथ जाकर खड़े हो गए. अगर वे सीधे भाजपा में चले जाते तो हमें इतनी आपत्ति नहीं होती, लेकिन पार्टी के साथ विश्वासघात करना अक्षम्य है। 

उन्होंने उन नेताओं पर भी निशाना साधा जो दावा करते हैं कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए पार्टी छोड़ी. ममता ने कहा, ‘वे कहते हैं कि कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए गए हैं, लेकिन अपने ही इलाके में एंट्री नहीं कर पा रहे. वे कार्यकर्ताओं को नहीं, बल्कि अपनी दौलत बचाने गए हैं. क्या वे आपका पैसा वापस लाएंगे? नहीं. उन्होंने धर्म, सांप्रदायिक सौहार्द और मूल्यों तक का सौदा कर दिया है और अब अहंकार के साथ घूम रहे हैं। 

ममता बनर्जी ने बागियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अभी भी जिन लोगों में समझ बाकी है, वे वापस लौट आएं. उन्होंने कहा, ‘जो लोग सोच रहे हैं कि वे इस रास्ते पर चलकर बच जाएंगे, वे अंत में कहीं के नहीं रहेंगे. न इधर के रहेंगे, न उधर के। 

जमीनी कार्यकर्ताओं को बताया महत्वपूर्ण
अपने भाषण में ममता ने बार-बार पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा, ‘कार्यकर्ता नेता बनाते हैं और नेता कार्यकर्ताओं को तैयार करते हैं. मैं हर दिन अपने कार्यकर्ताओं से मिलती हूं और वे मजबूती से हमारे साथ खड़े हैं.’ उन्होंने आरोप लगाया कि जिन नेताओं ने पार्टी छोड़ी, वे कार्यकर्ताओं के संघर्ष और बलिदान से लाभ उठाकर आज व्यक्तिगत हितों के लिए दल बदल रहे हैं. उन्होंने कहा, “हमने खून बहाया, संघर्ष किया. जो कठिन समय में हमारे साथ नहीं रहे, अगर वे पार्टी नहीं छोड़ते तो भाजपा हमारे कार्यकर्ताओं पर इतना अत्याचार करने की हिम्मत नहीं करती। 

ममता ने पुलिस और मीडिया पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में पुलिस का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा.’क्या पुलिस का काम लोगों से कहना है कि गाड़ी लेकर आए हैं, बैठो और उस शैतान के पास चले जाओ? पुलिस का कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन जो कुछ हो रहा है, वह पूरी तरह गैरकानूनी है। 

उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों को सभाओं और रैलियों की अनुमति नहीं दी जा रही है और सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है. उन्होंने कहा, “यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी बात रखने वाले लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है. क्या भाजपा का मतलब ‘वन पार्टी, वन नेशन’ है? हम इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। 

ममता बनर्जी ने अपने परिवार का जिक्र करते हुए कहा कि विश्वासघात की वजह से उन्होंने अपने दो भाइयों से संबंध तोड़ लिए थे, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा. उन्होंने कहा कि अभिषेक को लगातार सीआईडी, ईडी और सीबीआई के समन मिलते रहते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है. “मैं एयरपोर्ट जाती हूं तो भी उन्हें पहले से पता चल जाता है कि मैं कहां जा रही हूं। 

भाषण के अंत में ममता बनर्जी ने 21 जुलाई को होने वाली टीएमसी की शहीद दिवस रैली को सफल बनाने की अपील की. उन्होंने कहा, ‘इस रैली का आयोजन आसान नहीं होता, इसमें बहुत मेहनत और संघर्ष लगता है. लेकिन अगर सिर्फ पांच कार्यकर्ता भी आएंगे, तब भी हम यह सभा करेंगे. हमने कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया. 21 जुलाई के बाद सभी लोग एकजुट होकर आगे बढ़ें। 

उन्होंने भाजपा द्वारा मनाए जा रहे ‘संविधान हत्या दिवस’ का भी जिक्र किया और सवाल उठाया कि ‘आज संविधान और कानून का राज कहां है? लोग पुलिस के जरिए डराए और धमकाए जा रहे हैं. ऐसे समय में केवल जनता और हमारे कार्यकर्ता ही एकजुट होकर इसका मुकाबला कर सकते हैं। 

ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में टीएमसी के कई नेता भाजपा में शामिल हुए हैं और पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई जारी है. ऐसे में 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली से पहले ममता ने अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रहने और पार्टी छोड़ने वालों के खिलाफ सख्त संदेश देने की कोशिश की। 

दल-बदल मामले में कांग्रेस को बड़ा झटका, विधायक निर्मला सप्रे केस में हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज

 जबलपुर
हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने बीना विधानसभा सीट से विधायक निर्मला सप्रे से जुड़े बहुचर्चित दल-बदल विवाद में कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को इस मामले का शीघ्र निपटारा करने अथवा कोई विशेष निर्देश जारी करने से इन्कार करते हुए याचिका निरस्त कर दी।

कोर्ट ने साफ किया कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दल-बदल कानून के तहत दायर आवेदन पर विधिसम्मत सुनवाई जारी है और संबंधित पक्षों के बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं। ऐसे में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

उमंग सिंघार ने दायर की थी याचिका
दरअसल, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार की ओर से दायर याचिका में मांग की गई थी कि कांग्रेस से निर्वाचित विधायक निर्मला सप्रे के विरुद्ध दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई कर उनका निर्वाचन शून्य घोषित किया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया था कि लोकसभा चुनाव के दौरान वह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम में मंच साझा कर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हुईं और व्यवहारिक रूप से भाजपा का समर्थन करती रहीं।

विधायक सप्रे ने कहा कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली
वहीं विधायक सप्रे ने जवाब में कहा कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की है। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं। राज्य शासन ने भी कोर्ट को अवगत कराया कि विधानसभा अध्यक्ष मामले की सुनवाई कर रहे हैं और कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिससे न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़े।

18 जून को कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे सार्वजनिक कर दिया है। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, विधायक सप्रे की ओर से अधिवक्ता संजय अग्रवाल तथा याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल ने पैरवी की।

लंबे समय से लंबित है मामला, अब सुप्रीम कोर्ट जाएंगे : उमंग सिंघार
हाई कोर्ट जबलपुर द्वारा सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे के विरुद्ध दलबदल संबंधी मामले में विधानसभा अध्यक्ष को शीघ्र निराकरण के निर्देश के साथ याचिका निरस्त होने के बाद अब कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि लंबे समय से मामला विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट में निर्णय के लिए याचिका लगाई गई थी। नियम कहता है कि अध्यक्ष को आवेदन पर 90 दिनों में निर्णय करना है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई जाएगी।

 

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